अनकही शांति

रात के करीब दस बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड ने दस्तक दे दी थी। समीर अपने ऑफिस का लैपटॉप बंद करके जब अपने बेडरूम में दाखिल हुआ, तो सामने का नज़ारा देखकर उसके कदम ठिठक गए। उसकी पत्नी, राधिका, उनके डबल बेड के ठीक बगल में ज़मीन पर एक मोटा गद्दा बिछा रही थी और उस पर साफ चादर डाल रही थी।

“ये क्या कर रही हो राधिका? यहाँ नीचे बिस्तर क्यों लगा रही हो? क्या आज तुम्हारी कोई सहेली रुकने वाली है?” समीर ने माथे पर सिलवटें डालते हुए पूछा।

राधिका ने चादर के कोनों को गद्दे के नीचे दबाते हुए बेहद शांत स्वर में जवाब दिया, “नहीं समीर, कोई सहेली नहीं आ रही। मैं माँ जी के लिए बिस्तर लगा रही हूँ। आज से माँ जी हमारे ही कमरे में, हमारे पास सोएंगी।”

“क्या!” समीर की आँखें हैरानी से फैल गईं। उसे लगा जैसे उसने कुछ गलत सुन लिया हो। “तुम होश में तो हो राधिका? यहाँ… हमारे कमरे में? और हमारी प्राइवेसी का क्या? घर में चार कमरे हैं। माँ का अपना इतना बड़ा और हवादार कमरा है, जहाँ उनके आराम की सारी चीज़ें मौजूद हैं। फिर उन्हें यहाँ हमारे बेडरूम में सोने की क्या ज़रूरत आ पड़ी?”

राधिका अपनी जगह से उठी। उसने समीर के चेहरे पर उभरी झल्लाहट को देखा, लेकिन उसकी आँखों में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। वह समीर के करीब आई और बोली, “ज़रूरत है समीर… बहुत सख्त ज़रूरत है। जब से बाबूजी हमें छोड़कर गए हैं, क्या तुमने माँ जी को गौर से देखा है? पहले वे बाबूजी के साथ उस बड़े कमरे में रहती थीं, दोनों एक-दूसरे से बातें करते थे, लड़ते-झगड़ते थे, पुरानी यादें ताज़ा करते थे। बाबूजी की खांसने की आवाज़ से भी माँ जी को यह तसल्ली रहती थी कि कोई उनके साथ है। लेकिन आज? आज वो बड़ा सा कमरा उन्हें काटने को दौड़ता है।”

समीर ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “मैं मानता हूँ राधिका कि बाबूजी के जाने के बाद माँ अकेली हो गई हैं। लेकिन हम दिन भर तो उनका ध्यान रखते हैं ना। तुम और हमारी छोटी सी बेटी मिस्टी पूरा दिन उनके आस-पास ही तो रहते हो। मैं भी ऑफिस से आकर उनके साथ चाय पीता हूँ। फिर रात को ये ज़िद क्यों?”

“दिन का उजाला और घर की चहल-पहल इंसान का ध्यान भटका देती है समीर,” राधिका की आवाज़ अब थोड़ी भारी हो गई थी। “लेकिन रात का सन्नाटा बहुत खौफनाक होता है। आज शाम मैंने उन्हें वही बाबूजी की दी हुई हरी फूलों वाली साड़ी पहने देखा था… वो साड़ी जो बाबूजी को बहुत पसंद थी। वो उस साड़ी को पहने, बाबूजी की तस्वीर सीने से लगाए सुबक रही थीं। जब मैं उनके कमरे में दूध लेकर गई, तो उन्होंने जल्दी से अपने आंसू पोंछ लिए ताकि मुझे उनकी कमज़ोरी का पता न चले। वो रात भर सो नहीं पातीं। करवटें बदलती रहती हैं। उस बंद दरवाज़े के पीछे का अकेलापन उन्हें अंदर ही अंदर खा रहा है।”

समीर कुछ पल के लिए खामोश रहा, फिर अपनी झल्लाहट को काबू करते हुए बोला, “देखो राधिका, तुम्हारी भावनाएं अपनी जगह सही हैं, लेकिन पति-पत्नी के कमरे में सास का सोना… अजीब नहीं लगेगा? हम उन्हें कुछ दिनों के लिए अपने साथ सुला सकते हैं, लेकिन हमेशा के लिए यह कैसे मुमकिन है?”

राधिका की आँखों से अब तक रुके हुए आंसू छलक पड़े। उसने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कीं और फिर एक ऐसा दर्द बयां किया जिसे उसने बरसों से अपने सीने में दफन कर रखा था।

“समीर, बचपन में हर बच्चा अपने माता-पिता पर निर्भर होता है। उन्हें रात को डर लगता है तो वे भागकर अपने माँ-बाप के बिस्तर में घुस जाते हैं। तब कोई प्राइवेसी आड़े नहीं आती। तो बुढ़ापे में जब इंसान फिर से बच्चा बन जाता है, जब उसे रात के अंधेरे और अकेलेपन से खौफ आने लगता है, तब हमारी प्राइवेसी इतनी बड़ी कैसे हो जाती है?” राधिका फफक पड़ी। “मुझे मेरी दादी बहुत याद आती हैं समीर… मुझे उनसे बहुत लगाव था।”

समीर ने राधिका के कंधे पर हाथ रखा, “तुम्हारी दादी की बात यहाँ कहाँ से आ गई?”

राधिका ने कांपते हुए स्वर में बताया, “जब मेरे दादाजी का देहांत हुआ, तो दादी भी बिल्कुल अकेली पड़ गई थीं। मेरे पापा ने उनके लिए घर का सबसे अच्छा और सुख-सुविधाओं वाला कमरा बनवाया था। हम सब दिन में उनके साथ खेलते थे, उन्हें पूरा वक्त देते थे। लेकिन रात को उन्हें उनके उसी शानदार कमरे में अकेला छोड़ दिया जाता था। एक रात… कड़ाके की ठंड थी। दादी को आधी रात में अचानक सीने में दर्द उठा। वो आवाज़ लगाना चाहती थीं, लेकिन उनकी आवाज़ गले में ही घुट गई। उनका कमरा हमारे कमरों से थोड़ा दूर था। बंद दरवाज़े के पार उनकी कराहें किसी तक नहीं पहुँच पाईं। अगली सुबह जब माँ उन्हें चाय देने गईं… तो दादी जा चुकी थीं।”

राधिका फूट-फूट कर रोने लगी। “समीर, मेरी दादी उस रात अपनी बीमारी से नहीं, उस बंद कमरे के अकेलेपन और उस खौफ से मरी थीं कि इस दर्द में कोई उनके पास नहीं है। वो डर मुझे आज भी सताता है। मैं उस खौफनाक इतिहास को अपने घर में नहीं दोहराना चाहती। मैं नहीं चाहती कि किसी रात माँ जी घबराकर उठें और बाबूजी को अपने बगल में न पाकर उनकी सांसें अटक जाएं, और हम अपने कमरे में चैन की नींद सोते रहें।”

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। समीर के हाथ राधिका के कंधों पर जमे थे, लेकिन उसकी अपनी आँखों से अब आंसू बहने लगे थे। उसका पुरुषार्थ, उसकी प्राइवेसी की दलीलें, सब राधिका के उस दर्दनाक सच के आगे तिनके की तरह उड़ गए। उसे लगा जैसे राधिका ने उसे एक बहुत गहरी खाई में गिरने से बचा लिया हो। अपनी माँ की उस सूनी आँखों और सिकुड़ते शरीर का ख्याल आते ही समीर का कलेजा कांप गया।

उसने बिना कुछ कहे राधिका को अपने गले से लगा लिया। कुछ देर बाद समीर ने अपने आंसू पोंछे, नीचे बिछे उस गद्दे को अपने हाथों से ठीक किया और कहा, “तुम बिल्कुल ठीक कह रही हो राधिका। माँ का ये बुढ़ापा हमारी ज़िम्मेदारी है। प्राइवेसी तो हम कभी भी निकाल लेंगे, लेकिन अगर माँ को कुछ हो गया, तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊंगा। चलो, मैं खुद उन्हें उनके कमरे से यहाँ लेकर आता हूँ।”

राधिका के होंठों पर आंसुओं के बीच एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई। जब समीर अपनी माँ का हाथ पकड़कर उन्हें अपने बेडरूम में लाया और राधिका ने उन्हें ओढ़ने के लिए रज़ाई दी, तो कौशल्या देवी की आँखों में जो चमक और जो सुरक्षा का भाव था, उसने समीर और राधिका की पूरी दुनिया को एक अनकही शांति से भर दिया। उस रात, उस बेडरूम में कोई प्राइवेसी नहीं थी, लेकिन वहाँ जो सुकून था, वह दुनिया के किसी और कोने में नहीं हो सकता था।

***

क्या सच में हमारे बुज़ुर्गों को आलीशान कमरों की नहीं, बल्कि हमारे साथ की और हमारी सांसों की गर्माहट की ज़रूरत होती है? क्या राधिका का अपनी प्राइवेसी खत्म करके सास को अपने कमरे में लाने का फैसला सही था? अगर आप राधिका या समीर की जगह होते, तो क्या करते? इस कहानी के बारे में अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट करके ज़रूर बताएँ, हमें आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा।

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