खामोश रिश्तों की गूंज – अनुपमा

बाहर आसमान से बारिश की बूंदें लगातार गिर रही थीं, लेकिन मीरा के अंदर जो तूफान उठ रहा था, उसके सामने ये बारिश बहुत मामूली लग रही थी। सुबह से ही उसने कुछ नहीं खाया था। डाइनिंग टेबल पर रखी चाय की प्याली कब ठंडी हो गई, उसे इसका एहसास तक नहीं हुआ। वह बस खिड़की के पास बैठी शून्यता में घूर रही थी।

दिमाग में विचारों का एक ऐसा बवंडर चल रहा था जिसे शांत करना उसके बस में नहीं था। इंसान ऐसा क्यों करता है? क्या चंद पलों के भटके हुए आकर्षण या अपनी घटिया मानसिकता के लिए लोग उन रिश्तों की भी परवाह नहीं करते जो सालों के विश्वास पर टिके होते हैं? अपने ही दोस्त को, उसके परिवार को इस तरह से धोखा देते हुए क्या उनकी रूह एक बार भी नहीं कांपती? ये सवाल हथौड़े की तरह मीरा के सिर पर वार कर रहे थे।

सरदर्द अब बर्दाश्त से बाहर हो रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो किस दिशा में जाए। क्या करे, और किससे कहे? जो हुआ था, वह इतना अप्रत्याशित और घिनौना था कि किसी को बताने में भी उसे घबराहट हो रही थी। एक लंबी सांस लेकर वह उठी और किचन की तरफ गई।

गैस जलाकर उसने फ्राइंग पैन में पानी रखा। पानी में धीरे-धीरे बुलबुले उठने लगे थे, ठीक वैसे ही जैसे उसके मन में आक्रोश और उलझन के बुलबुले उठ रहे थे। लेकिन इस खौलते पानी को देखते-देखते मीरा के अंदर एक अजीब सी शांति भी छाने लगी। शायद एक कड़ा फैसला उसके अंतर्मन में आकार ले चुका था।

चाय का कप हाथों में थामे वह वापस अपने कमरे में आ गई। चाय की हर घूंट के साथ उसकी हिम्मत वापस लौट रही थी। उसने मन ही मन खुद से वादा किया कि चाहे जो हो जाए,

वह अपनी सहेली कविता को अंधेरे में नहीं रखेगी। जो सच है, वह कविता के सामने आना ही चाहिए, भले ही उसके पास अपनी बात साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत क्यों न बचा हो।

कविता… कविता सिर्फ उसकी सहेली नहीं थी, बल्कि इस बड़े से शहर में उसकी एक ऐसी बहन बन चुकी थी जिससे वह अपने मन की हर छोटी-बड़ी बात साझा करती थी। मीरा के पति समीर और कविता के पति विक्रम एक ही मल्टीनेशनल कंपनी में अलग-अलग डिपार्टमेंट में काम करते थे।

एक बार ऑफिस की किसी पार्टी में समीर ने विक्रम और कविता से मीरा की मुलाकात करवाई थी। समीर और विक्रम की दोस्ती तो ऑफिस तक सीमित थी, लेकिन उस दिन के बाद मीरा और कविता के बीच जो तार जुड़े, उसने दोनों परिवारों को बहुत करीब ला दिया। दोनों की उम्र लगभग समान थी,

दोनों को पुरानी किताबें पढ़ने और नए-नए पकवान बनाने का शौक था। उनका परिवेश और सोच इतनी मिलती-जुलती थी कि कुछ ही महीनों में वे पक्की सहेलियां बन गईं। समीर अक्सर हंसते हुए कहता था, “तुम दोनों को देखकर लगता ही नहीं कि तुम कुछ महीने पहले मिली हो, ऐसा लगता है जैसे तुम दोनों स्कूल की सहेलियां हो जो बरसों बाद फिर से एक हो गई हैं।”

समीर स्वभाव से बहुत ही हंसमुख और घुमक्कड़ इंसान था। उसे हर दूसरे हफ्ते कहीं न कहीं बाहर जाने का शौक था। कभी शहर के बाहर किसी रिसॉर्ट में वीकेंड बिताना, कभी रात को अचानक लॉन्ग ड्राइव पर निकल कर ढाबे पर खाना खाना, या फिर किसी नई फिल्म का फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखना।

और समीर के इन सभी प्लान्स में विक्रम और कविता का नाम सबसे पहले शामिल होता था। चारों का ग्रुप बहुत ही शानदार था। समीर और विक्रम साथ बैठकर अपनी कॉर्पोरेट दुनिया की बातें करते, जबकि मीरा और कविता अपनी ही दुनिया में मगन रहतीं। इन दोनों परिवारों का सामंजस्य इतना बेहतरीन था कि उनका हर सफर, हर मुलाकात एक खूबसूरत याद में तब्दील हो जाती थी। विक्रम एक सुलझा हुआ इंसान लगता था, जो हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहता था।

पिछले महीने मीरा ने अपना एक छोटा सा ऑनलाइन बुटीक शुरू करने का फैसला किया था। इसके लिए उसे कुछ कानूनी दस्तावेजों, रजिस्ट्रेशन और टैक्स से जुड़े कागजातों की जरूरत थी। समीर इन सब कागजी पचड़ों से दूर भागता था। उसने मीरा से कहा, “मीरा, तुम एक काम करो, विक्रम से बात कर लो। उसे इन सब लीगल और फाइनेंसियल चीजों की बहुत अच्छी जानकारी है। वो तुम्हारा काम चुटकियों में करवा देगा।

” समीर के कहने पर मीरा ने विक्रम को फोन किया। विक्रम बहुत शालीनता से पेश आया। उसने मीरा को कुछ जरूरी डाक्यूमेंट्स की लिस्ट दी और कहा कि वह उन्हें व्हाट्सएप पर भेज दे ताकि वह अपना काम शुरू कर सके। मीरा ने सारे कागज स्कैन करके भेज दिए और काम पूरा होने पर उसे एक बहुत ही सम्मानजनक ‘थैंक्स’ मैसेज भी कर दिया था। उस वक्त तक सब कुछ बेहद सामान्य था।

लेकिन आज सुबह जब मीरा उठी और उसने रोजमर्रा की आदत के अनुसार अपना फोन चेक किया, तो उसकी दुनिया हिल गई। स्क्रीन पर विक्रम का एक मैसेज फ्लैश कर रहा था। मैसेज रात के करीब दो बजे का था। विक्रम ने लिखा था कि वह काफी समय से उससे कुछ कहना चाहता था, लेकिन कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया। उसने लिखा था कि अगर मीरा बुरा न माने तो क्या वह अपने दिल की बात कह सकता है?

नींद से आधी जागी मीरा को पहले तो कुछ समझ नहीं आया। उसे लगा शायद विक्रम उसके बुटीक के काम के बारे में कोई फीडबैक देना चाहता है या कोई प्रोफेशनल बात है। उसने बिना ज्यादा सोचे-समझे एक स्माइली के साथ ‘गुड मॉर्निंग’ और ‘हां, कहिए’ लिख कर भेज दिया।

लेकिन उसके उस मैसेज का रिप्लाई चंद सेकंड में ही आ गया। रिप्लाई शब्दों में नहीं, बल्कि एक तस्वीर और एक बहुत ही आपत्तिजनक वॉयस नोट के रूप में था। तस्वीर डाउनलोड होते ही मीरा की आंखें फटी की फटी रह गईं। एक पल के लिए उसकी सांसें रुक गईं। उसके हाथों से फोन छूटकर बिस्तर पर गिर गया। विक्रम, जिसे वह अपने पति का दोस्त और अपनी सहेली का पति मानकर सम्मान देती थी, वह इतनी नीच हरकत कर सकता है, यह उसने सपने में भी नहीं सोचा था। घबराहट, शर्म और गुस्से के मिले-जुले भावों ने मीरा के दिमाग को सुन्न कर दिया। उसके हाथ कांप रहे थे। बिना कुछ सोचे-समझे, हड़बड़ाहट में उसने तुरंत वह तस्वीर, वह वॉयस नोट और विक्रम का पूरा चैट डिलीट कर दिया। उसे ऐसा लगा जैसे वह अपने फोन से उस गंदगी को हमेशा के लिए मिटा देना चाहती हो। इसके बाद उसने तुरंत विक्रम का नंबर ब्लॉक कर दिया।

चैट डिलीट करने के बाद उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। सबूत मिटाकर उसने खुद को एक कमजोर स्थिति में ला खड़ा किया था। अब वह सारा दिन इसी उधेड़बुन में जलती रही कि क्या करे। समीर को बताएगी तो वह बहुत गुस्से वाला इंसान है, वह सीधे विक्रम का कॉलर पकड़ने उसके घर पहुंच जाएगा और बिना सबूत के बात बिगड़ेगी तो तमाशा बन जाएगा। और कविता? क्या कविता उस पर यकीन करेगी? अगर कविता ने यह सोच लिया कि मीरा झूठ बोल रही है या मीरा ने ही विक्रम को कोई गलत इशारा किया था, तो उसकी सबसे अच्छी दोस्त हमेशा के लिए उससे छिन जाएगी। समाज और परिवार की इस उलझन ने उसके सिर में हथौड़े मार रखे थे।

लेकिन चाय खत्म करते-करते उसका मन शांत और दृढ़ हो चुका था। उसने फैसला कर लिया था कि औरत होने के नाते एक औरत को धोखे में रखना सबसे बड़ा पाप है। वह अपनी दोस्ती की नींव झूठ और फरेब पर नहीं रख सकती थी। उसने फोन उठाया और सीधे कविता को डायल किया।

“कविता, मुझे तुमसे अभी मिलना है। बहुत जरूरी बात है,” मीरा की आवाज में एक अजीब सी गंभीरता थी।

आधे घंटे बाद दोनों पास के एक शांत कैफे में बैठी थीं। मीरा ने कविता का हाथ अपने हाथों में लिया। उसकी आंखों में आंसू थे। “कविता, मेरे पास तुम्हें दिखाने के लिए कोई स्क्रीनशॉट नहीं है, कोई सबूत नहीं है। मैंने हड़बड़ाहट और घिन के मारे सब कुछ डिलीट कर दिया। लेकिन मैं हमारी दोस्ती और तुम्हारे विश्वास को कभी टूटने नहीं देना चाहती।”

फिर मीरा ने बिना कुछ छिपाए, सुबह की वह सारी घटना अक्षरशः कविता को बता दी। बताते हुए मीरा की आवाज कांप रही थी, उसे डर था कि अभी कविता अपना हाथ छुड़ा लेगी और उस पर चिल्लाने लगेगी। उसने यह भी कह दिया कि अब जो भी फैसला होगा, वह कविता का होगा और अगर कविता उस पर यकीन नहीं करना चाहती, तो वह उसे भी स्वीकार कर लेगी, लेकिन अब वह विक्रम के साथ कभी किसी ट्रिप या डिनर पर नहीं जा पाएगी।

कहानी खत्म होने के बाद कैफे में एक लंबी खामोशी छा गई। मीरा ने डरते हुए कविता की तरफ देखा। कविता के चेहरे पर न तो कोई गुस्सा था, न ही अविश्वास। बल्कि उसकी आंखों में एक गहरी उदासी और एक थकी हुई सी मुस्कान थी।

कविता ने मीरा का हाथ कसकर पकड़ लिया और एक ठंडी सांस भरते हुए बोली, “तुम्हें सबूत देने की कोई जरूरत नहीं है मीरा। मैं तुम पर पूरी तरह विश्वास करती हूं।”

मीरा हैरान रह गई। “तुम… तुम मुझसे नाराज नहीं हो?”

कविता की आंखों से एक आंसू छलक कर उसके गाल पर आ गिरा। “मैं तुमसे नाराज क्यों होऊंगी? गलती तुम्हारी नहीं, मेरे नसीब और उस इंसान की फितरत की है। सच कहूं मीरा, तो तुम पहली नहीं हो। विक्रम की इन आदतों से मैं सालों से वाकिफ हूं। ऑफिस की एक कलीग के साथ भी उसने ऐसा ही किया था। तब बहुत हंगामा हुआ था। मैंने उसे छोड़ने का मन बना लिया था, लेकिन फिर बच्चों और परिवार के दबाव में मुझे रुकना पड़ा। उसने कसमें खाई थीं कि वह सुधर गया है, लेकिन कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती। मैं तो सिर्फ एक समझौता जी रही हूं।”

मीरा को उस वक्त कविता से हमदर्दी होने लगी। जिस इंसान को वह इतना खुशमिजाज समझती थी, वह अंदर ही अंदर कितना बड़ा दर्द छुपाए बैठी थी।

“मुझे माफ कर दो कविता, मैंने तुम्हारे जख्मों को फिर से हरा कर दिया,” मीरा ने रुंधे गले से कहा।

“नहीं मीरा, तुमने वही किया जो एक सच्ची दोस्त को करना चाहिए। मुझे खुशी है कि तुमने मुझसे कुछ नहीं छुपाया। मैं नहीं चाहती कि उसकी वजह से हमारी दोस्ती पर कोई असर पड़े,” कविता ने आंसू पोंछते हुए कहा।

उस दिन दोनों सहेलियों ने एक अलिखित समझौता कर लिया। वे अपने पतियों को इस बात की भनक नहीं लगने देंगी कि वे क्या जानती हैं, ताकि समीर के गुस्से और किसी बड़े सामाजिक तमाशे से बचा जा सके। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने अपनी सीमाएं भी तय कर लीं।

इसके बाद जब भी समीर वीकेंड पर बाहर जाने का या विक्रम के साथ डिनर का कोई प्लान बनाता, तो कभी मीरा सिरदर्द का बहाना बना देती, तो कभी कविता फोन करके कह देती कि घर में मेहमान आ गए हैं। धीरे-धीरे समीर को भी लगने लगा कि शायद अब विक्रम और कविता के पास उनके लिए वक्त नहीं है। आहिस्ता-आहिस्ता दोनों परिवारों का एक साथ उठना-बैठना, घूमना-फिरना बिल्कुल बंद हो गया। समीर के लिए यह एक सामान्य बात थी कि वक्त के साथ दोस्तों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं, लेकिन इस दूरी के पीछे का असली कारण सिर्फ वे दो औरतें जानती थीं।

परिवारों की दूरी के बावजूद, मीरा और कविता की दोस्ती कभी कमजोर नहीं पड़ी। वे अब पतियों के बिना मिलतीं, साथ कॉफी पीतीं और घंटों बातें करतीं। मीरा ने अपना बुटीक सफलतापूर्वक शुरू कर लिया था और कविता उसमें उसकी पूरी मदद करती थी। एक तूफान आया जरूर था, लेकिन उस तूफान ने उनके रिश्ते को तोड़ने के बजाय एक ऐसी मजबूत नींव पर खड़ा कर दिया था जहां सिर्फ सच और एक-दूसरे के प्रति अटूट सम्मान था।

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 मूल लेखिका : अनुपमा

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