एक नया रिश्ता

सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड के बावजूद मेघा के माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। गैस के एक बर्नर पर कुकर सीटी दे रहा था और दूसरे पर वह तेजी से रोटियां सेंक रही थी। आज ऑफिस में मेघा का एक बहुत महत्वपूर्ण प्रेजेंटेशन था, जिसके लिए वह पिछले एक हफ्ते से रात-रात भर जागकर तैयारी कर रही थी। मेघा एक  कंपनी में जॉब  करती थी और साथ ही अपने घर की एक जिम्मेदार बहू भी। पति रोहन अक्सर टूर पर रहते थे, इसलिए घर और सास की जिम्मेदारी मेघा ही संभालती थी।

वह जल्दी-जल्दी टिफिन पैक कर ही रही थी कि अचानक दरवाजे की घंटी बजी। मेघा ने घड़ी की तरफ देखा, पौने आठ हो रहे थे। “इतनी सुबह कौन आ गया?” बड़बड़ाते हुए उसने गैस धीमी की और अपने पल्लू से हाथ पोंछते हुए दरवाजा खोलने भागी।

दरवाजा खोलते ही मेघा ठिठक गई। सामने उसकी ननद, कविता, अपने दो बच्चों के साथ खड़ी थी। कविता के हाथ में सूटकेस था और चेहरे पर एक अजीब सा रौब।

“अरे दीदी! आप? इतनी सुबह… सब ठीक तो है ना?” मेघा ने हैरानी और स्वागत के मिले-जुले भाव से पूछा।

कविता ने अंदर कदम रखते हुए एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, “क्यों मेघा? क्या अब मुझे अपने ही मायके आने के लिए तुमसे परमिशन लेनी पड़ेगी? या तुम्हें कोई नोटिस भेजना पड़ेगा?”

मेघा को कविता का यह तंज चुभा, लेकिन उसने बात को संभालते हुए कहा, “नहीं दीदी, मेरा वह मतलब बिल्कुल नहीं था। मैं तो बस हैरान थी क्योंकि आपने आने का कोई जिक्र नहीं किया था। आइए ना, अंदर आइए।”

मेघा एक तरफ हट गई और कविता बच्चों के साथ अंदर आ गई। आवाज सुनकर मेघा की सास, सुमित्रा जी भी अपने कमरे से बाहर आ गईं। अपनी बेटी और नाती-नातिनों को देखकर सुमित्रा जी का चेहरा खिल उठा। “अरे मेरी बच्ची! तू अचानक कैसे? मुझे बताया भी नहीं,” सुमित्रा जी ने कविता को गले लगाते हुए कहा।

“बस माँ, बच्चों की छुट्टियां थीं, तो सोचा कुछ दिन मायके में बिता आऊं। वैसे भी, अपने घर आने के लिए कैसा सोचना,” कविता ने मेघा की तरफ तिरछी नजर से देखते हुए कहा।

मेघा ने मुस्कुरा कर दोनों बच्चों के सिर पर हाथ फेरा और सुमित्रा जी से बोली, “माँ जी, मैं बस अपना लैपटॉप बैग लेकर आती हूँ। मेरी कैब आने ही वाली है, आज ऑफिस पहुंचना बहुत जरूरी है।”

मेघा जैसे ही पलटी, सुमित्रा जी ने कहा, “हाँ बहू, तू जा, मैं कविता के लिए चाय बना लेती हूँ।”

यह सुनते ही कविता तपाक से बोली, “रहने दो माँ! तुम क्यों इस उम्र में किचन में जाओगी? और क्या मेघा के पास इतना भी वक्त नहीं है कि अपनी ननद को एक कप चाय पिला सके? मैं कौन सा रोज़-रोज़ यहाँ आती हूँ। लेकिन नहीं, भाभी के लिए तो उनका ऑफिस और उनका काम ही सबसे ज्यादा जरूरी है। हम मायके वालों की क्या अहमियत।”

कविता की यह बात सीधे मेघा के दिल पर लगी। वह जानती थी कि अगर वह अभी कुछ कहेगी, तो बात का बतंगड़ बन जाएगा। मेघा ने एक गहरी सांस ली, अपनी घड़ी देखी—कैब आने में सिर्फ दस मिनट बचे थे—और चुपचाप रसोई की तरफ मुड़ गई।

“दीदी, आप बैठिए, मैं अभी चाय लाती हूँ,” मेघा ने कहा और वापस उसी रसोई में घुस गई जहां से वह अभी-अभी काम खत्म करके निकली थी।

चाय बनाते हुए मेघा का ध्यान बार-बार अपने फोन की स्क्रीन पर जा रहा था। कैब ड्राइवर का मैसेज आ चुका था कि वह नीचे पहुँच गया है। मेघा ने जल्दी से चाय छानी, ट्रे में कप और बिस्किट रखे और बाहर ले आई। सबको चाय देकर वह भागी-भागी अपने कमरे में गई, बैग उठाया और बिना अपनी चाय पिए ऑफिस के लिए निकल गई। जाते-जाते उसने सुना कि कविता अपनी माँ से कह रही थी, “देखा माँ, इसे तो बस भागने की पड़ी रहती है। पता नहीं कौन सा कलेक्टर का काम करती है।”

रास्ते भर कैब में मेघा का मन अशांत रहा। वह सोच रही थी कि क्यों एक औरत को हर बार साबित करना पड़ता है? वह सुबह पांच बजे उठकर पूरे घर की सफाई करती है, नाश्ता और लंच बनाती है, सास की दवाइयों का ध्यान रखती है, और फिर पूरे दिन ऑफिस में दिमागी कसरत करती है। फिर भी, कविता दीदी जैसे लोगों के लिए वह सिर्फ एक ‘लापरवाह बहू’ ही थी।

ऑफिस पहुंचकर मेघा ने अपने काम पर ध्यान केंद्रित किया। उसका प्रेजेंटेशन बहुत शानदार रहा। बॉस ने उसकी तारीफ की और उसे एक नए प्रोजेक्ट का लीड भी बना दिया। यह खुशी इतनी बड़ी थी कि मेघा सुबह की सारी कड़वाहट भूल गई। उसने सोचा कि शाम को घर जाकर सबके साथ यह खुशखबरी बांटेगी और दीदी के आने की खुशी में बाहर से मिठाई भी ले जाएगी।

शाम को जब मेघा घर लौटी, तो वह बहुत थकी हुई थी, लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी। घर का दरवाजा खुला तो देखा कि हॉल में चारों तरफ बच्चों के खिलौने बिखरे हुए हैं। सोफे के कुशन फर्श पर पड़े थे और टीवी तेज आवाज में चल रहा था। सुमित्रा जी और कविता आराम से बातें कर रही थीं।

“नमस्ते दीदी, कैसी रही दिन भर की थकान?” मेघा ने माहौल हल्का करने की कोशिश करते हुए कहा और मिठाई का डिब्बा मेज पर रख दिया।

कविता ने डिब्बे की तरफ देखे बिना ही कहा, “थकान तो हमें होनी चाहिए मेघा। तुमने तो सुबह रसोई ऐसे ही छोड़ दी थी। मैंने और माँ ने मिलकर दिन का खाना बनाया। तुम्हें तो बस अपने ऑफिस के एसी में बैठना होता है, घर की फिक्र किसे है?”

मेघा सन्न रह गई। उसने सुबह पूरा किचन साफ किया था, सिर्फ चाय के दो बर्तन सिंक में थे। लेकिन वह बहस नहीं करना चाहती थी। वह चुपचाप अपने कमरे में गई, कपड़े बदले और फिर से रात के खाने की तैयारी के लिए रसोई में आ गई।

रात का खाना खाते समय रोहन का वीडियो कॉल आया। उसने भी कविता को देखकर खुशी जताई। बातें चल रही थीं कि अचानक कविता ने कहा, “सुनो मेघा, कल मुझे बच्चों को लेकर मॉल जाना है। कुछ शॉपिंग करनी है और फिर बाहर ही खाना खाएंगे। तुम कल ऑफिस से छुट्टी ले लेना, हम सब साथ चलेंगे।”

मेघा ने विनम्रता से कहा, “दीदी, कल तो छुट्टी लेना बिल्कुल मुमकिन नहीं है। आज ही मुझे एक नया प्रोजेक्ट मिला है और कल उसकी पहली मीटिंग है। आप और माँ जी चले जाइए, मैं वीकेंड पर पक्का आप सबको बाहर लेकर चलूंगी।”

इतना सुनते ही कविता ने जोर से अपना चम्मच प्लेट पर पटका। “देखा माँ! मैंने कहा था ना कि इसके नखरे आसमान पर हैं। दो पैसे क्या कमाने लगी है, इसे तो हम सबकी कोई कद्र ही नहीं रही। अरे, कौन सा तुम्हारा यह 9 से 5 का काम घर चला रहा है? भैया कमा तो रहे हैं। यह तुम्हारा सिर्फ शौक है, और इस शौक के लिए तुम अपने परिवार को नजरअंदाज कर रही हो।”

सुमित्रा जी चुप रहीं। उन्होंने अपनी बेटी को रोकने की कोई कोशिश नहीं की। रोहन फोन पर था, उसने बीच-बचाव करना चाहा, “अरे दीदी, आप गुस्सा क्यों कर रही हैं? मेघा का काम भी तो जरूरी है।”

लेकिन आज मेघा ने सोच लिया था कि वह चुप नहीं रहेगी। बहुत हो चुका था। वह अपनी जगह से उठी। उसकी आंखों में आंसू नहीं, बल्कि एक दृढ़ संकल्प था। उसने बहुत ही शांत, लेकिन स्पष्ट आवाज में कहना शुरू किया।

“दीदी, आप सही कह रही हैं। मायके पर बेटी का हक होता है और आपको यहां आने के लिए किसी की इजाजत नहीं चाहिए। लेकिन इस घर पर जितना हक आपका है, उतना ही मेरा भी है। आप इसे मेरा ‘शौक’ कह रही हैं? यह जो घर हम ईएमआई पर ले पाए हैं, वह मेरे और रोहन के बराबर कमाने की वजह से मुमकिन हो पाया है। माँ जी की जो महंगी दवाइयां हर महीने आती हैं, वो मेरे इसी ‘शौक’ वाले अकाउंट से आती हैं।”

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। कविता की आंखें फटी रह गईं।

मेघा ने आगे कहा, “मैं सुबह पांच बजे उठती हूँ ताकि आप सबको गरम नाश्ता मिल सके। मैं घर का कोई काम नौकरानी पर नहीं छोड़ती क्योंकि माँ जी को मेरे हाथ का खाना पसंद है। मैं ऑफिस में काम का तनाव झेलकर घर आती हूँ और फिर से मुस्कुराते हुए किचन में खड़ी होती हूँ। यह मेरा शौक नहीं, मेरी जिम्मेदारी है। और मैं इसे दिल से निभाती हूँ। लेकिन अगर आप मेरी मेहनत को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज कर देंगी क्योंकि मैं एक कामकाजी महिला हूँ, तो यह गलत है। एक औरत होकर आप दूसरी औरत की मेहनत नहीं समझ पा रही हैं।”

मेघा ने सुमित्रा जी की तरफ देखा और कहा, “माँ जी, क्या मैंने कभी आपकी सेवा में कोई कमी छोड़ी? क्या मैंने कभी इस घर को अपना नहीं माना? फिर जब दीदी मुझे ताने मार रही थीं, तो आपने उन्हें क्यों नहीं रोका? क्या मेरा स्वाभिमान इस घर में कोई मायने नहीं रखता?”

सुमित्रा जी की आंखें झुक गईं। उन्हें पहली बार अहसास हुआ कि मेघा कितनी दोहरी जिंदगी जी रही है और उन्होंने कभी उसकी तारीफ करने के बजाय हमेशा उसमें कमियां ही निकालीं।

कविता का चेहरा भी उतर गया था। वह जानती थी कि मेघा जो कह रही है, वह शत-प्रतिशत सच है। उसके खुद के घर में, वह अपनी सास के ताने सहती थी और यहां आकर वह वही सब अपनी भाभी के साथ कर रही थी।

फोन पर रोहन ने कहा, “मेघा बिल्कुल सही कह रही है दीदी। वह मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। मुझे गर्व है अपनी पत्नी पर। आपको उसकी इज्जत करनी चाहिए।”

मेघा ने गहरी सांस ली और कहा, “दीदी, मुझे आपका यहां आना बहुत अच्छा लगा। सच में। लेकिन मुझे सिर्फ इतनी सी इज्जत चाहिए कि मेरे काम को, मेरी मेहनत को कम ना आंका जाए। मैं कल आपके साथ नहीं जा सकती, लेकिन रविवार को हम सब जरूर जाएंगे।”

यह कहकर मेघा ने बर्तन उठाए और रसोई में चली गई।

उस रात घर में बहुत शांति थी। किसी ने किसी से कोई बात नहीं की। अगले दिन सुबह मेघा हमेशा की तरह पांच बजे उठी। जब वह रसोई में गई, तो देखा कि गैस पर चाय बन रही थी और कविता वहां खड़ी थी।

मेघा को देखकर कविता ने एक फीकी सी मुस्कान दी और चाय का कप उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “तेरा प्रेजेंटेशन कैसा रहा कल? तूने तो खुशी मनाने का मौका ही नहीं दिया। ये ले, अपनी चाय पी ले, आज मुझे भी तेरे हाथ की बनी गोभी के पराठे खाने हैं। जल्दी से ऑफिस का काम निपटा कर आना, शाम को तेरा सेलिब्रेशन करेंगे।”

सुमित्रा जी भी रसोई के दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थीं। मेघा ने चाय का कप थाम लिया। चाय की वह चुस्की आज उसे बहुत मीठी लगी, क्योंकि उसमें सिर्फ चीनी नहीं, बल्कि उसका लौटा हुआ सम्मान और एक नया रिश्ता घुल चुका था। एक कामकाजी औरत को सिर्फ आराम की नहीं, सम्मान और समझ की जरूरत होती है। जब वह समझ घर से ही मिलने लगे, तो बाहर की दुनिया जीतना बहुत आसान हो जाता है।

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