अपनेपन की छांव का अहसास – डॉ बीना कुण्डलिया 

दरवाजे पर खटखटाहट और एक बुलन्द सी आवाज की चहक कुरियर कुरियर को सुनकर माया जी ने दरवाजा खोला कुरियर वाले से कुरियर लेकर अभी सोच ही रहीं थीं क्या होगा ? किसने भेजा होगा । दरवाजे पर आवाज सुनकर शुलभ बाबू भी जल्दी से बहार आ गये। अरे माया दिखाओ तो सही जरा किसने क्या भेजा भई ?

बहुत दिनों बाद कुछ भेजा गया है घर पर … तब तक माया जी लिफाफा खोल चुकी थीं। राखी आई है जी ,आपकी राधा बहन के यहां से आपके लिए, माया जी बोली। अरे मेरी बहन राधा ने राखी भेजी दिखाना जरा कहकर शुलभ बाबू राखी हाथ में लेकर काफी प्रसन्न चित्त नजर आ रहे।

पांच बरस हो गये अम्मा को गये पांच साल पहले आई थी राधा और तब से बस कभी कभार फोन में बतिया लेती दो घड़ी, कहकर शुलभ बाबू पत्नी माया को चाय बना दो जरा कहकर पास पड़ी कुर्सी में बैठ पुराने दिनों की यादों में खोकर रह गये । शुलभ जी के बाबूजी अपने रहते रहते तीनों बेटियां और एक बेटे के विवाह की जिम्मेदारी निपटा चुके थे।

शुलभ बाबू इकलौते बेटे और तीन बहनें दो बहनें बड़ी और एक बहन राधा सबसे छोटी। दोनों बहनें बड़े बड़े घरों में विवाहीं लेकिन राधा का विवाह एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। लड़का शरीफ था और शुलभ जी के पिताजी की माली हालत और स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था तो जो मिला जैसा मिला जल्दी में विवाह दी गई।

और बहनों की अपेक्षा  राधा थी भी सीधी सादी, कोई ना-नुकुर नहीं जहां दिया चुपचाप चली गई… जानती थी पिता की परिस्थिति शायद और ज्यादा बोझ नहीं बनना चाहती थी। लेकिन शुलभ बाबू की सबसे चहेती लाड़ली बहन थी वो उनकी शादी के बाद ही उसकी शादी हुई फिर एकाएक पिताजी का स्वर्गवास और फिर मां का भी अनायास ही स्वर्गवासी हो

जाना सभी अपने- अपने घर गृहस्थी में अपनी- अपनी व्यवस्थाओं में ऐसे व्यस्त हो गये बस कभी फोन में ही हालचाल हो जाते । अब फोन में दो घड़ी की बातचीत में कौन अपने दुखड़े रोने वाला भला ? सबहीं आपस में अपने को अच्छा ही बताते।  माँ की बरसी पर आये सभी उसके बाद तो दोनों बड़ी बहनों के यहां से भाई दूज रक्षा बंधन पर महंगी मिठाई

राखी बच्चों के लिए तोहफे आ जाते । लेकिन माँ की बरसी के बाद आज इतने साल बाद राधा की भेजी राखी शुलभ बाबू के मन में उससे मिलने की तड़फ जगा देती है। जाने कैसी होगी मेरी राधा बहन ? वो उसकी याद में भीतर ही भीतर तड़फ उठते हैं।  सोच में पड़ जाते हैं। कैसे हालात में होगी ? जाने सही भी होगी कैसी होगी ? पति भी उसका प्राइवेट नौकरी में था

वो भी ज्यादा पड़ी लिखी नहीं थी। दसवीं पास किया बाकी खुद ही कहने लगी उसको नहीं पढ़ना आगे। बाकी दोनों बड़ी बहनों ने तो बारहवीं पास की थी।

राधा सिलाई कढ़ाई की बहुत ही शौकीन थी । शुलभ बाबू अभी गहरी सोच में डूबे हुए ही थे की पत्नी की आवाज सुनकर चौक पड़े। जो चाय का कप लिए खड़ी थी और उनको चेतना में वापस लाने की कोशिश कर रही थी। अजी कहा खो गये आप… ये लीजिए, गर्म गर्म चाय अदरक वाली ताजा मलाई डालकर।

शुलभ बाबू ने चाय का कप हाथ में लिया और बोले- “माया मैं सोच रहा हूँ इस बार राखी पर राधा के घर चलते हैं” ।

माया बोलीं- ये अचानक राधा के घर जाने का ख्याल केसे आ गया आपको ?

“बस ऐसे ही न जाने क्यों मन अन्दर ही अन्दर घबरा सा रहा है राधा की हालत मुझे अच्छी नहीं लग रही है। किसी परेशानी में न हो वो .. मदद मांगना तो दूर वो तो कुछ बताने वाली भी नहीं है किसी को अपना दुख,सब चूपचाप  ही सहती रहेगी “ !! आज शुलभ बाबू बहुत कुछ कहना चाहते थे। 

पत्नी माया ने चिन्तित पति की ओर देखा बोली ठीक है आप कहते हैं तो चलते हैं आप अभी से टिकट बुक करवा लीजिए ट्रेन का, त्यौहार के मौसम में बड़ा ही मुश्किल हो जाता मिलना।

शुलभ बाबू चाय का खाली कप एक तरफ रखते हुए शीध्र ही खड़े हो गए और बोले मैं तो चला टिकट बुक करने और फिर छुट्टी के अनुमान का अंदाजा लगाने लगे । देखो माया शुक्रवार को निकल लेंगे रात की टिकट है दो दिन शनि और शाम इतवार रह देर रात इतवार की ट्रेन से हम वापस आ जायेंगे। इससे फायदा ये होगा मुझे छुट्टी भी नहीं लेनी पड़ेगी। कुछ छुट्टियां बच जायें तो वक्त बेवक्त काम ही आ जाती हैं।

बच्चों को तैयार रहने और चलने  का बता माया जी भी ननद के यहां जाने की जोर शोर से तैयारी में जुट गईं । उन्होंने अपना बड़ा सा खानदानी बक्शा खोलकर अपनी ‘माँ के यहां से समय समय पर मिलती साड़ियों में से संभाल कर रखी हुई दो साड़ी निकाल ननद राधा को देने के लिए एक तरफ रख दीं। पिछले दिनों भाई आया था बच्चों के लिए पेंट टी शर्ट कपड़े दे गया था महंगे तो थे मगर फिर भी बच्चों को पसंद नहीं आये उसने उनको बक्शे में संभालकर रख लिये थे । सोचा ज्यादा दिन भी कपड़ा रखकर खराब ही हो जाना है ऐसा सोचकर राधा के बच्चे पहन लेंगे कहते  हुए वो भी ले जाने को एक तरफ रख लिये । पिछले साल पति ऑफिस से टूर पर गये तो दो शाल ले आये थे। चलो एक राधा के लिए ले जाती हूँ ,उसको भी रख लिया। बच्चे भी तैयारी में लगे पता नहीं बुआ के यहां जाने की खुशी या बहुत दिनों बाद ट्रेन में सफर का उत्साह था उनमें।

आज निश्चित समय पर शुलभ बाबू अपने दोनों बेटों एक बेटी और पत्नी पूरे परिवार सहित निकल पड़े बहन राधा से मिलने उसके घर । देर रात की ट्रेन तो सुबह सुबह पहुँच गए निश्चित गन्तव्य पर ।ऑटो रिक्शा लिया और जा पहुंचे राधा के घर । 

पुराने से बने मकान बरसों से लिपाई पुताई का नाम नहीं बेहद शांत इलाका या यूं कहो विरान बंजर सी बस्ती। एक बार बहुत पहले राधा के रिश्ते के समय आये थे तो घर पहचानने में शुलभ बाबू को कोई मुश्किल नहीं हुई। वही लकड़ी का गेट चरमराई सी आवाज में जब खोला तो खुलते ही चरऽ मरऽ मर आवाज सुनकर भीतर से एक दुबला पतला सा लड़का थोड़ा बाहर आकर झांकता है । जिसके बदन पर पुरानी सी शर्ट पहनी हुई मगर धुली हुई साफ सी, जो सबको देखकर पहचान कर थोड़ा शरमा कर फिर वापस भीतर ही भाग गया । तब तक वो अन्दर आ गये थे। दरवाजे का परदा हटा राधा दौड़ती बहार आई शायद बच्चे ने बता दिया था कि कौन आया है ? 

भाई को देखकर राधा दौड़कर लिपट गई..भाई भाई आप मेरे यहां कैसे आ गये ? हड़बड़ाहट में वो समझ ही नहीं पा रही थी क्या करे ? 

क्यों… मैं नहीं आ सकता क्या तेरे घर ? तू तो आती नहीं मैंने सोचा मैं ही खबर ले लेता हूँ आकर, ऐसा कहकर शुलभ बाबू ने बहन का माथा चूम लिया। 

राधा ने माया भाभी बच्चों को भी गले लगाया और सभी को भीतर कमरे में ले गई । फिर अपने बच्चों को बुलाकर सबको प्रणाम करवाया मिलवाया। घर के अन्दर का दृश्य झिरते चिरते से पर्दे जो बरसों पुराना इतिहास बयां कर रहे थे। कमरे में पुराना सा बिस्तर पुरानी सी चादर मगर साफ धूली हुई बिछी थी। दो पुरानी सी कुर्सियां जिन पर फटी चादर के टुकड़े बिछा उसका पुराना पन छिपाने की भरपूर कोशिश की गई थी। घर की हालत देखकर शुलभ बाबू का दिल रो पड़ा। राधा भी कभी भाई को देखती कभी अपने टूटे फ़ूटे मकान को … तभी भाभी माया ने अपने साथ लाये फल फ़ूट बच्चों के कपड़े साडिया राधा को दिये जिनको रखने वो किचन या यूं कहो दो दीवारों की एक आड़ मात्र में गई और चाय की व्यवस्था करने लगी ।

शुलभ बाबू पत्नी माया से बोले देखो मेरे से ये कोई मदद लेने से रही तुम जितना कर सको कर देना ‌ पत्नी बोली आप चिंता न करें कल तक आपको बहुत सुधार दिखेगा ।

राधा ने चाय बनाई तब तक छोटा बेटा कुछ बिस्किट ब्रेड ले आया। राधा ने स्नेह पूर्वक आग्रह कर सबको नाश्ता खिलाया । फिर भाभी माया बोलीं- राधा तुम्हारे भाई और बच्चे अब थोड़ा आराम करेंगे । वो क्या है कि ट्रेन में ठीक से सो नहीं पाये ? चलो तब तक हम बाजार होकर आते हैं। माया राधा को लेकर बाजार गई जहां राधा से बातचीत कर पता चला आजकल कुछ माह से उसके पति की फैक्ट्री में कार्यकर्ताओं की छटाई की वजह से उसके पति की नौकरी चली गई है। वो खुद ही लोगों के कपड़े वगैरह सिल, सिलाई करके ही घर चला रही है। माया कहती हैं राधा तुमने हमको तो बताना चाहिए था। हमको इतना पराया समझ लिया आखिर अपने होते किस लिए है दुख सुख में वो काम नहीं आयेंगे तो कौन आयेंगे भला ? 

राधा की आँखों में आँसूओं की धारा बह पड़ती हैं वो उनको पौछते हुए कहती हैं… भाभी दो बरस पहले भी मेरे पति की नौकरी छुट गई थी। तब उन दिनों बड़ी दीदी आई थीं यहां उनके बच्चे की कुछ परीक्षा थी। मिलने आई घर पर उनका हमारे प्रति जो अपेक्षित व्यवहार था उसने तो मुझे बहुत डरा दिया था। कितना मजाक बनाया हमारी गरीबी का उन्होंने कह रहीं थीं वो अपने घर के पुराने पर्दे, बच्चों के पुराने कपड़े अपने नौकरों में बांट दिया करती है। आगे से उसको भेज दिया करेंगीं । उनके कहने का तरीका बहुत ही गलत और बेइज्जती करने वाला था। तो उसने भी कह दिया दीदी उसको तुम्हारी मदद की जरूरत नहीं है। बस थोड़ी ही देर रहीं हमारे यहां, फिर हॉटल में रहने चलीं गईं थीं।

माया राधा को समझातीं है सभी का व्यवहार एक जैसा नहीं होता राधा। तुम्हारे भाई तुमको बहुत चाहते हैं वो तो हम घर गृहस्थी बच्चों की पढ़ाई लिखाई में इतने व्यस्त हो गये सब भूल सा गये थे। लेकिन तुम याद करती या मदद मागतीं तो हम जरूर आ जाते ।

वो बड़े ही प्यार से राधा को समझातीं है.. देखो राधा समय हमेशा एक जैसा नहीं होता। तुम्हारे ये दिन हमेशा एक जैसे नहीं रहने वाले हैं। एक दिन दुबारा तुम्हारे पति की नौकरी लग जायेगी आखिर वो इतने मेहनती हैं।

फिर माया राधा को एक कपड़े की दुकान पर ले जाकर पर्दे खरीदती है कुछ चादरें और राशन सब्जी मिठाई वगैरा लेकर घर आ जाते हैं।

घर आकर जल्दी जल्दी खाना बना सबको खिलाकर घर व्यवस्थित करने में लग जाते हैं। आज राधा के घर में सुगन्धित मसालों पकवान की खुशबू की महक फैल जाती है। घर सजाते सजाते थोड़ी ही देर में पूरा घर नई चादर नये नये पर्दों से जगमगाने लगता है। शाम को राधा के पति घर आते हैं। सभी से मिलकर बहुत खुश होते हैं। और खबर देते हैं जल्दी ही उसी अपनी पुरानी कम्पनी में दुबारा रख लिये जायेंगे। इस बार उनकी तनख्वाह भी बढ़ा दी जायेगी ।

शुलभ बाबू और माया सब जानकर बहुत खुश होते हैं। सभी के चेहरों पर रौनक दौड़ने लगती है। सभी हंसी खुशी समय व्यतीत करते हैं।

आज दूसरा दिन राखी का त्यौहार तो सुबह सुबह सभी नहा-धोकर तैयार हो जाते हैं। राधा भाई को टीका लगाती और राखी बांधती है। सभी बच्चे भी आपस में राखी बांधते और खुशियां मना मिठाई भी खाते है ।

 दो दिन कैसे बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता। माया बाजार से कुछ अधिक महिने भर का राशन और खाने पीने का सामान लाकर राधा के घर में रख देती है। राधा के बहुत मना करने के बाबजूद भी ये कहकर तुम छोटी हो और हमारी जिम्मेदारी बनती है तुमको देखना, तुम्हारी जरूरत का ख्याल रखना। फिर रात शुलभ बाबू वापस जाने के लिए तैयार होते हैं। चलते समय राधा को कुछ पैसे देकर कहते हैं बहन ये भाई की तरफ से छोटा सा राखी का उपहार है। और हाँ अपने इस भाई को भूलना नहीं कभी, मैं फिर जल्दी ही तुमसे मिलने आऊंगा । और हाँ तुम भी अपने मायके जरूरत आना । ‘माँ बाबूजी नहीं रहे इसका मतलब ये नहीं की तुम्हारा मायका ही खत्म हो गया। वहां तुम्हारे भाई भाभी है जो तुमको ‘मां बाबूजी की कमी कभी महसूस नहीं होने देंगे। राधा भाई भाभी के गले लग रो पड़ती है । उनको जाते देख देर तक खड़ी निहारती रहती है। आज उसको बरसों बाद अपने माता-पिता के स्वर्गवासी होने के पश्चात पहली बार किसी अपने से मिली अपनेपन की छांव, असीम निस्वार्थ प्रेम, भावनात्मक सुरक्षा भरोसे की नींव के दर्शन का अहसास होता है। जो उसमें एक नया आत्मविश्वास पैदा करती है।

लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया 

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