सुहासिनी अक्सर खिड़की के पास बैठकर बाहर के कोलाहल को देखती रहती थी। शादी के छह साल बीत चुके थे, लेकिन उसे लगता था जैसे उसके और उसके पति, समर के बीच एक अदृश्य दीवार सी खड़ी है।
समर एक बेहद शांत, काम में डूबा रहने वाला और कम बोलने वाला इंसान था। सुहासिनी को हमेशा यही शिकायत रहती थी कि समर उसमें कोई दिलचस्पी नहीं लेता।
ना कोई सरप्राइज, ना कोई रोमांटिक बातें और ना ही कभी खुलकर प्यार का इज़हार। सुहासिनी को लगता था कि उसकी शादी बस एक समझौता बनकर रह गई है, जहाँ समर केवल एक पति होने की अपनी आर्थिक और सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ निभा रहा है।
समर के परिवार वाले काफी रसूखदार थे। जब सुहासिनी इस घर में ब्याह कर आई थी, तो उसे कई तरह के तानों का सामना करना पड़ा था। उसके मायके की आर्थिक स्थिति समर के परिवार जैसी नहीं थी। सास और ननद अक्सर बातों-बातों में सुहासिनी के परिवार के रहन-सहन और दिए गए दहेज को लेकर ताने मार दिया करती थीं।
शुरुआत में सुहासिनी बहुत रोती थी, लेकिन फिर धीरे-धीरे उसने खुद को इस माहौल में ढाल लिया था। समर उस वक्त भी खामोश ही रहता था। सुहासिनी को लगता था कि समर अपने परिवार के सामने डरपोक है और कभी अपनी पत्नी के लिए स्टैंड नहीं ले सकता। यही बात सुहासिनी के दिल में एक गहरी चुभन बनकर बैठ गई थी।
गर्मियों की छुट्टियाँ थीं और सुहासिनी की माँ, जानकी देवी, अपनी बेटी के पास कुछ दिनों के लिए रहने आई हुई थीं। जानकी देवी एक बेहद सुलझी हुई और अनुभवी महिला थीं।
उन्होंने इन कुछ दिनों में बड़ी खामोशी से अपनी बेटी और दामाद के बीच के इस ठंडेपन को महसूस किया था। उन्होंने देखा कि कैसे सुहासिनी बात-बात पर समर पर झल्ला जाती है, उसे ताने मारती है और समर बिना कुछ कहे, बस एक हल्की सी मुस्कान के साथ उसकी बातें सुन लेता है और अपने ऑफिस चला जाता है।
एक दोपहर, जब घर के बाकी लोग सो रहे थे, सुहासिनी और उसकी माँ बालकनी में बैठकर कपड़े तह कर रही थीं। सुहासिनी का चेहरा उतरा हुआ था। जानकी देवी ने अपनी बेटी के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा, “क्या बात है सुहास? मैं कई दिनों से देख रही हूँ, तू हर वक्त उखड़ी-उखड़ी सी रहती है। समर इतना अच्छा लड़का है, फिर भी तेरे चेहरे पर वो खुशी नहीं दिखती जो एक नवविवाहिता या एक सुखी पत्नी के चेहरे पर होनी चाहिए।”
सुहासिनी की आँखों में आँसू आ गए। उसने भर्राए हुए गले से कहा, “माँ, आप नहीं समझेंगी। आपको लगता है समर बहुत अच्छे हैं, क्योंकि वो आपकी इज्ज़त करते हैं। लेकिन एक पत्नी को सिर्फ छत और खाना नहीं चाहिए होता। मुझे लगता है वो मुझसे प्यार ही नहीं करते। जब सासू माँ मुझे मेरे मायके को लेकर ताने मारती थीं, तब भी वो चुप रहते थे। मुझे ऐसा लगता है कि मैं इस घर में बिल्कुल अकेली हूँ। मेरा कोई अपना नहीं है जो मेरे लिए लड़ सके।”
जानकी देवी ने अपनी बेटी की बातें बहुत ध्यान से सुनीं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता छा गई। उन्होंने कपड़े किनारे रखे और सुहासिनी का हाथ अपने हाथों में लेकर एक गहरी साँस ली।
“सुहास,” जानकी देवी ने धीमी लेकिन भारी आवाज़ में कहना शुरू किया, “मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है कि मैं तुझे वो सच बताऊँ जो मैंने पिछले तीन सालों से अपने सीने में दबा कर रखा है। मैंने कितनी बार तुझे बताना चाहा, पर मैं डरती थी कि कहीं तेरी जिंदगी में कोई नया भूचाल न आ जाए, कहीं तू अपने ससुराल वालों से बगावत न कर बैठे और तेरी गृहस्थी में दखल न पड़े। तू परेशान न हो जाए, सिर्फ इसलिए मैं आज तक चुप रही।”
सुहासिनी हैरान रह गई। “कैसा सच माँ? आप क्या कह रही हैं?”
जानकी देवी की आँखों से एक आँसू छलक कर उनके गाल पर आ गिरा। उन्होंने कहा, “तुझे याद है तीन साल पहले जब तेरे पिता जी को अचानक हार्ट अटैक आया था? तब डॉक्टर ने तुरंत बायपास सर्जरी के लिए कहा था और हमारे पास इतने पैसे नहीं थे।”
“हाँ माँ, मुझे याद है। तब समर ने ही तो अस्पताल का सारा बिल भरा था। मैंने हमेशा इसके लिए उनका अहसान माना है,” सुहासिनी ने बीच में ही टोकते हुए कहा।
“तुझे सिर्फ आधा सच पता है सुहास,” जानकी देवी ने कहा। “तुझे ये तो पता है कि समर ने पैसे दिए थे, लेकिन तुझे ये नहीं पता कि वो पैसे आए कहाँ से थे और उस रात इस घर में क्या हुआ था।”
सुहासिनी की धड़कनें तेज़ हो गईं। वह बिना पलक झपकाए अपनी माँ को देखने लगी।
“उस रात, जब समर ने अपने पिता जी से मदद माँगी थी, तो उन्होंने साफ मना कर दिया था। तुम्हारी सास ने तो यहाँ तक कह दिया था कि ‘हम कोई धरमशाला नहीं चला रहे हैं कि हर दूसरे दिन इनके मायके वालों की बीमारी का खर्चा उठाएं। वैसे भी कौन सा दहेज में खज़ाना ले आई है ये।’ ये सब बातें समर ने सुनीं। वह रात के दो बजे घर से निकला और अपने एक दोस्त के पास गया। समर ने अपनी वो पुश्तैनी ज़मीन का हिस्सा, जो उसके नाम पर था, अपने दोस्त के पास गिरवी रख दिया ताकि सुबह तक तेरे पिता के ऑपरेशन के लिए पैसे जमा हो सकें।”
सुहासिनी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। “क्या? समर ने अपनी ज़मीन गिरवी रख दी? और मुझे भनक तक नहीं लगने दी?”
“बात सिर्फ ज़मीन की नहीं है बेटा,” जानकी देवी ने आगे बताया, “ऑपरेशन के बाद जब मैं तेरे पिता जी को लेकर घर लौटी, तो समर मुझसे मिलने आया था। मैंने खुद उसके सामने हाथ जोड़कर माफी माँगी थी कि हमारी वजह से उसे अपने माता-पिता की बातें सुननी पड़ीं। तब उस लड़के ने मुझसे जो कहा, वो मैं मरते दम तक नहीं भूल सकती। समर ने कहा था- ‘माँ जी, सुहासिनी मेरी पत्नी है, मेरी अर्धांगिनी है। अगर उसके माता-पिता को कुछ होता है, तो वो दर्द मेरा है। मेरे परिवार ने जो भी कहा, उसके लिए मैं आपसे माफी माँगता हूँ। लेकिन मैं सुहासिनी को कभी ये पता नहीं चलने दूँगा, क्योंकि वो टूट जाएगी। वो अपने माता-पिता के अपमान को सह नहीं पाएगी।'”
सुहासिनी की आँखों से अब झरने की तरह आँसू बह रहे थे। उसका गला रुंध चुका था।
जानकी देवी ने अपनी बेटी के आँसू पोंछते हुए कहा, “तुझे लगता है कि वो तेरे लिए स्टैंड नहीं लेता? पगली, जिस दिन तुम्हारी सास ने तुम्हारे मायके को लेकर बहुत बड़ा तमाशा किया था और तुझे बहुत खरी-खोटी सुनाई थी, उसके अगले ही दिन समर ने अपने पिता के फैमिली बिजनेस से अपना हिस्सा अलग कर लिया था। उसने साफ कह दिया था कि जिस घर में उसकी पत्नी के सम्मान की रक्षा नहीं हो सकती, वो उस घर की दौलत का एक पैसा भी नहीं लेगा। वो जो आज दिन-रात ऑफिस में पागलों की तरह काम करता है, वो इसलिए नहीं कि उसे तुझसे प्यार नहीं है, बल्कि इसलिए ताकि वो अपनी मेहनत से तेरे लिए एक ऐसा महल बना सके जहाँ कोई तुझे ताना मारने वाला न हो। वो अपनी ज़मीन का कर्ज़ भी चुका रहा है और तेरे लिए एक नई दुनिया भी बसा रहा है, वो भी बिना तुझसे कोई शिकायत किए।”
सुहासिनी अपना चेहरा दोनों हाथों से छुपाकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसे अपने हर उस ताने पर पछतावा हो रहा था जो उसने समर को मारा था। उसे अपने अंधेपन पर गुस्सा आ रहा था जो अपने पति के इतने बड़े बलिदान को नहीं देख पाया।
जानकी देवी ने सुहासिनी का सिर अपने सीने से लगा लिया और कहा, “तू बड़ी किस्मतवाली है सुहास, जो तुझे समर जैसा प्यार करने वाला पति मिला है। वो बोलता नहीं है, पर उसका हर एक कदम सिर्फ और सिर्फ तेरी खुशी और तेरे सम्मान के लिए उठता है। तू कभी उसके दिल को मत दुखाना। असली पुरुष तो वही है जो बिना किसी दिखावे के, बिना किसी शोर-शराबे के अपनी पत्नी के मान-सम्मान की रक्षा करे, उसे दुनिया की हर बुरी नज़र और हर ताने से बचाए और उसे सच्चा प्यार दे। समर ने वही किया है।”
शाम को जब समर थका-हारा ऑफिस से लौटा, तो उसने देखा कि घर में अजीब सी शांति है। वह जैसे ही अपने कमरे में पहुँचा, सुहासिनी दौड़कर आई और उसके सीने से लिपट गई। वह बुरी तरह रो रही थी। समर घबरा गया। उसने सुहासिनी का चेहरा ऊपर उठाया और घबराहट में पूछा, “क्या हुआ सुहास? तुम रो क्यों रही हो? किसी ने कुछ कहा क्या? माँ जी ठीक हैं?”
सुहासिनी ने ना में सिर हिलाया और समर के हाथों को चूमते हुए कहा, “मुझे माफ कर दीजिए समर। मैं कितनी अंधी थी। मैं आपके प्यार को कागज़ के पन्नों और फिल्मों की तरह ढूँढती रही, जबकि आप तो असल ज़िंदगी में मेरे लिए पूरी दुनिया से लड़ रहे थे। आपने मेरी खातिर इतना सब कुछ सहा और मुझे भनक तक नहीं लगने दी?”
समर समझ गया कि जानकी देवी ने सुहासिनी को सब कुछ बता दिया है। उसने एक गहरी साँस ली, सुहासिनी के माथे को चूमा और बेहद नरमी से कहा, “तुम मेरी ज़िम्मेदारी नहीं, मेरी ज़िंदगी हो सुहास। और ज़िंदगी की हिफाज़त की जाती है, उसका ढिंढोरा नहीं पीटा जाता। मैं बस तुम्हें खुश देखना चाहता था, तुम्हें उन उलझनों और तानों से दूर रखना चाहता था जो तुम्हारे मुस्कुराते चेहरे को उदास कर देते।”
उस रात सुहासिनी को समझ में आ गया कि सच्चा प्यार लंबी-चौड़ी बातों या महंगे तोहफों में नहीं होता। सच्चा प्यार वो ढाल है जो बिना दिखे, हर मुसीबत से आपको बचाती है। आज उसके मन में समर के लिए जो प्यार और सम्मान था, वह दुनिया की किसी भी दौलत से बढ़कर था। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया, और कमरे में फैली वह खामोशी अब दूरियों की नहीं, बल्कि एक गहरे, अटूट और समझदार प्यार की गवाह बन गई थी।
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