जीवनसाथी के आंसू  – वाधवानी दिल्ली

 आज मैं तुम्हें अकेले में रोता तड़पता देख कर बहुत खुश हूं। आप लोग सो रहे होंगे कि मैं किसके लिए कह रही हूं और क्यों? 

 मैं हूं स्वर्गीय नंदिता और यह शब्द मैं  अपने पति के लिए कह रही हूं। अब आप सोचेंगे कि कैसी पत्नी है निर्दयी  और स्वार्थी, लेकिन जब आप मेरी जिंदगी के बारे में सुनेंगे तो आपको मेरी बात शायद सही लगे और ना भी लगे, तो मुझे क्या, क्योंकि मैं तो मर चुकी हूं हां कभी-कभी इस इंसान पर हंसने आ जाती हूं जिसने मेरी जिंदगी को सिर्फ एक दिखावा बना दिया था। 

 आज भी आप किसी से पूछोगे, तो वह यही कहेगा कि नंदिता, वह तो अपने पति राघव के साथ बहुत खुश थी और सुखी थी। किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। अच्छे-अच्छे कपड़े, जेवर, और खाना पीना  घूमना फिरना सब कुछ तो था, लेकिन उन लोगों को क्या पता कि सब कुछ तो था, सम्मान के अलावा। 

 देखने में बहुत सुंदर घर और वास्तव में जेल, राघव जेलर। उसने कभी मेरे आंसुओं की कीमत नहीं समझी और ना कभी मेरी भावनाओं की कद्र की। हर बात उसी के कहे मुताबिक होती थी। 

   छोटी-छोटी बातों में,बिना किसी गलती के, बुरी तरह डांटता था और चिल्लाता था। गंदी गंदी मां बहन की गालियां देता था और गालियां देते देते मेरे माता-पिता और भाई बहन तक पहुंच जाता था और उन्हें भी गालियां देता था। गुस्सा होते समय और गालियां देते समय वह यह भी नहीं देखता था कि हम मंदिर में खड़े हैं या किसी शादी समारोह में, आसपास कितने लोग हैं? इस बात से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। 

          मै ने कई बार कहा कि ऐसा मत किया करो। तब वह कहता कि तू बुरा क्यों मानती है, बस समझ जा की मेरा नेचर ही ऐसा है। हमारा कामकाज ही ऐसा है कि हमें गलियों की आदत पड़ गई है तो मुंह से निकल जाती है। ऐसे ही बहाने वह हर बार बनाता था। 

 एक बार मैंने कहा-” कल मैं अपनी सहेली कल्पना के घर थोड़ी देर के लिए जाऊंगी, वह बहुत दिनों से बुला रही है। ” 

 राघव-” नहीं, उस कमीनी औरत के घर जाने की कोई जरूरत नहीं है, वह तुझे उलटी बातें सिखाती है और फिर घर जाकर तू मुझसे लड़ती है और उलटे जवाब देती है कोई जरूरत नहीं है जाने की और ना ही उसे बुलाने की। ” 

 मैंने कहा-” ऐसा तो कभी कुछ नहीं हुआ और फिर मुझे भी अक्ल है कि कौन क्या कह रहा है यह कौन क्या सीखा रहा है? ” 

 राघव चिल्लाया -” कह दिया ना कहीं नहीं जाना” 

 तब मैं मन मसोस कर रह गई। 

 एक बार जब हमारे दोनों बच्चे छोटे थे। बच्चों ने कहा “पापा हमें दशहरा मेला में ले चलो। ” 

 राघव-” मुझे यह मेले वेले बिल्कुल पसंद नहीं, बहुत भीड़ होती है मैं कहीं नहीं ले जाऊंगा, चुपचाप घर पर बैठो। ” 

 बच्चे बेचारे रूआंसे हो गए। 

 एक बार दशहरे वाले दिन राघव को कहीं बाहर जाना था और उस दिन मेरा भाई आया हुआ था, तब हम चुपचाप दोनों बच्चों को लेकर मेले में गए  और बच्चे बहुत ही खुश थे। 

 एक बार हमारी एक पड़ोसन अपने बच्चों को दूर किसी गार्डन में ले जा रही थी तो उन्हें देखकर मेरे बच्चे भी रोने लगे। उस दिन शाम को मैंने  राघव से कहा कि “किसी दिन हम भी चलते हैं बच्चों को घूमाने” 

 इस बात पर राघव बहुत चिढ़ गया और मुझे कहने लगा कि” तुम दोनों बच्चों की कसम खाओ कि आगे से कभी घूमने के लिए नहीं कहोगी, मेरे पास फालतू का टाइम नहीं है। मैंने कहा कि मैं बच्चों की कसम नहीं खाऊंगी। वह जिद करने लगा तो मैंने कहा कि मैं ईश्वर की कसम खा लेती हूं। लेकिन वह किसी भी तरह नहीं माना और मुझे मजबूरी में बच्चों की कसम खानी पड़ी।उसके बाद मैं ईश्वर से माफी मांगी और रात भर आंसू बहाती रही। अब मैंने राघव से कुछ भी कहना छोड़ दिया था। 

 कुछ समय बाद मेरा छोटा बेटा बीमार पड़ गया, तब राघव ने मुझे गालियां देते हुए और बेहद अपमानित करते हुए कहा कि तूने बच्चों की झूठी कसम खाई थी, तेरी वजह से बच्चा बीमार हुआ है। उस दिन अंदर से मैं बिल्कुल टूट गई। मैं रात भर रोती रही लेकिन उसे मेरे आंसुओं की कोई परवाह नहीं थी। 

     जब बच्चे थोड़े बड़े हुए तो राघव ने अपनी मर्जी से पहाड़ों पर घूमने का प्रोग्राम बना लिया। वहां होटल के टेबल पर खाना खाते समय राघव ने बड़े बेटे को आवाज़ लगाई, अश्विन, अश्विन, लेकिन उसने नहीं सुना क्योंकि वह अपने छोटे भाई सोनू के साथ बातों में व्यस्त था। बस इतनी सी बात पर राघव उस पर चिल्लाने लगा वहां बैठे सारे लोग पलट कर देख रहे थे कि यह आदमी बच्चों को गालियां क्यों दे रहा है। 

 अश्विन ने सबके सामने खुद को अपमानित महसूस किया और जब मैंने राघव को समझाने की कोशिश की तो मुझे भी गालियां मिली। तब से लेकर बच्चों ने ठान लिया था कि पापा के साथ कहीं नहीं जाएंगे। राघव कभी मूवी देखने के लिए कहता तो बच्चे मना  कर देते। 

 लेकिन राघव बच्चों को कभी भी पैसे देने से मना  नहीं करता था। बच्चे उससे 

 सिर्फ जरूरी बात ही करते थे वह भी सिर्फ हां और ना में। 

 अब राघव मुझे यह कहने लगा था कि बच्चे तुझे हर बात बताते हैं और मुझे नहीं। वह मुझसे इस बात पर भी लड़ता था कि तू हमेशा बच्चों का पक्ष लेती है। 

 छोटी-छोटी बातों पर अपमानित होने के बाद कई बार मेरा मन हुआ कि मैं आत्महत्या कर लूं, लेकिन बच्चों के मोह में नहीं कर पाई। 

 राघव अपने प्रति बच्चों का रूखा व्यवहार देखकर चिढ जाता था और उनके ऑफिस चले जाने के बाद मुझ पर सारी भड़ास निकालता था, लेकिन उसने यह समझने की कोशिश कभी नहीं की कि ऐसा क्यों हो रहा है? 

 गलती ना होने पर भी मेरी गलती निकालता था और अगर भूल से किसी से बात कर लो,तो पूछने लगता था कि किस से बात कर रही थी, उसने क्या कहा और तूने क्या जवाब दिया। वैसे तो मैं अक्सर इस बात को टाल जाती थी पर अगर कभी बता दो, तो कहता था कि तुझे ऐसे नहीं, वैसे कहना चाहिए था। 

 मैं सोचती थी कि यह कैसा इंसान है, यह अब मुझे बोलना भी सिखाएगा और इसका बस चले तो मेरी जुबान पर ताला ही लगा दे। 

 एक बार राघव का भांजा किसी काम से हमारे घर आया, उसे अपनी दुकान पर पहुंचने में देर हो रही थी इसीलिए वह रुका नहीं बस अपना सामान लेकर चला गया। 

 राघव ने आते ही पूछा-” रजत आया था, उसे चाय पानी दिया? ” 

 हालांकि यह पूछने की जरूरत नहीं थी क्योंकि रजत यह अच्छी तरह जानता था कि मैं ससुराल वालों की इज्जत करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ती। 

 मैंने कहा-” उसे देर हो रही थी इसीलिए वह रुका नहीं” 

 तब राघव ने फिर से गालियां देकर मुझे अपमानित करते हुए कहा-” तेरे पास मेरे रिश्तेदारों के लिए एक गिलास पानी भी नहीं है। ” 

 तब मैं भी चिल्ला कर कहा -” आप ऐसा कैसे कह सकते हो, मैं हमेशा सबका सम्मान करती हूं और अगर विश्वास नहीं है तो रजत से फोन करके पूछ लो कि उसे देर हो रही थी या नहीं। ” 

 ऐसे ही पूरी जिंदगी सम्मान के बिना गुजार दी मैंने, अगर सारी बातें लिखूं  तो किताब बन जाएगी। आप दोनों बच्चे बड़े हो गए थे तो शादी की बात चल रही थी। 

 कुछ समय बाद हमने अश्विन की शादी करवा दी। हमारी बहू सौम्या बहुत अच्छी लड़की थी। ऑफिस जाने  के साथ-साथ घर के कामों में मेरी मदद करवाती थी। 

 लेकिन राघव को तो आदत थी सब की कमियां निकालने की इसीलिए कुछ समय बाद अश्विन और सौम्या को अलग घर में रहने भेज दिया। मैंने बहुत समझाया कि बच्चों के बिना क्या घर,क्या परिवार। लेकिन वह नहीं माना। 

 3 साल बाद छोटे बेटे की शादी भी हो गई। उसका ट्रांसफर मुंबई में हो गया इसीलिए वह अपनी पत्नी के साथ वहां चला गया। अश्विन और सौम्या मिलने के लिए आते रहते थे। 

 मैं नंदिता बच्चों के बिना ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह पाई और एक दिन चक्कर खाकर गिर पड़ी और फिर कभी नहीं उठी। तब से लेकर राघव अकेला रह रहा है पहले मेरे मरने पर, अश्विन और सौम्या सुबह ऑफिस जाते समय राघव को खाना देकर जाते थे और रात को भी टिफिन लेकर आते थे, लेकिन राघव किसी भी बात में कभी खुश नहीं होता, सिर्फ कमियां निकालना उसकी आदत है। मैंने तो जीवन भर बर्दाश्त किया, लेकिन अब कोई कब तक सहेगा। 

 अश्विन और सौम्या दोनों बहुत अच्छे बच्चे हैं। उन्होंने अपने पापा से कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप उनसे दूरी बना ली और एक दिन कोशिश करके दोनों पुणे चले गए। 

 अब अकेले में राघव को मेरी याद आती है। मैंने अपने कानों से सुना है वह मेरी फोटो को लेकर रोता है, अपनी गलतियों की माफी मांगता है और कहता है कि तुम सही थी और मैं गलत। तुम हमेशा मुझे समझाती रहती थी और मैं पल-पल तुम्हारा अपमान करता रहता था। मेरे से अपमानित होने के बाद तुम रात रात भर रोती रहती थी, मुझे पता लग जाता था लेकिन फिर भी मैं तुम्हें चुप नहीं करवाता था और ना ही मैंने कभी तुम्हारे आंसुओं की कीमत समझी। मेरे व्यवहार के कारण ही बच्चे भी मुझसे दूर हो गए। अब मैं खुद अकेले बैठा रो रहा हूं, कोई देखभाल करने वाला भी नहीं है। ऐसा लगता है अपनी करनी का फल भुगत रहा हूं। 

 बस यही सब देखने मै आती हूं, लेकिन रोने का अब क्या फायदा। जब तक मैं जीवित थी तब तक मुझे कभी जीवन साथी नहीं समझा। दोस्तों, एक स्त्री को प्यार के साथ-साथ सम्मान की बहुत जरूरत होती है। 

 अ प्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली

साप्ताहिक प्रतियोगिता विषय #आंसुओं की कीमत

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