मैंने बिना एक पल गँवाए, बिना कोई तर्क किए, अपना मुँह खोल दिया। दादी ने अपने कांपते हाथों से वो खीर मेरे मुँह में रख दी। वो साबूदाने की खीर, जो शायद थोड़ी ठंडी हो चुकी थी, मुझे दुनिया का सबसे स्वादिष्ट व्यंजन लगी। उसे निगलते हुए मेरी आँखों से आंसुओं की एक धार बह निकली। मैं रोने लगा। मैं इसलिए नहीं रो रहा था कि मैं भावुक था, बल्कि मैं अपने उस अज्ञान पर रो रहा था जिसने इतने सालों तक मुझे इस अलौकिक आनंद से दूर रखा था। मैंने अपने सफाई के गुरूर में न जाने कितने ऐसे प्यार भरे पलों को खो दिया था।
बचपन में जब भी घर में कोई धार्मिक कथा या पुराने किस्से सुनाए जाते थे, तो एक बात मेरे गले कभी नहीं उतरती थी। कथाओं में अक्सर ऐसा प्रसंग आता था जहाँ कोई भक्त भगवान को अपना जूठा भोजन खिलाता है और भगवान उसे बड़े चाव से खा लेते हैं। मैं हमेशा सोचता था कि ये कैसी भक्ति है? कोई किसी का जूठा कैसे खा सकता है? क्या ये अस्वच्छता नहीं है? क्या प्रेम दर्शाने का कोई और साफ-सुथरा तरीका नहीं हो सकता? जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ और पढ़ाई के लिए बड़े शहरों में गया, मेरे ये तर्क और भी मजबूत होते गए।
मेरा नाम समीर है। मैं मुंबई की एक मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में एक ऊंचे पद पर कार्यरत हूँ। मेरी जीवनशैली पूरी तरह से ‘आधुनिक’ और ‘हाइजीनिक’ है। कार में बैठने से लेकर ऑफिस की डेस्क तक, मेरे बैग में हमेशा एक हैंड सैनिटाइजर और डिसइंफेक्टेंट वाइप्स मौजूद रहते हैं। बाहर का खुला खाना, किसी के हाथ का छुआ हुआ पानी या एक ही प्लेट में खाना साझा करना—ये सब बातें मेरे लिए किसी बुरे सपने जैसी थीं। मेरी पत्नी राधिका भी बिल्कुल मेरे जैसी ही है। हमारे घर में सफाई का ऐसा मानक है कि कोई भी बाहरी व्यक्ति हमारे यहाँ आने से पहले दो बार सोचता है। हमारे लिए ‘जर्म्स’ और ‘बैक्टीरिया’ दुनिया के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
लेकिन जिंदगी हमेशा आपके बनाए हुए कांच के महलों में नहीं चलती। कभी-कभी आपको अपनी जड़ों की तरफ लौटना ही पड़ता है।
पिछले हफ्ते मुझे अपने पुश्तैनी गाँव से एक फोन आया। फोन मेरे ताऊजी का था। उन्होंने बताया कि दादी की तबीयत बहुत खराब है। उम्र के पच्चासीवें पड़ाव पर पहुँच चुकीं दादी अब बिस्तर से उठ भी नहीं पाती थीं। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था और ताऊजी ने कहा कि दादी बार-बार अपने ‘समर’ (दादी मुझे इसी नाम से बुलाती थीं) को याद कर रही हैं। यह सुनकर मेरे भीतर एक अजीब सी बेचैनी उठ खड़ी हुई।
बचपन में, जब मेरे माता-पिता दोनों काम पर जाते थे, तब दादी ही मेरी पूरी दुनिया हुआ करती थीं। उन्होंने ही मुझे चलना सिखाया, कहानियाँ सुनाईं और अपने हाथों से खाना खिलाया। लेकिन पिछले दस सालों में, करियर, शादी और अपनी इस ‘साफ-सुथरी’ दुनिया में मैं इतना उलझ गया था कि दादी से मिले हुए मुझे पाँच साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका था। अपराधबोध से मेरा मन भारी हो गया। मैंने बिना कोई समय बर्बाद किए ऑफिस से छुट्टी ली और अगली ही सुबह गाँव के लिए निकल पड़ा।
गाँव का हमारा पुश्तैनी घर आज भी वैसा ही था—मिट्टी और ईंटों से बना, जिसके आंगन में एक बड़ा सा नीम का पेड़ था। वहाँ की हवा में आज भी गाय के गोबर, सूखी मिट्टी और पुराने लकड़ी के चूल्हे की महक घुली हुई थी। शहर के वातानुकूलित और खुशबूदार कमरों में रहने वाले मेरे फेफड़ों को यह हवा थोड़ी अजीब लग रही थी, लेकिन मेरे अंदर बैठी बचपन की यादें अंगड़ाइयां लेने लगी थीं।
मैं जैसे ही घर के अंदर दाखिल हुआ, ताऊजी मुझे सीधे दादी के कमरे में ले गए। कमरे में हल्की सी रोशनी थी और कपूर की भीनी-भीनी महक आ रही थी। दादी एक पुरानी सी चारपाई पर लेटी हुई थीं। उनका शरीर सूखकर कांटा हो गया था, आँखों के नीचे गहरे गड्ढे पड़ गए थे और त्वचा पर झुर्रियों का जाल बिछा था। उन्हें देखकर मेरा दिल भर आया।
“अम्मा… देखो कौन आया है,” ताऊजी ने दादी के कान के पास जाकर कहा।
दादी ने धीरे से अपनी धुंधली आँखें खोलीं। उनकी नज़र मुझ पर पड़ी। कुछ पलों तक वो मुझे ऐसे देखती रहीं जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हों। फिर अचानक उनकी सूखी हुई आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उनके कांपते हुए हाथ मेरी तरफ उठे और उनके होठों से एक बहुत ही कमजोर, लेकिन वात्सल्य से भरी आवाज़ निकली, “मेरा समर… मेरा बच्चा आ गया।”
मैं उनके पास बैठ गया और उनके कांपते हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उनके हाथ बहुत खुरदरे और ठंडे थे, लेकिन उनमें जो गर्माहट थी, वो मुझे दुनिया के किसी भी हीटर में नहीं मिल सकती थी। मैं अपनी सारी हाइजीन की बातें, सैनिटाइजर की गंध सब भूल गया। मैं बस उनके पास बैठा रहा और वो मेरे सिर पर हाथ फेरती रहीं। उस दिन मैंने महसूस किया कि अपनों से दूर रहकर मैंने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है।
अगले दो दिन मैं दादी के पास ही रहा। उनकी तबीयत में थोड़ा सुधार आने लगा था, शायद अपने पोते को इतने सालों बाद देखने की खुशी ने उनके अंदर एक नई ऊर्जा भर दी थी। वो मुझसे मेरी नौकरी, मेरी पत्नी और मेरे शहर के बारे में अनगिनत सवाल पूछतीं और मैं उन्हें बड़ी तसल्ली से जवाब देता।
तीसरे दिन दोपहर का वक्त था। घर के बाकी लोग किसी काम से बाहर गए हुए थे। ताई जी ने दादी के लिए एक कटोरी में साबूदाने की खीर बनाकर रखी थी। दादी अब खुद से ठीक से खा नहीं पाती थीं, इसलिए मैं उन्हें चम्मच से खीर खिलाने लगा। कमरे में बहुत शांति थी। बाहर नीम के पेड़ पर कुछ चिड़ियाँ चहचहा रही थीं। दादी एक-एक चम्मच खीर बहुत आराम से खा रही थीं और बीच-बीच में मुझे बड़े प्यार से निहार रही थीं।
तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे अंदर के उस ‘आधुनिक और तर्कशील’ इंसान को हमेशा के लिए झकझोर कर रख दिया।
दादी ने खीर खाते-खाते अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया। उन्होंने कटोरी मेरी तरफ खिसकाई और अपनी कांपती हुई उंगलियों से उस कटोरी में से थोड़ी सी खीर उठाई। उनके हाथ कांप रहे थे और खीर की कुछ बूंदें उनके बिस्तर पर गिर रही थीं। उन्होंने वो खीर अपनी उंगलियों से ही उठाई थी और अब वो उसे मेरे मुँह के पास ला रही थीं।
“ले… तू भी तो खा मेरा बच्चा। सुबह से तूने कुछ नहीं खाया, बस मेरे पास बैठा है। ये ले, खा ले,” दादी ने बड़े ही मनुहार भरे स्वर में कहा।
एक पल के लिए मेरे दिमाग की नसें सुन्न हो गईं। मेरा वही पुराना ‘हाइजीन-पसंद’ दिमाग एकदम से जाग उठा। वह खीर दादी के बिस्तर पर रखी थी, उन्होंने उसे अपने जूठे मुँह के पास से हटाकर, उन्हीं बिना धुले, कांपते और झुर्रीदार हाथों से उठाया था जिनसे वो खुद खा रही थीं। मेरे शहर के उसूलों के हिसाब से यह ‘अनहाइजीनिक’ था, जर्म्स का घर था। मेरा मन किया कि मैं प्यार से उनका हाथ हटा दूँ और कहूँ, ‘नहीं दादी, मैं बाद में साफ प्लेट में खा लूँगा।’
मैं कुछ बोलने ही वाला था कि मेरी नज़र दादी की आँखों पर पड़ी। उनकी उन धुंधली, मोतियाबिंद वाली आँखों में मुझे वो दिखा जिसे मैं आज तक किताबों और किस्सों में ढूँढता आया था। वहाँ कोई तर्क नहीं था, कोई गंदगी नहीं थी, कोई बीमारी का डर नहीं था। वहाँ सिर्फ और सिर्फ एक शुद्ध, असीम और निस्वार्थ प्रेम था। वो प्रेम जो इस बात की परवाह नहीं करता कि हाथ साफ हैं या नहीं, जो इस बात की फिक्र नहीं करता कि खाना जूठा है या नहीं। वो बस अपने हिस्से का अमृत अपने बच्चे को दे देना चाहता था।
मुझे अचानक बचपन में सुनी वो सारी कथाएँ याद आ गईं। मुझे समझ आ गया कि जब कोई अपना, पूरे दिल से, अपनी सारी भावनाओं को समेटकर आपको कुछ खिलाता है, तो वो जूठा नहीं रहता, वो प्रसाद बन जाता है। उसमें कोई बैक्टीरिया नहीं होता, उसमें सिर्फ आशीर्वाद होता है।
मैंने बिना एक पल गँवाए, बिना कोई तर्क किए, अपना मुँह खोल दिया। दादी ने अपने कांपते हाथों से वो खीर मेरे मुँह में रख दी। वो साबूदाने की खीर, जो शायद थोड़ी ठंडी हो चुकी थी, मुझे दुनिया का सबसे स्वादिष्ट व्यंजन लगी। उसे निगलते हुए मेरी आँखों से आंसुओं की एक धार बह निकली। मैं रोने लगा। मैं इसलिए नहीं रो रहा था कि मैं भावुक था, बल्कि मैं अपने उस अज्ञान पर रो रहा था जिसने इतने सालों तक मुझे इस अलौकिक आनंद से दूर रखा था। मैंने अपने सफाई के गुरूर में न जाने कितने ऐसे प्यार भरे पलों को खो दिया था।
मैंने दादी के उन झुर्रीदार हाथों को चूमा और उन्हें अपने गालों से लगा लिया।
“क्या हुआ मेरे समर? खीर अच्छी नहीं लगी क्या?” दादी ने मेरे आंसू पोंछते हुए घबराकर पूछा।
मैं मुस्कुराया और रुंधे हुए गले से बोला, “नहीं दादी, इससे मीठी और अच्छी खीर मैंने जिंदगी में कभी नहीं खाई। मुझे और खिलाओ ना।”
दादी के चेहरे पर एक ऐसी शांति और खुशी छा गई, जैसे उन्हें दुनिया की सारी दौलत मिल गई हो। उन्होंने मुझे अपने जूठे हाथों से और खीर खिलाई और मैंने उसे किसी अमूल्य खजाने की तरह ग्रहण किया।
उस दिन के बाद से मेरी जिंदगी को देखने का नज़रिया पूरी तरह बदल गया। मैं आज भी मुंबई में रहता हूँ, आज भी मैं सफाई का ध्यान रखता हूँ, लेकिन अब मैं रिश्तों को सैनिटाइजर से नहीं धोता। अब मैं जानता हूँ कि प्रेम की कोई हाइजीन नहीं होती। जब प्यार अपने चरम पर होता है, तो वो हर तर्क, हर नियम और हर उसूल से ऊपर उठ जाता है। आज भी जब मैं कभी फाइव स्टार होटल में कोई महंगी डिश खाता हूँ, तो मुझे उस स्वाद में वो मिठास कभी नहीं मिलती जो मुझे दादी के उस कांपते हुए, जूठे हाथ से खिलाए गए निवाले में मिली थी। वो सिर्फ एक निवाला नहीं था, वो एक बूढ़ी माँ की आत्मा का सार था, जिसने मेरे अंदर के जमे हुए बर्फ को पिघलाकर मुझे फिर से इंसान बना दिया था।
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