घोंसला –   : Moral Stories in Hindi

“इतनी उदास क्यों बैठी है तू, नीलिमा? लोग तरसते हैं ऐसी जिंदगी के लिए… बड़ा सा फ्लैट, गाड़ी, नौकर-चाकर, हर मौसम में ट्रिप… फिर भी तेरी आँखों में सूनी-सी परछाईं क्यों रहती है?” कॉलेज के जमाने की सहेली पायल ने कॉफी का कप टेबल पर रखते हुए पूछा।

नीलिमा ने हल्की मुस्कान बनाई, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची। कैफे की खिड़की के बाहर सड़क पर ट्रैफिक अपनी रफ्तार में भाग रहा था, और नीलिमा का मन जैसे वहीं कहीं रुका हुआ था।

पायल ने बात जारी रखी, “और सुन, जब पिछले महीने तेरे पापा की तबीयत खराब हुई थी… तूने बताया था कि अद्वैत ने खुद ड्राइवर लेकर उन्हें अस्पताल पहुँचाया, रातभर बैठा रहा। ये छोटी बात नहीं है।”

नीलिमा ने धीरे से सिर हिलाया।

“और तेरे बच्चे… आरव और तानी… उनके स्कूल में परफॉर्मेंस होती है, तो तू कितनी खुशी से उनके लिए कपड़े चुनती है। तूने खुद कहा था कि उन्हें तैयार होते देखकर तुझे अलग-सा सुकून मिलता है।” पायल का चेहरा सच में खुश था, जैसे वह नीलिमा के अंदर की खुशियों की सूची पढ़कर उसे ठीक कर देना चाहती हो।

नीलिमा की उंगलियाँ कप के किनारे से खेल रही थीं। उसने कुछ नहीं कहा।

पायल ने मुस्कुराकर तीर छोड़ा, “और तेरे सास-ससुर… कितने सभ्य हैं। तेरे लिए अलग कमरा, अलग स्पेस, कोई रोक-टोक नहीं। घर के निर्णयों में तेरी राय भी ली जाती है। तू तो किस्मत वाली है।”

नीलिमा का चेहरा एकदम खाली हो गया। उसकी आँखें जैसे कहीं दूर देख रही थीं। फिर अचानक, उसकी आवाज़ निकली—धीमी, पर काँपती हुई—“पायल… तू सच में सोचती है कि सम्मान और आज़ादी सिर्फ़ व्यवस्था से मिलती है? कमरे से? पैसों से? गाड़ियों से?”

पायल थोड़ी घबरा गई। “तो फिर… परेशानी क्या है?”

नीलिमा ने गहरी सांस ली, जैसे वर्षों से भीतर दबा कोई झरना अब रास्ता ढूँढ रहा हो। “तूने कभी किसी ऐसे घर में साँस ली है, जहाँ सब कुछ चमकता हो… पर हवा भारी हो? जहाँ हर चीज़ परफेक्ट दिखती हो… पर भीतर कोई अपना न हो?”

पायल ने चुपचाप उसके हाथ पर हाथ रख दिया।

नीलिमा की आँखें भर आईं। “देख, मेरी शादी जब हुई, लोग कह रहे थे—‘नीलिमा की तो किस्मत खुल गई।’ अद्वैत एक बड़ा बिज़नेस संभालता है, परिवार नामी है, घर शानदार है। और मैं? मैं भी खुश थी। मुझे लगा था कि अब जीवन में साथी मिल गया है—जिसके साथ मैं अपनी सारी बातें बाँट सकूँगी।”

वह कुछ पल रुककर बोली, “लेकिन शादी के बाद मैं धीरे-धीरे समझी… इस घर में मैं ‘नीलिमा’ नहीं हूँ। मैं एक ब्रांड हूँ। एक शोपीस। एक ऐसी तस्वीर जो लोगों को दिखानी है कि ‘हमारे घर की बहू कितनी ग्रेसफुल है।’”

पायल ने आँखें सिकोड़कर पूछा, “ये कैसे?”

नीलिमा ने होंठ भींच लिए। “हर पार्टी में मुझे ऐसे सजाया जाता है जैसे कोई डेकोरेशन पीस। ‘नीलिमा ये पहनना’, ‘नीलिमा ऐसे बैठना’, ‘नीलिमा हँसना’, ‘नीलिमा ज्यादा बोलना नहीं।’”

उसकी आवाज़ में दर्द बढ़ गया। “अद्वैत… वो बुरा नहीं है, पायल। वह जिम्मेदार है, काम में तेज है, परिवार के लिए सब करता है। लेकिन मेरे लिए उसके पास सिर्फ़… ‘फॉर्मैलिटी’ है। जैसे मैं उसकी लाइफ का एक ‘डिपार्टमेंट’ हूँ—घर और इवेंट्स वाला।”

पायल ने हल्के स्वर में कहा, “पर वो तो तुम्हारी केयर करता है…”

“केयर?” नीलिमा हँसी—कड़वी हँसी। “केयर और साथ में फर्क होता है। अस्पताल में ड्राइवर भेजना केयर है। रात को मेरे पास बैठकर पूछना कि मैं अंदर से कैसी हूँ… वो साथ है। और उस साथ के लिए मैं सालों से तरस रही हूँ।”

कप में कॉफी ठंडी हो चुकी थी। नीलिमा की हथेलियाँ भी ठंडी पड़ रही थीं। फिर उसने एक और परत खोली—“तू जानती है, आरव का जन्म हुआ, तो घर में खुशी थी। पर मुझे महसूस हुआ कि मेरी खुशी का भी रंग तय किया जा रहा है। ‘बहू बहुत खुश मत दिखे’, ‘बहू ज्यादा भावुक मत हो’, ‘बहू का वजन बढ़ रहा है, फोटो अच्छी नहीं आएगी।’”

पायल का चेहरा पीला पड़ गया। “ये सब… कौन कहता था?”

“कौन नहीं कहता था?” नीलिमा की आँखों से आँसू निकल आए। “कभी सास की नरम बातों में ताना, कभी ननद के मज़ाक में चोट, कभी अद्वैत की खामोशी में बेरुखी। और सबसे बड़ा—यहाँ एक अदृश्य नियम है—‘तुम्हारी निजी तकलीफें परिवार की इमेज खराब करती हैं।’”

पायल को लगा जैसे उसकी साँसें धीमी हो गई हों। “नीलिमा, ये तो… बहुत भारी है।”

नीलिमा ने सिर झुका लिया। “और सुन, मुझे लिखना पसंद है। कॉलेज में कविता लिखती थी। मैंने सोचा था कि शादी के बाद भी लिखूँगी। पर हर बार जब मैं लैपटॉप खोलती, कोई न कोई कह देता—‘ये सब टाइमपास छोड़ो, लोगों को तुम्हारी लाइफ कैसी लगती है, उस पर ध्यान दो।’”

“अद्वैत ने कभी तुम्हें रोका?” पायल ने पूछा।

“रोकना जरूरी नहीं होता।” नीलिमा ने जवाब दिया। “कभी-कभी चुप्पी भी हथकड़ी बन जाती है। वो कहता नहीं, पर उसकी नज़रें कहती हैं—‘तुम्हारे शौक मेरे शेड्यूल में फिट नहीं होते।’”

कुछ देर बाद नीलिमा की आवाज़ और टूट गई। “सबसे ज्यादा बुरा तब लगा, जब तानी हुई। बेटी होने पर… घर में किसी ने कुछ नहीं कहा खुले में। सब मुस्कुराए, मिठाई बाँटी। लेकिन अगले दिन ननद ने हँसते हुए कहा—‘अगली बार बेटा ही हो, घर का वारिस चाहिए।’ और अद्वैत… वह बस मुस्कुरा दिया। उसने विरोध नहीं किया। बस मुस्कुरा दिया, पायल।”

पायल की आँखें भर आईं। “मैंने सोचा भी नहीं था…”

नीलिमा ने अपने आँसू पोंछे। “मैं भी नहीं सोचती थी कि सबसे ज्यादा चोट किसी की बुराई से नहीं, किसी की चुप्पी से लगती है।”

पायल ने हिम्मत जुटाकर पूछा, “फिर तुम क्या चाहती हो?”

नीलिमा ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा, “मैं कोई महल नहीं चाहती। मैं एक ऐसा घर चाहती हूँ जहाँ मेरा मन सुरक्षित हो। जहाँ मैं बिना सजावट के भी ‘काफी’ रहूँ। मुझे अद्वैत का समय चाहिए—पाँच मिनट नहीं, साथ चाहिए। मुझे यह अहसास चाहिए कि मैं उसकी पार्टनर हूँ, प्रोजेक्ट नहीं।”

पायल ने धीरे से कहा, “ये तो तुम उसे कह सकती हो।”

नीलिमा की आँखों में डर उतर आया। “कहा था मैंने। एक बार। बहुत धीरे से। मैंने बस कहा—‘तुम मेरे साथ बैठो, थोड़ा बातें कर लो।’ उसने फोन स्क्रीन से नजर उठाए बिना कहा—‘मेरे पास अभी बहुत काम है, तुम समझती क्यों नहीं?’”

नीलिमा की आवाज़ काँप गई। “पायल, मुझे उसकी व्यस्तता से शिकायत नहीं है। मुझे उस ‘अनदेखेपन’ से शिकायत है। मैं उसके घर में रहकर भी उसके जीवन से बाहर हूँ।”

पायल ने नीलिमा को कसकर गले लगाया। “तू अकेली नहीं है।”

नीलिमा का बाँध टूट गया। वह रोते-रोते बोलती गई, “लोग कहते हैं—‘कितनी सुखी है, कितना कुछ है।’ पर कोई नहीं पूछता कि मेरे भीतर क्या नहीं है। मेरे पास कपड़े हैं, पर अपनी पसंद नहीं। मेरे पास लोग हैं, पर अपना कोई नहीं। मेरे पास सुविधाएँ हैं, पर सुकून नहीं।”

वह थोड़ी देर बाद खुद को संभालकर बोली, “और सबसे अजीब बात… इस घर में मेरी तकलीफ को भी गिल्ट बना दिया गया है। अगर मैं उदास दिखूँ तो कहा जाता है—‘बहू नखरे कर रही है।’ अगर मैं बोलूँ तो कहा जाता है—‘बहू बदतमीज़ हो गई।’ अगर मैं चुप रहूँ तो कहा जाता है—‘बहू घमंडी है।’”

पायल ने उसके चेहरे को दोनों हाथों से थाम लिया। “नीलिमा, सुन… तुम इंसान हो। तुम्हारे भाव, तुम्हारी जरूरतें जायज़ हैं। तुमको अपने लिए आवाज़ उठानी होगी।”

नीलिमा ने धीमे स्वर में कहा, “मैं लड़ाई नहीं चाहती। मैं बस यह चाहती हूँ कि अद्वैत मुझे देखे। सच में देखे। जैसे कोई आदमी अपनी पत्नी को देखता है—एक इंसान की तरह। मुझे सोने का पिंजरा नहीं चाहिए। मुझे रिश्ते की गर्माहट चाहिए।”

पायल ने कहा, “तो तुम एक बार साफ़-साफ़ बात करो। और अगर फिर भी…?”

नीलिमा की आँखों में पहली बार एक हल्की-सी दृढ़ता आई। “तो फिर मैं अपने बच्चों के लिए एक ऐसी माँ बनूँगी जो खुद टूटकर उन्हें टूटना नहीं सिखाएगी। मैं अपने लिए भी जीना सीखूँगी।”

उसने धीरे से मुस्कुराकर कहा, “मैंने तय किया है—मैं वापस लिखना शुरू करूंगी। मैं अपनी पहचान वापस लूंगी। अगर इस घर में मेरी आवाज़ नहीं सुनी जाती, तो मैं अपनी आवाज़ खुद बनाऊंगी। और अगर मेरे साथ होने का मतलब सिर्फ़ दिखावा है, तो मैं दिखावे के लिए खुद को खत्म नहीं करूंगी।”

पायल ने उसकी हथेली दबाई। “तू मजबूत है, नीलिमा।”

नीलिमा ने सिर हिलाया। “मजबूती अक्सर शोर नहीं करती, पायल। मजबूती बस… धीरे-धीरे खुद को बचाती है।”

कैफे में हल्का-सा संगीत बज रहा था। बाहर ट्रैफिक चल रहा था। भीतर दो सहेलियाँ थीं—एक जो पहली बार सच सुन रही थी, और दूसरी जो पहली बार अपने सच को बिना डर के बोल पा रही थी। नीलिमा ने कॉफी का कप उठाया। अब वह ठंडी थी, पर नीलिमा के भीतर कुछ गर्म होने लगा था—अपने जीवन को फिर से अर्थ देने की आग।

और यही उसकी सीख थी—सुख की परिभाषा महंगे घर से नहीं बनती, सुख बनता है सम्मान, साथ और अपनापन से। जब ये नहीं होते, तब सबसे चमकदार जिंदगी भी भीतर से धुंधली पड़ जाती है।

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