अटूट प्रेम

सुमित्रा देवी दौड़कर कमरे में आईं और अपनी बहू के कदमों के पास बैठकर उसे गले से लगा लिया। “मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची। तूने आज साबित कर दिया कि माँ की ममता और एक औरत का विश्वास किसी भी विज्ञान की मोहताज नहीं होती। अब से तू नहीं, मैं तेरा पूरा ध्यान रखूंगी।”

आंगन में पारिजात के फूलों की महक बिखरी हुई थी। अनन्या अपने कमरे में बैठी, लाल रंग के मखमली कपड़े पर छोटे-छोटे सितारे टांक रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था। वह अपने ‘लड्डू गोपाल’ के लिए जन्माष्टमी की पोशाक तैयार कर रही थी। बाहर बारिश की हल्की फुहारें गिर रही थीं, लेकिन अनन्या अपनी ही दुनिया में मग्न थी। तभी दरवाज़े पर उसकी सास, सुमित्रा देवी की कड़क और चुभती हुई आवाज़ गूंजी।

“अनन्या! क्या दिन भर इस पीतल की मूरत को कपड़े पहनाती और नहलाती रहती है? क्या इस खिलौने को सीने से लगाए रखने से तेरे आँगन में असली बच्चे की किलकारी गूंजने लगेगी? आठ साल हो गए शादी को, अगर इस पीतल के खिलौने में जान होती तो अब तक तेरा बांझपन दूर न हो गया होता? दुनिया हम पर हंसती है कि बहू पागल हो गई है।” सुमित्रा देवी के शब्द किसी नुकीले तीर की तरह अनन्या के दिल के पार हो गए।

अनन्या ने अपनी आँखें नीची कर लीं। उसके होंठ कांपे, लेकिन वह कुछ नहीं बोली। उसने ठाकुर जी की उस नन्ही सी पोशाक को अपने सीने से लगा लिया। तभी पीछे से उसका पति विक्रम आ गया। विक्रम अपनी पत्नी के इस दर्द को बख़ूबी समझता था।

“माँ, आप क्यों हर वक़्त इसे ताने मारती रहती हैं?” विक्रम ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा। “डॉक्टरों ने भी तो जवाब दे दिया है ना? हम सब कुछ आज़मा चुके हैं। अगर अनन्या को अपने लड्डू गोपाल की सेवा करने में शांति मिलती है, उसे एक माँ होने का अहसास होता है, तो इसमें आपको क्या परेशानी है? ऊपर वाला जो करेगा, वही होगा। आप कम से कम इसके ज़ख्मों पर नमक तो मत छिड़किए।”

सुमित्रा देवी मुँह बनाते हुए वहाँ से चली गईं। विक्रम ने अनन्या के पास बैठकर उसके हाथों से वह आधी सिली हुई पोशाक ली और उसके आँसू पोंछे। “तुम माँ की बातों पर ध्यान मत दिया करो। तुम्हारा विश्वास बहुत बड़ी चीज़ है, अनन्या। तुम बस अपने ठाकुर जी पर भरोसा रखो।”

अनन्या और विक्रम की शादी को आठ लंबे साल बीत चुके थे। इन आठ सालों में उन्होंने अस्पतालों के अनगिनत चक्कर काटे, तमाम मन्नतें मांगीं, कई महंगी दवाइयां खाईं, लेकिन नतीजा हमेशा निराशाजनक ही रहा। हर महीने एक नई उम्मीद बंधती और फिर टूट जाती। समाज और रिश्तेदारों के तानों ने अनन्या को अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया था। लोग उसे किसी शुभ काम में आगे नहीं आने देते थे। जब हर दरवाज़ा बंद दिखा, तो उसने अपना पूरा मातृत्व अपने घर के मंदिर में बैठे लड्डू गोपाल पर न्योछावर कर दिया। वह सुबह उन्हें अपने हाथों से दूध पिलाती, दोपहर में लोरियां गाकर सुलाती और शाम को उनके साथ बातें करती। लोगों के लिए वह महज़ एक पीतल की मूर्ति थी, लेकिन अनन्या के लिए वह उसका अपना बच्चा था, उसका सर्वस्व था।

आज जन्माष्टमी का पवित्र दिन था। अनन्या ने निर्जला उपवास रखा था। सुबह से ही वह मंदिर की सजावट, फूलों की माला बनाने और छप्पन भोग तैयार करने में जुटी हुई थी। उसका शरीर थकान से चूर था, पानी की एक बूँद न जाने से होंठ सूख गए थे, लेकिन आँखों में एक अलौकिक चमक और चेहरे पर एक दिव्य तेज़ था। सुमित्रा देवी ने उसे कमज़ोर देखकर फिर टोका, “भूखे मरने से भगवान खुश नहीं होते। और तेरी तो किस्मत ही फूटी है, ये सब ढोंग करने से कुछ नहीं बदलने वाला। तू कुछ खा ले, वरना बीमार पड़ेगी तो अस्पताल का खर्चा अलग से बढ़ेगा।”

अनन्या ने बस एक हल्की सी मुस्कान दी और अपने ठाकुर जी को पालने में झुलाने लगी। रात के बारह बजने वाले थे। शंख और घंटियों की आवाज़ से पूरा घर गूंज रहा था। मोहल्ले के लोग भी उनके घर के मंदिर में दर्शन के लिए आ चुके थे। अनन्या ने जैसे ही कपूर की आरती की थाली उठाई और ठाकुर जी की आँख में आँख डालकर पूरी तल्लीनता से भजन गाना शुरू किया, अचानक उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। उसके हाथ कांपने लगे। इससे पहले कि वह आरती पूरी कर पाती, थाली उसके हाथ से छूटकर गिर गई और वह ज़मीन पर बेसुध होकर गिर पड़ी।

“अनन्या!” विक्रम ज़ोर से चीखा और भीड़ को चीरता हुआ उसके पास पहुँचा। उसने अनन्या का सिर अपनी गोद में रख लिया और उसे होश में लाने की कोशिश करने लगा।

सुमित्रा देवी भी घबरा गईं। “मैंने कहा था ना, दिन भर भूखी-प्यासी रहेगी तो यही होगा। इसकी तो अक्ल ही घास चरने गई है। जल्दी से डॉक्टर भार्गव को फोन कर विक्रम, पता नहीं इसे क्या हो गया है।”

कुछ ही देर में डॉक्टर भार्गव अपना बैग लेकर घर पहुँच गए। उन्होंने कमरे में जाकर अनन्या की नब्ज़ जांची और कुछ ज़रूरी चेकअप किए। बाहर विक्रम और सुमित्रा देवी बेचैनी से टहल रहे थे। कमरे में एक भारी सन्नाटा पसरा था। सुमित्रा देवी भी अब मन ही मन भगवान से अपनी बहू की सलामती की प्रार्थना कर रही थीं।

थोड़ी देर बाद कमरे का दरवाज़ा खुला। डॉक्टर साहब ने मुड़कर विक्रम की तरफ देखा और उनके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान फैल गई। “बधाई हो विक्रम! घबराने की कोई बात नहीं है। तुम्हारी पत्नी सिर्फ उपवास की वजह से बेहोश नहीं हुई है। अनन्या माँ बनने वाली है। ये प्रेगनेंसी के शुरुआती लक्षण हैं और कमज़ोरी के कारण उसे चक्कर आ गया। अब बस इसका बहुत अच्छे से ध्यान रखना।”

कमरे में मानो वक़्त ठहर गया। विक्रम की आँखों से ख़ुशी के आँसू छलक पड़े। वह अवाक रह गया। सुमित्रा देवी को तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। “क्या… क्या कह रहे हैं डॉक्टर साहब? लेकिन डॉक्टरों ने तो कहा था कि मेरी बहू कभी माँ नहीं बन सकती। ये कैसे हो सकता है?”

“विज्ञान जहाँ ख़त्म होता है सुमित्रा जी, वहीं से ईश्वर के चमत्कार शुरू होते हैं,” डॉक्टर साहब मुस्कुराते हुए बोले और वहाँ से चले गए।

सुमित्रा देवी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उनके रोंगटे खड़े हो गए। वे कांपते कदमों से दौड़कर घर के मंदिर तक गईं। पालने में बैठे लड्डू गोपाल उन्हें देखकर मुस्कुराते हुए प्रतीत हो रहे थे। सुमित्रा देवी वहीं ज़मीन पर घुटनों के बल गिर पड़ीं और फूट-फूट कर रोने लगीं।

“हे मेरे कान्हा! हे मेरे पालनहार! मुझे माफ़ कर दे,” सुमित्रा देवी हाथ जोड़कर सिसकती जा रही थीं। “मैंने तुझे सिर्फ एक पीतल की मूरत समझा। मैंने अपनी ही बहू को बांझ कहकर उसके दिल को छलनी किया। लेकिन तू तो सच में मेरे घर आ रहा है। आज मेरी बहू की भक्ति और उसका निस्वार्थ प्रेम जीत गया, और मेरा घमंड हार गया। तूने मेरी बहू की सूनी कोख को अपने आशीर्वाद से भर दिया।”

तभी अनन्या को होश आ गया। विक्रम ने उसके माथे को चूमा और उसे यह खुशखबरी दी। अनन्या की आँखें आंसुओं से भर गईं। उसने अपने ठाकुर जी की तरफ देखा, मानो कह रही हों, “तुमने मेरी पुकार सुन ली मेरे बच्चे।”

सुमित्रा देवी दौड़कर कमरे में आईं और अपनी बहू के कदमों के पास बैठकर उसे गले से लगा लिया। “मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची। तूने आज साबित कर दिया कि माँ की ममता और एक औरत का विश्वास किसी भी विज्ञान की मोहताज नहीं होती। अब से तू नहीं, मैं तेरा पूरा ध्यान रखूंगी।”

उस रात उस घर में सिर्फ एक त्योहार नहीं मनाया जा रहा था, बल्कि एक नए जीवन का, एक नए विश्वास का और एक अटूट प्रेम का जन्म हुआ था। सभी की आँखें नम थीं और पालने में बैठे लड्डू गोपाल मानों अपनी माँ के इस नए सफर को देखकर मुस्कुरा रहे थे।

क्या आपने भी कभी अपने जीवन में या आस-पास ऐसा कोई चमत्कार होते देखा है जहाँ विज्ञान हार गया हो और विश्वास जीत गया हो? क्या सुमित्रा देवी का अपनी बहू के प्रति ऐसा व्यवहार सही था? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!