मां सुमित्रा काकी के पास गई थी… दही लाने…
घर में कहां से होगा…
अनुज ने एक दो बार मां को मना करने की कोशिश की…
लेकिन वह भी जानता था… कि वह नहीं रूकेगी…
इसलिए… वह मां का इंतजार किए बिना ही…
घर से निकल गया…
निकलते हुए ही एक बार जोर से आवाज लगाई…
” मां मैं जा रहा हूं… ट्रेन छूट जाएगी…!”
” अरे रुक जा… अभी आई…!”
पर वह नहीं रुका…
वह जानता था… मां मांगना नहीं छोड़ेगी… और काकी…
कभी एक बार में देती कहां है कुछ…
इसलिए वह नहीं चाहता था… की मां मांगने जाए…
बचपन से देखता आया था…
छोटी-छोटी जरूरत पर… मां झट से कभी सुमित्रा काकी, कभी केतकी काकी, कभी किसी और के पास…
कटोरा लेकर दौड़ लगा देती…
उसे कभी अच्छा नहीं लगा… जब से समझदार हुआ… हजारों बार मां को मना कर चुका था…
“मां छोड़ दो… बिना तेल की सब्जी बना लो…
अरे मां कुछ नहीं है… तो बस आलू बना लो…
वह भी नहीं है तो बस भात दे दो…!”
मगर मां का दिल… बच्चों की खातिर…
कभी किसी के सामने हाथ फैलाने से परहेज नहीं करता था…
पापा की छोटी सी जमीन थी…
उससे उपज ही कितनी थी… की चार बेटियों और एक बेटे का.… अच्छे से गुजारा हो जाए…
किसी तरह चारों बेटियों का कन्यादान तो हो गया…
अब अनुज की पढ़ाई थी…
दूसरों से किताबें लेकर… उधार की यूनिफॉर्म…
मांगे हुए जूते… बैग… बोतल…
इसी तरह मिली थी… अनुज को ग्रेजुएशन तक की डिग्री…
आज पहली बार… वह गांव से बाहर शहर जा रहा था…
प्रतियोगिताओं की तैयारी करने…
बिना दही खाए भला यात्रा होती है…
मां पीछे-पीछे भागती आई…
मंदिर के पास जाकर कहीं अनुज मिला…
” अरे मां… तुम इतनी दूर क्यों चली आई…!”
” बिना शगुन बनाए जाएगा लल्ला… ले दही शक्कर खा ले… तब तो नौकरी लगेगी…!”
” अच्छा मां… मेरी नौकरी लग गई… तब भी क्या तुम मांगने जाओगी… किसी के यहां…!”
” नहीं रे तब क्यों जाऊंगी… मेरे बेटे के रहते… मुझे कुछ कमी ही नहीं होगी…
वैसे भी… तुम हो तो लेती हूं किसी से कुछ…
अकेली मैं और तेरे बाबूजी रहेंगे… तो थोड़े ही मांगूंगी किसी से…!”
बोलते मां की आंखें भर आई…
” जा जल्दी जा… अब देर नहीं हो रही…!”
” नहीं हो रही… तब भी नहीं हो रही थी… बस मुझे तेरा मांगना अच्छा नहीं लगता…!”
” जा जा देर ना हो जाए… एक बार तू कुछ बन तो जा… फिर देखना मेरी ठाठ…!”
बोलकर मां इतराई… तो अनुज हंस पड़ा…
” ठीक है मां… तुम जाओ घर… मैं निकल रहा हूं…!” मां के पैर छू… शगुन बना…
अनुज शहर आ गया…
अनुज बहुत मेहनती लड़का था…
कुछ ही दिनों में उसकी तैयारी रंग लाई…
अपने पहले ही प्रयास में उसने नौकरी प्राप्त कर ली…
दिवाली आने वाली थी…
मां ने घर बुलाया…
” अनुज बेटा… नौकरी के बाद पहली दिवाली है… घर आ जा…!”
” पर मां… अभी तो महीना भी नहीं लगा…
अभी कैसे छुट्टी मिलेगी…
पैसे भी नहीं मिले हैं…!”
” कोई बात नहीं बेटा… एक दिन के लिए आ जा ना…!”
” ठीक है मां… कोशिश करता हूं…!”
अनुज दो दिनों की छुट्टी लेकर… नौकरी के बाद पहली बार… मां से मिलने घर आया…
दिवाली की शाम थी…
घर के बाहर अंधेरा था…
अंदर आया तो घर में केवल तीन दिए जल रहे थे…
एक अंदर… पूजा मंदिर में… एक दरवाजे पर… और एक तुलसी मंदिर में…
अनुज को बहुत आश्चर्य हुआ…
बैग रखकर… सीधा मां पिताजी के पैर छू…
पूजा में शामिल हुआ…
पूजा के बाद… मां खाना बनाने में लग गई… तो अनुज अचंभे से मां के पास गया…
उसके कंधे पर दोनों हाथ रख… प्यार से बोला…
” क्या हुआ मेरी प्यारी मां…
हर बार कम से कम 11 दिए तो जलाती ही थी… इस बार सिर्फ तीन… ऐसा क्यों…?”
मां ने प्यार से बेटे के हाथों पर अपना हाथ रख दिया… उन्हें पड़कर सामने ले आई…
फिर बोली…
” मैंने कहा था ना… एक बार तेरी नौकरी लग गई तो किसी से कुछ नहीं मांगूंगी…
घर में जो पैसे थे… उनसे तो केवल तीन ही दिए जल सकते थे… बाकी सारी तैयारियां भी तो करनी थी…
खाने के लिए भी सब कुछ लाना था…मेरे राजा बेटे की पसंद का…
इसलिए इस बार खुशियों के दीप जला लेते हैं…
अगली बार घी के दिए जलाएंगे…
क्यों ठीक है ना…!”
अनुज का सर अपनी मां के चरणों में मन से झुक गया…
” हां मां जरूर… अगली बार दुनिया को दिखाने की दिवाली होगी…
इस बार तो हमारी अपनी खुशियों की दिवाली है…!”
स्वलिखित
रश्मि झा मिश्रा
खुशियों के दीप…