अपनों का साथ! – डाॅ संजु झा

आशा जी  एक आम गृहिणी की भाॅंति अपने गाॅंव के बड़े मकान में सुकून के साथ रहतीं थीं।बच्चे,पति , परिवार,समाज ही उनकी दुनियाॅं थी। अपनों के साथ समय कैसे बीत जाता था, उन्हें  पता ही नहीं चलता।कहावत है परिवर्त्तन समय का नियम है।समय के साथ बच्चे बड़े होकर शहर की राह पकड़ चुके थे।

साल में एक-दो बार बच्चे छुट्टियों में गाॅंव आ जाते, उन्हीं सुनहरी यादों के सहारे पति -पत्नी का समय आराम से गुजर जाता।बेटी अंकिता शादी के बाद विदेश चली गई,बेटा आलोक दिल्ली में किसी इंटरनेशनल कंपनी में काम करता था।

उसके दो छोटे-छोटे बच्चे थे। कभी-कभार आशा जी पति के साथ बेटा-बहू के पास दिल्ली चले आते, परन्तु अपनों का साथ भी उन्हें शहर में ज्यादा दिन तक रोक नहीं पाता। कुछ समय बिताकर दंपत्ति पुनः गाॅंव वापस लौट आते।

वक्त की चाल को कोई समझ नहीं पाया है। अचानक से आशा जी की जिन्दगी में भूचाल आ गया।सहसा ही हृदयाघात से उनके पति की मृत्यु हो गई।आशा जी के जीवन का वो अंतिम पड़ाव था, जहाॅं स्त्री बिना जीवनसाथी के खुद को बेबस और लाचार पाती है। अब आशा जी की ऑंखों में रह-रहकर सूनापन दिखने लगा।

माॅं के दुःख को बेटा आलोक भलीभाॅंति महसूस कर रहा था।वापस शहर लौटते वक्त बेटे ने कहा -“माॅं!अब इतने बड़े घर में आपका अकेले रहना ठीक नहीं है।आप भी हमारे साथ चलिए!”

बच्चों और बहू ने भी साथ चलने की जिद्द कर दी।आशा जी  वर्षों से सहेजा हुआ घर   एकदम से छोड़ने को तैयार नहीं थीं, परन्तु खाली जीवन की खामोश दीवारों से डरकर बच्चों के साथ शहर आ गईं।

दिल्ली में एक बड़ी सोसायटी में बेटे ने तीन कमरे का फ्लैट ले रखा था।आशा जी को अपने गाॅंव के घर के समक्ष यह फ्लैट बौना प्रतीत हो रहा था, परन्तु उन्हें छोटे फ्लैट से कोई दिक्कत नहीं थी, यहाॅं केवल अकेलापन उन्हें बहुत अधिक खल रहा था।एक तो पति-वियोग,दूसरा फ्लैट की संस्कृति उन्हें रास नहीं आ रही थी।

सुबह-सुबह बेटे-बहू काम पर निकल जातें और बच्चे स्कूल।एक घंटे के लिए मेड आती, परन्तु उससे भी कोई बात-चीत नहीं हो पाती। शहरों की मेड को  भी  बात करने की फुर्सत नहीं होती। उन्हें भी जल्दी-जल्दी काम निपटाकर दूसरे घर जाना होता है।उसे आशा जी की मनःस्थिति से क्या मतलब?

आशा जी सोचतीं हैं -“गाॅंव में तो किसी को चाय-नाश्ता देकर एक घंटे तक बात-चीत कर लेतीं थीं, परन्तु यहाॅं तो सभी भाग-दौड़ में व्यस्त हैं। उन्हें महसूस होता कि कोई ऐसा दोस्त हो,जिससे अपने मन की बात कह सकें।जो उनके मन के घाव पर  सूई चुभोकर सारा मवाद निकालकर राहत दे दे।

जब तब उन्हें अपना घर याद आ जाता, जहाॅं वह किसी पक्षी की भाॅंति स्वतंत्र थीं। जहाॅं उनका अपना आसमान था,जिनके साथ वह अपने छोटे-मोटे सुख-दुख बाॅंटकर हल्की हो जाता करतीं थीं।

कभी धोबी,तो कभी सब्जीवाले,कभी पड़ोसियों  से बात कर मन बहला लेतीं।कभी उदास होने पर छत पर टहलने चलीं जातीं थीं, वहाॅं उन्हें ऐसा एहसास होता,मानो ठंढ़ी पुरवाई समंदर से आकर उनके गालों पर थपकी देकर सारी उदासी हर ले जाती हो।

दिल्ली में दिन-रात बिस्तर पर लेटे-लेटे और टेलीविजन देखकर परेशान हो जातीं।ऊपर से बेटे ने हिदायतें देते हुए कहा था -“माॅं! भूलकर भी अनजान आदमी के लिए दरवाजा नहीं खोलना है, यहाॅं बुजुर्गों के साथ आए दिन घटनाऐं घटतीं रहतीं हैं!”

आशा जी के मन में डर भी समा गया था,फिर भी कभी-कभार आधा दरवाजा खोलकर आशा जी देखने का प्रयास करतीं कि पड़ोस में कौन लोग हैं?बाहर तो कोई नजर नहीं आता,अगर धोखे से कोई दिख भी जाता तो नमस्ते करके निकल जाता।उनके बोल मुॅंह में ही रह जातें।

आशा जी थक-हारकर कोई पत्रिका लेकर पुनः बिस्तर पर लेट जातीं। बंद घर में उनसे समय काटे नहीं कटता। लेटे-लेटे उनकी ऑंखों में अपने गाॅंव, परिवार,समाज का दृश्य उपस्थित हो जाता। सुबह-सुबह उनके गाॅंव के बगीचे में सुवासित हवाऍं चला करतीं थीं। वृक्षों की हरियाली तन-मन में ऊर्जा भर देती।

ऑंगन में ही प्राची के क्षितिज पर भगवान भास्कर मुस्कराते हुए दिख जाते थे।बगीचे में हरी-हरी घास पर ओस की बूॅंदें मोती सदृश्य प्रतीत होतीं ।

सुबह-सुबह ऑंगन में दाना डालने पर पक्षियों का कलरव मच जाता। गाॅंव में दिन-भर लोगों का आना-जाना लगा ही रहता।रात होने से पहले कभी ऑंगन का दरवाजा नहीं बंद होता। किसी-किसी दिन वे इतना थक जातीं कि पति से कहतीं -“आज दिन-भर दो मिनट भी आराम करने का मौका नहीं मिला!”

यहाॅं शहर में आराम करते-करते ही थक जातीं हैं। उनके मन में रह-रहकर ख्याल आता -“अगर शहरों की जीवन‌शैली यही है,तो मैं कब तक इसे अपना पाऊॅंगी?”

वे ऊबकर बेटे से कहतीं -” बेटा!मुझे गाॅंव पहुॅंचा दो, वहाॅं मैं अकेली रह जाऊॅंगी।”

बेटा उन्हें समझाते हुए कहता -“माॅं!इस उम्र में अपने बच्चों का साथ ही सहारा होता है। गाॅंव में स्वास्थ्य सुविधाऍं नहीं हैं।कुछ भी होने पर आपको यहीं लाना पड़ेगा।आपके वहाॅं रहने से हमलोग भी चिन्तित रहेंगे।”

आशा जी को बेटे की बात में सच्चाई नजर आती। यहाॅं कम-से-कम बच्चों का तो साथ है, वहाॅं लोगों के रहते हुए भी घर में तो अकेलापन ही रहेगा। धीरे-धीरे आशा जी अपना दिल लगाने की कोशिश करतीं।

बेटा-बहू उनकी मनःस्थिति को भली-भाॅंति समझते थे।उन लोगों ने आशा जी  के दिल बहलाने के उपाय सोचने शुरू कर दिऍं।एक दिन बेटा आलोक ने बाल्कनी में पक्षियों के लिए दाना-पानी रख दिया।उनका पोता जोर से चिल्लाया -“दादी माॅं!देखो, यहाॅं भी ढ़ेर सारे पक्षी आ गए हैं!”

अगले दिन से आशा जी पक्षियों को दाना -पानी डालते हुए सोचतीं हैं -“यहाॅं बाल्कनी छोटी है,तो क्या हुआ?पक्षी तो यहाॅं भी आते हैं!”

छुट्टी दिन बहू उन्हें पार्क में ले जाकर हमउम्र  महिलाओं से दोस्ती करवा देती है और किट्टी कीर्त्तन पार्टी में भी शामिल करवा देती है। आशा जी किट्टी कीर्त्तन पार्टी में जाने से झिझकते हुए कहतीं हैं -“बहू! वहाॅं तो सभी आधुनिक परिधान में होंगी। मैं साड़ी में गॅंवार लगूॅंगी!”

बहू -“माॅं जी!अपने भारतीय परिधान में कोई गॅंवार नहीं होता है!आप बेहिचक वहाॅं जाईए।”

किट्टी कीर्त्तन में पहुॅंचकर आशा जी देखा कि अधिकांश महिलाओं ने साड़ी पहन रखी थीं तथा अधिकांश उन्हीं की हमउम्र थीं।ये सब देखकर उनको थोड़ी तसल्ली हुई। भजन-कीर्तन का कार्य-क्रम शुरू हो गया।आशा जी ने भी दो प्यारे भजन गाऍं।सभी महिलाओं ने ताली बजाकर उनका उत्साहवर्धन किया तथा सुबह-शाम पार्क में आने का आमंत्रण भी दिया।

अब आशा जी खुश होकर सहेलियों के साथ सुबह-शाम पार्क में टहलतीं।आपस में फोन पर एक-दूसरे के साथ आचार ,बड़ियाॅं, पापड़ तथा नए-नए व्यंजन बनाने की विधि पर बातें करतीं। कभी-कभी सहेलियों के साथ मंदिर और बाजार भी घूम आतीं।अब  

 अपने बच्चों और सहेलियों के साथ आशा जी का मन धीरे-धीरे रमने लगा।उनका मृतप्राय आत्मविश्वास जीवित हो उठा।अब उन्हें एहसास हो गया  कि अपनों का रिश्ता ऐसा मजबूत डोर से बॅंधा होता है कि उसकी डोर  में ही सभी रिश्ते समाहित हो जातें हैं।माॅं को खुश देखकर चुहल करते हुए बेटे ने कहा -“माॅं!आपको किस दिन गाॅंव पहुॅंचा दूॅं?”

आशा जी-“नहीं!अब गाॅंव में अकेली क्या करूॅंगी? यहाॅं तुम सभी अपनों का साथ है!”

बेटा -“माॅं! आपकी किट्टी की सहेलियों का भी तो साथ है!”

आशा जी ने बेटे की ओर देखकर मुस्कुरा दिया। सचमुच अगर अपनों का साथ हो तो बड़ी से बड़ी कठिनाईयाॅं भी छोटी हो जातीं हैं।

समाप्त।

लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)

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