सुबह की भागदौड़ के बीच, जब घर में नाश्ते की खुशबू और कुकर की सीटियों का शोर गूंज रहा था, तभी दरवाजे से बाहर निकलते हुए समीर ने अपनी पत्नी काव्या को आवाज लगाई। “काव्या, सुनो! आज शाम को जल्दी तैयार हो जाना। तुम्हें याद है न, हमारे पुराने पड़ोसी माथुर अंकल की बेटी की शादी का रिसेप्शन है आज। हम शादी में तो नहीं जा पाए थे, तो आज रिसेप्शन में जाकर उन्हें बधाई भी दे आएंगे और इसी बहाने बरसों बाद उन लोगों से मुलाकात भी हो जाएगी।” काव्या ने किचन से ही हाथ पोंछते हुए हामी भरी और समीर मुस्कुराते हुए अपनी गाड़ी की चाबी लेकर ऑफिस निकल गया।
समीर के जाने के बाद काव्या ने घर के बाकी बचे काम निपटाए। दोपहर का समय था, घर में एक अजीब सी शांति छाई हुई थी। काव्या ने सोचा कि शाम को पार्टी में जाना है, तो क्यों न अभी से कपड़े निकालकर रख लिए जाएं, ताकि ऐन मौके पर प्रेस करने या मैचिंग ज्वेलरी ढूंढने की हड़बड़ी न हो। काव्या हमेशा से ही बहुत सलीके से रहने वाली महिला थी। उसे हर काम समय पर और परफेक्शन के साथ करना पसंद था।
काव्या अपने बेडरूम में आई और उसने अपनी बड़ी सी लकड़ी की अलमारी का दरवाजा खोला। अलमारी खुलते ही कपूर और मोगरे की एक भीनी-भीनी महक उसके नथुनों से टकराई। उसके कपड़ों के कलेक्शन में एक से बढ़कर एक साड़ियां और सूट करीने से लगे हुए थे। उसकी नज़र अचानक उस गहरे नीले रंग की बनारसी सिल्क साड़ी पर जाकर टिक गई, जिस पर सुनहरे धागों का बेहद बारीक और खूबसूरत काम किया हुआ था। यह साड़ी उसे उसकी कॉलेज की सबसे करीबी दोस्त और रूममेट रही विशाखा ने दी थी।
साड़ी को देखते ही काव्या के चेहरे पर एक बहुत ही प्यारी और संतोषजनक मुस्कान तैर गई। उसने बहुत ही कोमलता से उस साड़ी को हैंगर से निकाला और बिस्तर पर फैला दिया। नीले रंग की वह साड़ी किसी शांत समंदर की तरह लग रही थी। काव्या को याद आया कि कुछ महीने पहले जब विशाखा ने शहर के एक पॉश इलाके में अपना नया फ्लैट खरीदा था, तो काव्या उससे मिलने गई थी। काव्या खाली हाथ नहीं गई थी, बल्कि उसने हफ्तों बाजार छानकर विशाखा के नए घर के लिए एक बेहद खूबसूरत और दुर्लभ एंटीक घड़ी खरीदी थी। उसे पता था कि विशाखा को विंटेज चीजों का बहुत शौक है।
जब काव्या वह घड़ी लेकर विशाखा के घर पहुंची थी, तो विशाखा बहुत खुश हुई थी। उसी दिन लौटते समय विशाखा ने काव्या के हाथों में यह नीली बनारसी साड़ी रख दी थी। काव्या ने उस दिन यह साड़ी पाकर खुद को दुनिया की सबसे खुशनसीब दोस्त माना था। उसे लगा था कि विशाखा ने कितनी बारीकी से उसकी पसंद को याद रखा है, क्योंकि नीला काव्या का सबसे पसंदीदा रंग था।
काव्या की हमेशा से यह फितरत रही थी कि वह रिश्तों और तोहफों को बहुत गहराई से महसूस करती थी। उसके लिए कोई भी तोहफा सिर्फ बाजार से खरीदी गई कोई निर्जीव वस्तु नहीं होता था। उसकी नजर में, जब कोई इंसान आपके लिए कोई तोहफा चुनता है, तो वह अपना कीमती वक्त निकालता है, सैकड़ों चीजों को देखता है, आपकी पसंद-नापसंद का ख्याल करता है और फिर उसमें अपना प्यार लपेटकर आपको देता है। इसलिए काव्या हर छोटे-बड़े तोहफे को बहुत सहेज कर रखती थी। चाहे वह किसी के द्वारा दिया गया एक रुमाल हो या कोई महंगी साड़ी, काव्या के लिए उनका मोल पैसों से नहीं, बल्कि उसमें छुपी भावनाओं से तय होता था।
बिस्तर पर रखी उस नीली साड़ी को काव्या प्यार से सहलाने लगी। वह मन ही मन सोच रही थी कि आज शाम को वह यही साड़ी पहनेगी। जब वह यह साड़ी पहनकर विशाखा के साथ अपनी कोई तस्वीर सोशल मीडिया पर डालेगी, तो विशाखा कितनी खुश होगी कि उसकी दी हुई निशानी को काव्या ने इतने प्यार से अपनाया है। काव्या साड़ी को प्रेस करने के लिए आयरन बोर्ड की तरफ मुड़ी ही थी कि अचानक उसके दिमाग में एक स्मृति कौंध गई। उसके कदम वहीं ठिठक गए और चेहरे की मुस्कान जैसे कहीं गायब हो गई।
यह स्मृति बहुत पुरानी नहीं थी, बस तीन-चार दिन पहले की ही बात थी। दोपहर के समय काव्या और विशाखा फोन पर बात कर रहे थे। बातों-बातों में विशाखा ने बताया कि उसकी ननद उसके घर आई हुई थी।
“यार काव्या, ये रिश्तेदारों का आना-जाना भी कितना थकाऊ होता है,” विशाखा फोन पर झुंझलाते हुए कह रही थी।
काव्या ने हंसते हुए पूछा था, “अरे, क्या हो गया? ननद जी आई हैं तो खुश होना चाहिए। कुछ कह दिया क्या उन्होंने?”
“कहा तो कुछ नहीं, पर वो आते हुए बच्चों के लिए कपड़े और मेरे लिए एक चांदी का बाउल ले आईं,” विशाखा ने जवाब दिया।
“तो इसमें परेशान होने वाली क्या बात है? ये तो प्यार है उनका,” काव्या ने सहजता से कहा था।
तभी विशाखा ने जो बात कही, वह अब काव्या के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूंज रही थी। विशाखा ने कहा था, “प्यार-व्यार कुछ नहीं यार, ये सब फॉर्मेलिटी है। और सच कहूं तो मुझे ये सब बिल्कुल पसंद नहीं। मुझे किसी का एहसान अपने सिर पर रखना अच्छा नहीं लगता। कोई मुझे कुछ देता है, तो मुझे अजीब सा बोझ लगने लगता है। इसलिए मैंने तो एक उसूल बना रखा है—जो कोई मुझे कुछ देता है, मैं तुरंत उसे उसी वक्त, उसी कीमत की कोई चीज रिटर्न गिफ्ट में देकर अपना हिसाब बराबर कर लेती हूं। ननद जी ने चांदी का बाउल दिया, तो जाते समय मैंने भी उनके हाथ में एक कीमती सिल्क का सूट थमा दिया। मैं किसी का कर्ज नहीं रखती, अपना लेजर हमेशा क्लियर रखती हूं।”
उस दिन फोन पर विशाखा की यह बात सुनकर काव्या ने बस एक फीकी सी ‘हम्म’ कर दी थी और बात टाल दी थी। लेकिन आज, जब वह उस नीली साड़ी को पहनने जा रही थी, तो विशाखा के वे शब्द — “मैं किसी का कर्ज नहीं रखती, अपना हिसाब बराबर कर लेती हूं” — काव्या के दिल पर हथौड़े की तरह वार कर रहे थे।
काव्या की उंगलियां जो कुछ पल पहले तक उस साड़ी के रेशमी धागों में प्यार महसूस कर रही थीं, अब ठिठुर सी गईं। उसे ऐसा लगने लगा जैसे वह साड़ी कोई प्यार की निशानी नहीं, बल्कि विशाखा के बहीखाते की एक रसीद है। जब काव्या विशाखा के घर वह महंगी एंटीक घड़ी लेकर गई थी, तो विशाखा को वह काव्या का प्यार नहीं, बल्कि एक ‘कर्ज’ लगा होगा। और उस कर्ज, उस एहसान को तुरंत उतारने के लिए ही विशाखा ने जाते-जाते यह नीली बनारसी साड़ी काव्या के हाथों में थमा दी थी, ताकि उसका ‘लेजर क्लियर’ हो जाए।
काव्या की आंखें नम हो गईं। उसके अंदर कुछ बहुत ही नाजुक सा टूट कर बिखर गया था। जिस साड़ी को वह पिछले कई महीनों से अपनी सबसे अच्छी दोस्त के असीम प्यार का प्रतीक मानकर चूम रही थी, आज अचानक वह साड़ी उसे बेजान और ठंडी लगने लगी। काव्या सोचने लगी कि क्या वाकई हम इतने व्यावसायिक (कमर्शियल) हो गए हैं? क्या रिश्तों में अब भावनाएं नहीं, बल्कि तराजू काम करते हैं? किसी के प्यार से दिए गए उपहार को ‘एहसान’ समझ लेना और उसे तुरंत लौटाकर ‘कर्ज मुक्त’ हो जाना, क्या यही आधुनिक रिश्तों की सच्चाई है?
काव्या को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह नीली साड़ी बिस्तर पर पड़ी हुई उसका मुंह चिढ़ा रही हो और कह रही हो— “मैं कोई तोहफा नहीं, मैं तो बस एक चुकता किया हुआ उधार हूं।” काव्या का मन अब उस साड़ी से पूरी तरह खट्टा हो चुका था। उसने एक गहरी सांस ली, अपने आंसू पोंछे और उस नीली साड़ी को बहुत ही रूखेपन से समेट कर वापस अलमारी के सबसे निचले हिस्से में रख दिया।
अब उसे यह तय करना था कि शाम को क्या पहनना है। उसकी नजर अलमारी में टंगी एक सादी सी, हल्के गुलाबी रंग की सूती-रेशमी (कॉटन-सिल्क) साड़ी पर पड़ी। यह साड़ी कोई बहुत महंगी या किसी मशहूर डिज़ाइनर की नहीं थी। यह साड़ी पिछले साल उसकी शादी की सालगिरह पर उसके पिता ने दी थी। पिता जी एक रिटायर्ड इंसान थे, उनकी पेंशन से बहुत ज्यादा बचत नहीं होती थी, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने मोहल्ले की एक छोटी सी दुकान से काव्या के लिए यह साड़ी खरीदी थी। जब उन्होंने यह साड़ी काव्या को दी थी, तो उनके हाथ कांप रहे थे और आंखों में अपनी बेटी के लिए बेशुमार प्यार था। उन्होंने कहा था, “बिटिया, मुझे रंगों की ज्यादा समझ नहीं, पर यह गुलाबी रंग देखकर मुझे मेरी नन्ही काव्या याद आ गई। इसे पहनना कभी।”
काव्या के पिता को कोई हिसाब बराबर नहीं करना था। उन्हें काव्या से कोई रिटर्न गिफ्ट नहीं चाहिए था। वह साड़ी सिर्फ और सिर्फ निस्वार्थ प्यार के धागों से बुनी गई थी। काव्या ने तुरंत उस गुलाबी साड़ी को बाहर निकाला। उसे सीने से लगाया तो उसे अपने पिता के हाथों का खुरदरापन और उनके प्यार की गर्माहट महसूस हुई।
शाम को जब समीर ऑफिस से लौटा, तो काव्या तैयार हो चुकी थी। उस सादी सी गुलाबी साड़ी, माथे पर छोटी सी बिंदी और चेहरे पर एक अजीब सी शांति के साथ काव्या बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। समीर ने उसे देखते ही कहा, “वाह काव्या! आज तो तुम बहुत प्यारी लग रही हो। ये साड़ी पहले कभी नहीं देखी?”
काव्या ने आईने में खुद को निहारते हुए एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “यह मेरे बाबूजी ने दी थी। इसमें कोई हिसाब-किताब नहीं है, समीर, इसमें सिर्फ प्यार है। और आज मुझे सिर्फ प्यार पहनने का मन था।”
समीर काव्या की बात की गहराई को पूरी तरह तो नहीं समझ पाया, लेकिन वह उसके चेहरे के सुकून को देखकर मुस्कुरा दिया। दोनों रिसेप्शन के लिए निकल पड़े। पीछे अलमारी में वह नीली साड़ी अंधेरे में पड़ी रह गई, जो शायद हमेशा के लिए एक चुकता किए हुए कर्ज की तरह वहीं दबी रहने वाली थी। काव्या ने आज एक बहुत बड़ा सबक सीख लिया था—तोहफे की कीमत बाजार में नहीं, बल्कि देने वाले की नीयत और उसकी भावना में तय होती है। कर्ज तो पैसों का चुकाया जाता है, प्यार का कोई बहीखाता नहीं होता।
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