बचपन में गर्मी की छुट्टियाँ होते ही हम सब भाई-बहन नानी घर चले जाते थें।दोपहरी में घर के बड़े आराम करते और हम छोटे खूब उधम मचाते।ऐसे में एक दिन हमारी नानी ने हम बच्चों को बगीचे से मेंहदी के पत्ते तोड़ लाने का काम सौंप दिया।
हम सभी ने बड़े उत्साह से अपने-अपने रुमाल की पोटली की पोटली बनाई और मेंहदी के पत्तों को भरकर घर ले आए।फिर मामी उन पत्तों को सिलबट्टे पर रखकर पीसने बैठ गईं।मेंहदी बेचारी पीस रही थी और हम सब सिलबट्टे के चारों तरफ बैठकर उसे पीसते हुए घूर-घूर देख रहे थे।
फिर मामी ने पिसी हुई मेंहदी को बड़े प्यार-से एक कटोरे में निकाला और लाइन से बैठे हम सभी बच्चों की हथेली बूटा-बूटा लगाकर सजा दिया।उस दिन मेंहदी के रंग और उसकी खुशबू से हमारी हथेली ही नहीं बल्कि पूरा घर महक उठा था।
फिर बाजार में मेंहदी के पाउडर मिलने लगे।सौ ग्राम, दो सौ ग्राम, पाँच सौ ग्राम…, अपनी आवश्यकता-अनुसार महिलाएँ खरीद लेतीं थीं।एक दिन हमारे घर में भी मेंहदी प्रोजेक्ट शुरु हुआ।शाम को मेंहदी के पैकेट खरीद लिए गये और अगले दिन दोपहर के खाने के साथ-साथ रात्रि भोजन की भी तैयारी कर ली गई।
मेंहदी लगाना’ है,यह सोचकर ही हमारे शरीर में गजब की फ़ुर्ती आ गई थी।उस दिन घर के पुरुषों ने भी अपनी पेट-पूजा जल्दी समाप्त कर ली थी।
ढ़ाई बजे तक रसोई साफ करके हमने मेंहदी लगाने का कार्य शुरू किया।दो महिलाएँ मलमल का कपड़ा लेकर एक बड़े थाल में मेंहदी छानने लगीं।एक ने दो-चार भिंडियों को काटकर पानी में भिगो दिया।( कहा जाता है कि इस पानी से मेंहदी में लस आता है)मेरी छोटी बहन नींबू-चीनी का घोल तैयार करने लगी।
फिर माताजी ने एक बड़े कटोरे में मेंहदी का पाउडर डाला और उसमें भिंडी का पानी धीरे-धीरे डालते हुए मेंहदी का पेस्ट बनाने लगी।इस प्रक्रिया में उनकी दाहिनी हथेली की उँगलियाँ संतरे रंग की हो गईं थीं।फिर घर की महिलाएँ-लड़कियाँ गोल घेरा बनाकर बैठ गईं।
बीच में मेंहदी का कटोरा और सींक झाड़ू की एक पतली- लंबी डंडी भी रख ली गई।पहले तय हुआ कि चार लोगों की हथेलियों पर आज और दो की हथेलियों पर मेंहदी कल लगेगी।इस पर सब ‘मैं पहले’ की बात पर भिड़ गईं।फिर तय हुआ कि अपनी-अपनी हथेली पर स्वयं मेंहदी लगा लिया जाए।
इससे सभी अपनी पसंद के डिजाइन उकेर सकते हैं।सभी के चेहरे खिल उठे।सबने हथेली पर मेंहदी के तेल की एक परत लगाई गई और फिर उस पर मेंहदी के डिजाइन उकेरने के लिए होड़ लग गई।अब मेंहदी लगाने के हम कोई महारथी तो थे नहीं,
सो अपने अंगूठे और दूसरी अंगुली से मेंहदी की लस बनाने के प्रयास में समय बीतने लगा। हार कर सभी ने तिनके की मदद ली और अपनी हथेली पर फूल, पत्ती, डंडी, नाम…जो बन पाया, बना लिया।बची हुई मेंहदी को अंगुलियों के सिरे और नाखूनों पर लपेट दिया।इसी बीच मेंहदी सूखने लगी
तब सात वर्षीय भाई मनु कटोरी लेकर सभी की हथेलियों को रुई से नींबू-चीनी का जूस पिलाने लगा।कुछ देर बाद मेंहदी सूख कर झरने लगी तो हथेली पर रंग निखरा देखकर सभी के चेहरे खिल उठे लेकिन एक-दूसरे की डिजाइन देखकर हँसने से बाज नहीं आए थे।अब मेंहदी लगे हाथ पर पानी नहीं लगाना था,
सो सभी ने एक हाथ से ही खाना खाया…उस दिन बेचारे पुरुषों ने भी समझौता कर लिया था।रात में सभी ने अपनी-अपनी हथेली पर मल-मलकर सरसों तेल लगाया और चैन की नींद सो गये।सुबह उठने पर तो मेंहदी के रंग में गजब का निखार आ गया था।जी तो कर रहा था कि बस अपनी हथेली को निहारते रहे लेकिन…।मन मारकर हथेली पर पानी डालना ही पड़ा।
समय के साथ मेंहदी की डिमांड को देखते हुए बाजार में तैयार मेंहदी के कोन उपलब्ध होने लगे।दुकानों के बाहर लगाने और लगवाने वालों की लाइनें लगने लगी।
पहले विवाह के समय केवल वर-वधू को मेंहदी लगाई जाती थी लेकिन अब तो पूरा घर ही…।यहाँ तक कि वैवाहिक कार्यक्रमों में एक दिन ‘ मेंहदी लगाई’ रस्म भी किया जाने लगा है।सुविधाएँ चाहे जितनी भी हो गई हो लेकिन मेंहदी के पत्तों को तोड़ने, उसे पीसकर लगाने और उसकी प्राकृतिक खुशबू लेने का आनंद ही कुछ और था।
विभा गुप्ता
स्वरचित, बैंगलुरु