**चमकते ख्वाब और घर की चौखट** – अर्चना खंडेलवाल

“निहारिका, इस तरह आधी रात को अचानक घर छोड़ कर जाना ठीक नहीं होगा,” अनिरुद्ध की आवाज़ में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी पीड़ा थी। “अभी बाबूजी और माँ सो गए हैं, सुबह उठकर जब वे तुम्हारे बारे में पूछेंगे तो मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा? वे सब तुमसे कितना प्यार करते हैं, तुम्हारा कितना ख्याल रखते हैं, और तुम… तुम महज़ पैसों के पीछे और एक खोखले दिखावे के लिए भागी जा रही हो। जीवन में पैसा और स्टेटस ही सब कुछ नहीं होता।”

निहारिका के हाथ पल भर के लिए ठिठके, लेकिन फिर उसने झटके से बैग की ज़िप बंद की और पलट कर अनिरुद्ध को देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी ज़िद थी, वह ज़िद जो उसने पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया की चकाचौंध और अपनी अमीर सहेलियों की जीवनशैली देखकर पाला था। 

“प्यार और ख्याल से बैंक के बिल नहीं भरे जाते अनिरुद्ध,” निहारिका ने ठंडी आवाज़ में कहा। “मुझे घोटन होती है इस मिडिल-क्लास ज़िंदगी से। वही पुरानी कार, वही छोटे-छोटे खर्चों पर हिसाब लगाना, महीने के अंत में बजट का रोना। मेरी सहेलियां हर महीने विदेश घूम रही हैं, उनके पास बड़े-बड़े ब्रांड्स हैं,

और मैं? मैं यहाँ इस दो कमरों के फ्लैट में रसोई और घर की ज़िम्मेदारियों के बीच अपनी जवानी और अपने सपने खत्म कर रही हूँ। मेरी दोस्त राधिका ने मुझे मुंबई में अपने साथ एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी शुरू करने का ऑफर दिया है। यह मेरी ज़िंदगी का इकलौता मौका है कुछ बड़ा करने का, और मैं इसे तुम्हारे इस ‘प्यार भरे’ परिवार के लिए नहीं छोड़ सकती।”

अनिरुद्ध ने एक गहरी सांस ली। उसे अपनी पत्नी की महत्वाकांक्षाओं से कोई शिकायत नहीं थी, लेकिन जिस रास्ते को उसने चुना था, वह उसे अंदर तक तोड़ रहा था। “सपने देखना गलत नहीं है निहारिका, लेकिन उन सपनों की कीमत हमारे परिवार का सुकून नहीं हो सकती। तुम राधिका की जिस चमकती दुनिया की बात कर रही हो, वो सिर्फ दूर से खूबसूरत दिखती है। याद है जब पिछले साल तुम्हें डेंगू हुआ था? राधिका या तुम्हारी किसी अमीर सहेली ने एक बार फोन करके तुम्हारा हाल तक नहीं पूछा था। मेरी माँ तीन रातों तक सोई नहीं थीं। वो तुम्हारे सिरहाने बैठकर तुम्हारे माथे पर पट्टियां रखती रहीं। बाबूजी रोज़ सुबह मंडी जाकर तुम्हारे लिए ताज़े फल लाते थे ताकि तुम जल्दी ठीक हो सको। क्या वो प्यार, वो समर्पण तुम्हारे इस झूठे दिखावे के आगे इतना सस्ता हो गया?”

निहारिका ने नज़रें चुरा लीं। अनिरुद्ध की बातें सच थीं, और यह सच उसे चुभ रहा था। लेकिन महत्वाकांक्षा का नशा बहुत गहरा होता है। “प्लीज अनिरुद्ध, मुझे इमोशनल ब्लैकमेल मत करो। मुझे पता है माँ-बाबूजी बहुत अच्छे हैं, लेकिन मैं सिर्फ ‘अच्छे लोगों’ के बीच अपनी पूरी ज़िंदगी एक साधारण औरत बनकर नहीं गुज़ारना चाहती। मुझे मेरी पहचान चाहिए, मुझे पैसा चाहिए, मुझे वो सब चाहिए जिसकी मैं हकदार हूँ। तुम मुझे नहीं रोक सकते।” उसने अपना पर्स उठाया और सूटकेस का हैंडल पकड़ कर दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगी। 

अनिरुद्ध ने उसे नहीं रोका। वह बस वहीं खड़ा रहा, एक ऐसे इंसान की तरह जिसने अपनी पूरी दुनिया को अपनी आँखों के सामने ढहते हुए देख लिया हो। निहारिका ने दरवाज़े का हैंडल घुमाया, लेकिन दरवाज़ा खुलने से पहले ही बाहर से किसी ने उसे धकेल कर खोल दिया। सामने अनिरुद्ध की माँ, सुमित्रा जी खड़ी थीं। उनके हाथ में पानी का एक गिलास था, शायद वह रात को पानी पीने उठी थीं।

निहारिका के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सुमित्रा जी की नज़रें पहले निहारिका पर पड़ीं, फिर उसके हाथ में पकड़े सूटकेस पर और अंत में अनिरुद्ध के उतरे हुए चेहरे पर। कमरे में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल था। निहारिका को लगा कि अब सुमित्रा जी उस पर चिल्लाएंगी, उसे ताने मारेंगी, घर के बाकी लोगों को जगा देंगी और एक बड़ा तमाशा होगा। वह अपना बचाव करने के लिए शब्दों को बुनने ही लगी थी कि सुमित्रा जी ने कुछ ऐसा किया जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

सुमित्रा जी चुपचाप कमरे के अंदर आईं। उन्होंने पानी का गिलास टेबल पर रखा और निहारिका के पास जाकर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा। “कहाँ जा रही है मेरी बच्ची इतनी रात को? कोई ज़रूरी काम आ गया क्या ऑफिस का?” उनकी आवाज़ में वही हमेशा वाली मिठास और वात्सल्य था, रत्ती भर भी शक या गुस्सा नहीं। 

निहारिका के होंठ कांपने लगे, वह कुछ बोल नहीं पाई। अनिरुद्ध भी हैरान था। सुमित्रा जी ने निहारिका का हाथ पकड़ा और उसे बिस्तर पर बिठाया। “देख निहारिका, मैं अनपढ़ ज़रूर हूँ, लेकिन एक माँ हूँ। मैं पिछले कई दिनों से देख रही हूँ कि तू परेशान है। किसी से फोन पर छुप-छुप कर बातें करती है, और फिर अकेले में रोती है। मुझे लगा शायद तुझे अपने किसी नए काम के लिए पैसों की ज़रूरत है और तू अनिरुद्ध से मांग नहीं पा रही क्योंकि तुझे पता है कि घर की हालत अभी कैसी है।”

यह कहते हुए सुमित्रा जी ने अपनी साड़ी के पल्लू से बंधी चाबियों का गुच्छा निकाला और अपनी पुरानी अलमारी खोली। उन्होंने उसमें से एक छोटी सी लाल रंग की पोटली निकाली और लाकर निहारिका के हाथों में रख दी। “यह मेरे पुश्तैनी गहने हैं बेटा, और इसमें कुछ पैसे भी हैं जो मैंने इतने सालों में जोड़ कर रखे थे। मुझे नहीं पता कि तुझे किस चीज़ की ज़रूरत है, लेकिन अगर तेरा कोई सपना है, कोई काम है जिसके लिए तुझे यह घर छोड़कर इतनी रात को अकेले जाना पड़ रहा है… तो तू ये ले जा। अपनी ज़िंदगी में कुछ कमी मत रहने देना। बस एक बात याद रखना, बाहर की दुनिया बहुत जालिम है, अगर कभी लगे कि वहाँ तेरा दम घुट रहा है, तो बेझिझक लौट आना। यह घर, यह चौखट और तेरी यह माँ हमेशा तेरे इंतज़ार में रहेंगे।”

पोटली का वज़न निहारिका के हाथों में कम, लेकिन उसकी आत्मा पर पहाड़ जैसा लग रहा था। उसकी आँखों के सामने राधिका की वो झूठी दुनिया, इंस्टाग्राम की वो चमकती तस्वीरें और क्लब की वो महफिलें ताश के पत्तों की तरह ढहने लगीं। उसे अचानक एहसास हुआ कि वह कितनी खोखली दुनिया के पीछे भाग रही थी। जिस सास को वह हमेशा ‘गंवार’ और ‘पुरानी सोच वाली’ समझती थी, आज उसी सास ने बिना कोई सवाल किए, बिना कोई शर्त रखे, अपनी ज़िंदगी भर की पूंजी उसके कदमों में रख दी थी। वह भी सिर्फ इसलिए ताकि उसकी बहू को कोई तकलीफ न हो। 

निहारिका की आँखों से आँसू छलक पड़े। ये आँसू दुख के नहीं, बल्कि उस भयानक पछतावे के थे जो उसके सीने में आग लगा रहे थे। उसने वो लाल पोटली वापस सुमित्रा जी के हाथों में दी और ज़मीन पर बैठकर उनके घुटनों से लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ़ कर दीजिए माँ… मैं बहुत अंधी हो गई थी। मैं वो हीरा छोड़ कर कांच के टुकड़ों के पीछे भाग रही थी। मुझे कहीं नहीं जाना… मेरी असली दुनिया, मेरी असली पहचान यहीं है… आपके चरणों में, इस घर में।”

सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए उसे उठाया और अपने गले से लगा लिया। अनिरुद्ध की आँखों में भी नमी तैर गई थी। उसने देखा कि कैसे एक सच्चे प्रेम और निस्वार्थ त्याग ने एक टूटते हुए घर को बचा लिया था। निहारिका को अब समझ आ गया था कि पैसा और रुतबा इंसान को सुख तो दे सकता है, लेकिन जो सुकून एक परिवार के साथ में, उनके निस्वार्थ प्यार में मिलता है, वो दुनिया के किसी भी बाज़ार में नहीं खरीदा जा सकता। 

उस रात के बाद निहारिका ने कभी उस दिखावे की दुनिया की तरफ मुड़कर नहीं देखा। उसने अपने सपने पूरे किए, लेकिन अपने परिवार के साथ, उनकी नींव पर खड़े होकर। क्योंकि अब वह जान चुकी थी कि सबसे ऊंची उड़ान वही भर सकता है, जिसकी जड़ें ज़मीन से मजबूती से जुड़ी हों।

आपको क्या लगता है, क्या निहारिका को उसके किए के लिए इतनी आसानी से माफ़ कर देना सुमित्रा जी की कमज़ोरी थी या उनकी ममता की सबसे बड़ी ताकत? आपके विचार हमें कमेंट में ज़रूर बताएं।

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मूल लेखिका 

अर्चना खंडेलवाल

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