प्रकाश बाबू ने एक बार अपने भाई की ओर देखा, कुछ कहना चाहा, लेकिन उनका गला रुंध गया। वे चुपचाप उठे, हाथ जोड़े और भारी कदमों से उस आलीशान बंगले से बाहर निकल आए। दोपहर की चिलचिलाती धूप में पैदल चलते हुए उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उनके दिमाग में रमेश के शब्द हथौड़े की तरह बज रहे थे— ‘दिखावा… हैसियत…’।
रास्ते भर चलते हुए प्रकाश बाबू का अतीत उनकी आँखों के सामने किसी फिल्म की तरह घूमने लगा। उन्हें याद आया कि कैसे उन्होंने राहुल की कॉलेज की फीस भरने के लिए अपनी बरसों पुरानी स्कूटर को बेच दिया था और खुद खचाखच भरी बस में धक्के खाकर ऑफिस जाते थे। उन्होंने पिछले पांच सालों से अपने लिए एक नई शर्ट तक नहीं खरीदी थी। उनके जूते घिस चुके थे, लेकिन वे हर बार उन्हें मोची से सिलवाकर काम चला लेते थे। सरिता ने अंजलि की शादी के लिए अपनी वो आखिरी सोने की चूड़ियाँ भी खुशी-खुशी बेच दी थीं, जो उसकी माँ ने उसे दी थीं।
उन्होंने अंजलि की शादी किसी ‘दिखावे’ के लिए नहीं की थी, बल्कि इसलिए की थी ताकि उनकी लाडली बेटी को ससुराल में कभी कोई कमी महसूस न हो। लड़के वाले बहुत अच्छे थे, उन्होंने कभी दहेज नहीं मांगा, लेकिन एक पिता का दिल अपनी बेटी को हर खुशी देना चाहता है। क्या अपने बच्चों के सपनों को सच करने के लिए खुद को दांव पर लगा देना एक पिता का अपराध है? क्या अपनी औलाद के लिए किया गया संघर्ष दुनिया की नज़रों में सिर्फ एक ‘दिखावा’ होता है?
इन्हीं सवालों में उलझे प्रकाश बाबू अस्पताल पहुँचे। आईसीयू के बाहर उनका बेटा राहुल उदास बैठा था। प्रकाश बाबू ने अपने आंसुओं को पोंछा और चेहरे पर एक झूठी तसल्ली ओढ़ ली, ताकि बेटे को उनकी निराशा का पता न चले। राहुल ने पिता को देखते ही पूछा, “पापा, बड़े ताऊजी ने क्या कहा? पैसों का इंतज़ाम हो गया?”
प्रकाश बाबू ने नज़रें चुराते हुए कहा, “बेटा, तेरे ताऊजी के पास भी अभी नकद पैसा नहीं है। उनका पैसा व्यापार में फंसा है। तू चिंता मत कर, मैं अपनी पीएफ (PF) से कुछ पैसा निकालने की कोशिश करता हूँ या किसी दोस्त से उधार ले लूंगा।”
राहुल अपने पिता की खामोशी और उनके चेहरे की मायूसी को बहुत अच्छी तरह समझता था। वह जानता था कि उसके ताऊजी का स्वभाव कैसा है। राहुल ने आगे बढ़कर अपने पिता के कांपते हुए हाथों को पकड़ लिया और उन्हें पास की कुर्सी पर बिठाया।
“पापा, आपको अब किसी के सामने हाथ फैलाने की कोई ज़रूरत नहीं है, और न ही आपको अपने प्रोविडेंट फंड को छूने की ज़रूरत है,” राहुल ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा।
प्रकाश बाबू ने हैरानी से बेटे को देखा। “क्या मतलब? तेरी माँ के ऑपरेशन के लिए कल सुबह तक तीन लाख रुपये जमा करने हैं। पैसे कहाँ से आएंगे?”
राहुल ने अपनी जेब से एक बैंक की रसीद निकाली और पिता के हाथों में रख दी। “पापा, मैंने अस्पताल के अकाउंट में पैसे जमा कर दिए हैं। माँ का ऑपरेशन कल सुबह ही होगा।”
प्रकाश बाबू अवाक् रह गए। “बेटा, तूने इतने पैसे कहाँ से लाए? तेरी तो अभी नई-नई नौकरी लगी है।”
राहुल की आँखें नम हो गईं। उसने पिता के कंधे पर सिर रखते हुए कहा, “पापा, आपने जिस महंगे कॉलेज में मुझे पढ़ाया था, जिसकी वजह से दुनिया आपको ताने देती थी, उसी कॉलेज की डिग्री की बदौलत आज मैं इस शहर की सबसे बड़ी आईटी कंपनी में काम कर रहा हूँ। जब मैंने अपने बॉस को माँ की तबीयत के बारे में बताया, तो उन्होंने मेरे काम और मेरी काबिलियत को देखते हुए मुझे मेरी छह महीने की सैलरी एडवांस में दे दी। इतना ही नहीं पापा, अंजलि और जीजाजी भी रास्ते में हैं। जीजाजी ने कहा है कि आप उनके लिए ससुर नहीं, बल्कि पिता समान हैं, और इस घर की हर मुसीबत उनकी अपनी मुसीबत है।”
यह सुनते ही प्रकाश बाबू के सब्र का बांध टूट गया। वे फूट-फूट कर रोने लगे। लेकिन इस बार ये आँसू बेबसी के नहीं, बल्कि गर्व और सुकून के थे। उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने जीवन में कोई गलती नहीं की थी। उन्होंने अपना पैसा किसी बैंक या प्रॉपर्टी में नहीं, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य और उनके संस्कारों में निवेश किया था, और आज वह निवेश सबसे बड़े मुनाफे के रूप में उनके सामने खड़ा था।
अगले दिन सरिता का ऑपरेशन सफलतापूर्वक हो गया। जब सरिता को होश आया, तो उसके एक तरफ राहुल खड़ा था और दूसरी तरफ अंजलि अपने पति के साथ खड़ी थी। कुछ दिनों बाद जब यह खबर रमेश तक पहुँची, तो वे शर्मिंदगी से पानी-पानी हो गए। जिस भाई की हैसियत पर वे सवाल उठा रहे थे, आज उसी भाई के बच्चों ने साबित कर दिया था कि इंसान की असली दौलत उसके बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि उसके बच्चों की सफलता और उनके प्यार में छिपी होती है। प्रकाश बाबू ने दुनिया को बता दिया था कि एक पिता का अपनी औलाद के लिए किया गया त्याग कभी ‘दिखावा’ नहीं होता, वह एक नींव होती है जिस पर बच्चों का सुनहरा भविष्य टिका होता है।
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