सिंदूर का कर्ज  – लतिका श्रीवास्तव

*जब एक औरत पर लगा अपने ही जीजा के साथ अवैध संबंध का घिनौना आरोप, तो उसने अपनी पवित्रता की कसम खाने के बजाय स्वीकार कर लिया वो गुनाह जो उसने किया ही नहीं था। आखिर किस सच को छिपाने के लिए एक भाभी अपनी ही ननद की सुहाग की सेज उजाड़ने को तैयार हो गई?*

“भाभी! अंजलि भाभी, रुकिए!” समीर ने उसका हाथ पकड़ लिया। “ये आप क्या कर रही हैं? आपने इल्जाम अपने सिर क्यों ले लिया? आप जानती हैं कि सच क्या है। बता दीजिये सबको। मेरी वजह से आप अपना घर क्यों बर्बाद कर रही हैं?”

ड्राइंग रूम में पसरा सन्नाटा किसी तूफ़ान के आने से पहले की खामोशी जैसा नहीं था, बल्कि उस तूफ़ान के गुजर जाने के बाद की तबाही जैसा था। फ़र्श पर कांच के टुकड़े बिखरे पड़े थे—शायद किसी फोटो फ्रेम के टूटने से, या शायद उस घर के भरोसे के टूटने से।

कमरे के बीचों-बीच अंजलि खड़ी थी। सिर झुका हुआ, बाल बिखरे हुए, और आँखों में आंसुओं का समंदर जो बहने से इंकार कर रहा था। उसके चारों तरफ उसका अपना परिवार खड़ा था—ससुराल वाले भी और मायके वाले भी। लेकिन आज वो ‘अपना’ परिवार, भीड़ में तब्दील हो चुका था जो उसके चरित्र पर पत्थर मारने को तैयार खड़ा था।

सोफे पर उसकी ननद, नेहा, दहाड़ें मारकर रो रही थी। नेहा की सास उसे संभालने की कोशिश कर रही थी। नेहा के पति, समीर, कोने में खड़े थे, उनका चेहरा शर्मिंदगी और एक अजीब सी बेबसी से झुका हुआ था।

“अंजलि, मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि मैंने अपनी कोख से ऐसी कलंकिनी को जन्म दिया!” अंजलि की माँ ने आगे बढ़कर उसका कन्धा झकझोरा। “अरे, अगर तुझे अपना घर नहीं बसाना था, तो बता देती। कम से कम अपनी ही ननद का घर तो न उजाड़ती। समीर? समीर दामाद हैं इस घर के! तुझे शर्म नहीं आई?”

अंजलि कुछ नहीं बोली। वह बस अपनी हथेलियों को भींचती रही।

तभी उसके पति, प्रशांत, जो अब तक गुस्से में उबल रहा था, ने टेबल पर रखा एक लिफाफा उठाया और अंजलि के मुंह पर दे मारा। लिफाफे से कुछ तस्वीरें निकलकर फ़र्श पर गिर गईं। उन तस्वीरों में अंजलि और समीर थे। कभी किसी पार्क में बेंच पर बैठे हुए, कभी किसी कैफ़े के कोने में गंभीर बातें करते हुए, तो कभी समीर अंजलि के हाथ पर अपना हाथ रखकर रो रहा था।

“अब क्या बचा है बोलने को?” प्रशांत ने चिल्लाते हुए कहा। “सबूत सबके सामने हैं। पिछले छह महीने से तुम दोनों पीठ पीछे ये गुल खिला रहे हो। मैं ऑफिस जाता था और तुम… तुम अपनी ही ननद के पति के साथ रंगरलियां मना रही थी? छी! मुझे तो तुम्हें अपनी पत्नी कहते हुए भी घिन आ रही है।”

नेहा ने रोते हुए सिर उठाया, “भाभी… मैंने आपको माँ का दर्जा दिया था। जब प्रशांत भइया काम में बिजी होते थे, मैं अपनी हर बात आपसे शेयर करती थी। और आपने? आपने मेरे ही सुहाग पर डोरे डाल दिए? समीर जी भोले हैं, आपने ही उन्हें फंसाया होगा। मुझे पता है, आप हमेशा से चाहती थीं कि समीर जी जैसा पति आपको मिले।”

अंजलि ने पहली बार सिर उठाया। उसकी आँखों में एक अजीब सी दृढ़ता थी। उसने समीर की तरफ देखा। समीर कुछ बोलने के लिए आगे बढ़ा, “प्रशांत, तुम गलत समझ रहे हो… अंजलि निर्दोष है…”

“खामोश रहिये आप!” नेहा चीख पड़ी। “अब और झूठ मत बोलिये। इन तस्वीरों के बाद भी आप इसकी तरफदारी कर रहे हैं? इसने मुझ पर क्या जादू कर दिया है?”

अंजलि ने समीर को इशारे से चुप रहने को कहा। उसने एक गहरी सांस ली और प्रशांत की आँखों में देखते हुए बोली, “हाँ… मैं समीर जी से मिलती थी। हम दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं। मैं इस शादी से खुश नहीं हूँ प्रशांत। मुझे तलाक चाहिए।”

यह सुनते ही कमरे में जैसे बिजली गिर गई। प्रशांत की माँ (अंजलि की सास) ने अपना सीना पीट लिया। “हाय राम! ये दिन देखने से पहले मैं मर क्यों नहीं गई? कलयुग आ गया है, घोर कलयुग!”

प्रशांत का हाथ उठा और हवा में ही रुक गया। वह कांप रहा था। “ठीक है… ठीक है। अगर तुम्हें इतनी ही बेशर्मी सवार है, तो अभी इसी वक्त निकल जाओ मेरे घर से। लेकिन याद रखना, तलाक के पेपर्स कोर्ट में मिलेंगे। आज के बाद तुम मेरे लिए मर गई हो।”

नेहा ने अंजलि का हाथ पकड़कर उसे दरवाज़े की तरफ धकेला। “निकल जाओ डायन! मेरे घर से, मेरी ज़िंदगी से दूर हो जाओ।”

अंजलि ने अपना पर्स उठाया। उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह घर से बाहर निकली, जहाँ शाम का अंधेरा गहरा रहा था। लेकिन जैसे ही वह गेट के बाहर पहुंची, समीर दौड़ते हुए बाहर आया।

“भाभी! अंजलि भाभी, रुकिए!” समीर ने उसका हाथ पकड़ लिया। “ये आप क्या कर रही हैं? आपने इल्जाम अपने सिर क्यों ले लिया? आप जानती हैं कि सच क्या है। बता दीजिये सबको। मेरी वजह से आप अपना घर क्यों बर्बाद कर रही हैं?”

अंजलि ने अपनी नम आँखों से समीर को देखा। “समीर जी, नेहा तीन महीने की गर्भवती है। डॉक्टर ने कहा है कि उसकी प्रेगनेंसी बहुत जटिल (complicated) है। थोड़ा सा भी तनाव, थोड़ा सा भी सदमा, उसके और बच्चे दोनों के लिए जानलेवा हो सकता है। अगर उसे सच पता चला, तो वो जी नहीं पाएगी।”

“लेकिन भाभी, इस सच के लिए आपको ‘कुलटा’ कहा जा रहा है। प्रशांत भाई आपको छोड़ देंगे। मैं ये अन्याय नहीं देख सकता,” समीर रो पड़ा।

“आपको देखना होगा समीर जी,” अंजलि ने सख्त आवाज़ में कहा। “आपके पास वक्त कम है। बहुत कम। आप जाइए, नेहा को संभालिये। मेरी चिंता मत कीजिये।”

अंजलि वहां से चली गई और एक सस्ते से होटल में कमरा लेकर रहने लगी।

कहानी असल में वो नहीं थी जो तस्वीरों में दिख रही थी। कहानी की शुरुआत छह महीने पहले हुई थी।

एक दिन अंजलि बाज़ार में थी जब उसने समीर को एक बड़े हॉस्पिटल से निकलते हुए देखा था। समीर बहुत परेशान दिख रहा था। अंजलि ने जब उसे रोका और कुरेदा, तो समीर टूट गया। उसने अंजलि को अपनी रिपोर्ट्स दिखाई थीं।

समीर को ‘फोर्थ स्टेज पैंक्रियाटिक कैंसर’ था। डॉक्टरों ने उसे जवाब दे दिया था। उसके पास मुश्किल से छह-सात महीने बचे थे।

समीर ने अंजलि के पैर पकड़ लिए थे, “भाभी, नेहा प्रेग्नेंट है। अगर उसे पता चला कि मैं मरने वाला हूँ, तो वो इस बच्चे को जन्म देने से पहले ही मर जाएगी। उसका बीपी वैसे ही हाई रहता है। मैं चाहता हूँ कि वो इस बच्चे को जन्म दे दे। मैं अपने बच्चे का चेहरा देखकर मरना चाहता हूँ। प्लीज, किसी को मत बताना।”

उस दिन के बाद से, अंजलि समीर का सहारा बन गई थी। वो तस्वीरें जो प्रशांत ने दिखाई थीं, वो हकीकत का सिर्फ आधा सच थीं। पार्क में समीर दर्द से कराह रहा था और अंजलि उसे ढांढस बंधा रही थी। कैफ़े में वे वकीलों से मिलकर समीर की वसीयत और नेहा के भविष्य के लिए निवेश (investment) प्लान कर रहे थे। जिस फोटो में समीर अंजलि का हाथ पकड़कर रो रहा था, उस दिन डॉक्टर ने कहा था कि कीमोथेरेपी अब असर नहीं कर रही है।

अंजलि, समीर को कीमो के लिए ले जाती थी, उसके लिए दवाइयां लाती थी, और जब उसे दर्द उठता तो उसके पास बैठकर उसे हिम्मत देती थी। यह सब छिपकर हो रहा था ताकि नेहा को पता न चले। अंजलि जानती थी कि समाज क्या सोचेगा, लेकिन एक अजन्मे बच्चे और एक मरते हुए पिता के लिए उसने अपनी इज़्ज़त दांव पर लगा दी थी।

वर्तमान में वापस आते हैं।

अंजलि को घर छोड़े दो महीने बीत चुके थे। वह एक छोटे से स्कूल में पढ़ाने लगी थी। प्रशांत ने तलाक की अर्जी डाल दी थी। नेहा अब आठवें महीने में थी। समीर की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी, लेकिन उसने नेहा के सामने मुस्कुराना नहीं छोड़ा था।

एक रात, प्रशांत के फ़ोन की घंटी बजी। फ़ोन समीर के नंबर से था।

“हेलो?”

दूसरी तरफ से समीर नहीं, कोई और बोल रहा था। “हेलो, क्या आप मिस्टर समीर के रिश्तेदार हैं? उन्हें ‘सिटी हॉस्पिटल’ के आईसीयू में भर्ती कराया गया है। उनकी हालत बहुत नाजुक है।”

प्रशांत और नेहा बदहवास होकर हॉस्पिटल भागे। नेहा का रो-रोकर बुरा हाल था। जब वे हॉस्पिटल पहुंचे, तो डॉक्टर ने उन्हें बाहर ही रोक दिया।

“पेशेंट आखिरी सांसें गिन रहा है। वो किसी ‘अंजलि’ को बुला रहे हैं। कौन है अंजलि?”

प्रशांत का खून खौल उठा। मरते वक्त भी समीर अंजलि को याद कर रहा है? नेहा गुस्से और दुख में अंधी हो गई। “बुलाओ उस औरत को। मैं देखना चाहती हूँ कि उसने मेरे पति पर क्या काला जादू किया है।”

प्रशांत ने अंजलि को फ़ोन किया। अंजलि आधे घंटे में वहां पहुँच गई।

नेहा ने अंजलि को देखते ही थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया, “तुम फिर आ गई? मेरे पति मर रहे हैं और तुम्हें शर्म नहीं आती यहाँ आते हुए?”

तभी आईसीयू का दरवाज़ा खुला। डॉक्टर बाहर आए। उनके हाथ में एक डायरी और एक फ़ोन था।

“सॉरी, हम उन्हें नहीं बचा सके। मिस्टर समीर अब नहीं रहे।”

नेहा पछाड़ खाकर गिर पड़ी। प्रशांत ने उसे संभाला। अंजलि दीवार से टिककर सन्न रह गई। उसकी तपस्या, उसका संघर्ष, सब खत्म हो गया। समीर चला गया।

डॉक्टर ने वह डायरी प्रशांत की तरफ बढ़ाई। “पेशेंट ने कहा था कि उनके जाने के बाद यह डायरी उनकी पत्नी और साले साहब को दी जाए। और हाँ, यह उनका फ़ोन है, इसमें एक वीडियो है जो वो आप सबको दिखाना चाहते थे।”

प्रशांत ने कांपते हाथों से डायरी ली। नेहा को होश आया, तो वह समीर के शरीर से लिपटकर रोने लगी। थोड़ी देर बाद, जब स्थिति थोड़ी शांत हुई, प्रशांत ने समीर का फ़ोन खोला। उसमें एक वीडियो रिकॉर्डिंग थी, जो शायद दो दिन पहले बनाई गई थी। समीर बेहद कमजोर लग रहा था, उसके बाल झड़ चुके थे।

वीडियो में समीर बोल रहा था:

*”नेहा, मेरी जान… अगर तुम यह वीडियो देख रही हो, तो इसका मतलब मैं जा चुका हूँ। मुझे माफ़ करना कि मैंने तुमसे इतना बड़ा झूठ बोला। मुझे माफ़ करना प्रशांत, माँ जी, बाबूजी… मैंने आप सबको अँधेरे में रखा।”*

वीडियो में समीर ने सांस ली और आगे बोला:

*”मुझे कैंसर था। डॉक्टर्स ने छह महीने पहले ही बता दिया था। मैं टूट चुका था। मैं शायद आत्महत्या कर लेता अगर अंजलि भाभी ने मुझे संभाला न होता। आप लोगों ने उन तस्वीरों को देखा, पर उनके पीछे का सच नहीं देखा। भाभी मुझे कीमो के लिए ले जाती थीं। वो मेरे दर्द में मेरे साथ रोती थीं ताकि मैं तुम्हारे सामने हंस सकूँ नेहा। मैंने उनसे कसम ली थी कि जब तक हमारा बच्चा दुनिया में नहीं आ जाता, वो तुम्हें कुछ नहीं बताएंगी।”*

समीर की आँखों से आंसू बह रहे थे।

*”उस दिन जब तुम सब भाभी को चरित्रहीन कह रहे थे, कुलटा कह रहे थे… मेरा दम घुट रहा था। मैं सच बताना चाहता था। लेकिन भाभी ने मुझे कसम दी थी। उन्होंने अपनी इज़्ज़त, अपना घर, अपना पति… सब कुछ कुर्बान कर दिया, सिर्फ इसलिए ताकि नेहा तुम और हमारा बच्चा सुरक्षित रहें। भाभी ने वो गुनाह कबूल किया जो उन्होंने कभी किया ही नहीं था। अंजलि भाभी इंसान नहीं, देवी हैं। मेरे मरने के बाद, प्लीज उनके पैर धोकर पीना… शायद तब मेरे पाप धुल जाएं।”*

वीडियो बंद हो गया।

हॉस्पिटल के उस ठंडे कॉरिडोर में सन्नाटा था। बस नेहा के सिसकने की आवाज़ आ रही थी। प्रशांत के हाथ से फ़ोन छूटकर गिर गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसकी आत्मा को झकझोर दिया हो। जिस औरत को उसने ‘कुलटा’ कहकर घर से निकाला, जिस पत्नी के चरित्र पर उसने कीचड़ उछाला, वो असल में उसकी और उसके परिवार की ढाल बनी खड़ी थी।

प्रशांत धीरे-धीरे अंजलि की तरफ बढ़ा। अंजलि अभी भी शून्य में देख रही थी। प्रशांत उसके पैरों में घुटनों के बल गिर गया।

“अंजलि…” प्रशांत का गला रुंध गया। “मुझे मार डालो अंजलि। मैं माफ़ी के लायक नहीं हूँ। मैंने… मैंने तुम्हें क्या नहीं कहा? मैंने तुम्हारी तपस्या को पाप समझा। मैं अंधा हो गया था।”

अंजलि की सास और ससुर भी सिर झुकाए खड़े थे। नेहा, जो अब तक अंजलि को कोस रही थी, घिसटते हुए अंजलि के पास आई और उसके पैरों में अपना सिर रख दिया।

“भाभी… ओ भाभी… आपने इतना बड़ा ज़हर अकेले कैसे पी लिया? मैं तो आपकी ननद थी, आपकी बहन थी… मैंने आपको डायन कहा… मुझे माफ़ कर दो भाभी।”

अंजलि ने झुककर नेहा को उठाया और गले लगा लिया। अब उसकी आँखों से आंसू बह निकले। वो आंसू जो उसने छह महीने से रोक रखे थे।

“मुझे माफ़ी नहीं चाहिए नेहा। मुझे बस यह वादा चाहिए कि तुम समीर जी की निशानी, अपने बच्चे को बहुत प्यार से पालोगी। समीर जी यही चाहते थे।”

समीर का अंतिम संस्कार हुआ। पूरा शहर उमड़ा था। लेकिन लोगों की ज़ुबान पर समीर की मौत से ज़्यादा चर्चा अंजलि के त्याग की थी।

प्रशांत अंजलि को वापस घर ले आया। लेकिन घर का माहौल अब बदल चुका था। अब अंजलि उस घर की सिर्फ बहू नहीं थी, वो उस घर की ‘गरिमा’ थी। प्रशांत ने अपनी शेष ज़िंदगी अंजलि के उस घाव को भरने में लगा दी जो उसके शब्दों ने दिए थे।

कुछ महीनों बाद, नेहा ने एक स्वस्थ बेटे को जन्म दिया। उसका नाम उसने ‘अंश’ रखा—समीर का अंश। नामकरण संस्कार के दिन, नेहा ने बच्चे को सबसे पहले अंजलि की गोद में दिया।

“भाभी, यह बच्चा सिर्फ़ मेरा और समीर जी का नहीं है। यह आपके त्याग का फल है। आप इसकी ‘यशोदा माँ’ हैं।”

अंजलि ने नन्हे अंश को सीने से लगाया तो उसे लगा कि समीर कहीं आस-पास ही मुस्कुरा रहा है। उसने साबित कर दिया था कि रिश्ते खून से नहीं, ‘एहसास’ और ‘विश्वास’ से बनते हैं। एक औरत जब ठान ले, तो वो परिवार को बचाने के लिए विषपान भी कर सकती है और अमृत भी बरसा सकती है।

**निष्कर्ष:**

सत्य कभी-कभी कड़वा होता है और झूठ की परतें बहुत चमकदार। हम अक्सर आँखों देखी पर विश्वास कर लेते हैं, लेकिन कभी-कभी सच वह होता है जो दिखाई नहीं देता। अंजलि की कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम और त्याग का कोई मोल नहीं होता। एक स्त्री परिवार की नींव होती है, जो चुपचाप सारा भार सहती है ताकि ऊपर की इमारत सुरक्षित रहे।

**अंत में एक सवाल:**

क्या आज के दौर में अंजलि जैसा त्याग संभव है? क्या प्रशांत को बिना सच जाने इतना कठोर कदम उठाना चाहिए था? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

**“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। रिश्तों की गहराई को समझने के लिए और ऐसी ही मार्मिक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**

मूल लेखिका : लतिका श्रीवास्तव

error: Content is protected !!