अपमान – करुणा मलिक

 बहुत बधाई हो मंजू, नए प्यारे से घर की, बहुत सुंदर मकान बनाया है। 

धन्यवाद जी, क्या करे ं …. मेरी पसंद तो थी ही अव्वल, मेरे तो बच्चों को भी कोई चीज आसानी से पसंद नहीं आती। तुम्हें पता है कुमुद, ठेकेदार ने छह- सात महीने का टाइम दिया था मकान पूरे करने का…..पर देखो, पूरा डेढ़ साल हो गया मिस्त्री घर से नहीं निकले। हमारे तो बच्चों के पापा भी ऐसे है कि बनी बनाई पूरी दीवार तुड़वा डालते थे अगर हम तीनों में से एक भी कुछ कह देता था। पाँच-छह करोड़ का खर्चा आया है….. शायद इंटीरियर डेकोरेशन चेंज करवाएँगे, बेटे को खास पसंद नहीं आ रहा है। 

मंजू थी कि बोलती ही जा रही थी और बेचारी कुमुद सोच रही थी कि इतना बताने की क्या जरूरत है, छह-सात करोड़ ….. या इंटीरियर डेकोरेशन, ऊँ, मेरी बला से…. बाप रे बाप…. कितना बोलती है ये औरत….. 

मंजू की पुरानी पड़ोसन ने चैन की सांस ली कि अच्छा हुआ, उसकी सास ने किसी काम से उसे बुला लिया वरना दिमाग की दही बनाने में इसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। 

कुमुद भीड़ के बीच में अपने परिचितों को ढूँढने के इरादे से आगे बढ़ी और मंजू की बेटी सोनिया आगे पड़ गई। कुमुद ने मुस्कुरा कर कहा–

कांगरेचुलेशन बेटा! 

थैंक्स आंटी…. घर कैसा लगा? 

बहुत ही सुंदर….. अपने को रोकते-रोकते भी कुमुद के होंठो से निकल ही गया पर वो चुप भी कैसे रहती, अब सोनिया पूछ रही है तो कुछ तो बोलना ही पड़ेगा ना…. कुमुद जिस बात से डर रही थी वही हो गई, सोनिया तो अपनी माँ से चार कदम आगे निकली…. 

कुमुद का हाथ पकड़ कर बोली–

सच में आंटी, एक- एक चीज मैंने पसंद की है। दस करोड़ तो लग चुका है पर कईं चीजें अभी बदलवानी है। मैंने तो सोच लिया था आंटी कि मम्मी की एक नहीं चलने दूँगी घर के बारे में…. मिस्त्री और ठेकेदार भी हैरान थे मेरी पसंद देखकर…. पापा को बार-बार बोलते थे कि आपकी बेटी की पसंद तो शाही है। यही बात मेरे फ्रैंड सर्कल में कहते है कि मेरी रायल च्वाइस है….. हमारे शहर में तो ऐसा घर किसी का नहीं है…. अभी मेरी एक सहेली तो कह रही थी कि घर नहीं, ये तो महल है और सोनिया भी तो राजकुमारी है, महल में रहने वाली… आप तो शायद अभी उसी पुराने घर में रहती हैं ना? 

अब तो कुमुद की सहनशक्ति जवाब देने लगी थी, उसने सोनिया से बचने के लिए दूर से ही हाथ उठाकर , यह दिखाने का प्रयास किया जैसे कोई परिचित बुला रहा हो…. 

चलिए आंटी, आप मिल लीजिए उनसे, मैं भी अपनी फ्रैंडस के पास चलती हूँ, आंटी, मिलकर जाना, मैंने सभी के लिए खास रिटर्न गिफ्ट तैयार करवाए है। 

हाँ-हाँ जरूर….. 

कुमुद ने चैन की सांस ली और कोने में पड़ी एक कुर्सी पर जा बैठी, भूख भी लगी थी पर खाने के लिए इतनी भीड़ थी कि धक्का मुक्की जैसी हालत हो रही थी…. आई तो इसलिए थी कि चलो इसी बहाने पुराने परिचितों से मिलना हो जाएगा। पर… ये माँ-बेटी तो ऐसे दिखा रही हैं जैसे इनके सामने तो कोई दूसरा कुछ भी नहीं…. 

कुमुद खुद से बातें कर ही रही थी कि मंजू के पति ने कहा-

नमस्कार कुमुद जी, खाना हो गया क्या? 

बधाई हो भाई साहब, और कैसे हैं आप? 

कुमुद ने इस बार मकान की बात ही नहीं छेड़ी….

कैसा बताऊँ, दो साल हो गए मकान को बनते, पंद्रह-बीस करोड़ तो लग चुका। आप तो जानती ही है मंजू की पसंद… कहीं कोई समझौता नहीं और सच तो यह है कि समझौता करना भी क्यों? भगवान् ने जब दिया है तो खर्च करना चाहिए। अब खाने का ही प्रबंध देख लीजिए, इतने आइटम है कि आप खाते-खाते थक जाएँगी। मैंने सोच लिया था कि कोई खाने का आइटम छोड़ूँगा ही नहीं, कितने लोग ऐसे है यहाँ, जिन्होंने वे चीजें खाई तो क्या, नाम तक नहीं सुना….कुमुद जी, खुले दिल से काम करते हैं हम तो……. भीड़ देखिए….पूरा शहर है…..आइए,  मैं पूरा घर दिखाता हूँ। 

कुमुद अनिच्छा से उठी क्योंकि भूख की वजह से उसका दम निकला जा रहा था। आज सुबह नाश्ते में भी चाय और दो रस लिए थे । ग्यारह बजे से ढाई बज गए पर एक गिलास पानी तक नहीं पूछा इन लोगों ने… 

वह एक कदम ही चली थी कि मंजू ने अपने पति को बुलाया। 

आप इधर से चलिए कुमुद जी, मैं बस अभी आया… 

कुमुद ने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया और फिर से एक नजर खाने के लिए लगी लाइन पर डाली। वह सोच रही थी कि लोग आगे बढ़ने की जगह रूके क्यों हैं तभी उसके कानों में आवाज आई–

बस दो मिनट में, गर्म पूरियाँ आ रही हैं…. 

सब्जियों के डोंगे भी खाली है…. सब्जी भी मँगवा…. 

कुमुद समझ गई कि अभी खाने में समय लगेगा इसलिए उसने सोचा कि रसोई में जाकर खुद ही पानी पी लेती हूँ लेकिन जैसे ही एक कमरे के सामने से गुजरी, मंजू की आवाज आई-

लोगों को भी तमीज नहीं होती, निमंत्रण देते ही पूरे खानदान को लेकर चल पड़ते है…भूक्कड़ कहीं के, इनमें से एक की भी औकात थी क्या यहाँ आने की, हमने तो इसलिए बुला लिए थे कि चलो, देख लेंगे बेचारे…. दुनिया में क्या- क्या चला है पर इन्हें तो इतनी अक्ल नहीं कि इतनी देर तक लाइन में कौन लगा रहता है ? हलवाई को बोलो कि निपटाने वाला तरीका निकाले… 

कुमुद हकदम रह गई। क्या ये वही मंजू और उसके पति है जो खुद दूध का दही जमा कर कढ़ी नहीं बना सकती थी। हमेशा हमारे घर से मट्ठा मंगवाती थी। आज चार पैसे आते ही अपने पुराने दिन भूल गई और हमें भूक्कड़ कहने लगी। 

कुमुद उल्टे पांव लौट गई। उसे दूसरों का तो पता नहीं पर अब वह इस घर का पानी तक नहीं पिएगी और ना ही ऐसे लोगों से कोई संबंध रखेगी क्यों कि ऐसे लोगों के विचारों में दिखावा नहीं, #अभिमान होता है। तभी बाहर निकलते हुए कुमुद की नजर खाने के लिए लगी लाइन पर पड़ी जो ये सोचकर इंतजार कर रहे थे कि शोर-शराबा करके किसी का अपमान नहीं करना चाहिए।

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