इडली वाली: – मुकेश कुमार (अनजान लेखक)

क्या यार, कैसी लड़की है ए? ना ढंग के कपड़े पहनती है, ना ढंग से सजती सँवरती है, शरीर देखो उसका? कैसे अदरक जैसा जहाँ तहाँ से शरीर निकल रहा है।

उसकी आँखें तो देखो, कितनी कजरारी और बड़ी हैं।

अगर सही से सजे-धजे और शरीर का वजन घटा ले तो हमारे क्लास की लड़कियों से ज़्यादा खुबसुरत लगेगी।

पता नहीं कैसी लड़की है? दिन भर इडली-साँभर में लगी रहती है।

विशाल बड़बड़ाता हुआ योगेश के पास आया। क्या हुआ भाई? इतना झल्लाया हुआ क्यों है?

क्या यार, छोड़ो। मैं पैसे देने गया था इडली के, वो बोली – सर खुदरा नहीं है, या तो छोड़ जाइए अगली बार कम दिजीएगा या फिर एक इडली और खा लिजीए। यार इडली तो खा लेता, लेकिन थोड़ा मुस्कुरा कर बोलती, थोड़े बन सँवर कर रहती तो ज़्यादा भीड़ लगती न इसके ठेले पर।

तुम इडली खाने आए थे न? हाँ इडली ही खाने आया था। कैसा स्वाद था? यार इसके हाथों में जादू है, क्या ग़ज़ब का साँभर-चटनी बनाती है, मन करता है पुरा पतीला खा जाऊँ।

तो फिर इडली खाने से मतलब रख न, उसके पकड़े और रुप रंग से क्या लेना-देना?

यार वो भाभी भी तो इडली बेचती है न, देख कितने बन सँवर कर आती है, स्वादिष्ट नहीं होने के बावजूद भी लोगों की भीड़ लगी रहती है।


विशाल एक बात बता, तुझे उसके खुबसुरत नहीं दिखने से दिक़्क़त है या मुस्कुरा कर नहीं बेचती उससे दिक़्क़त है?

मुझे किसी से दिक़्क़त नहीं है भाई, मैं चाहता हूँ इसका स्वादिष्ट है तो इसका ज़्यादा बिके।

उसकी फ़िक्र करते देख मुझे अच्छा लगा।

तू जानता है, मैं उसके पास कभी क्यों नहीं जाता?

नहीं, नहीं जानता।

बचपन में वो भी मेरे साथ पढ़ती थी, एक ही स्कूल में, वो अपना टिफ़िन रोज़ हमलोग के साथ सेयर करती थी।

मैं उसका सारा साँभर-चटनी खा जाता था, वो मेरे पराठे खाया करती थी।

स्कूल के बाद जब हमलोग हाईस्कूल गए तो वो वहाँ नहीं थी, उसने कहीं और नाम लिखा लिया।

फिर न ही मैंने उसको देखा और न ही उसने मुझे।

कॉलेज आया तो देखा वो यहाँ ठेला लगाती है, मुझे सामने देख कैसे रिएक्ट करेगी पता नहीं, उसके आत्मसम्मान को ठेस न पहुँचे इसलिए कभी सामने नहीं जाता। वो भी किसी को नज़र उठा कर नहीं देखती।

एक बार उसके मोहल्ले गया था तब पता चला, उसके पिताजी नहीं रहे, इसी वजह से उसने हमारा स्कूल छोड़ कहीं और दाख़िला लिया था। उसके पिताजी का अपना दुकान था, धीरे-धीरे तंगी ने सब ख़त्म कर दिया। पहले उसकी माँ ठेला लगा कर इडली-डोसा बेचती थी, ए साँभर-चटनी का जो स्वाद है न उसे मैं आज भी याद करता हूँ, उसकी माँ ही बनाती है।

उसका छोटा भाई इंजीनियर कर रहा है, उसकी माँ बस स्टैंड के पास ठेला लगाता है और ए हमारे कॉलेज में।

शाम होते ही सारा सामान लूना (पैंडल मार कर स्टार्ट करने वाली मोटरसाइकिल) से घर ले जाती है, दो बार आना पड़ता है इसको, इसका और इसकी माँ का ठेला वहीं पड़ा रहता है कोने में।


तुझे पता है? इसका नाम वैजयन्ती है, ए भी हमारे कॉलेज में पढ़ती है, आर्ट्स ले रखा है इसने, इसका क्लास सुबह से दोपहर तक चलता है, उसके बाद इडली बेचती है, प्रिंसिपल साहब ने इसे छुट दे रखी है।

हमारा क्लास दोपहर के बाद शुरू होता है इसलिए हम इसे क्लास करते कभी नहीं देखते।

क्लास करने के बाद घर जाती है तब अपना ड्रेस बदल लेती है, तू जानता है? अगर इसने अच्छे ड्रेस पहनना शुरू कर दिया और सजने सँवरने लगी तो हर कोई इसको भी घुरता रहेगा जैसे उस भाभी को लोग घुरते रहते हैं।

योगेश, भाई मैं समझ गया तुम्हारी बात, चलो क्लास चलते हैं।

कल फिर से इडली खानें आएँगे।

दूसरे दिन विशाल योगेश को ज़बरदस्ती वैजयन्ती के ठेले के पास ले गया।

आओ योगेश कैसे हो?

ठीक हूँ वैजयन्ती, पहचान लिया तुमने मुझे?

दोस्तों को भी कोई भुलता है क्या? कैसी हो वैजयन्ती? मैं ठीक हूँ, बस थोड़ी मोटी हो गई हूँ।

वो तो तुम जब चाहो वजन घटा सकती हो। हाँ, पढ़ाई पुरी होने के बाद ध्यान दूँगी, तब तक भाई की पढ़ाई भी पुरी हो जाएगी।

तुम इतने दिन क्यों नहीं आए योगेश? बस ऐसी ही वैजयन्ती।

मैं जानती हूँ, तुम सोच रहे थे मैं इडली बेचते हुए शरमा जाऊँगी। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है योगेश, मैं कोई ग़लत काम नहीं कर रही। मैं तुम्हें रोज़ देखती थी दूर खड़े। तुमने एक बार भी मेरी तरफ़ नहीं देखा।

आगे से ऐसी गलती नहीं करूँगा वैजयन्ती।


और हाँ, योगेश तुम भाभी के पास खा कर अपना मुँह का टेस्ट मत बिगाड़ा करो, रोज़ यहीं खाया करो, घबराओ नहीं, मैं पैसे लेने से मना नहीं करूँगी।

यहाँ खाओगे तो पैसे दे देना, और अच्छा स्वाद चाहिए तो घर आओ, रविवार को हम दोनों माँ-बेटी ठेला नहीं लगाते, घर पर ही रहते हैं।

अपने इस ग़ुस्सैल दोस्त को भी लेते आना, मुझे देख कर ग़ुस्सा करता रहता है, एक दिन मैंने सुन लिया था जब ए बुदबुदाते जा रहा था – बेवक़ूफ़ी की भी हद होती है, इतना अच्छा नयन नक़्श और पागलों जैसे कपड़े पहन कर रहती है।

मुकेश कुमार (अनजान लेखक)

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