निशांत बचपन से ही बहुत संकोची स्वभाव का था।मां के सिवाय और किसी से भी खुलकर बात नहीं करता था।पति (सुशांत)हमेशा ताना देकर कहते थे निधि को”निधि कब तक तुम्हारा बेटा तुम्हारे पल्लू में छिपा रहेगा?
अपने पापा से तक अजनबी जैसा व्यवहार करता है।मुझे देखते ही अंदर चला जाता है।उसे क्या तकलीफ़ है मुझसे? पता करके बताना जरा।” निधि झट बेटे का पक्ष रखकर कहती”अरे, परेशानी क्या होगी? बस लिहाज करता है तुम्हारा।मेरा बेटा मेरे ज्यादा करीब है, तो तुम्हें जलन होती है क्या?”
सुशांत हंसकर कहते “नहीं-नहीं,जलन क्यों होगी?मेरे पास मेरी बेटी(नेहा) है।तुम रहो खुश अपने बेटे के साथ,मैं मेरी बेटी के साथ खुश हूं।” निधि भी मुस्कुरा कर चिढ़ने का ढोंग करती। देखते-देखते समय कैसे बीत गया,पता ही नही चला।अब निशांत दसवीं में पहुंच गया था,और नेहा नवमी में।
पापा के जितनी करीब नेहा होती गई,उतना ही निशांत दूर। रिजल्ट वाले दिन निधि ,नेहा को साथ लेकर अपने ननिहाल आई थी।निशांत का रिजल्ट घोषित होते ही सुशांत ने फोन किया” निधि,निशांत का रिजल्ट आया है आज।बहुत बढ़िया नंबर लाया है मेरा बेटा।आज तुम्हारी अनुपस्थिति में हम दोनों पार्टी करेंगे।तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा ना? “
आज सुशांत की आवाज में गजब की खुशी थी।पहली बार मेरा बेटा बोला था उन्होंने।निधि को तब पहली बार महसूस हुआ कि पिता भी बेटे की नजदीकी चाहते हैं।
हम औरतें अपने बेटे को बांटना नहीं चाहतीं किसी से।यहां तक कि अपने पति से भी।कुछ दिनों बाद वापस आकर निधि ने पाया कि बाप -बेटे में अब औपचारिकता खत्म हो चुकी थी।सुशांत का व्यवहार भी बिल्कुल बदला सा लगा।निधि को अब बहुत शांति का अनुभव हुआ।वह गलती कर रही थी,बेटे और पिता के बीच मध्यस्थता कर।पिता का बहुत बड़ा बल होता है बेटा।
सुशांत और निशांत में बहुत अच्छी दोस्ती हो गई थी।आदतें भी अब पिता की ही ज्यादा दिखने लगी थी उसमें।अब निधि जानबूझकर दोनों को अकेला छोड़ने लगी।कुछ बातों में निशांत अपनी मां की कॉपी था।नेहा को अपने पापा की साफगोई मिली थी,
तो निशांत भावुक था मां की तरह।नेहा कहती भी अक्सर” मॉरल स्टोरी सुना-सुनाकर तुमने दादा को बिल्कुल बुद्धू बना दिया है।
इतना ज्यादा संवेदनशील होने से दुनिया में जीना बहुत मुश्किल होता है।मन का सरल होना अच्छा है, पर कोई छल जाए मन को , तब क्या? “निधि हंसकर कहती”मुझे गर्व है तेरे दादा पर।जो सीख मैंने अपने छात्रों को दी,मेरा बेटा भी वही सीखा।परिवार में एक समझदार काफी है।तू ही संभावना अपने दादा को,जब मुश्किल आएगी।”
समय बदलने के साथ बहुत कुछ बदला निधि के जीवन में।सुशांत की आकस्मिक मृत्यु,उसका नौकरी छोड़ना,बेटी का बाहर पढ़ने जाना सब एक साथ हुआ।जो बदला नहीं वह था,आपसी विश्वास।भाई का बहन के प्रति,बहन का अपने भाई के प्रति विश्वास अटूट था।
लड़-झगड़कर भी दोनों एक दूसरे से कभी कोई बात नहीं छिपाते थे।गुस्सा भुलाकर कभी नेहा पहल कर लेती,कभी निशांत।पापा की जगह नौकरी मिली थी निशांत को।
मोहल्ले,परिवार के लोग कहते थे निधि को” अब देखना,कैसे बदल जाएगा बेटा।दुनियादारी के हिसाब से खुद को बदलना ही पड़ता है। खान-पान,शौक,आदतें,फितरत सब बदल जाती हैं, नौकरी करते ही।”निशांत ने इस बात को ग़लत साबित किया।उसने अपने आप को बिना बदले ही दुनियादारी भी सीखने की कोशिश जारी रखी थी।
अब नेहा भी नौकरी करने लगी थी।पापा की तरह अपनी तनख्वाह आते ही पहले बहन को पैसे भेजता था।ठीक पापा की ही तरह किराने की लिस्ट बनाने पर जोर देता।आज भी समोसा और चाय नहीं लेता था वह।आज भी बचपन की तरह अपना पसंदीदा खाना खाकर खुश हो जाता था।
नेहा की शादी पहले करने का विचार निधि और निशांत दोनों का था।बहन को कभी जोर नहीं देता था शादी करने के लिए, बल्कि उसे यह अहसास दिलाना नहीं भूलता था कि उसकी पसंद ही सर्वोपरि है।निधि कभी -कभी हताश होकर कहतीं”कब कोई लड़का पसंद आएगा तेरी बहन को? मैं भी निश्चिंत हो जाती।
उसकी शादी के बाद तेरी भी शादी कर लेती, तो मेरी जिम्मेदारी पूरी हो जाती।” निशांत बड़े धैर्य से समझाता”मां, वह कभी ग़लत निर्णय नहीं लेगी।मुझे उस पर पूरा विश्वास है।वह रिश्ते बनाने से पहले अच्छे से परखेगी।तुम चिंता मत करो।अपना काम करते रहो।ईश्वर जब संजोग बनाएगा, वह राजी हो जाएगी।”
निधि ने भी नेहा की शादी के लिए लड़का देखना जोर-शोर से और तेज कर दिया।निशांत हड़बड़ी ना करने की सदा सलाह दी।जब भी उससे शादी के लिए बात करती निधि, वह हंसकर कहता”एक -एक करके मां।पहले बोनू का हो जाए फिर मेरे बारे में सोचना।
” निधि भी बेटे का मनोबल बढ़ाने कहती थी”अगर तुझे कोई पसंद हो, तो संकोच मत करना।तुम लोगों की खुशी में ही मेरी खुशी है।
तू अपनी हर जिम्मेदारी बखूबी निभाना जानता है।मैं जानती हूं, तू बहुत अच्छा पति बनेगा।अपने लिए भी सोचना शुरू कर दे अब।
बोनू की शादी के तुरंत बाद ही तू भी कर लेना।जाति या समाज का कोई बंधन मत पालना।हमने अकेले बहुत बड़े-बड़े दुख झेले हैं, सुख में भी रिश्तेदारों के लिए मत सोचना।मैं खुशी-खुशी निभाऊंगी, अपना सास का रिश्ता।” वह भी हंसकर कहता “हां-हां, जब कोई पसंद आएगी, तब बता दूंगा।”
अचानक एक दिन शादी डॉट कॉम में देखकर एक लड़की पसंद आ गई थी उसे।ठीक वैसी ही थी,जैसी उसे चाहिए थी।निधि को फोटो दिखाकर पूछा”देखो तो मां,कैसी लग रही है यह?
है ना बिल्कुल तुम्हारी बहू बनने लायक।रंग ज्यादा साफ नहीं है,पर बाकी सारे वो गुण हैं,जो मुझे चाहिए।” निधि को भी लड़की बहुत अच्छी लगी।साधारण पर विशिष्ट दिख रही थी वह।निधि ने भी अपनी तरफ से हां ही कहा।उसकी सहमति जानकर अब निशांत ने धीरे-धीरे उससे बातचीत शुरू की।अपनी हर बार की बातचीत के बारे में मां को जरूर बताता था वह।
सजातीय, नौकरीपेशा,स्वाभिमानी लड़की थी वह।ऐसा निशांत ने ही बताया।
निधि को अब निशांत में बहुत सारे अच्छे बदलाव दिख रहे थे।लड़कियों से दोस्ती ना के ही बराबर थी उसकी।अधिकतर लड़कियां उसकी मुंहबोली बहनें थीं।निशांत के चरित्र की यही सबसे बड़ी विशेषता थी कि वह उनके प्रति भी काफी संवेदनशील था।अब निधि को अचानक ही निशांत खुश दिखने लगा था।
मन ही मन वह भी खुश होती कि बेटे के पास भी कोई है, सुख-दुख बांटने के लिए।उस लड़की के स्वाभिमान ने निशांत को सबसे ज्यादा प्रभावित किया था।उससे संबंधित छोटी-छोटी जानकारियां मां और बहन से साझा किया करता था।एक दिन बातों ही बातों में उसने बताया कि लड़की की मां को इस रिश्ते से ऐतराज है।
क्यों?यह तो बताया नहीं,पर वह लड़की भी दुखी थी।उसके चरित्र की विशिष्टता यह भी थी कि उसने बेटे को यह वादा दिया था कि वह शादी कहीं और नहीं करेगी,मां को मनाने की पूरी कोशिश करेगी।
बेटे से उसके बारे में यह सच्चाई जानकर,बहुत बुरा लगा था निधि को।आज के जमाने में इतना अच्छा लड़का मिलना बहुत मुश्किल है,फिर लड़की की मां के ना करने की वजह क्या हो सकती है?कहीं ना कहीं खुद को अपमानित महसूस करने लगी थी निधि।ठीक इसके विपरीत निशांत शांत रहता था।उसे अपनी पसंद पर पूरा विश्वास था।
कई लोग निशांत के रिश्ते लेकर आने लगे थे इस बीच।वह आकर खुद से बताता भी था।अब तक जिस बेटे की पसंद पर नाज होता था निधि को, अब खटकने लगा था। बार-बार पूछती उससे”क्या बोली उसकी मां? शादी के लिए मानी या नहीं।वह क्या बोल रही है? क्या सोचा तूने?” वह शांत होकर बोलता”समय आने पर सब ठीक हो जाएगा मां।
वह भी मना लेगी अपनी मां को।अभी तो कोई जल्दी भी नहीं है ना हमें।बोनू का सब हो जाने दो।तब तक कुछ ना कुछ हल निकल जाएगा।
तुम्हें विश्वास है ना मुझ पर?मैं कोई ग़लत निर्णय नहीं लूंगा।बस किसी से मेरे लिए लड़की देखने की बात मत कहना।मैंने पहली बार किसी से वादा किया है,साथ निभाने का।वह भी मुझ पर विश्वास करती है।तुमने तो हमेशा रिश्ते में विश्वास और ईमानदारी का सबक सिखाया है।बस तुम मुझ पर अपना विश्वास बनाए रखना।”
एक तरफ तो निधि खुश हो रही थी कि बेटे ने कितनी अच्छी तरह रिश्तों की परिभाषा समझी है,पर दूसरी तरफ एक मां कमजोर पड़ रही थी।कहीं ना कहीं विश्वास डगमगा रहा था,कि कल को अगर लड़की की मां ना मानी,बेटे के स्वाभिमान को ठेस पहुंची तो?
निशांत ने पिछले सप्ताह ही बताया था कि उसके एक अफसर ने एक लड़की के बारे में बात की।वे जानना चाहते थे कि निशांत इच्छुक है या नहीं।निशांत ने मना कर दिया था साफ-साफ।
उसने हिम्मत जुटाकर निधि से कहा भी” मां, मैं किसी और लड़की के बारे में सोचकर, उसका विश्वास नहीं तोड़ सकता।वह लड़की तो गंभीर है ना हमारे रिश्ते को लेकर।वह जब किसी और लड़के के बारे में नहीं सोच रही, तो मैं कैसे सोच सकता हूं? यह तो बेईमानी होगी।”
निधि को लगा कि अभी वह लड़की आई भी नहीं ब्याह कर,और अभी से बेटे के मन को नियंत्रित कर रही है।मेरे बेटे में ऐसी कोई कमी भी नहीं,फिर भी वह क्यों समय बर्बाद करें।निधि के मन में अब उस लड़की के लिए प्रेम कम होने लगा था।उसके संकोची लड़के को इतना सशक्त बना देने वाली बहू,किसी मां को अच्छी नहीं लग सकती।
नेहा से जब इस बारे में बात की,तो उसने भी यही कहा था”मां,रिश्तों में ईमानदारी रखना तुमने ही सिखाया है हमें।आज तक दादा ने कभी किसी लड़की से इतना गहरा रिश्ता नहीं रखा।कभी तुम्हारा दिल नहीं दुखाया।आज अगर वह किसी से प्यार करता है,
तो उसे एक मौका दो।समय का इंतजार करो।उसे विद्रोह करने पर मजबूर मत करो।सोच समझ कर बात करना उससे।वह समझदार है, गलत निर्णय नहीं लेगा ना।”
अचानक रविवार के दिन निशांत के वही ऑफीसर घर आए। बातों-बातों में निशांत के लिए अपने परिचित की बेटी के बारे में पूछने लगे।निधि से सीधे ही पूछा शादी करेंगी ना बेटे की? एक लड़की है।आपका बेटे ने तो मना कर दिया।आप क्या बोलतीं हैं? “
निधि ने बिना सोचे-समझे ही बोल दिया ” हां-हां,शादी तो करनी है बेटे की।आप बात चलाइये ना।लड़की की फोटो मंगवाइये।ये तो संकोच करता है।
बहन की शादी पहले करनी है ना,इसलिए टालता रहता है।”बोलते-बोलते जैसे ही निधि ने निशांत की तरफ देखा,उसके चेहरे पर अनकहा दर्द साफ झलक रहा था।उनके जाने के बाद बस इतना ही कहा उसने” मां,मैंने तुमसे कहा था ना,मैंने अंकल को मना कर दिया है।
उनसे कहा है कि मैं किसी और को पसंद करता हूं।तुमने यह जानकर भी रिश्ते की बात आगे बढ़ाई।वो क्या सोचेंगे मेरे बारे में?जिस लड़की ने मुझपर पूरी तरह से विश्वास किया है,मैं उसका विश्वास तोड़कर दूसरी लड़की देखूं,शादी के बारे में सोचूं?ऐसा दोहरा चरित्र नहीं है मेरा।
कमिटमेंट मतलब सौ प्रतिशत कमिटमेंट।तुमसे यह बात सीखकर आज तुम्हें यह बात याद दिलानी पड़ रही है।यह मेरे लिए असहनीय है।विश्वास की डोर बहुत मजबूत होती है,तुम अपनी शंका से उसे कमजोर करने की कोशिश में तोड़ ही दोगी।मैंने अगर किसी का विश्वास तोड़ा तो मेरा भी विश्वास टूटेगा।मैं बहुत निराश हुआ हूं आज मां।”
बेटा तो कहकर निकल गया,निधि अपने आंसुओं को रोक नहीं सकी।तमाचा पड़ा था उसकी सोच पर।कितनी स्वार्थी हो गई थी एक मां,अपने बेटे के प्रेम का मोल ना दे सकी
।एक विश्वास ही तो मांगा तो उसने अपने विश्वास पर,वह भी ना दे सकी।इतने सालों तक अपने बेटे होने का,भाई होने का दायित्व बखूबी निभाया,पर जब उसके जीवन में प्रेम ने दस्तक दी पहली बार,वह स्वागत ना कर पाई।खोखली थी उसकी सिखाई सीख।आज बेटे ने आईना दिखा दिया।
अपनी भूल को समझकर तुरंत उन सज्जन से इस रिश्ते की बात को ना चलाने का सविनय आग्रह किया।वे भी शायद समझ चुके थे।आज एक मां ने अपनी भूल सुधारने में गलती नहीं की, ताकि एक बेटे का विश्वास ना टूटे।
शुभ्रा बैनर्जी
वाक्य आधारित कहानी-विश्वास की डोर बहुत मजबूत होती है