पश्चाताप – अपर्णा गर्ग : Moral Stories in Hindi

कमरे की छत से पानी टपक रहा था, ज्योति कभी एक तरफ बर्तन रखती, तो कभी दूसरी ओर… न तो बारिश रूक रही थी और न ही उसके पास और बर्तन बचे थे, जिसे वो टपकते हुए पानी के नीचे लगा दे।

हे भगवान! अब तो रहम करो, कब तक बरसोगे। ऐसा लग रहा हैं कि आज तुमने कसम खा ली हैं कि रोने में ज्योति को हराकर ही छोड़ोगे,”अपने दुपट्टे से आंसू पोंछते हुए ज्योति हंसने लगी।”

“साली मुझ पर हंसती हैं।”, अमन कमरे में आते ही ज्योति पर चप्पल फेंक कर बोला।

मुझे क्या पता तुम आ रहे हो, मैं तो अपनी किस्मत पर हंस रही थी।

मुझसे जबान लड़ाती हैं, और आव देखा ना ताव…घूंसो और लातों से ज्योति को मारने लगा।

ज्योति भी पता नहीं किस मिट्टी की बनी थी,अमन उसे कितना भी मार ले, पर वो जरा भी उफ़ नहीं करती।

ज्यादा नशे में होने के कारण, अमन वही जमीन पर गिरकर सो गया। पानी की बूंदे उसके पैरों पर गिर रही थी, पर उस पर बूंदों का रत्ती भर भी असर नहीं हो रहा था।

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 सुबह होते ही अमन ज्योति के पास आया और कान पकड़कर माफी मांगने लगा, “मुझे माफ कर दे ज्योति, कल थोड़ी ज्यादा ही पी ली थी। इसलिए सब गड़बड़ हो गई।”

 मैं पक्का वादा करता हूं कि आज के बाद मैं शराब को हाथ भी नहीं लगाऊंगा। बहुत तेज भूख लगी हैं। खाना दे दे, फिर काम ढूंढने निकलता हूं।

ज्योति के लिए तो ये रोज का किस्सा था, उसने सिर हिलाकर हामी भर दी।

अमन के जाते ही राधा तुरंत कमरे में आ गई। राधा, ज्योति की हमउम्र सहेली थी।

कल उसने तुझे फिर पीटा…तू उसे छोड़ क्यूं नहीं देती?

नहीं छोड़ सकती…

क्यूं नहीं छोड़ सकती?, तू पढ़ी लिखी हैं, अगर कहीं काम ढूंढने जाएगी तो तुझे काम भी मिल जाएगा। फिर तू इस राक्षस के साथ क्यूं रहती हैं?

मैने अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारी हैं, अपनी अम्मां का दिल दुखाया हैं। दिन रात कपड़े सिलकर, वो मेरा और घर का गुजारा करती थी। वो मुझे टीचर बनाना चाहती थी। हम दोनों अपनी दुनिया में खुश थे।

फिर मेरी जिंदगी में अमन आया, कच्ची जवानी का जोश था, प्यार में बहक गई। अम्मां को सब पता चल गया। उस दिन उन्होंने मुझे बहुत समझाया, पर मैं भी अपनी बात पर अड़ी रही।

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 नतीजा…मैं फेल हो गई। उस दिन पहली बार अम्मां ने मुझे बहुत मारा। मुझे भी बहुत गुस्सा आया और रात में मौका देखकर अमन के साथ भाग आई।

अब किस्मत में यही मारपीट लिखी हैं, तो कहां जाऊं …

जानती हूं, सब जानती हूं, जब तक तू दिन में पच्चीस बार कहानी न सुना ले, तेरा दिन पूरा नहीं होता।

क्या तेरा उनसे मिलने का मन नहीं करता…

क्या मुंह लेकर जाऊं, मैने तो उसे समाज में मुंह दिखाने के काबिल भी न छोड़ा…पता नहीं कैसे उन्होंने सबका सामना किया होगा? मुझे तो उनके पास जाने में डर लगता हैं।

तू पागल हो गई हैं क्या…अपने घर जाने में डर कैसा…तू तो किस्मत वाली हैं कि तेरे पास एक घर और भी हैं। मुझे देख, मेरा तो कोई भी घर नहीं हैं। चल, एक बार फिर भागते हैं…

मतलब…

इस बार मैं और तू, दोनों भागकर अम्मा के पास जाते हैं। मुझे पक्का विश्वास हैं कि वो तुझे माफ कर देंगी।

ज्योति के मन में न जाने क्या आया, और उसने राधा के साथ जाने का मन बना लिया।

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घर के दरवाजे खुले हुए थे, राधा का हाथ पकड़े ज्योति अंदर गई। कमरे से खांसने की आवाज आ रही थी। 

पैरों की आहट सुनकर अम्मा बोली, “तू आ गई ज्योति, मेरा दिल कहता था,तू जरूर आएगी। देख जबसे तू गई हैं, मैने एक दिन भी दरवाजे बंद नहीं किए।” बोलते हुए बीच में ही अम्मा को फिर से खांसी आ गई।

ज्योति भागकर उनके पास गई और उनकी कमर सहलाने लगी। अम्मा मुझे माफ कर दो, मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया है। मैं कसम खाती हूं कि अब कोई गलती नहीं करूंगी।

अम्मा और ज्योति दोनों गले मिलकर रोने लगी। दोनों की आंखों से आंसू मोती बनकर झड़ रहे थे। दूर कोने में खड़ी राधा के मन को सुकून था, कि आज उसने बिछड़ी हुई मां बेटी को मिला दिया।

          स्वरचित एवं अप्रकाशित कहानी, 

                 अपर्णा गर्ग

                     (नोएडा)

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