कर्ज रोशनी का – गोविंद गुप्ता

राधिका उनके चरणों में गिर पड़ी और रोने लगी। उसने अपना परिचय दिया और अपनी पहली तनख्वाह का लिफाफा उनके हाथों में रख दिया। “मांजी, मैं राधिका। आपने मुझे जो जीवनदान दिया था, आज मैं आपका वह कर्ज चुकाने आई हूँ। यह मेरी पहली तनख्वाह है। आपकी उस रात की मदद ने एक गरीब की बेटी को डॉक्टर बना दिया।”

डॉ. कल्याणी ने उस लिफाफे को देखा, मुस्कुराईं, और उसे वापस राधिका के हाथों में थमा दिया। उन्होंने बहुत प्यार से राधिका के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, मैंने कहा था ना कि तुम्हें यह कर्ज चुकाना होगा, लेकिन मैंने यह नहीं कहा था कि यह कर्ज मुझे चुकाना है।”

राधिका हैरानी से उनकी ओर देखने लगी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।  

माधोपुर गांव की पगडंडियां वैसे तो बहुत खामोश रहती थीं, लेकिन बारह साल की राधिका के मन में हमेशा सवालो और सपनों का एक शोर गूंजता रहता था। राधिका के पिता, दीनानाथ, गांव के एक छोटे से कारीगर थे जो बांस की टोकरियां बनाते थे। कुछ साल पहले एक दुर्घटना में उनके दायें हाथ की उंगलियां कट गई थीं,

जिसके बाद से घर की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो गई थी। उसकी माँ, विमला, दूसरों के खेतों में मजदूरी करके किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करती थी।

राधिका पढ़ने में बहुत मेधावी थी, लेकिन गरीबी उस मेधावी चमक को निगलने के लिए रोज मुँह बाए खड़ी रहती थी। स्कूल जाने के लिए उसके पास ना तो ढंग के जूते थे और ना ही पूरी किताबें। उसकी स्कूल ड्रेस की रंगत उड़ चुकी थी और कोहनियों के पास से धागे उधड़ने लगे थे।

एक दिन स्कूल में प्रार्थना के समय, जब सभी बच्चे कतार में खड़े थे, तभी पीछे खड़े एक अमीर किसान के बेटे ने राधिका की उधड़ी हुई कॉलर देखकर फब्ती कसी, “अरे राधिका, तेरी शर्ट तो ऐसी लग रही है जैसे खेतों में खड़ा कोई बिजूका हो, क्या दर्जी ने इसे चूहों से सिलवाया है?” आस-पास के सभी बच्चे खिलखिला कर हंस पड़े।

राधिका का दिल बैठ गया। उसने किसी तरह अपने आंसू रोके और अपनी गर्दन झुका ली। वह जानती थी कि उसकी माँ के पास उसे नई ड्रेस दिलाने के पैसे नहीं हैं। स्कूल से लौटकर वह चुपचाप एक कोने में बैठकर रोई, लेकिन उसने अपने माता-पिता से कुछ नहीं कहा क्योंकि वह उनके दुख को और बढ़ाना नहीं चाहती थी।

राधिका के घर में बिजली नहीं थी। शाम ढलते ही पूरा घर अंधकार में डूब जाता था। मिट्टी के तेल की भी किल्लत रहती थी, इसलिए राधिका स्कूल से आने के बाद और घर का सारा काम खत्म करने के बाद, अपनी किताबें लेकर गांव से कुछ दूर स्थित रेलवे स्टेशन की ओर निकल जाती थी।

वहां प्लेटफॉर्म नंबर एक पर एक बड़ा सा पीली रोशनी वाला हैलोजन बल्ब लगा था। रात के सन्नाटे में, जब मुसाफिरों की भीड़ छंट जाती, तब वह उस बल्ब की रोशनी में बैठकर अपनी पढ़ाई करती। स्टेशन का चाय वाला, रहमत चाचा, उसे कभी-कभी बची हुई चाय या एक आध बिस्कुट दे देता था। राधिका वहीं जमीन पर बोरी बिछाकर गणित के सवाल सुलझाती और विज्ञान के पन्ने पलटती।

राधिका ने अपनी आठवीं और नवीं की परीक्षा में पूरे जिले में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। उसके शिक्षक उसकी प्रतिभा से वाकिफ थे, लेकिन हाईस्कूल के बाद की पढ़ाई और शहर के कॉलेज का खर्च उठाना उसके पिता के बस की बात नहीं थी। दीनानाथ अक्सर रात में खांसते हुए अपनी पत्नी से कहते, “मेरी बच्ची में उड़ने की बहुत ताकत है विमला, लेकिन मेरे पास उसे देने के लिए आसमान नहीं है।” राधिका यह सब सुनती और अपनी किताबों को सीने से लगाकर खामोश रह जाती।

सर्दियों की एक ठिठुरती रात थी। कोहरा इतना घना था कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था। ट्रेनें कई घंटे लेट थीं। राधिका अपनी पुरानी शॉल ओढ़े प्लेटफॉर्म के उसी हैलोजन बल्ब के नीचे बैठी भौतिक विज्ञान के सूत्र याद कर रही थी। तभी एक बुजुर्ग महिला, जो शहर की एक नामी डॉक्टर प्रतीत हो रही थीं, अपनी लेट हुई ट्रेन का इंतजार करते हुए प्लेटफॉर्म पर टहलने लगीं। उनका नाम डॉ. कल्याणी था। उनकी नजर उस कड़कड़ाती ठंड में जमीन पर बैठकर पढ़ रही एक छोटी सी बच्ची पर पड़ी। उन्होंने गौर से देखा कि राधिका कितनी एकाग्रता से पढ़ाई कर रही है।

अचानक डॉ. कल्याणी के हाथ से उनका चश्मा छूटकर नीचे गिर गया। राधिका ने तुरंत अपनी किताब छोड़ी, चश्मा उठाया, उसे अपने दुपट्टे के साफ हिस्से से पोंछा और बड़े अदब से उन्हें पकड़ा दिया। डॉ. कल्याणी ने मुस्कुराते हुए पूछा, “इतनी रात में तुम यहां क्यों पढ़ रही हो बेटा? घर पर पढ़ाई नहीं होती?” राधिका ने बिना किसी झिझक के अपनी स्थिति बता दी। उसने कहा, “मांझीजी, घर में रोशनी नहीं है, पर यहां की रोशनी कभी नहीं बुझती। मुझे डॉक्टर बनना है, ताकि मेरे बाबूजी का इलाज हो सके और मेरी माँ को चिलचिलाती धूप में मजदूरी न करनी पड़े।” राधिका के आत्मविश्वास और उसकी आंखों की चमक ने डॉ. कल्याणी के दिल को गहराई से छू लिया। उन्होंने उसका नाम और स्कूल का पता पूछा। थोड़ी देर में ट्रेन आ गई और वह चली गईं, लेकिन राधिका के मन में एक अनजानी सी उम्मीद छोड़ गईं।

कुछ दिनों बाद राधिका के स्कूल के प्रिंसिपल ने दीनानाथ को बुलवाया। जब दीनानाथ घबराए हुए स्कूल पहुंचे, तो प्रिंसिपल ने मुस्कुराते हुए कहा, “दीनानाथ जी, आपकी बेटी की किस्मत खुल गई है। शहर की एक बड़ी संस्था ने राधिका की आगे की पढ़ाई, उसके रहने-खाने और किताबों का पूरा खर्च उठाने का जिम्मा लिया है। उसका दाखिला शहर के सबसे अच्छे साइंस कॉलेज में हो गया है।” राधिका और उसके पिता की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। प्रिंसिपल ने राधिका को एक लिफाफा दिया और कहा, “यह उस इंसान ने तुम्हारे लिए छोड़ा है जिसने यह फीस भरी है।”

राधिका ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला। उसमें एक छोटा सा पत्र था, जिसमें लिखा था:

“प्रिय राधिका, तुम्हारी आंखों में मैंने वह सपना देखा है जो कभी मेरी आंखों में हुआ करता था। तुम्हारी आगे की पढ़ाई का रास्ता अब साफ है। तुम्हें किसी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह पैसा कोई खैरात नहीं है, यह एक कर्ज है। शर्त बस इतनी है कि जब तुम पढ़-लिखकर एक सफल इंसान बन जाओगी, तो तुम्हें अपनी पहली तनख्वाह के साथ यह कर्ज चुकाना होगा। जब वह वक्त आए, तो इस पते पर आ जाना।”

उस पत्र में किसी का नाम नहीं था, बस शहर का एक पता लिखा था। राधिका ने उस पत्र को अपने हृदय से लगा लिया। उसने दिन-रात एक कर दिया। वह शहर गई, हॉस्टल में रही, और रातों की नींद त्याग कर पढ़ाई की। उसकी मेहनत रंग लाई और उसने मेडिकल प्रवेश परीक्षा में पूरे राज्य में टॉप किया। सरकार और उस अज्ञात मदद के सहारे उसने अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद सर्जरी में मास्टर्स भी किया। जो लड़की कभी रेलवे स्टेशन की पीली रोशनी में पढ़ती थी, वह अब शहर के एक बड़े सरकारी अस्पताल में डॉ. राधिका बन चुकी थी। उसके पिता का इलाज हो चुका था और अब उसकी माँ को खेतों में काम करने की जरूरत नहीं थी।

जिस दिन राधिका को उसकी पहली तनख्वाह मिली, उसने कुछ पैसे अपने माता-पिता के चरणों में रखे और बाकी पूरी तनख्वाह एक लिफाफे में डालकर उस पते की ओर निकल पड़ी, जो सालों पहले उसे उस चिट्ठी में मिला था। वह पता एक पुराने लेकिन बेहद सुंदर अनाथालय और क्लीनिक का था। जब वह अंदर गई, तो उसने देखा कि एक बुजुर्ग महिला व्हीलचेयर पर बैठी बच्चों को पढ़ा रही हैं। राधिका ने उन्हें तुरंत पहचान लिया। वे डॉ. कल्याणी ही थीं, जो उस रात स्टेशन पर मिली थीं।

राधिका उनके चरणों में गिर पड़ी और रोने लगी। उसने अपना परिचय दिया और अपनी पहली तनख्वाह का लिफाफा उनके हाथों में रख दिया। “मांजी, मैं राधिका। आपने मुझे जो जीवनदान दिया था, आज मैं आपका वह कर्ज चुकाने आई हूँ। यह मेरी पहली तनख्वाह है। आपकी उस रात की मदद ने एक गरीब की बेटी को डॉक्टर बना दिया।”

डॉ. कल्याणी ने उस लिफाफे को देखा, मुस्कुराईं, और उसे वापस राधिका के हाथों में थमा दिया। उन्होंने बहुत प्यार से राधिका के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, मैंने कहा था ना कि तुम्हें यह कर्ज चुकाना होगा, लेकिन मैंने यह नहीं कहा था कि यह कर्ज मुझे चुकाना है।”

राधिका हैरानी से उनकी ओर देखने लगी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। डॉ. कल्याणी ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “सालों पहले, जब मैं अनाथ थी और सड़क किनारे बैठकर पढ़ती थी, तब किसी ने इसी तरह मेरी मदद की थी। जब मैं अपनी पहली तनख्वाह लेकर उनके पास गई, तो उन्होंने मुझसे पैसे नहीं लिए। उन्होंने मुझसे कहा था कि अगर तुम सच में मेरा कर्ज चुकाना चाहती हो, तो किसी ऐसे जरूरतमंद की मदद करना जिसे तुम्हारी जरूरत हो। मैंने वही किया। मैंने अपना वह कर्ज उस रात स्टेशन पर तुम्हारी पढ़ाई का खर्च उठाकर चुकाया था। मेरा कर्ज उतर गया।”

डॉ. कल्याणी ने राधिका की आंखों में देखते हुए आगे कहा, “अब तुम्हारी बारी है राधिका। तुम्हें यह लिफाफा मुझे नहीं देना है। तुम्हें इस पैसे से किसी ऐसी ‘राधिका’ की तलाश करनी है, जो अंधेरे में रोशनी ढूंढ रही हो। जिस दिन तुम किसी एक बच्चे को उस अंधेरे से निकालकर सफलता के उजाले तक पहुंचा दोगी, समझ लेना तुम्हारा यह कर्ज चुक गया। और उससे भी यही वचन लेना। यही वह परंपरा है जो कभी रुकनी नहीं चाहिए।”

राधिका की आंखों से आंसू बहने लगे। उसे समझ आ गया था कि सच्ची मदद क्या होती है। उसने वह लिफाफा वापस अपने बैग में रखा और डॉ. कल्याणी को वचन दिया। वह वापस अपने उसी गांव के रेलवे स्टेशन पर गई, जहां कभी वह पढ़ती थी। उसने वहां भीख मांगने वाले और कूड़ा बीनने वाले तीन बच्चों को अपने साथ लिया और उनकी पढ़ाई का सारा जिम्मा अपने कंधों पर उठा लिया। वह स्टेशन का पीला हैलोजन बल्ब आज भी जल रहा था, लेकिन राधिका ने अपने भीतर जो रोशनी जलाई थी, वह अब कई जिंदगियों के अंधेरे मिटाने वाली थी।

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मूल लेखक : गोविंद गुप्ता

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