तेरे मेरे बीच में – डॉ संगीता अग्रवाल: Moral stories in hindi

मयंक,बहुत उदास था आज,रह रह के उसे ये ख्याल परेशान कर रहा था कि वो घरवालों से और चांदनी से कब तक ये बात छुपा पायेगा कि कोरोना के चलते रिसेशन की मार का शिकार वो भी बन चुका था।

अपने घर से वो ठीक टाइम  निकलता और देर शाम घर पहुंच जाता। चांदनी,जिससे उसकी शादी तय हो चुकी थी,जो उसकी धड़कनों में सांसों की तरह बसी थी,उससे भी ये सब न बता पाने से एक अजीब से अपराध बोध से ग्रस्त रहने लगा था।

उस दिन,चांदनी उसे मिली तो बहुत खुश थी,चहकते हुए उसके गले में बाहें डालकर झूल सी गई वो…

“अच्छा बताओ… ,आज क्या हुआ होगा…”वो बोली।

“बताओ न प्लीज,क्यों सस्पेन्स बढ़ा रही हो?”,वो बोला।

“आज मुझे मेरा ड्रीम जॉब मिल गया…अब हम शादी जल्दी कर सकते हैं,वो चहकी …।

चांदनी चौंक गई जब मयंक को उसने उदास देखा और वो उसके पीछे लग गई,ये तुम नहीं,मेरा मयंक तो मेरी छोटी सी बात से इतना खुश हो जाता है,बताओ न क्या बात है,कई दिनों से देख रही हूं तुम बात करते करते कहीं खो जाते हो…।

मयंक भी ज्यादा देर उससे झूठ न बोल पाया और उसने चांदनी को सच्चाई बता दी।

उसकी आशा के विपरीत,चांदनी ने उसपर उस तरह रियेक्ट नहीं किया जैसा वो सोच रहा था,चांदनी बोली:”अरे यार! इसमें टेंशन क्या है,तुम्हे कुकिंग बहुत अच्छी आती है,तुम घर संभालना ,मैं जॉब करूंगी,किसी को तो घर में भी रहना पड़ेगा न”,वो उसे छेड़ते हुए बोली।

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“ये मज़ाक नहीं डिअर…तुम ऐसे मुझे या खुद को तो समझा लोगी लेकिन तुम्हारे पेरेंट्स…उनका क्या?”

मयंक मायूसी से बोला।

“तुम उनकी परवाह न करो,वो मेरी कोई बात टाल नहीं सकते,मैं उनकी इकलौती लाडली बेटी हूं…फिर तुम्हारी एक नौकरी छूटी है,इसका मतलब ये तो नहीं कि अब कहीं लगेगी नहीं…और अगर शादी बाद ये सब होता तब भी क्या मैं तुम्हें….?”

चिल यार…चांदनी मुस्कराई और उसने मयंक को आंख मारी तो मयंक भी मुस्कराए बिना न रह सका।

आखिर वही हुआ जो चांदनी चाहती थी,थोड़े बहुत विरोध के बाद दोनों के पेरेंट्स राजी हो गए और धूमधाम से उनकी शादी हो गई।

शुरू के कुछ दिन मौज मस्ती में कटे,मयंक घर में रहता,चांदनी का पूरा ख्याल रखता,जिद करके ब्रेकफास्ट भी खुद बनाता,लंच बना के देता उसे…।

चांदनी उससे कहती भी कि कुछ घर के काम मुझे भी करने दिया करो पर वो उसे प्यार से टाल देता।मयंक के माँ बाप को भी उसका अपनी पत्नि के प्रति ये अंधा प्यार बुरी तरह खटकने लगा था।वो भी जब तब दबे स्वर,चांदनी को ताने मारते रहते।

उधर,चांदनी, जब भी अपनी माँ के घर जाती,उसकी माँ उससे पूछती:”अब मयंक क्या हमेशा के लिए घर में ही बैठा रहेगा..”

कैसे बात करती हो मां,चांदनी कहती,वो मुझे बहुत प्यार करता है..।

प्यार से पेट नहीं भरता,आज तुम दोनों हो ,कल परिवार बढ़ेगा…मां तिलमिलाने लगी थी।

चांदनी जानती थी कि मयंक कोशिश कर रहा है,पर दोबारा पहले से अच्छा प्लेसमेंट,आज के माहौल में असम्भव सा हो चला था।

कहते हैं न,शादीशुदा लड़की के घर में पेरेंट्स का हस्तक्षेप एक सीमा में ही होना चाहिए,उससे ज्यादा टोकाटाकी उनका घर तुड़वा देती है।

कुछ ये ही हाल मयंक और चांदनी के साथ भी हो रहा था।

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एक तरफ चांदनी की माँ उसे जब तब मयंक के खिलाफ भड़काती रहती,दूसरी तरफ,उसके अपने सास ससुर मयंक को घर के काम करते देख  गुस्सा होते और ये गुस्सा जब तब चांदनी पर उतारते रहते,इन दोनों के बीच मे पिसी चांदनी कब अपने मयंक से दूर होने लगी,पता ही न चला।

हालांकि,उसके पापा,उसे हमेशा ये ही सिखाते कि मयंक बहुत अच्छा,होनहार लड़का है,उससे बना के ही रखना,जब उसकी नौकरी फिर से लगेगी तो सब ठीक हो जाएगा पर चांदनी की माँ अपने पति को भी डपट देती:बस तुम अपनी ही बेटी की खुशी के दुश्मन बने रहना,न कभी मुझे कुछ दे सके जिंदगी में,न बेटी को लेने देना,एक बेरोजगार आदमी से बांध दिया मेरी फूलों जैसे नाजुक बेटी को…।

और फिर वो बिल्कुल चुप जाते।

धीरे धीरे,चांदनी की माँ ने ऐसा विष वृक्ष खड़ा किया उसके मन में कि आये दिन मयंक और चांदनी में झगड़े होने लगे और गुस्से में एक दिन चांदनी अपनी मम्मी के यहां चल दी हमेशा के लिए,मयंक से झगड़ा करके।

बहुत गुस्से में थी वो उस दिन,मयंक उसे अपने प्यार का हवाला देता है रह गया पर उसने उसकी एक न सुनी।वो जानती थी कि मयंक बुरा नहीं है पर उसके मां बाप के तानों और अपनी मां के बढ़ते प्रेशर से उसने ये कदम उठाया था।

और उस दिन एक अनहोनी घट गई,वो अपनी सोच में बढ़ती जा रही थी सड़क पर,कैब लेने के लिए कि पीछे से आ रहे एक ट्रक से घिसट के दूर उछल गई और अपनी एक टांग गंवा बैठी।

हॉस्पिटल में जब उसकी आंख खुली तो मयंक को अपने पास बैठे देखा,वो उसका हाथ अपने हाथ में लेकर सहला रहा था।

दोनों ने आंखों ही आंखों में वादा किया कि अब वो ये गलती नहीं दोहराएंगे,अभी चांदनी को तो अपने पैर के बारे में पता भी न था।

जब मयंक के घर आकर उसे ये पता चला वो बहुत रोई,चीखी,चिल्लाई लेकिन मयंक ने अपने प्यार के मरहम से उसे शांत कर दिया।

लेकिन उन दोनों का परीक्षा का समय खत्म ही होने का नाम न ले रहा था।अब तो चांदनी की नौकरी भी जा चुकी थी।

मयंक के  माँ बाप,उग्र हो चले थे,जब चांदनी कमाती थी तभी शांत नहीं रहते थे वो लोग ,अब तो मयंक उसके दूसरे काम भी करता।

हर वक्त घर में तनातनी रहती,अगर मयंक किसी बात में रो पड़ता ,उसके पापा कहते:”कैसा मर्द है तू,औरतों की तरह टसुए बहा रहा है?”

कभी वो चांदनी को खिलाने में,चलने में सहायता करता दिख जाता तो उसकी माँ उसे जोरू का गुलाम और न जाने क्या क्या कहती।

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हर समय की किचकिच से उन दोनों का प्यार भी  दम तोड़ने लगा था।

चांदनी बार बार उससे कहती:”ज्यादा भारी पड़ती हूँ तो छोड़ दो मेरे मायके मुझे..?”

मयंक को एक छोटी सी नौकरी भी मिल गई थी अब तक,घर,बाहर दोनों जगह का काम करते तंग आ चुका था वो,फिर एक दिन उसने सबके तानों से तंग आकर चांदनी को उसके मां के घर छोड़ ही दिया।

बहुत गुस्से में था वो,”अब रहो यहीं हमेशा…बहुत परेशान करता हूँ न मैं..इतनी ही गैरत है तो फिर कभी न आना लौटकर…”

 

चांदनी की जिंदगी नरक बन गई थी,एक तो अपाहिज़ और दूसरे अपने प्यार से दूर…वो जानती थी जो कुछ भी हुआ उसमें मयंक की गलती बिल्कुल भी नहीं थी,उस जैसा प्यारा पति चिराग ले कर ढूंढने से भी न मिले।

उधर मयंक का भी वो ही हाल था,वो हरवक्त चांदनी को मिस करता,कौन उसका ख्याल रख रहा होगा,वो ठीक से खाना खाती है या नहीं…ये प्रश्न उसे परेशान करते।

आखिर चाँद यानी मयंक अपनी चांदनी से कितने दिनों दूर रहता…पहुंच गया एक दिन फिर से उसे मनाने…।

दोनों अभी ठीक से बात भी न कर पाए थे कि चांदनी की माँ ने उसे जलील कर घर से बाहर कर दिया।

चांदनी के पापा को जब ये बात पता चली उन्हें ये बात बहुत नागवार गुजरी,पर चांदनी की माँ दोनों के अलगाव कराने पर आमादा थीं।

आज चांदनी ने पहली बार अपनी मां के सामने प्रतिरोध किया,आप क्यों मेरी जिंदगी में कांटे बोना चाहती हैं,मियां बीबी में तो झगड़ा हो ही जाता है,मैं अपाहिज़ हो गई फिर भी उसके प्यार में कमी न आई,और क्या चाहती हैं…?

मां भी बिफर गई ये सुनते ही..उसके मां बाप तुझे कोसते हैं,वो भी अच्छी नौकरी मिलते ही तुझे दूध में मक्खी की तरह निकाल फेंकेगा,मैं इन मर्दों की मानसिकता खूब जानती हूं।

मैं तुझे उससे तलाक दिलवा के ही रहूंगी…उसकी माँ चिल्लाई।

तो ठीक है माँ,आप दो तलाकनामे बनवाना,वो शांत स्वर में बोली।

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क्यों,क्या मतलब…,? मां ने उसे आश्चर्य से देखा।

एक आपका और एक मेरा,चांदनी की आवाज़ बहुत ठहरी हुई और गम्भीर थी…।

मेरा क्यों???मां बोली।

आपको भी तो पापा से हरदम शिकायत रहती है,आपने आज तक वो काम क्यों नहीं किया जिसका उपदेश मुझे देती हैं दिनरात…।

कितनी बदतमीज हो गई है तू…मां बिलबिला गई

नहीं माँ,मुझे गलत न समझें,मैं तो मयंक को जितना प्यार करती हूं ,शायद इस जन्म फिर किसी से न कर पाऊं..और वो भी मुझे ऐसे ही करता है…पर आपको तो लगता है सारी मर्द जात से शिकायत है,

मैंने देखा है कि आप पापा को भी हर वक्त बुरा भला कहती रहती हो,मयंक में भी हमेशा आपने बुराई ही ढूंढी,मेरे दिल में उसके लिए खटास भरी…क्यों मां…

और वो फूट फूट के रो पड़ी।

उसकी माँ ,इतने सीधे आरोप सह न सकी…

लगभग चीखते हुए बोली:”हां,मैं हर आदमी से घृणा करती हूं…जब छोटी थी तो मेरा सौतेला बाप,मेरी माँ को पीटता देखा,मेरी माँ ने जैसे तैसे हमें पाला,बचपन से ही मेरी जिंदगी का एक उद्देश्य रहा कि मैं खुद और अपनी संतान(अगर वो बेटी हुई,)किसी मर्द की गुंडागर्दी का शिकार नहीं होने दूंगी…कहते कहते वो हांफने लगी …।

चांदनी,अपनी व्हील चेयर सरकाती उसके पास आई और अपनी माँ को प्यार से पुचकारते हुए बोली:”तो क्या,अपने क्रूर पिता का बदला अपने पति और दामाद से चुकाओगी माँ,ये क्या हो गया है तुम्हें…?

रिश्ते बनाने,फिर तोड़ने बहुत आसान हैं पर उन्हें निभाना ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है,मैंने इतने दिन मयंक से दूर रहना चाहा पर एक क्षण को भी उसे दिल से दूर न कर पाई।

उसके माता पिता भी परेशान हैं बाकी वो भी दिल के बुरे नहीं…मैं जानती हूं।

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उसकी माँ को भी अपनी गलती समझ आ रही थी,वो ये क्या नादानी कर बैठी थी,अपनी ही बेटी का सुखी संसार बर्बाद करने चली थी…

फिर एक दिन,जल्द ही वो चांदनी के ससुराल पहुंच गए,उसके मां बाप,मयंक से माफी मांगी,चांदनी की माँ बहुत शर्मिंदा थीं अपने पिछले व्यवहार को लेकर और उनसे वादा कर रही थीं कि भविष्य में ऐसा बिल्कुल न होगा।

मयंक तो जैसे बेसब्री से इसीका इंतजार कर रहा था,उसके मां बाप भी खुश थे,वो जान चुके थे कि उनके बेटे की खुशी की चाबी चांदनी ही थी…।

 

और फिर जब चांदनी और मयंक अपने कमरे में एक साथ थे,भावुक होते हुए  मयंक उससे बोला:इस बार की अमावस की रात बहुत लंबी थी न,15 दिनों की जगह जैसे 15 बरस लग गए…

चांदनी,उससे लिपटती हुई बोली:”फिक्र न करो मेरे सनम! इस बार की पूनम की रात कभी खत्म न होगी,तुम्हारी चांदनी अब मरते दम तक तुमसे कभी जुदा नहीं होगी…और चांदनी को उसके चाँद से कोई जुदा कर भी न पायेगा।

फिर दोनों एक दूसरे में खो गए….।

 

डॉक्टर संगीता अग्रवाल

1 thought on “तेरे मेरे बीच में – डॉ संगीता अग्रवाल: Moral stories in hindi”

  1. बेटी का घर माँ बरबाद करती है, ये सुनते पढ़ते आये महज किताबी बातें नहीं है ये सच्चाई है माँ ही तोड़ती है बेटी का घर मैने अपने आस पास देखा है ऐसा होते, एक अच्छी शिक्षा प्रद कहानी बधाई संगीताजी व शुभकामनाएं

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