बहू सिर्फ़ काम करने के लिए नहीं होती – आरती कुशवाहा

सुबह के दस ही बजे थे, पर शर्मा हाउस में शोर ऐसा था जैसे पूरा मुहल्ला जुट आया हो। ड्रॉइंग रूम में बड़े से स्पीकर पर गाने बज रहे थे, किचन में गैस पर एक साथ तीन-तीन बर्तन चढ़े थे, और आँगन में प्लास्टिक की कुर्सियाँ पोंछी जा रही थीं।

“अरे नेहा, जरा जल्दी कर, मेहमान कभी भी आने वाले हैं!”
बड़ी बहू संजना ने गला फाड़कर आवाज़ लगाई।

नेहा ने सिर पर बंधी चुन्नी ठीक की, गैस से उतरा हुआ गरम-गरम गुलाबजामुन का पैंदा स्लैब पर रखा और थककर पास की दीवार से टिक गई। रात के साढ़े बारह बजे तक वह अकेली ही सब्ज़ियाँ काटती, पनीर मेरिनेट करती, फ्रीज़र से आइसक्रीम निकाल-निकाल कर कंटेनर में रखती रही थी। सुबह चार बजे उठकर फिर से तैयारियों में लग गई थी।

आज ससुर जी की साठवीं सालगिरह थी।
संजना दीदी की ससुराल वाले, देवर की ऑफिस के दोस्त, ननद कोमल की सहेलियाँ—all invited.

“भाभी, ये रही गिफ्ट की लिस्ट,” ननद कोमल ने अंदर आते हुए नेहा के हाथ में एक कागज़ थमा दिया,
“जब भी तुम मार्केट जाओ ना, मेरे लिए ये क्लच और हील्स ले आना। पार्टी में सब मुझे ही देखेंगे।”

नेहा ने हल्का-सा मुस्कुराकर लिस्ट थाम ली,
“आज तो फुर्सत ही नहीं मिलेगी, कोमल। कल देखते हैं।”

कोमल ने नाक सिकोड़ ली,
“आपके पास तो कभी फुर्सत होती ही नहीं। बस घर-घर खेलना है आपको। कोई स्टाइल, कोई सोशल लाइफ नहीं। रहने दीजिए, मैं ही ऑनलाइन ऑर्डर कर लूँगी, फिर मत कहिएगा दीदी जी भाभी को कुछ बताती ही नहीं।”

नेहा ने बिना जवाब दिए वापस किचन की तरफ रुख कर लिया।
ससुराल में आए पाँच साल हो गए थे, पर “दीदी” या “भाभी” से ज़्यादा उसे किसी ने “नेहा, ये कर… नेहा, वो कर…” के अलावा पुकारा ही नहीं।

पति विवेक प्राइवेट बैंक में मैनेजर थे, सुबह आठ बजे निकल जाते, रात नौ बजे लौटते।
घर, सास-ससुर, देवरा, ननद—सब की जिम्मेदारी अपने-आप नेहा के हिस्से आ गई थी।

आज भी उसने बिना शिकन दिखाए सब काम संभाल लिया था, पर रात से उठे सिरदर्द ने अब पूरा बदन तोड़ रखा था। आँखों के सामने हल्की-हल्की चक्कर भी आ रहे थे।

“नेहा, गार्डन में गुब्बारे लगा दिए क्या?” सास ममता जी ने झाँककर पूछा,
“और हॉल में टेबल कवर भी बदल देना, ये पुराने वाले ठीक नहीं लगेंगे फ़ोटो में।”

“जी मम्मी जी, अभी लगाती हूँ,” नेहा ने सिर हिलाया और खुद को सँभालते हुए बाहर चली गई।

फोम की सीढ़ी पर चढ़कर जब वह कोने वाले गुब्बारे बाँध रही थी, तभी आँखों के आगे अँधेरा-सा छा गया।
उसने हाथ आगे बढ़ाकर दीवार पकड़ने की कोशिश की, पर पैर फिसला और वह धप से नीचे आ गिरी।

“अरे!” किसी ने चीख मारी।

दौड़ते हुए सब आ गए। नेहा की टांग बुरी तरह मरोड़ खा चुकी थी, माथे पर भी हल्की चोट लग गई थी।

“उठा उसे,” सास ने परेशान होकर कहा,
“कहीं हड्डी-वड्डी तो नहीं टूट गई?”

देवर कार्तिक और विवेक ने मिलकर उसे सोफ़े तक पहुँचाया। डॉक्टर को फोन किया गया।
एक घंटे बाद डॉक्टर ने चेकअप करके कहा,
“अच्छी खासी मोच है। तीन–चार दिन बिलकुल आराम, ज्यादा चलना–फिरना नहीं। पट्टी बाँध दी है, दर्द की दवाई दे दी है। अगर सूजन न उतरे तो एक्स-रे करवा लीजिएगा।”

डॉक्टर गए तो ममता जी ने एक लंबी साँस ली,
“हे भगवान, आज ही के दिन होना था ये सब! इतने मेहमान आने वाले हैं और ये बहू है कि मुसीबत बनकर बैठ गई। अब सब काम कौन करेगा?”

नेहा ने दर्द से कराहते हुए कहा,
“मम्मी जी, मैं धीरे–धीरे कर लूँगी, बस थोड़ा समय दीजिए–”

“नहीं, तुमसे अब कुछ नहीं होगा,” संजना ने झल्लाकर कहा,
“तुम आराम करो, वैसे भी तुम्हारा तो रोज़ का है। कभी माइग्रेन, कभी कमजोरी, कभी कमर दर्द—जब देखो कोई न कोई बहाना!
हम भी तो इंसान हैं, हमें नहीं होता क्या?”

कोमल ने तुरंत समर्थन किया,
“हाँ, भाभी तो वैसे भी घर पर ही रहती हैं, इनको तो आदत है लेटने की। हम तो साल में एक-दो बार ही घर का फुल फंक्शनल काम करते हैं, वो भी इनके नखरे झेलो अलग से।”

नेहा ने जैसे किसी ने दिल पर छींटे मार दिए हों, ऐसे महसूस किया।
“घर पर ही रहती हैं…”
ये वही घर था जहाँ वह रोज़ दस से बारह घंटे खड़े रहकर सबकी जरूरतें पूरी करती थी।

विवेक ने धीमी आवाज़ में कहा,
“दी, नेहा सच में चोट खा गई है, अभी डॉक्टर ने ही कहा—”

“अरे भाई, चोट किसको नहीं लगती?” संजना बोली,
“हम तो छोटे से छोटे दर्द की दवाई लेकर काम करते हैं। तुम उसकी तरफदारी करोगे, तो हम ही बुरी बनेंगे।
चलो, कोमल, केक ऑर्डर के लिए फोन लगाते हैं। भाभी से तो ना सजावट ठीक से करवाई गई, ना कुछ।”

मेहमान आने शुरू हो गए।
मुस्कुराते चेहरों, ताली बजती आवाज़ों और मोबाइल के फ्लैश के बीच, नेहा सोफ़े पर टिककर बैठी थी। उसकी टांग में जलन थी, पर मन में उससे ज्यादा।

सबने आकर ससुर जी को बधाई दी, मिठाई खिलाई, फोटो खिंचवाई।
नेहा के पास कोई लौटा तो बस इतना पूछने—
“अरे क्या हो गया भाभी? गिर पड़ी क्या? संभल कर रहा करो, ये सब तो चलता रहता है।”

किसी ने पानी का गिलास पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा।

दोपहर एक बजे तक नेहा के पेट में चाय के अलावा कुछ नहीं गया था।
डाइनिंग टेबल पर सब लोग खाना खा रहे थे—
“संजना, ज़रा रायता और दे,”
“कोमल, रोटी दे ना, ये तो ठंडी हो गई,”
“मम्मी, दाल बहुत बढ़िया बनी है।”

नेहा ने एक बार विवेक की तरफ देखा।
विवेक भी कुर्सी पर बैठा प्लेट में सब्ज़ी ले रहा था। उसने नज़र मिलते ही हल्का-सा इशारा किया—“थोड़ी देर में तुम्हारे लिए भेजता हूँ।”
लेकिन उस “थोड़ी देर” का कोई वजूद नहीं था।

आख़िर जब सब खा-पीकर उठ गए, बर्तन सिंक में भर गए, गैस बंद हो गई, तब जाकर नेहा उठकर किचन की तरफ लंगड़ाते हुए बढ़ी।
फ्रिज खोला, ठंडी रोटी का एक टुकड़ा और थोड़ी दाल प्लेट में डाली, गैस पर गरम करने लगी।

तभी पीछे से मानो तीर चला,
“अरे वाह!” संजना ने तंज कसा,
“खाना तो ऐसे गर्म कर रही हो जैसे हम सबने तुम्हें खिलाने से मना किया हो। अब अकेले में मज़े से खा लेना, किसी को बुलाने मत लग जाना।”

जवाब देने की ताकत अब नेहा में बची ही नहीं थी।
उसने चुपचाप अपने लिए दाल-रोटी निकाली, एक कोने में बैठकर दो कौर निगले और गले से नीचे उतरने की कोशिश की।

रात को सब मेहमान जा चुके थे।
हॉल में कुर्सियाँ उलटी रखी थीं, टेबल पर पड़े पेपर प्लेट और ग्लास किसी जंग के मैदान जैसे लग रहे थे।

संजना और कोमल दोनों अपने–अपने मोबाइल लेकर कमरे में घुस चुकी थीं।
ममता जी टीवी के सामने बैठकर चैनल बदल रही थीं।

नेहा ने हिम्मत जुटाकर कहा,
“मम्मी जी, बर्तन बहुत हैं, आज रहने दीजिए, कल सुबह कर लूँगी।”

“मैं क्या करूँ?” ममता जी ने बिना देखे उत्तर दिया,
“मैं तो अब बूढ़ी हो गई, मेरे घुटने जवाब दे रहे हैं।
कोई काम रह जाएगा तो कल घर में आने वाली मेड कान पकड़कर सुनाएगी कि ‘इतने पैसे लेते हैं, फिर भी बर्तन छोड़ देते हैं।’
तुम्हें तो वैसे भी नींद नहीं आएगी, कर लो आराम–आराम से।”

नेहा के अंदर कुछ टूट–सा गया।
उसने धीरे से सिंक की तरफ देखा—उसमें लगे प्लेट, गिलास और कड़ाही की परतें वैसे ही चमक रही थीं जैसे दिन भर उसके किए काम को किसी ने देखा ही नहीं।

उसी समय मुख्य दरवाज़ा खुला।
विवेक अंदर आया, चेहरे से थका हुआ, पर आँखों में झुंझलाहट की रेखाएँ साफ थीं।

“इतनी देर कर दी?” ममता जी ने पूछा,
“तुम्हारे पापा तो सो गए, इंतज़ार करते–करते।”

“ऑफिस में काम था, माँ,” विवेक ने संक्षेप में कहा,
“नेहा कहाँ है?”

“वहीं होगी किचन में, जहाँ और कहाँ,” कोमल ने कमरे से चिल्लाकर कहा,
“जाते ही ड्रामा शुरू कर दिया था, अब बर्तन धोकर सुकून मिलेगा इसे।”

विवेक सीधे किचन में गया।
नेहा सिंक के सामने खड़ी थी, एक हाथ में प्लेट, दूसरे में स्क्रबर, टांग पर पट्टी, चेहरा पसीने और आँसुओं से भीगा हुआ।

“नेहा!” उसने झट से उसके हाथ से प्लेट लेकर टेबल पर रखी,
“ये क्या कर रही हो तुम? डॉक्टर ने कहा था न आराम करने को?”

नेहा ने धीरे से कहा,
“आराम करने दूँगे तो करूँगी न। किसी को मेरी तकलीफ दिखाई नहीं दे रही। कोई पूछ रहा है कि मैंने कुछ खाया भी है या नहीं। मेहमानों को खिलाते–खिलाते खुद भूखी रह गई।
अब बर्तन भी मुझसे ही धुलवाएँगे, तो मैं ना कैसे कहूँ, बताओ?”

विवेक के चेहरे की नसें तन गईं,
“माँ ने? दीदी ने? कोमल ने? किसी ने भी नहीं कहा कि तुम बैठ जाओ?”

नेहा की हँसी कड़वाहट में बदल गई,
“दीदी ने तो उल्टा कहा कि ये सब मेरा नाटक है। कोमल कह रही थी मैं घर पर ही रहती हूँ, मुझे तो आदत है काम की।
माँ ने मुझे ही घर की जिम्मेदारी समझ रखा है। जब कभी तुम्हारी बहनें आती हैं, तो कहा जाता है—‘ये तो मेहमान हैं, इनके सामने बहू काम करेगी, तो ही अच्छा लगेगा।’
मेरी तो कोई थकान ही नहीं है इनके लिए।”

विवेक ने एक पल को सिर पकड़ लिया।
उसे अपने बचपन के कई दृश्य याद आने लगे—
जब वह स्कूल से लौटता तो माँ का पहला वाक्य होता,
“अरे, दादी के पैर दबा, बहन के लिए पानी ला।”
पिता कभी–कभी धीरे से कहते,
“बेटा, जो घर बांट सके, वही घर होता है, सिर्फ लेने से नहीं चलता।”
पर अब लगता था जैसे उन्हीं माता–पिता की सीख कहीं धुँधली पड़ गई थी।

वह हॉल में गया।
टीवी पर सास–बहू वाला धारावाहिक चल रहा था।

“माँ,” विवेक ने सख़्त स्वर में कहा,
“आज आपने बहुत गलती की है।”

ममता जी चौंक गईं,
“क्या हुआ? अभी तो सब मेहमानों ने तारीफ की कि कितना अच्छा आयोजन था।”

“आयोजन अच्छा था, लेकिन इंसानियत फेल हो गई,” विवेक ने सीधा जवाब दिया,
“मेरी पत्नी चोट खाकर, पट्टी बाँधकर भी सबके लिए काम करती रही, और आप सबने मिलकर उसे ‘नाटकबाज़’ बता दिया।
सच बताइए, क्या आपने एक बार भी उससे पूछा कि उसने खाना खाया या नहीं?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

संजना कमरे से निकलकर बोली,
“अरे हमने तो सोचा था, खा ही लिया होगा। इतने वक़्त तक किचन में जो रही—”

“किचन में रहना और खुद खाना दो अलग चीज़ें हैं, दीदी,”
विवेक की आवाज़ अब और भी सख़्त हो गई,
“आपके लिए तो घर आना मतलब अपने बच्चों के साथ एंजॉय करना, माँ के हाथ का बना हुआ खाना खाना, फिर सो जाना।
नेहा सुबह से रात तक आपके नाश्ते, आपकी फरमाइशों में लगी रहती है।
आपकी एनिवर्सरी पर पूरा खाना यहाँ से पैक होकर जाता है, बच्चों के बर्थडे पर गिफ्ट भी यहीं से जाते हैं।
कभी आपने सोचा कि उसकी भी जिंदगी है, उसकी भी थकान है?”

कोमल बीच में बोल पड़ी,
“भइया, आप तो भाभी के वकील बन गए! हम भी तो काम करते हैं न, बस दिखाते नहीं—”

“तुम्हारा काम क्या है, कोमल?” विवेक ने सीधा पूछा,
“कभी–कभी आकर दो–तीन सेल्फी लेना, कुछ रील बनाना, माँ के ऊपर दो–चार हुक्म चिल्लाना, और फिर ससुराल लौट जाना?
तुम्हें यह दिखता है कि तुम साल में पाँच–छह बार मायके आती हो,
पर यह नहीं दिखता कि नेहा साल के 365 दिन इसी घर में है,
हर त्योहार, हर फंक्शन में वही सबसे पहले उठती है और सबसे आखिर में सोती है।”

ममता जी बिफर पड़ीं,
“तो अब तू अपनी माँ–बहनों पर ही इल्जाम लगाएगा? बहू ने जरूर बहकाया होगा तुझे!”

“नहीं माँ,” विवेक ने शांत पर दृढ़ स्वर में कहा,
“बहू ने नहीं, आपके व्यवहार ने मुझे सच दिखाया है।
आज से एक फैसला सुन लीजिए—
नेहा अब अपनी क्षमता से ज्यादा काम नहीं करेगी।
जब वो भूखी होगी, पहले खाएगी, फिर किसी को खिलाएगी।
जब वह थकी होगी, तो आराम करेगी, चाहे घर में कितने ही मेहमान क्यों न हों।
और अगर इस बात से आपको दिक्कत है, तो मुझे डर है कि कल को हमारे बच्चे भी आपको इसी तरह नज़रअंदाज़ करना सीख जाएँगे।”

संजना ने ताली बजाने के अंदाज़ में कहा,
“वाह, आज तो बहू ने अच्छी ‘ब्रेनवॉशिंग’ कर दी है। कैसे तुम पर पूरा काबू पा लिया है!”

विवेक ने सीधे उसकी आँखों में देखा,
“काबू प्यार से किया जाता है, दीदी, शोषण से नहीं।
नेहा ने कभी आपको ‘मायके में न रहो’ नहीं कहा,
कभी यह शिकायत नहीं की कि ‘आप हर दूसरे हफ्ते आ जाती हैं।’
पर आज मैंने देख लिया कि जिस इंसान ने इस घर को घर बनाया,
उसी के लिए इस घर में जगह सबसे कम है।”

वह वापस किचन में गया, नेहा का हाथ पकड़ा और बोला,
“चलो, अपने कमरे में। आज से तुम किसी के लिए नहीं, सबसे पहले अपने लिए ज़िम्मेदार हो।
और हाँ, जब तक तुम्हारी टांग पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती, तुम किचन में कदम भी नहीं रखोगी।
ऑर्डर किया हुआ खाना भी आ सकता है, और मेरी अपनी दो हाथ भी काम आ सकते हैं—बस तुम्हारी जिंदगी ऑर्डर पर नहीं चलनी चाहिए, यह बात अब समझ आया है।”

नेहा ने अविश्वास से उसकी तरफ देखा।
उसे लगा जैसे इतने सालों से जिस चट्टान पर वह टिके रहना चाहती थी, वह आज सच में मजबूत हो गई है।

रात देर तक हॉल में फुसफुसाहटें, शिकायतें, ताने चलते रहे।
कभी ममता जी कहतीं—“आजकल के लड़के तो बीवी के हो जाते हैं,”
कभी संजना—“देखना, कल को ये बहू इनको माँ-बाप से दूर कर देगी।”

पर कमरे में, नेहा को बरसों बाद पहली बार यह महसूस हुआ कि शायद वह सिर्फ “सबके काम की” नहीं, किसी के लिए “अपनी” भी है।

कुछ ही हफ्तों में नेहा की टांग ठीक होने लगी।
लेकिन इस बार उसने खुद भी अपने लिए कुछ सीमाएँ तय कर लीं।

सुबह वह सभी के लिए चाय–नाश्ता बनाती,
फिर एक घंटा अपने ऑनलाइन कुकिंग चैनल के लिए वीडियो शूट करती—जिसकी शुरुआत विवेक ने ही उससे कराई थी।
“तुम्हारा खाना सिर्फ इस घर तक क्यों रहे?” उसने कहा था,
“जो मेहनत तुम हर दिन करती हो, उससे तुम्हें अपने लिए भी पहचान बनानी चाहिए।”

धीरे–धीरे नेहा के चैनल के सब्सक्राइबर बढ़ने लगे।
लोग कमेंट में लिखते—
“दीदी, आपकी रेसिपी से पहली बार घर में सब खुश हो गए,”
“आपकी आवाज़ बहुत प्यारी है, ऐसे ही सिखाइए।”

एक दिन संजना अपने मोबाइल पर स्क्रॉल करती हुई बोली,
“अरे, ये तो नेहा की वीडियो है! दो लाख से ज़्यादा लोग देख चुके हैं… वाह रे भाभी, हमें तो पता ही नहीं था कि आप इतनी फेमस हो रही हैं।”

नेहा मुस्कुराई,
“फेमस नहीं दीदी, बस इतना कह सकती हूँ कि अब मेरी भी कोई दुनिया है, जो सिर्फ ‘रसोई’ तक सीमित नहीं।”

ममता जी भी एक दिन दबे स्वर में बोलीं,
“बहू, तेरी एक रेसिपी मैंने पड़ोस वाली कमलेश को भेजी थी, वो कह रही थी खूब तारीफ। अच्छा लगा सुनकर… कि मेरी बहू का नाम हो रहा है।”

नेहा ने भीतर–ही–भीतर भगवान का धन्यवाद किया।
शायद बदलाव एक दिन में नहीं आया था,
पर विवेक के एक फैसले ने एक बात तो साफ़ कर दी थी—

सम्मान भी दो तरफ़ा होना चाहिए,
और संवेदना भी।

वह रात, जब नेहा प्लास्टर चढ़ी टांग लेकर भूखी बैठी थी,
और सब उसे “नाटकबाज़” कहकर निकल गए थे,
एक कड़वा सच बनकर हमेशा उसकी यादों में रहेगा।
पर उसी रात विवेक की वह आवाज़ भी अमिट रहेगी—

“जो इंसान हमारे लिए रात–दिन एक कर देता है,
उसे खाना देने में भी अगर हमें कंजूसी लगे,
तो समझ लो समस्या हमारे संस्कारों में है,
उसकी अपेक्षाओं में नहीं।”

 समाप्त 

आरती कुशवाहा

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