सुमित्रा चार महीने से बिस्तर पर पड़ी हुई है ।बस लेटे रहना और खाना यही दिन चर्या बन गई है।अपने से कुछ कर नहीं सकती है ।बहु और बेटी सेवा में लगी रहती है ।व्हील चेयर पर बिठा कर बाथरूम ले जाना, नहलाना,सफाई सबकुछ के लिये दूसरे पर आश्रित हो गई है।बहुत तकलीफ होती है सोच कर क्या थी
और क्या हो गई है।जिंदगी का पन्ना पलट कर देख रही है ।पैतिंस वर्ष की थी तभी पति चले गये थे ।बस दो दिन का बुखार माथे पर चढ़ा और सब खत्म हो गया ।एकदम असहाय हो गई थी ।कहाँ जायेगी? कैसे जीवन चलेगा? दो छोटे बच्चे का पालन पोषण,शिक्षा कैसे पूरी होगी?
सवाल मथने लगा था ।परिवार के लोगों ने कहा जो खायेंगे वह खिलायेगें।लेकिन सिर्फ खाने की समस्या नहीं थी।जीवन के लिए और भी बहुत कुछ चाहिए था ।लेकिन तभी बड़ी बेटी दामाद ने सहारा दिया ।यह तो अच्छा हुआ था कि बेटी की शादी कम उम्र में ही हो गई थी ।
कितना हल्ला मचाया था उसने “सत्रह साल भला अभी शादी की उम्र है?”पति ने तब समझाया था कि “देखो सुमी,लड़का अच्छा मिल रहा है ।शिक्षित है।परिवार छोटा और समझदार है ।सबसे बड़ी बात तिलक दहेज की मांग नहीं है “फिर वह मान गयी थी ।और मीता दुलहन बन कर ससुराल चली गई ।
कहाँ जानती थी कि किस्मत और चाल चलने वाली है ।दोनों छोटे बेटा बेटी पढ़ाई मे आगे बढ़ने लगे।गृहस्थी में खुश थी वह।सीधे सादे पति,दो छोटे बच्चे ।छोटी तो अभी तीसरे क्लास में ही थी कि पिता की तबीयत खराब हो गई ।ज्वर माथे पर चढ़ गया ।दो दिन अस्पताल में रहने के बाद ही तीसरे दिन सबको अनाथ करके वे चले गए ।
भगवान का लाख लाख धन्यवाद दिया था उसने जब दामाद जी आकर सबको अपने घर ले गये ।मन मे एक हिचक था “बेटी के घर कैसे रहेगी? उसके ससुराल वाले क्या कहेंगे? “लेकिन सबकुछ ठीक हो गया ।बेटी मीता ने बहुत समझाया माँ को ।”माँ अब जमाना बदल गया है ।कोई कुछ नहीं कहेगा ।बस आप निश्चिंत रहें आपका पूरा जीवन बाकी है।कुछ न कुछ उपाय करने के लिए सोचेगें ।
और बेटी दामाद के प्रयास से नौकरी लग गई थी सुमित्रा की।मीता पर काम का बोझ बढ़ गया था ।दुबली पतली सी मीता सबकुछ सही से संभालती रही ।थक कर चूर हो जाती ।लेकिन माँ को कभी अपनी परेशानी महसूस नहीं होने दी ।सुमित्रा भी सोचती “जीवन में अपनो का साथ होना बहुत जरूरी है
“अगर सहारा नहीं मिलता तो न जाने क्या होता उसका ।जवान ही तो थी उस समय ।समाज मे विधवा स्त्री के लिए भूखे भेड़िये की कमी नहीं थी।बच्चों के नाम लिखा दिया था स्कूल में मीता ने ।अपना जीवन उसने छोटे भाई बहन के नाम कर दिया था ।दामाद जी ठीक नहीं रहते तो यह कहाँ सम्भव था।सुमित्रा सुबह आठ बजे अपने आफिस चली जाती ।शाम को पांच बजे तक आती ।समय दौड़ता रहता है ।मीता भी अब एक बेटे की माँ बनी ।
सुलझा हुआ परिवार था उसका ।गांव से सासूमा आ गयी थी बच्चे को संभालने के लिये ।सासूमा भी बहुत अच्छी थी तो किसी तरह की परेशानी नहीं हुई ।देखते देखते मीता के दोनों भाई बहन की पढ़ाई पूरी हो गई ।अचछे परिवार मे शादी भी हो गई ।भाई तो मीता से बहुत छोटा था।अपने बेटे जैसा ।एक तरह से माँ की तरह भाभी लाने की जिम्मेदारी भी निभाईं ।भाभी का स्वभाव अच्छा था।शादी के बाद माँ अपने क्वाटर में चली गई थी ।
समय के साथ मीता ने अपने बेटे का ब्याह भी कर दिया ।घर गृहस्थी दोनों तरफ ठीक से चल रही थी कि अचानक मीता के पति का हार्ट अटेक से निधन हो गया ।तब पूरा परिवार मीता के साथ रहा।जीवन चलने का नाम है ।चलने ही लगा ठीक ठाक ।गृहस्थी बच्चों के हाथ आ गयी ।
घर मे पोते का जन्म हुआ ।और उधर भतीजे का भी जन्म हुआ ।दोनों परिवार में खुशियाँ मिली।एक ही शहर होने के कारण आना जाना लगा रहता ।सुमित्रा भी रिटायर हो गयीं थीं नौकरी से।कम उम्र में पति का वियोग, छोटे बच्चों की चिन्ता, नौकरी की दौड़ धूप ।थक गयी थी वह।उम्र भी हो गई थी ।
तबियत खराब रहने लगी थी उसकी ।फिर अचानक बेटे की तबियत बिगड़ने लगी ।घबरा गयी सुमित्रा ।पेट में कोई समस्या थी।डाक्टर ने वेल्लोर जाने की सलाह दी।समस्या थी कि माँ अकेली कैसे रहेगी? मीता ने भाभी को दिलासा दिया “मै हूँ ना अभी,चिन्ता मत करो ।मै सब देख लूंगी “सबदिन तो मीता साथ देतीं रही थी अब कैसे छोड़ देती ।मीता के भाई भाभी वेल्लोर चले गए ।
भाभी प्रिया को बड़ी ननद पर पूरा भरोसा था ।मीता माँ के देख भाल के लिये वहीं चली गई थी ।माँ की मन पसंद बना कर खिलाया करती ।माँ सुमित्रा खुश होती ।एक दिन मीता अपने घर आई।हालांकि माँ से पूछ लिया था कि शाम तक लौट आती हूँ ।लेकिन शाम को लौटी तो माँ खाट पर बेसुध थी।अनजाने मे बाथरुम जाने के लिये उठी तो चक्कर खा कर गिर गई ।सामने वाली पड़ोसिन ने आकर उठाया ।
फिर तो सुमित्रा एकदम बेड पर ही पड़ी रहती है ।उठ नहीं सकती ।पैर मे फ्रैक्चर हो गया ।उम्र भी तो काफी हो गई थी ।मीता को माँ की सेवा, भोजन बनाना, घर की सफाई सारे काम करने थे।पन्द्रह दिन के बाद भाई और प्रिया लौट आये ।सुमित्रा चुपचाप खाट पर लेटी देखती रहती ।
बेटी और बहू कितना मेहनत और सेवा कर रही है ।कितनी फुर्तीली थी वह कभी ।आज दूसरे पर आश्रित हो गई है ।बहु का स्वभाव ठीक नहीं रहता तो कैसे निभता?मुसीबत में अपनो का साथ होना बहुत जरूरी है ।आज सुमित्रा की तबीयत ठीक नहीं है ।मीता अपने घर गयी है ।सुमित्रा को बहुत उल्टी हो रही थी ।
उसने बेटी को बुलाने के लिए कहा ।खबर मिलते ही तो मीता आ गयी ।पेट दर्द से छटपटाने लगी थी सुमित्रा ।मीता ने समझाया “माँ थोड़ा धीरज रखो।दवाई असर करेगा तो ठीक हो जायेगा दर्द ।रात को बारह बजे सबकुछ शान्त हो गया ।मीता ने प्रिया से कहा “लगता है माँ को आराम हो गया है ।
वह सो रही है”सुबह हुई ।दोनों ननद भाभी उठी।मां के पास आई।माँ की आँखे खुली हुई थी ।लेकिन जीवन का कोई चिन्ह नहीं था ।मीता ने चेहरे के आगे हाथ लहराया ।कोई हलचल नहीं हुई ।पड़ोस से सभी लोग आ गए ।सुमित्रा नहीं रही।वातावरण में मीता की चीख गूंजने लगी–माँ—-।सबकुछ खत्म हो गया ।
—-उमा वर्मा ।राँची ।झारखंड ।सभी ने कहा “अपनों का साथ होना बहुत जरूरी है “