राधिका और सुमित की शादी को हुए अभी पाँच साल ही बीते थे। उनका एक प्यारा सा चार साल का बेटा था, जिसका नाम उन्होंने अनमोल रखा था। सुमित एक प्राइवेट कंपनी में अच्छे पद पर था और राधिका एक कुशल गृहिणी। उनकी जिंदगी किसी शांत नदी की तरह बह रही थी,
जिसमें सुख-दुख की छोटी-मोटी लहरें तो आती थीं, लेकिन कोई बड़ा तूफान नहीं था। सुमित अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था, इसलिए राधिका ने भी अपने सास-ससुर की सेवा में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी।
सब कुछ इतना परिपूर्ण था कि अक्सर पड़ोसियों को भी उनके परिवार से ईर्ष्या होने लगती थी। लेकिन कहते हैं ना कि खुशियों को सबसे जल्दी नजर लगती है। और राधिका की इस छोटी सी दुनिया को भी जैसे किसी की बुरी नजर लग गई।
एक दिन अचानक सुमित ऑफिस से बहुत घबराया हुआ लौटा। उसने खुद को कमरे में बंद कर लिया और राधिका से बात करने से मना कर दिया। राधिका को लगा कि शायद ऑफिस में कोई तनाव होगा, जो कल तक ठीक हो जाएगा। लेकिन वह कल कभी नहीं आया। सुमित की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती चली गई।
वह रात-रात भर जागता, दीवारों से बातें करता, और अचानक ही जोर-जोर से चिल्लाने लगता। कभी-कभी वह इतने हिंसक रूप में आ जाता कि घर का सामान तोड़ने लगता। राधिका के लिए यह सब समझना बहुत मुश्किल हो रहा था।
जिस पति ने कभी उस पर आवाज तक नहीं उठाई थी, वह अब उसे पहचानने से भी इंकार कर रहा था। डॉक्टर को दिखाया गया तो पता चला कि सुमित को एक गंभीर मनोवैज्ञानिक विकार (सिज़ोफ्रेनिया) ने घेर लिया है। यह सुनकर राधिका के पैरों तले से जमीन खिसक गई।
बीमारी के कारण सुमित की नौकरी छूट गई। घर में जो जमा-पूंजी थी, वह दवाइयों और डॉक्टरों की फीस में पानी की तरह बहने लगी। राधिका ने सोचा था कि इस मुश्किल घड़ी में उसके सास-ससुर उसका और सुमित का सहारा बनेंगे। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट। सुमित की मानसिक स्थिति के कारण घर का माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया था
कि उसके माता-पिता ने राधिका से दूरी बना ली। बात-बात पर ताने दिए जाने लगे कि “पता नहीं कौन से बुरे कदम इस घर में पड़े हैं कि हमारा हँसता-खेलता बेटा पागल हो गया।” एक दिन तो हद ही हो गई जब सुमित ने दौरे की हालत में अपने पिता पर हाथ उठा दिया।
उसके बाद सास-ससुर ने साफ कह दिया कि वे अब इस पागलपन को और नहीं झेल सकते। उन्होंने अपना हिस्सा अलग कर लिया और राधिका से कह दिया कि वह अपने पति को किसी पागलखाने में छोड़ आए, क्योंकि वे अपनी बाकी की जिंदगी चैन से जीना चाहते हैं।
राधिका के लिए यह किसी वज्रपात से कम नहीं था। एक तरफ बीमार पति, दूसरी तरफ छोटा सा बच्चा जो अपने पिता को इस हालत में देखकर सहम जाता था, और ऊपर से अपनों का यह तिरस्कार। राधिका ने दो महीने तक उस घर में अकेले ही संघर्ष किया। उसने अपने गहने बेचकर सुमित का इलाज जारी रखा, लेकिन घर खर्च और महंगी दवाइयों के आगे वह पैसा भी ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुआ। जब घर में राशन का आखिरी दाना बचा, तो राधिका पूरी तरह से टूट गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अब कहाँ जाए।
ऐसे में उसे अपने मायके की याद आई। राधिका का मायका कोई बहुत अमीर नहीं था। उसके पिता के गुजरने के बाद उसका बड़ा भाई, रमेश, ही घर चला रहा था। रमेश एक छोटी सी कपड़े की दुकान में काम करता था और उसकी खुद की भी पत्नी और दो बच्चे थे। राधिका कभी नहीं चाहती थी कि वह अपने भाई पर बोझ बने, लेकिन अनमोल के भूखे चेहरे और सुमित की दयनीय हालत ने उसे मजबूर कर दिया। उसने रोते हुए रमेश को फोन किया। रमेश बिना एक पल गँवाए राधिका के ससुराल पहुँचा और अपनी बहन, बहनोई और भांजे को लेकर अपने घर आ गया।
रमेश की पत्नी, विमला, बहुत ही सुलझी हुई और समझदार महिला थी। उसने बिना किसी शिकायत के राधिका को गले लगाया और कहा, “दीदी, यह घर आपका भी उतना ही है जितना हमारा। आप बिल्कुल फिक्र मत करो, हम सब मिलकर जीजाजी को ठीक करेंगे।” मायके की उस छोटी सी चौखट में राधिका को जो सुकून मिला, वह उसे अपने ससुराल के बड़े से महल में भी कभी नसीब नहीं हुआ था।
रमेश ने शहर के सबसे अच्छे मनोचिकित्सक से सुमित का इलाज शुरू करवाया। डॉक्टर की फीस और दवाइयों का खर्च बहुत ज्यादा था, इसलिए रमेश ने अपनी दुकान के बाद रात में एक पेट्रोल पंप पर भी काम करना शुरू कर दिया। विमला ने घर का खर्च कम करने के लिए सिलाई का काम पकड़ लिया। अपने मायके वालों के इस निस्वार्थ त्याग को देखकर राधिका की आँखों में हर रोज आंसू आ जाते। वह सोचती कि एक तरफ वे लोग हैं जिनका अपना खून है, जिन्होंने मुसीबत में मुंह फेर लिया, और दूसरी तरफ यह मायका है, जो अपनी हैसियत से बढ़कर एक दामाद की जान बचाने में लगा है।
लगातार इलाज, रमेश और विमला की सेवा, और राधिका के अटूट विश्वास का असर धीरे-धीरे दिखने लगा। लगभग आठ महीने के कठिन संघर्ष के बाद सुमित की हालत में सुधार आने लगा। उसके हिंसक दौरे बंद हो गए, वह लोगों को पहचानने लगा और अनमोल के साथ फिर से खेलने लगा। डॉक्टर ने भी कह दिया कि अब खतरे की कोई बात नहीं है, बस दवाइयां समय पर चलती रहनी चाहिए।
सुमित के ठीक होने से राधिका की जान में जान आई, लेकिन उसके स्वाभिमान ने उसे यह अहसास दिलाना शुरू कर दिया कि वह अब और अपने भाई पर आर्थिक बोझ नहीं बन सकती। रमेश ने कभी इस बात का जिक्र नहीं किया, लेकिन राधिका जानती थी कि उसके भाई ने इस दौरान कितना कर्ज ले लिया है। राधिका ने तय किया कि वह अब खुद काम करेगी और अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाएगी। सुमित भी अब काम करने लायक हो गया था, हालांकि उसे अभी बहुत ज्यादा तनाव वाले काम से बचना था।
राधिका ने काम खोजना शुरू किया। एक दिन रमेश के एक परिचित ने बताया कि शहर के बाहर ‘आनंद पुष्प वाटिका’ नाम की एक बहुत बड़ी फूलों की नर्सरी है। उस नर्सरी के मालिक, सेठ दीनानाथ, एक बहुत ही नेक इंसान हैं। उन्हें अपनी नर्सरी की देखभाल के लिए एक ऐसे भरोसेमंद परिवार की तलाश है जो वहीं रहकर काम कर सके। बदले में वे रहने के लिए एक अच्छा सा दो कमरों का घर, बिजली-पानी और एक अच्छी तनख्वाह देंगे।
राधिका ने सुमित को इस बारे में बताया। सुमित भी खाली बैठकर थक चुका था, उसने तुरंत हामी भर दी। दोनों अगले ही दिन सेठ दीनानाथ से मिलने पहुँच गए। सेठ जी ने सुमित की बीमारी का पूरा सच जानने के बाद भी उन्हें काम पर रख लिया। उन्होंने कहा, “फूलों और पौधों के बीच रहने से इंसान का मन वैसे भी शांत रहता है। तुम दोनों यहाँ रहो, नर्सरी का काम देखो, और अपने जीवन की नई शुरुआत करो।”
राधिका और सुमित उस नर्सरी में रहने लगे। सुबह-सुबह फूलों की महक और ताजी हवा ने सुमित के मानसिक स्वास्थ्य पर जादू सा असर किया। राधिका नर्सरी के पौधों की छंटाई और पैकिंग का काम देखती, जबकि सुमित हिसाब-किताब और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालता। सेठ जी द्वारा दिया गया घर बहुत आरामदायक था। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी तनख्वाह से रमेश का सारा कर्ज भी चुकाना शुरू कर दिया।
जिंदगी फिर से पटरी पर लौट आई थी। सुमित अब पूरी तरह से स्वस्थ था और अनमोल का दाखिला भी पास के एक अच्छे स्कूल में हो गया था। एक दिन सेठ दीनानाथ नर्सरी का मुआयना करने आए। सुमित और राधिका ने उन्हें चाय पिलाई। सुमित ने अचानक सेठ जी के पैर छू लिए और रुंधे हुए गले से बोला, “मालिक, जब हमारे अपनों ने हमें धक्के मारकर निकाल दिया था, तब आपने हमें छत दी, काम दिया। आपने हमारा उजड़ा हुआ घर फिर से बसा दिया। हम आपकी इस दया को, आपके इस एहसान को सात जनम तक नहीं भूलेंगे। हम जिंदगी भर आपकी दुआएं करेंगे।”
सेठ दीनानाथ ने प्यार से सुमित को उठाया और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, एहसान कैसा? तुम लोग मेरी इस नर्सरी को अपने बच्चों की तरह पाल रहे हो। तुम यहाँ मेहनत करते हो, अपना पसीना बहाते हो, उसी के बदले मैं तुम्हें तनख्वाह देता हूँ। इसमें मेरा कोई एहसान नहीं है, यह तुम्हारी अपनी कर्मशीलता का फल है। इंसान को हमेशा उस ईश्वर का शुक्रगुजार होना चाहिए, जो सही समय पर सही रास्ते खोल देता है।”
उस दिन राधिका को समझ में आया कि सच्चे रिश्ते और सच्चे इंसान वो नहीं होते जो खून के हों, बल्कि वो होते हैं जो मुश्किल वक्त में आपकी उंगली थाम लें। ससुराल वालों ने भले ही उसे उसके सबसे बुरे वक्त में अकेला छोड़ दिया था, लेकिन उसके मायके वालों के प्यार और रमेश के बलिदान ने उसे कभी टूटने नहीं दिया। आज जब राधिका पीछे मुड़कर देखती है, तो उसे अपने संघर्ष के दिनों पर गर्व होता है। उसने अपने सुहाग को मौत के मुंह से वापस खींचा था, और आज वह सम्मान के साथ अपनी जिंदगी जी रही थी।
आपको क्या लगता है, क्या राधिका के ससुराल वालों का अपनी जिम्मेदारी से भागना सही था? या फिर एक पत्नी का अपने पति के लिए मायके की दहलीज पर जाना उसकी कमजोरी थी या ताकत? आप इस कहानी के बारे में क्या सोचते हैं, कमेंट करके जरूर बताएँ।
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मूल लेखिका : सपना बबेले