बचपन का साथी सुहास जब भी पूछता, स्वाति मना कर देती। धीरे धीरे बडे हो गये वे। उसने स्वाति से प्यार-भरे अंदाज में पुछा,
” मेरी प्रिया बनोगी?”
वह चुप रही। पता नहीं उसके मन क्या था। वह क्या चाहती थी?
अपनी पढाई, करिअर बनाने व्यस्त पता ही नहीं चला, सुहास कब उससे दूर चला गया।
आज जब उसने अपना मुकाम पा लिया, अपनी खुशी सुहास के साथ बांटना चाहती थी।
हाथ में नियुक्ति पत्र थामें वह उसके साथ बीते खूबसूरत पलों को याद कर रही थी।
कल ऑफीस जाना है। समय पर पहुंचना होगा।
थोडासा विलंब हो ही गया।
” साॅरी सर, मुझे विलंब हो गया।”
जमीन पर नजरें गढ़ी थी उसकी।
” कोई बात नहीं, पूरानी आदत है आपकी।”
आवाज जानी पहचानी लगी।
नजरें उठाकर देखा, “ओ सुहास तुम, नहीं आप यहां?”
” बैठो आराम से। बोलो, अब तो साथ निभाओगी?”
सच्चे प्यार की सांची झलक से अभिभूत थी वह। अधर खामोश थे। नयन मुखर।
दांपत्य जीवन के सपनों में नवरंग आभा बिखेर रहा था प्यार उसका।
स्वरचित मौलिक कहानी
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र