जिन्दगी की दूसरी पारी – बीना शुक्ला अवस्थी

आज हरिद्वार के इस होटल में काम करते महेन्द्र को पूरे पॉच साल हो गये। आज से पॉच साल पहले वह सेवा निवृत्त हुआ था।

बहुत खुश था वह जिन्दगी की दूसरी पारी अपने परिवार के साथ बितायेगा।‌ जिन्दगी भर नौकरी के कारण न घर परिवार को समय दे पाया और न खुद को। माता पिता की जिम्मेदारी, दो बहनों की शादी और अपने तीन बच्चों की परवरिश में खुद को पैसा कमाने की मशीन बना लिया था। सबकी ख्वाहिशें और सपने पूरे करने में अपने लिये कुछ किया ही नहीं। देर रात तक थका मांदा घर आता, चुपचाप जो मिल गया खाकर सो जाता।

रिश्तेदारों के यहॉ सुख – दुःख, शादी – विवाह में पत्नी और बच्चों को भेज देता और खुद अधिक से अधिक एक दिन के लिये मेहमान की तरह सम्मिलित होता था जिससे उसके ओवरटाइम का नुकसान न हो।

धीरे धीरे परिवार और रिश्तेदार भी उसकी अनुपस्थिति के आदी होते गये। वह सोचता था कि सेवा निवृत्त के बाद सारे रिश्तेदारों और मित्रों से बराबर मुलाकात करता रहेगा। सबकी शिकायतें दूर कर देगा। 

बच्चों का बचपन तो आपाधापी में नहीं देख पाया लेकिन अपने नाती- नातिन, पोते- पोतियों को बढ़ते हुये देखेगा, उनके साथ खेलेगा, पत्नी को पूरा समय देगा। 

सेवानिवृत्त के दिन अपने अनुभव साझा करते समय अपने विदाई समारोह में उसने कहा भी कि उसकी दूसरी पारी पहली से अच्छी और सुखद रहेगी। न कोई जिम्मेदारी, न पैसे की किचकिच और न भविष्य के लिये कोई योजना। चिकित्सा सुविधा और पेंशन के कारण बुढ़ापे की कोई चिन्ता नहीं है। अपनी दूसरी पारी में वह अपनी भरपूर जिन्दगी जियेगा, अपनी अधूरी इच्छाएं, शौक सब पूरे करेगा।

दोनों बेटियों – दामाद और बेटे बहू ने भव्य पार्टी दी। घर आने पर पत्नी ने आरती उतारकर स्वागत किया।

धीरे धीरे सबकी ख्वाहिशें और सपने सामने आने लगे। उसने भी सबकी इच्छायें पूरी करने का प्रयास किया। यह सोंचकर सब कुछ इन सबका ही तो है, मरने के बाद साथ तो लेकर जाना नहीं है। नाती- नातिन, पोते – पोतियों के नाम कुछ पैसे बीस बीस साल के लिये बैंक में सावधि जमा कर दिये।

सेवानिवृत्त के पहले ही दो मंजिला मकान बनवा लिया था। हालांकि सभी बच्चे और पत्नी एक मंजिल मकान और बनवाना चाहते थे लेकिन उन्होंने मना कर दिया – ” हम लोगों के रहने के लिये इतना पर्याप्त है। अब पैसा खर्च नहीं करूॅगा।” 

” उस मंजिल को अगर हम किराये पर दे देंगे तो अतिरिक्त आमदनी होने लगेगी।” पत्नी ने समझाया।

” यह तुम्हारा भ्रम है। पहली बात तो मुझे अपने घर में किसी दूसरे का झंझट पसंद नहीं है। दूसरी बात जितना पैसा मकान में लगायेंगे उतना अगर सावधि बैंक में जमा कर देंगे तो बिना किसी परेशानी के उतना ही ब्याज मिलने लगेगा।” 

” जैसी तुम्हारी मर्जी।” पत्नी चुप हो गई लेकिन उसके चेहरे से लग रहा था कि उसे उनकी बात पसंद नहीं आई।

एक जैसे चार सोने के हार अंगूठी और कान के आभूषण सहित पत्नी, दोनों बेटियों और बहू को दे दिये। दोनों दामादों और बेटे को एक एक सोने का सिक्का दिया।

सभी खुश थे और साथ में वह स्वयं भी खुश थे। अब वह सारा दिन घर में रहते।‌

धीरे धीरे उन्हें अनुभव होने लगा कि वह तो परिवार के बीच में खुश हैं लेकिन परिवार उनको अपने बीच में पाकर खुश नहीं है। जो परिवार पहले घर आने पर उसके आगे पीछे घूमता था, अब वही उसे उपेक्षित समझने लगा।

पोते, बेटे या पत्नी जिससे भी बातें करना चाहता, वह कुछ देर बाद ही कोई न कोई बहाना बना कर चला जाता।

किसी के पास उसके लिये समय नहीं था। बेटियों के पास जाता तो वे भी अपने घर संसार में व्यस्त थीं।

उनसे आने को कहता तो वे कह देतीं – ” समय मिले तो आऊॅ पापा, समय ही नहीं मिलता।”

उसने सोचा नहीं था कि उसकी दूसरी पारी इतनी तनावपूर्ण होगी। दूसरी पारी की सुखद कल्पना यथार्थ की ठोकरों से दरकने लगी। एक दिन उसने पत्नी से इस बात की शिकायत की तो उसने तुरन्त उत्तर दिया-” तुम्हारे पास कोई काम नहीं है तो क्या सभी तुम्हारी तरह खाली हैं? सबके पास ढेरों काम हैं। मेरी मानो तो तुम भी कहीं काम कर लो। तुम्हारा समय भी कट‌ जायेगा और कुछ अतिरिक्त पैसे भी आने लगेंगे।” 

” जिन्दगी भर पैसे के पीछे तुम सबको बेहतर जिन्दगी देने के लिये काम करके थक गया हूॅ। अब सब अच्छी तरह निपट गया है। दोनों बच्चों की जिम्मेदारी समाप्त हो गई है, अब बस दूसरी पारी में तुम सबके सामीप्य और सानिध्य का सुख पाना चाहता हूॅ। अब कोई काम नहीं करूॅगा।” 

” लेकिन खाली बैठे तुम्हारा समय नहीं कटता है और तुम बोर होते हो। जिन्दगी भर काम किया है, एक निश्चित दिनचर्या रही है, मुझे डर है कि तुम बीमार न पड़ जाओ।” 

” बेकार चिन्ता मत करो। अब तुम्हारी सारी शिकायतें दूर कर दूंगा।” महेंद्र ने हंसते हुये कहा।

धीरे-धीरे घर का परिवर्तन उन्हें परेशान और तनाव पूर्ण करता जा रहा था। बहू बेटे की हल्की भुनभुनाहट उनके कानों में पड़ने लगी – ” सारा दिन के लिये चले जाते थे तो छुट्टी मिल जाती थी। अब तो दिन भर घुसे रहकर जीना हराम कर दिया है। मम्मी, इनसे कहो कि कहीं काम करने जाया करें जिससे सबको चैन मिल सके।”

” कहा था बहू लेकिन सुनते ही नहीं। मैं भी थक गई हूॅ, हर समय इनकी जी- हुजुरी करते करते।‌”

” मैं तो खुलकर जीना भी भूल गई हूॅ जबसे पापा सेवा निवृत्त हुये हैं। अब तो घर में घुटन सी होने लगी है।”

तभी बेटा बोल उठा – ” ऐसे ही रहा तो हम अपने बच्चे को लेकर कहीं दूसरी जगह रहने न चले जायेंगे। हम नहीं रह सकते इनके साथ। जब इन्होंने जीवन भर अपने साथ की बजाय पैसे दिये हैं तो अब हमें उनसे केवल पैसे ही चाहिये साथ नहीं।” 

उसी दिन महेन्द्र केवल दो जोड़ी कपड़े और अपनी पेन्शन की किताब लेकर सब कुछ छोड़कर हरिद्वार आ गये और इस होटल में हिसाब किताब देखने का काम करने लगे। 

बीना शुक्ला अवस्थी, कानपुर 

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