बुढ़ापा तो सब पर आना है – नीलम गुप्ता

वह इस सोसाइटी में पिछले काफी वर्षों से रह रही हैं ।घर में कोई दूसरा नहीं है ,ना पति ना बच्चे बस एक नौकरानी है जो उनके सब काम करती है। 4 वर्ष पूर्व जब हम यहां रहने आए तो सबसे पहले हमारा परिचय उन्हीं से हुआ। वह छड़ी के सहारे धीरे-धीरे चलती हुई हमारे घर तक आ जाती

और आवाज लगाकर मुझे बुलाती फिर कहती मेरे लिए कुर्सी ला दो मैं बैठना चाहती हूं ।मैं उन्हें अंदर आने को कहती पर उन्होंने बताया कि वह एक सीढ़ी भी नहीं चढ़ सकती क्योंकि उनके पैरों में बहुत दर्द रहता है। थोड़ी देर कुर्सी पर बैठकर दो-चार बातें करके वह उठकर चल देती ।

फिर सोसाइटी के गेट तक जाकर वहां रखे बेंच पर कुछ देर बैठती। गार्ड से दो बातें करती फिर उठकर चल देती और धीरे-धीरे चलती चलती अपने घर वापस आ जाती।यह उनका रोज का नियम था। उनका घर ब्लॉक के कोने पर था तीन तरफ से खुला।

वह अपनी बालकनी में बैठी रहती शाम को सोसाइटी के लोग सैर के लिए निकलते तो उनके घर के सामने से होकर जाते। वह हर आने जाने वाले को रोक कर कहती ,आओ ना थोड़ी देर मेरे पास बैठो । पर सब अनसुनी करके निकल जाते। एक महिला अक्सर उनके पास कुछ देर अवश्य बैठा करती थी।

मैं भी कभी-कभी उनके पास बैठ जाती थी । बैठते ही वह अपने बचपन के किस्से,स्कूल की बातें, नौकरी की कहानियां सुनाने लगती और सामने वाले को उठने ना देती ।आंटी घर पर बहुत काम है अभी थोड़ा सैर करुंगी, फिर जाकर खाना बनाना है। अरे बैठो ना थोड़ी देर ।और मुझे मजबूरन बैठना पड़ता ।

कभी-कभी तो वह मुझे घंटों बिठाए रखती ।बस बैठे रहो और उनकी बातें सुनते रहो। अक्सर वही किस्से ,वही बातें मैं बोर होने लगी ।धीरे-धीरे मैंने उनके पास बैठना कम कर दिया और फिर उन्हें अनदेखा करना शुरू कर दिया ।वह बुलाती तो मैं कहती अभी सैर करके फिर आऊंगी और फिर दूसरे रास्ते से निकल जाती ।

वह अगले दिन फिर बुलाती, शिकायत करती तुमने कहा था आऊंगी पर आई नहीं । सॉरी आंटी कुछ जरूरी काम याद आ गया था। कल दोपहर को आऊंगी ।आना जरूर मैं इंतजार करूंगी। अकेले में मेरा मन बहुत घबराता है,उदास बैठी कुछ उल्टा सीधा सोचती रहती हूं। धीरे-धीरे उनका चलना फिरना बिल्कुल बंद हो गया ।

बस कमरे से किसी तरह बालकनी में आती और दिनभर वहीं बैठी रहती हर आते जाते को आवाज देती। कोई रुक कर 2 मिनट बात कर लेता तो खुश हो जाती कोई 10 मिनट उनके पास बैठ जाता तो निहाल हो जाती और उसे हर रोज आने का वादा लेती यह जानते हुए भी की रोज कोई नहीं आएगा।

मैंने भी उनके पास जाना लगभग बंद कर दिया था ।फिर एक दिन वह आंटी जो उनके पास अक्सर बैठी रहती थी मुझे रास्ते में मिल गई। मुझे देखकर बोली – बेटी एक बात कहूं , बुरा मत मानना । नहीं – नहीं आंटी आप बताइए क्या कहना चाहती हैं। वह बोली बेटा तुम दिन में 10-15 मिनट का समय निकालकर उनके पास चली जाया करो मैं जानती हूं उनकी बातें बोर करती हैं कभी-कभी खीज भी होने लगती है पर तुम उनकी मनोदशा को समझो ।

एक बुजुर्ग , चलने से लाचार स्त्री, जिसे अधिकांश लोग अनदेखा करके निकल जाते हैं उसके पास कुछ देर बैठना उसकी मन की बातें सुनना, उनका कुछ छोटा – मोटा काम कर देना यह बड़े पुण्य का काम है। जो व्यक्ति अपना समय किसी को देता है वह सबसे बड़ा दानी है ।

और बेटा बुढ़ापा तो सब पर आना है । तब ईश्वर ना करें हमारी सुनने वाला कोई ना हो तो हमें कैसा लगेगा? मैं भी यही सोच कर घंटा आधा घंटा बैठ जाती हूं उनके पास। अच्छा बेटा मेरी बात पर विचार जरूर करना। मैंने तो उनके कहते-कहते ही निश्चय कर लिया था कि अब मैं अपना कुछ समय उन्हें जरूर दूंगी, पुण्य कमाने के लिए नहीं अपने बुढ़ापे की तैयारी के लिए क्योंकि बुढ़ापा तो सब पर आना है। 

नीलम गुप्ता

error: Content is protected !!