“नियति क्या ना कराए” – हेमलता गुप्ता

  आज जो मैं कहानी आपको बताने जा रही हूं, वह एक ऐसी मासूम लड़की की है, जो कारावास में उम्र कैद की सजा काट रही है!

जेलर के पद पर मेरी पोस्टिंग कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र की महिला कारावास एवं पुनर्वास केंद्र में हुई थी! मेरे सेवाकाल पूर्ण होने में अभी 4 वर्ष शेष थे! अभी तक मेरा सामना एक से एक खतरनाक कैदियों से हुआ था! कई बार तो उनका वीभत्स चेहरा देखकर मुझे रातों को नींद नहीं आती थी; किंतु आज मेरे लिए यह सब सामान्य था!

कारागार का वातावरण हमेशा एक जैसा नहीं होता—कभी सन्नाटा, कभी अचानक चीखों की गूंज, कभी किसी कैदी का रोना, तो कभी किसी का हँसना… और बीच-बीच में लोहे के गेटों की चरमराहट। यहाँ हर दिन मेरे लिए एक नई फाइल, एक नया चेहरा, एक नई कहानी लेकर आता। पर इन कहानियों में अक्सर अपराध की कठोरता होती—चालाकियाँ, षड्यंत्र, लालच, प्रतिशोध… और कई बार तो ऐसी बेरहमी कि मन विचलित हो जाए।

लेकिन उस दिन… मेरे सामने जो चेहरा था, वह इन सब से अलग था। आज मेरा सामना एक ऐसी कैदी से हुआ जिसकी मासूमियत देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि वह यहां हत्या के जुर्म में उम्र कैद की सजा भुगत रही है! 26 बरस की निहायत खूबसूरत महिला थी वह! उसके चेहरे पर थकान थी, पर वह थकान किसी मजदूरी की नहीं थी—वह थकान किसी टूटे हुए सपने की थी। उसकी आंखों में एक अजीब-सी रिक्तता थी, जैसे वह दुनिया को देख तो रही हो, पर दुनिया उससे छूट चुकी हो।

मेरी आंखों से उसका चेहरा हट ही नहीं रहा था। वह हरदम गुमसुम सी रहती थी! अपनी साथ की कैदियों से भी बातें नहीं करती थी! न झगड़ा, न शिकायत, न दोस्ती—बस एक कोना चुनकर बैठ जाना, और घंटों उसी तरह स्थिर रहना। कभी-कभी तो मुझे लगता जैसे वह किसी अदृश्य दीवार के पीछे जी रही है—जहाँ कोई आवाज़ पहुँचती ही नहीं।

मैंने कई बार उसके मन को कुरेदने की कोशिश की, पर मेरी हर कोशिश नाकामयाब होती नजर आ रही थी! और मेरी जिज्ञासा उसके लिए बढ़ती ही जा रही थी। एक जेलर होने के नाते मेरा काम सिर्फ व्यवस्था रखना नहीं था; इस केंद्र का उद्देश्य “पुनर्वास” भी था। हम चाहकर भी कैदियों के मन को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे। कोई चुप रहता है, तो उसकी चुप्पी के पीछे भी कारण होता है—पछतावा, डर, शर्म, या फिर कोई ऐसा घाव जो बोलने नहीं देता।

मैंने उसे कई बार सामान्य तरीके से पूछा—“तुम ठीक तो हो? कुछ चाहिए? तबीयत?”
वह बस सिर हिला देती। कभी-कभी उसकी पलकों के किनारे नमी भर आती, पर फिर वह नमी भी सूख जाती—मानो आँसू भी थक गए हों।

आखिरकार एक महीने बाद मेरी मेहनत रंग लाई और वो पिघल गई! वह दिन मुझे आज भी साफ याद है। बारिश हुई थी, जेल के गलियारे में सीलन की गंध थी, और खिड़की से बाहर धुंधला-सा आसमान दिख रहा था। मैंने उसे अलग से बैठाया, और इस बार आदेश नहीं, बस एक इंसानी आवाज़ में कहा—“देखो, मैं तुम्हें जज करने नहीं आई। मैं बस तुम्हारी कहानी समझना चाहती हूँ।”

वह कुछ देर चुप रही। फिर बहुत धीमे स्वर में बोली—“समझकर क्या कर लेंगे मैडम… जो होना था हो गया।”
मैंने कहा—“शायद तुम्हारे भीतर जो बोझ है, वह हल्का हो जाए।”
उसने आँखें उठाकर मेरी ओर देखा। उस नजर में न गुस्सा था, न भय—बस एक तरह की थकी हुई सच्चाई थी।

वह यहां अपने पति की हत्या की सजा काट रही थी! किंतु उसे इस बात का जरा भी अफसोस नहीं था!
उसके शब्द सुनकर मैं भीतर तक हिल गई। इतनी मासूम, इतनी शांत—और यह वाक्य इतना कठोर? मैंने संयम रखा, पूछा—“तुम्हारा नाम?”
“अंजलि,” उसने बताया।

अंजलि ने धीरे-धीरे अपने जीवन की परतें खोलनी शुरू कीं। वह मानव से प्यार करती थी! बचपन से ही इकलौती होने के कारण बहुत जिद्दी भी थी! माता पिता उसकी हर जिद्द पूरी करते थे! इनकार शब्द तो उसकी जिंदगी में था ही नहीं। घर में उसे हमेशा “राजकुमारी” की तरह रखा गया था। उसके माता-पिता उसे बहुत मानते थे, बहुत चाहते थे। शायद इसी वजह से उसे यह भी विश्वास हो गया था कि जो वह चाहेगी, वही सही होगा।

मानव से शादी करने के लिए उसके माता-पिता ने उसे बहुत समझाया, क्योंकि मानव सही लड़का नहीं था! उन्होंने उसके बारे में सुना था, कुछ बातें देखी थीं, कुछ लोगों ने बताया भी था। पर अंजलि उसके प्यार में ऐसी पागल हुई कि उसे मानव की हर बुराई भी अच्छाई में नजर आने लगी और उसकी ज़िद के आगे माता-पिता की एक ना चली!

अंजलि बताते-बताते मुस्कुरा भी दी—पर वह मुस्कान खुशियों की नहीं थी; वह मुस्कान किसी पुराने भ्रम की थी। उसने कहा, “मैं सोचती थी—प्यार हो तो आदमी बदल जाता है। मैं बदल दूँगी उसे।”
मुझे लगा, यह वाक्य न जाने कितनी लड़कियाँ अपने जीवन में कहती हैं… और फिर उसी वाक्य की कीमत चुकाती हैं।

उसे इस बात का घमंड भी था कि उसने अपनी पसंद की शादी की है। मानव से शादी करके वह उसके घर आ गई! कुछ दिन तो सब कुछ सही रहा—नए रिश्ते, नई जगह, नए सपने। शुरुआती दिनों में मानव भी ठीक था। वह बाहर लोगों के सामने अच्छा बनता, मुस्कुराता, तारीफ करता। अंजलि को लगता कि उसके माता-पिता गलत थे। वह अपने भीतर ही भीतर यह “जीत” महसूस करती—कि देखो, मैंने सही चुना।

किंतु कुछ समय पश्चात मानव ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया! उससे अंजलि के खर्चे भी बर्दाश्त नहीं हो रहे थे! वह छोटी-छोटी बातों पर ताने देता—“इतने की क्या जरूरत थी? तुम्हें बस शौक चाहिए। तुम्हारे घर वालों ने तुम्हें बिगाड़ दिया है।”
आए दिन दोनों में झगड़ा होता रहता और नौबत मार पीटाई तक आ जाती!

मानव शराब तो पीता ही था, और जो जमा पैसा उसके पास था वह भी लुटा के आ जाता। कभी दोस्तों पर, कभी सट्टे जैसी आदतों पर, और धीरे-धीरे अंजलि समझने लगी कि यह आदमी “घर” नहीं बना सकता। अब वह अंजलि से पीछा छुड़ाना चाहता था! क्योंकि अंजलि उसके लिए अब “खर्च” थी, और वह किसी दूसरी दिशा में अपना मन और पैसा लुटा रहा था।

अंजलि को तलाक देना चाहता था किंतु अंजलि ऐसा नहीं चाहती थी। उसके लिए तलाक सिर्फ रिश्ता खत्म होना नहीं था—उसके लिए यह हार थी, समाज के सामने हार, माता-पिता के सामने हार, और अपने खुद के फैसले की हार। वह खुद को टूटता हुआ नहीं देखना चाहती थी।

कुछ समय बाद अंजलि को पता चला कि मानव किसी और लड़की से प्रेम करता है, और सारा पैसा वही लुटा देता है! यह सच उसके लिए किसी हथौड़े की तरह था। वह दिन-रात सोचने लगी—“मैंने क्या चुना? मैंने किसके लिए घर छोड़ा?”

अब जब भी मानव घर आता अंजलि पर बेतहाशा जुल्म धाता! कभी उसे बेल्टों से मारता, कभी उसे लात घूंसों से! अंजलि भी अब इन सब से थक गई थी! पिता के पास भी वह वापस नहीं जा सकती थी क्योंकि आज उसकी जिद का ही यह परिणाम था। घर लौटती तो सवाल उठते, ताने पड़ते, और सबसे बड़ा डर—माता-पिता का दुख। उसे लगता, “मैंने उनकी बात नहीं मानी, अब कैसे जाऊँ?”

मानव के अत्याचार कम होने का नाम नहीं ले रहे थे! अंजलि ने कई बार उसे प्यार से समझाने की कोशिश की किंतु नतीजा कुछ नहीं निकला, बल्कि मानव इन सब से और चिड़ जाता। अब तो वह अंजलि की शक्ल भी नहीं देखना चाहता था!

अंजलि ने बताया कि कई रातें ऐसी थीं जब वह चुपचाप बाथरूम में जाकर रोती, ताकि पड़ोसी न सुनें। कई सुबहें ऐसी थीं जब वह मेकअप करके चोटों को छुपाती, ताकि लोग सवाल न करें। और कई दिन ऐसे थे जब उसे लगता—“मैं जी रही हूँ या बस सांस ले रही हूँ?”

एक दिन नशे की हालत में मानव ने अंजलि को इतना मारा कि अंजली का सारा आत्मसम्मान ढह गया! उस दिन उसके भीतर कुछ टूट गया—वह “प्यार” जो कभी ढाल था, अब बोझ बन गया। और उसने मानव से बदला लेने का मानस बना लिया। अंजलि के अंदर मानव के प्रति नफरत इस कदर बढ़ गई कि वह उससे छुटकारा पाने के लिए तड़पने लगी!

मैं उसकी बात सुनती रही, पर एक जेलर होने के बावजूद मेरे भीतर की स्त्री काँप उठी। क्योंकि यह सिर्फ अपराध की कहानी नहीं थी—यह यातना की कहानी थी, और उस यातना के भीतर फंसी एक लड़की की कहानी थी।

और ऐसी ही एक भयानक रात में उसने अपने पति का कत्ल कर दिया और उसे यहां कारागार में पहुंचा दिया!
उसने यह वाक्य बिना रोए कहा, बिना हिचकिचाए। जैसे उसने किसी और की कहानी सुनाई हो। पर उसकी आंखों की पुतलियों में हल्का-सा कंपन था—बहुत महीन, बहुत दबा हुआ।

नाजों से पलने वाली आज सलाखों के पीछे अपना जीवन व्यतीत कर रही है! मैं उसके हाथों को देख रही थी—वे हाथ जो कभी कांच की चूड़ियों में सजे होंगे, आज कैदी के कपड़ों में ढके थे। उन हाथों में अब न मेहंदी थी, न कोई आभूषण—बस एक सूनी-सी रेखा, जैसे जीवन ने उसकी खुशियों को मिटा दिया हो।

जेल में आने के बाद अंजलि को पता लगा कि मानव लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फसाकर कर उन्हें आगे बेच देता है! यह सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। अंजलि ने कहा कि यह बात उसे यहाँ दूसरे माध्यमों से, पूछताछ के दौरान और कुछ महिलाओं की बातें सुनकर पता चली। उसे लगा कि वह जिस आदमी को अपना “पति” समझती रही, वह तो एक दरिंदा था।

ऐसे जानवर का खात्मा करके वह अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रही थी, किंतु वह पछता भी रही थी कि काश उसने अपने माता-पिता की बात मानी होती और वह मानव जैसे दरिंदे की कैद में ना आती। किंतु नियति के आगे किसकी चली है!

उसके चेहरे पर एक अजीब-सी दोहरी भाव-रेखा थी—एक तरफ हल्कापन, दूसरी तरफ पछतावा। वह कहती—“मैडम, मैं उसे मारकर बची नहीं… मैं तो अब भी उसी रात में कैद हूँ… बस अब सलाखें बाहर हैं।”

मैं देर तक चुप रही। फिर मैंने बस इतना कहा—“सजा कानून देता है, पर जिंदगी बहुत बड़ी सजा खुद दे देती है।”
अंजलि ने सिर झुका लिया।
मुझे महसूस हुआ कि वह मजबूत दिखती है, पर भीतर से वह भी टूट चुकी है।

मेरी सभी से यही प्रार्थना है कि आवेश में आकर कोई ऐसा कदम ना उठाएं जिसकी सजा उसे जिंदगी भर का दर्द दे दे!
क्योंकि एक पल का आवेश—एक उम्र की कैद बन जाता है।

हेमलता गुप्ता!


पाठकों के लिए सवाल (कमेंट में जरूर लिखें)

  1. क्या आपको लगता है अंजलि का अपराध सिर्फ “अपराध” था, या एक लंबे अत्याचार का विस्फोट?
  2. अंजलि जैसी परिस्थितियों में फंसी महिलाओं के लिए समाज और कानून—क्या सच में समय पर मदद कर पाते हैं?
  3. अगर कोई लड़की गलत रिश्ते में फंस जाए, तो परिवार को उसे “ताने” देने चाहिए या “सहारा” देना चाहिए?

आपकी राय बहुत मायने रखती है—कमेंट में खुलकर लिखिए।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!