प्यार भरे झूठ का सहारा

“आरव, बेटा वो आखिरी गुलाब जामुन नानी का है। तुमने पहले ही दो खा लिए हैं, अब और नहीं।” मैंने अपने सात साल के बेटे को प्यार से डांटते हुए कहा। हम सब डाइनिंग टेबल पर बैठे थे और रात के खाने के बाद मीठे का आनंद ले रहे थे।

लेकिन मेरे टोकने का कोई असर होने से पहले ही मेरी माँ, कावेरी जी ने अपनी कटोरी से वह चाशनी में डूबा हुआ आखिरी गुलाब जामुन निकालकर आरव की प्लेट में डाल दिया।

“माँ, आप भी ना! आपको गुलाब जामुन कितना पसंद है। मैंने खास आपके लिए ही तो अपने पसंदीदा हलवाई की दुकान से इसे मंगवाया था।” मैं थोड़ा झुंझला गई और मैंने हल्की सी नाराजगी भी जताई।

माँ ने बड़ी सहजता से मुस्कुराते हुए कहा, “अरे नहीं सुरभि, मुझे आजकल मीठा खाने से दांतों में झनझनाहट होने लगती है। और फिर कल ही तो डॉक्टर ने भी मीठा कम खाने को कहा था। उम्र हो रही है, अब ये सब पचता कहाँ है।”

मैंने एक गहरी सांस ली और अपना माथा पीटा। माँ की यह ‘त्याग वाली बीमारी’ या कहूं कि ‘झूठ बोलने की आदत’ कोई नई बात नहीं थी। जब से मैंने होश संभाला है, मैंने अपनी माँ को अपने हिस्से की खुशियाँ और पसंद की चीज़ें इसी तरह तरह-तरह के बहाने बनाकर हम पर या घर के अन्य सदस्यों पर लुटाते देखा है। यह उनका अपना एक अलग ही तरीका था प्यार जताने का।

बचपन की कई यादें आज भी मेरे जेहन में पूरी तरह ताज़ा हैं। मुझे याद है, एक बार बाबूजी (मेरे पिता) ने अपनी सैलरी से पैसे बचाकर दिवाली के मौके पर माँ के लिए एक बहुत ही सुंदर बनारसी रेशमी साड़ी खरीदी थी। नीले रंग की उस साड़ी पर सुनहरी ज़री का बहुत ही उम्दा काम था। माँ उसे देखकर बेहद खुश हुई थीं, उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी। लेकिन तभी पड़ोस वाली ताई जी हमारे घर आईं। उन्हें वह साड़ी बहुत भा गई और उन्होंने उसकी खूब तारीफ की। बस फिर क्या था, माँ की वह त्याग वाली बीमारी फौरन उन पर हावी हो गई। उन्होंने तुरंत वह साड़ी ताई जी की तरफ बढ़ाते हुए कहा था, “भाभी जी, आप ही रख लीजिए। मुझे तो यह रेशमी कपड़ा चुभता है, इसे पहनने से मेरी त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं। आप पर यह नीला रंग बहुत खिलेगा।”

मैं उस दिन माँ से खूब लड़ी थी। मुझे इस बात का बहुत गुस्सा था कि उन्होंने अपनी पसंद की चीज़ यूं ही किसी और को क्यों दे दी। मैंने दो दिन तक उनसे ठीक से बात नहीं की थी। तब बाबूजी ने मुझे पास बिठाकर बहुत प्यार से समझाया था, “सुरभि बेटा, तुम्हारी माँ को खुद के लिए कुछ मांगना आता ही नहीं है। उनकी खुशी इसी बात में बसती है कि वो दूसरों को खुश देखें। उन्होंने आज तक अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा। यही उनका स्वभाव है, और यही उनका प्यार है।”

आज इतने सालों बाद भी हालात कुछ ज्यादा बदले नहीं थे। मैं सर्दियों की छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए अपने मायके आई हुई थी और कल मुझे वापस अपने ससुराल, दिल्ली लौटना था। इस बार मैं मायके आते वक्त अपने और माँ दोनों के लिए सर्दियों के कपड़े खरीद कर लाई थी। मैंने अपने लिए एक बेहद खूबसूरत कश्मीरी पश्मीना शॉल ली थी, जिसका रंग गहरा मेहरून था और उस पर बहुत ही बारीक और सुंदर कश्मीरी कढ़ाई की गई थी। मैंने गौर किया था कि जब मैं अपना सामान सूटकेस से निकाल रही थी, तो माँ की नज़र उस मेहरून शॉल पर जाकर अटक गई थी। उन्होंने बड़ी ही कोमलता से उसे अपने हाथों से छुआ था, उसकी कढ़ाई को काफी देर तक निहारा था और उनके चेहरे पर एक हल्की सी, संतोष भरी मुस्कान आ गई थी।

मैंने तुरंत उनकी आँखों की वो भाषा पढ़ ली और कहा, “माँ, यह शॉल आपको इतनी पसंद आ रही है, तो आप ही रख लीजिए ना। मैं दिल्ली जाकर अपने लिए वैसी ही दूसरी ले लूंगी।”

लेकिन मेरी माँ कहाँ इतनी आसानी से मानने वाली थीं। उन्होंने तुरंत वह शॉल मेरे हाथ में वापस थमा दी और अपना रटा-रटाया बहाना बिल्कुल तैयार रखा, “अरे नहीं बेटा! पागल हो गई है क्या? इतना गहरा चटक रंग मुझ बुढ़िया पर कहाँ जंचेगा? यह तो तुम जैसी नई उम्र की लड़कियों के लिए है। और वैसे भी, मुझे पश्मीना पहनने से घुटन सी महसूस होती है, गर्मी लगती है। मुझे तो वही अपना पुराना ऊनी स्वेटर ही सबसे ज्यादा आरामदायक लगता है।”

मुझे बहुत अच्छे से पता था कि उनसे इस विषय पर बहस करना बिल्कुल बेकार है। वो किसी न किसी तरह, कोई न कोई तर्क देकर अपनी बात मनवा ही लेंगी। लेकिन इस बार मैंने भी मन ही मन एक पक्का फैसला कर लिया था कि मैं उन्हें यह शॉल देकर ही रहूंगी।

अगले दिन सुबह-सुबह मेरी वापसी की तैयारी ज़ोरों पर चल रही थी। मेरा सूटकेस लगभग पूरी तरह से पैक हो चुका था। तभी माँ कमरे में आईं। मैंने जानबूझकर अपना चेहरा बहुत उदास और परेशान बना रखा था और हाथ में वही मेहरून पश्मीना शॉल पकड़े बिस्तर के किनारे पर बैठी हुई थी।

“क्या हुआ सुरभि? ऐसे मुंह क्यों लटकाए बैठी है? कोई ज़रूरी सामान भूल गई क्या या आरव ने कोई शैतानी की?” माँ ने मेरे पास आते हुए बहुत चिंता भरे स्वर में पूछा।

मैंने रुआंसी और हताश आवाज़ में कहा, “माँ, देखिए ना क्या हो गया। पैकिंग करते वक्त गलती से मेरे हाथ से नेलपेंट रिमूवर की शीशी इस शॉल पर गिर गई। इसका रंग एक किनारे से हल्का सा उड़ गया है और एक भद्दा सा दाग भी पड़ गया है।” मैंने शॉल का एक अंदरूनी कोना (जहाँ डिज़ाइन के कारण धागे थोड़े अलग रंग के लग रहे थे) माँ को दिखाते हुए बहुत ही मासूमियत से कहा।

“अरे राम! यह तो सच में बहुत खराब हो गया,” माँ ने शॉल को हाथ में लेकर अफसोस जताते हुए कहा।

“अब मैं इस शॉल का क्या करूँ? इतने महंगे और नए शॉल को ऐसे दाग के साथ तो मैं कहीं पहन कर जा नहीं सकती। मेरी सास देखेंगी तो क्या कहेंगी कि मायके से फटी-पुरानी और दाग वाली शॉल ओढ़ कर आ गई। इसे तो अब बाहर कूड़े में ही फेंकना पड़ेगा या फिर अपनी काम वाली बाई को दे दूंगी, शायद उसके किसी काम आ जाए,” मैंने पूरी गंभीरता से अपना अभिनय जारी रखा।

“कूड़े में? तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है?” माँ की आँखें फटी की फटी रह गईं। “इतनी महंगी और इतनी सुंदर शॉल को कोई कूड़े में फेंकता है भला? ज़रा ठीक से दिखा मुझे।”

उन्होंने मेरे हाथ से शॉल को लगभग छीनते हुए अपनी तरफ खींचा और उस ‘दाग’ को बहुत ध्यान से देखने लगीं। “कहाँ है बड़ा दाग? यह तो बस ज़रा सा रंग हल्का हुआ है, वो भी बिल्कुल अंदर की तरफ है। जब तू इसे ओढ़ेगी, तो बाहर से तो कुछ पता भी नहीं चलेगा।”

“नहीं माँ, मुझे पता है ना कि दाग है। मुझे नहीं पहननी ये दाग वाली शॉल। मैं तो इसे फेंक ही रही हूँ,” मैंने ज़िद करते हुए शॉल वापस लेने की कोशिश की।

“तू रहने दे। तुझसे नहीं पहनी जाती तो मत पहन। मैं इसे रख लेती हूँ। घर के अंदर, रात-बिरात ओढ़ने के काम तो आ ही जाएगी। कौन सा मुझे इसे पहनकर किसी पार्टी या शादी-ब्याह में सज-धज कर जाना है,” यह कहते हुए माँ ने शॉल को बहुत प्यार से अपने सीने से लगा लिया और विजयी मुस्कान के साथ कमरे से बाहर चली गईं।

मैं पीछे से अपने होंठ दबाकर अपनी हंसी रोक रही थी। तभी मेरी नज़र दरवाज़े पर पड़ी। मैंने देखा कि बाबूजी वहां खड़े थे। वो शुरू से ही सब कुछ देख और सुन रहे थे। उनके चेहरे पर एक बहुत बड़ी और सुकून भरी मुस्कान थी।

उन्होंने धीरे से मेरे पास आकर मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरा और धीमी लेकिन बहुत ही गहरी आवाज़ में बोले, “लगता है अपनों की खुशी के लिए झूठ बोलने की यह पुरानी बीमारी माँ से अब बेटी में भी आ गई है।”

मैंने भी बाबूजी को देखकर आँख मारी और मुस्कुरा दी। बाबूजी ने मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा, “हमेशा खुश रहो बेटा।”

वाकई, एक माँ को अपने लिए कुछ लेने पर मजबूर करना इस दुनिया का सबसे मुश्किल काम है, लेकिन कभी-कभी उनके इस निस्वार्थ और प्यारे से ‘झूठ’ को हराने के लिए हमें भी प्यार भरे झूठ का सहारा लेना ही पड़ता है। ऐसी ही होती हैं हमारी माँएं, जो खुद खाली हाथ रहकर भी हमारी झोली खुशियों से भर देती हैं।

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