घूँघट

शादी के बाद पहली बार नैना अपने पति के साथ मायके आ रही थी 

नैना की भाभी( मधु)—सुबह से ही बिना रुके दौड़-भाग में लगी थी। चूल्हे पर खीर उबल रही थी, गैस पर कढ़ी चढ़ी थी और बीच-बीच में वह सजावट भी ठीक करती जा रही थी।

उधर, मधु की देवरानी निधि, जो नई-नई ब्याही थी, कमरे में बैठकर आईने में अपना मेकअप ठीक कर रही थी। उसके हाथों में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, चमकदार नेलपेंट और स्टाइलिश कुर्ती थी।  

मधु ने आवाज़ दी—
“निधि, ज़रा गिलास निकाल दो, मेहमानों को पानी देना है।”

निधि बेमन से उठी—
“हाँ भाभी, बस दो मिनट… ये काजल फैल गया है, इसे ठीक कर लूँ।”

मधु ने मुस्कुराकर मन ही मन सोचा—
“अभी बच्ची है, धीरे-धीरे सब सीख जाएगी।”

शाम के करीब चार बजे नैना और उसका पति विक्रम घर में प्रवेश कर गए। घर की औरतें मंगल गीत गाने लगीं। लाल चुनरी ओढ़े नैना शर्माते हुए अंदर आई। माँ—कैलाशवी देवी—ने उसे गले लगा लिया।  

थोड़ी देर बाद शगुन की रस्म शुरू हुई। पंडित जी ने कहा—
“अब बिटिया को घर की बड़ी बहू आरती दिखाएगी।”

मधु जल्दी से आरती का थाल लेकर आई, और नैना के सामने घुमा दिया।
अब अगली रस्म में निधि को थाल लाना था।

कैलाशवी देवी ने कहा—
“अरे निधि, बर्तन की आलमारी से दूसरा थाल ले आ बेटी!”

निधि तेज़ी से उठी, लेकिन उसकी चुन्नी कुर्सी में अटक गई और वह लगभग गिरते-गिरते बची। थाल उसके हाथ से छूटते-छूटते रह गया।
कैलाशवी देवी चिल्लाईं—

“क्या बेढंगापन है ये! एक थाल भी ठीक से नहीं पकड़ा जाता? ऐसी लापरवाही!”

निधि का चेहरा लाल हो गया—
“माँजी… वह चुन्नी कहीं अटक गई थी… इसलिए—”

“चुन्नी संभालनी नहीं आती? हमारी सास के सामने हम लोग सालों तक घूंघट में रहे, पर कभी गिरते नहीं थे! एक तुम हो…!”

कैलाशवी देवी की कड़वी आवाज़ से माहौल में असहजता पनप गई।
नैना ने थोड़ा संकोच से देखा। मधु को बुरा लगा, पर वह चुप रही।

पास में खड़ी कैलाशवी देवी की ननद शशि बोली—
“भाभी , अब कौन जमाना रहा है घूंघट का या इतनी भारी-भरकम चुन्नियों का? टाइम बदल गया है। लड़की गिर जाती तो चोट लग जाती।”

कैलाशवी देवी तुनकमुनाई—
“बस तुम लोगों की बहुओं को बहुत छूट मिली है, इसलिए ये सब होता है।”

शशि ने मुस्कुराते हुए कहा—
“छूट नहीं भाभी … बस बंधन कम किए हैं। हम लोगों की ज़िंदगी में जितना कठोरपन था, क्या वही हम बहुओं पर भी लादें? जिस गलती की पीड़ा हमें मिली, वही हम आगे बढ़ाएँ?”

धीरे-धीरे अन्य औरतें भी सहमत होने लगीं—
“हाँ, अब नया दौर है।”
“बहुओं को थोड़ा आराम, थोड़ी आज़ादी मिलेगी तभी घर में प्रेम रहेगा।”

कैलाशवी देवी चुप तो हो गईं, पर उनके मन में असंतोष की हल्की परतें बन गईं।

शादी की सारी रस्में पूरी हुईं। रात को सबने खाना खाया। हँसी-ठिठोली हुई, पर कैलाशवी देवी का मन कहीं भीतर से भारी हो रहा था।

रात को जब सब सो गए, कैलाशवी देवी बिस्तर पर लेटी हुई थीं। कमरे में हल्की चाँदनी आ रही थी। वे सोचने लगीं—

“क्यों मुझे इतना गुस्सा आया? मैंने तो पूरी जिंदगी नियमों में गुज़ारी… मेरी सास की डांट… मेरे घूंघट… मेरी हर गलती पर इल्ज़ाम… क्या वही सब मैं निधि के साथ भी कर रही हूँ?”

शशि की बात एक-एक शब्द में गूँज रही थी—
“जो तुम्हारे साथ हुआ, क्या वही बहू के साथ भी करोगी?”
उनका दिल भारी हो गया।

अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। शशि अंदर आई।
“क्यों भाभी , नींद नहीं आ रही?”

कैलाशवी ने सिर घुमा लिया—
“सोच रही हूँ… शायद मैं ज़्यादा कठोर हो गई हूँ।”

शशि पास बैठी—
“ भाभी, तुमने बहुत सहा है, बहुत सह कर जीया है। पर अब ज़माना बदल रहा है। अगर हम अपनी बहू-बेटियों पर वही बोझ डालेंगे जो हम ढोते रहे, तो बदलेगा क्या?”

कैलाशवी की आँखें नम हो गईं—
“लेकिन लोग क्या कहेंगे? रिश्तेदार क्या सोचेंगे?”

शशि ने प्यार से कहा—
“कौन से लोग  भाभी? वही जो हमारे दुख में कभी साथ नहीं खड़े हुए? क्या लोग हमारे घर में बहू की ख़ुशी से ज़्यादा जरूरी हैं?”

कैलाशवी ने पहली बार महसूस किया—शायद वे सच में गलत थीं।

अगली सुबह नैना की विदाई भी होनी थी।

निधि चुपचाप अपना काम कर रही थी। उसका चेहरा अब भी शर्म और संकोच से बुझा हुआ था।

तभी शशि एक सुंदर पैकेट लेकर रसोई में आई।
“निधि बेटी, ज़रा इधर आओ।”

निधि हक्की-बक्की रह गई।

शशि ने पैकेट खोला—उसमें एक हल्की, खूबसूरत कुर्ती सेट था।
“आज से बेटा, तुम यही पहनोगी। चुन्नी भी हल्की है, और पहनने में आराम भी रहेगा।”

निधि सकुचाई—
“लेकिन माँजी… क्या कहेंगी…?”

इतने में कैलाशवी देवी भी अंदर आ गईं।
उनकी आवाज़ नरम थी, बिल्कुल अलग—
“हाँ निधि, आज से यही पहनोगी।
और सिर पर बस इतना कपड़ा रखना जितना आरामदेह लगे। गिरने-उलझने का कोई मतलब नहीं। तुम बच्ची हो अभी… धीरे-धीरे सब सीख जाओगी।”

निधि आश्चर्य से उन्हें देखती रह गई। मधु मुस्कुरा उठी।

“जाओ बेटी, पहनकर आओ,” कैलाशवी ने कहा।

निधि जब नई कुर्ती में सामने आई, तो उसकी चाल में आत्मविश्वास की हल्की-सी झलक थी।
पर उसके सिर पर फिर भी चुन्नी आधी से ज्यादा थी।

शशि हँसकर बोली—
“अरे इतना घूंघट क्यों? ये कोई दादी-नानी के जमाने की चुन्नी है?”

कैलाशवी देवी ने पहली बार हल्का मज़ाक किया—
“हाँ… थोड़ा सिर ढक लो, पर इतनी भी नहीं कि दिखे कि तुम कोई भारी जिम्मेदारी उठा रही हो। आराम से रहो।”

निधि ने चुन्नी थोड़ा ऊपर कर ली।
उसे लगा जैसे आज किसी ने उसकी गर्दन से कोई भारी बोझ उतार दिया हो।

दिन बीतते गए।
कैलाशवी देवी धीरे-धीरे बदलीं।
वे अब हर काम में निधि को मार्गदर्शन तो देती थीं, लेकिन डांट, कटाक्ष और ‘हमारे जमाने में’ जैसे संवाद धीरे-धीरे गायब होते गए।

निधि भी घर के काम सीखने लगी। सब्ज़ी काटने से लेकर समोसे बनाने तक, वह सब सलीके से करने लगी थी।
अब वह सिर्फ मेकअप में ही व्यस्त रहने वाली लड़की नहीं रही थी, बल्कि घर की जिम्मेदारी में भी मधु का साथ देने लगी थी।

एक दिन मधु ने कहा—
“निधि, तू अब बहुत कुछ सीख गई है, किसका श्रेय है ये?”

निधि मुस्कुरा दी—
“भाभी, दबाव में नहीं… प्यार से सीखने को मिले तो सब सीख जाता है।”

कैलाशवी देवी पास खड़ी सुन रही थीं।
उनके चेहरे पर एक संतुष्टि की चमक थी।

उस रात कैलाशवी देर तक छत पर बैठीं।
उनकी यादों और आज की बातें एक-दूसरे से मिलती जा रही थीं—

उनके घूंघट का बोझ, सास की डांट, जिम्मेदारियाँ, और अब निधि का हल्का-फुल्का घूंघट, उसकी मुस्कान, उसकी सहजता।

कैलाशवी ने लंबी साँस ली—
“हाँ… बदलाव ही समय की मांग है।”

उन्होंने महसूस किया—
जिस दिन हम यह समझ जाते हैं कि अगली पीढ़ी का सुख हमारे कठोर अनुभवों पर निर्भर नहीं करता, उसी दिन रिश्तों में उजास उतरता है।

उन्होंने धीरे से अपने दिल से पुरानी सोच की परतें उतारीं—
और वहीं से घर की दहलीज़ पर एक नई रोशनी फैल गई।

error: Content is protected !!