अरे उठ जा कलमुँही कबतक लेटी रहेगी, सुबह के आठ बजे रहे है चाय नाश्ता नहीं बनाएगी क्या, सर दर्द से फटा जा रहा है मेरा बिना चाय के। अरे अब उठ, इतना धीरे धीरे क्यों उठ रही है शरीर मे जान नहीं है क्या, कामचोर कहीं की। बस काम से जी चुराती रहती है। नहीं मांजी काम से जी नहीं चुरा रही हूँ। बुखार था न दो दिन से तो बहुत कमजोरी लग रही है। अच्छा अच्छा बस कर कबतक बुखार का नाटक करती रहेगी। घर का काम कौन करेगा तेरा बाप। और कल छोटे ने दवा दी थी न बुखार की खाई नहीं थी क्या। बुखार है बुखार का बहाना बना कर बस पडे रहो।
न कोई काम न धाम करना है। खुशियाँ खा गई मेरे घर की। मेरा बेटा तेरी खुशियों की भेट चढ गया और तू मेरे सिर पर बैठी है। अब तूझे दिन मे चार बार भर भरके खाना खिलाऊं और तुझसे ये भी न होता कि घर का काम करे। जा, जाकर चाय नाश्ता बना कर ला मेरे लिए। इतने मे छोटा बेटा मयंक आया उसने माँ को भाभी को फिर जली कटी सुनाते देखा। माँ को वो हर वक़्त समझाता रहता है, माँ भाभी पर इतना जुल्म क्यों करती ह़ो, बेचारी तो वैसे भी इतनी दुखी है। आपने तो अपना बेटा खोया है तो उनने भी तो अपना पति खोया है।
और आपके पास तो भइया नहीं है तो मै तो हूँ और दीदी रिया तो है और वो बेचारी तो अकेले है कोई भी नहीं है उनका। उनके तो मायके मे भी कोई नहीं है सौतेली माँ है जो पूछती नहीं है, नहीं तो वो वही चली जाती। और दिन भर व़ घर का काम करती है। सबकुछ तो करती है वो आपका कितना ख्याल रखती है कभी आपको जवाब नहीं देती। और एक आप हो कि भाभी के साथ इतना र्दुव्यवहार
करती हो। अच्छा अच्छा बस कर बहुत भाभी का साईड ले रहा है तुझ पर कुछ जादू कर दिया है उसने लगता है। क्या दिन भर भाभी के गुण गाता रहता है। गुण नहीं गाता आपको असलियत से वाकिफ करा रहा हूँ, लेकिन आप हो कि मेरी कुछ सुनती ही नहीं भो।
रोहिणी और प्रकाश के तीन बच्चे थे । एक बेटी रिया और दो बेटे नमन और मयंक। बेटी बड़ी थी तो उसकी शादी पहले ही हो चुकी थी। मयंक के पिता कम उम्र मे ही इस दुनिया से चले गए थे। मयंक के घर मे दादा दादी थे उनके पास पैसा था। गांव मे खेती किसानी थी तो बेटे के परिवार को कोई आर्थिक परेशानी का सामना नही करना पड़ा। रोहिणी का बड़ा बेटा नमन सेना मे भर्ती होना चाहता था।
और कुछ प्रयासों के बाद उसकी भर्ती हो गई। नौकरी के दो साल बाद नमन की दीपिका से शादी हो गई। दिपिका पढी लिखी और सुंदर और बहुत वयवहार कुशल थी। शादी के छै महीने बाद ही डयूटी करते हुए किसी आंतकी हमले मे नमन को गोली लग गई थी। उसका उपचार कराया गया लेकिन गोली सीने मे लगी थी इस वजह से नमन बच नही पाया और उसकी मृत्यु हो गई।
रोहिणी का रो रोकर बुरा हाल था। सब अपने आपमें दुखी थे लेकिन दिपिका का दुख किसी को दिखाई नहीं दे रहा था। सबसे बड़ा पहाड तो उसी पर गिरा था। उसकी तो दुनिया ही उजड गई थी। अंतिम संस्कार के तेरह दिन बाद जब सारे कार्यक्रम निपट गए तो रोहिणी बस दिन भर दिपिका को कोसने लगीं तू ही मनहूस थी जो मेरे बेटे को खा गई। बात बात में रोहिणी दिपिका को ताना मारने लगी। और उससे कहती तू तो पहले से ही मनहूस थी वहाँ पैदा होते ही अपनी माँ को खा गई और ब्याह कर आई तो मेरे बेटे को खा गई।
वो हर समय दिपिका पर ताने मारती रहती। छोटा बेटा मयंक जो कि अब 22 साल का हो गया था वो अपनी भाभी पर मा का इस तरह से अत्याचार देखकर बहुत दुखी होता वो माँ को समझाता। माँ यदि भइया नहीं रहे तो इसमें भाभी का क्या कसूर है, भइया तो डयूटी पर थे। भइया अब हमारे बीच अब नहीं है इसका दुख तो हम सबको है लेकिन क्या भाभी को दुख नही है सबसे ज्यादा दुख तो भाभी को ही है। आप उन्हें क्यों हर वक़्त जली कटी सुनाती रहती है। देखिए बेचारी कितनी दुखी रहती है। सबको अपना अपना दुख तो दीखता है लेकिन भाभी का दुख किसी को नहीं दिखाई देता। उस बेचारी भाभी के पास कौन है कोई तो नहीं।
अच्छा अच्छा चुप रह बड़ा आया भाभी की साइड लेने वाला। इतनी सीधी तेरी भाभी है नहीं जितना वह दीखती है। तू हम सास बहू के बीच मे न आ। तुझे कोई जरूरत नहीं है घर के मामले मे टांग अडाने की। मै तो सोच रही हूँ इसे इसके मायके भेज दूं। यहाँ रहेगी तो मनहूसियत छाई रहेगी। खुशी के दो पल नसीब न होगें हम सबको एक तक मेरा बेटा खा गई और अब भोली सूरत बना कर हमदर्दी बटोर रही है। मयंक बोला माँ, माँ आपको समझाना तो बड़ा मुश्किल है।
तभी दरवाजे की घंटी बजी शाम के सात बजे रहे थे। इस समय कौन आ गया। मयंक ने दरवाजा खोला तो सामने रिया खडी थी, अरे दीदी आप। रोहिणी भी उठ खडी हुई अरे रिया इस समय और ये अटैची लेकर। रिया रोते हुए मा के गले लग गई। क्या हुआ मेरी बेटी को रो क्यों रही है। माँ माँ मेरे ससुराल वाले ने मुझे घर से निकाल दिया। कह रहे थे आजकल दुकान मे थोड़ी मंदी चल रही है इसलिए घर के काम वाली को छुड़ा रहे है अब घर का काम हमे ही करना पडेगा और जब मैने काम करने से मना किया तो कहने लगे अपने मायके चली जाओ। घर का काम तो बहुओ को करना ही पड़ता है। ऐसे कैसे वो लोग तुम्हें घर से निकाल सकते है, बहु तो घर की लक्ष्मी होती है। उसके बिना तो घर, घर नहीं होता है। आजा बेटी तू बैठ आराम से मै तेरी सास से बात करती हूँ।
रात का खाना खाकर रिया सो गईं। फिर रोहिणी ने मयंक से बात की अब तो रिया की सास को सबक सिखाना ही पड़ेगा। घर की लक्ष्मी को इस तरह से घर से बेघर कैसे कर सकती है। हाँ माँ आप सही कह रही है बहुए तो घर की लक्ष्मी होती है ये बात आप अपनी बेटी के लिए तो कह रही है लेकिन माँ आपके घर मे जो लक्ष्मी है उसके साथ आप कैसा वयवहार करती है। वो तो वैसे भी बहुत दुखी है। अकेले में भइया के तसवीर के सामने कितना रोती है। और आप उनका दुख बांटने की बजाय दिनभर जली कटी सुनाती रहती है। कुछ समझी आप उनका दुख भी तो समझोआज आपकी बेटी पर गुजरी वही सब तो कितनी तकलीफ हो रही है और वो बेचारी भाभी उनका तो मायके में भी कोई नहीं है। सोतेली माँ है, पिता जी भी नहीं पूछते। इतना सबकुछ सहने पर भी वो आपको कोई जवाब पलटकर नहीं देती। बस शांति से सब काम करती रहती है सोचों माँ कुछ समझों आप भी।
तभी दिपिका चाय नाश्ता लेकर आ गई, माँ जी चाय। उसका चेहरा उतरा था आखे सूजी हुई थी। दिपिका को देखकर मयंक की बात रोहिणी को याद आ गई। थोड़ा दिल नरम हो गया रोहिणी का। दिपिका को रोहिणी ने अपने पास बिठाया बैठ बहू तू भी चाय पीले। मै अदंर पी लूंगी। नहीं रिया को बुला ला सब लोग बैठकर साथ मे चाय नाश्ता करेगे। बेटा दिपिका आज मेरी आखें खुल गई है जब ससुराल से बेटी घर आइ है। मयंक तो मुझे हर वक़्त समझाता रहता है मेरे ही आखों पर पट्टी बंधी थी। क्या करूँ बेटा खोया है अपना। अपने आगे मुझे तेरा दुख तो दिखाई भी न दे रहा था। मुझे माफ कर दे बेटा। मै तुझे ही कसूर वार ठहराती रही पर इसमें तेरा क्या कुसूर था।
आज दिपिका के चेहरे पर एक अलग सा सुकून था वो हलके से फीकी सी मुस्कान के साथ रोहिणी का हाथ पकड़ लिया। नहीं माँ माफी न मांगे आप तो मेरी माँ जैसी है। बड़े छोटे से माफी मांगे ये अच्छा नहीं लगता। आज दिपिका दौड़ दौड़ कर सारे काम कर रही थी। सास की बातो से एक जोश भर गया था। भाभी के चेहरे को देखकर आज मयंक भी बहुत खुश था। बस भाभी ऐसे ही मुस्कुराती रहना। आज पूरा परिवार दुख को थोड़ा पीछे धकेल कर एक फीकी ही सही मुस्कान चेहरे पर लाकर खुश था। और रिया को भी समझा बुझा कर ससुराल भेज दिया।
दोस्तों जाने वाला तो चला गया लेकिन जो परिवार मे पीछे बच जाता है व़ पल पल मरता है। मरने वाले के साथ मरा तो नहीं जाता लेकिन उसके बिना जीने की आदत तो डालनी ही पडती है न।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
1 मई