वक़्त के बदलते रिश्ते। – रश्मि सिंह

सुधा-प्रदीप, पंडित जी आ गये है, जाओ बुआ, चाची सब को पूजा के लिये बुला ला।

प्रदीप-बुआ तो मानसी दीदी के यहाँ गयी है और चाची थोड़ी देर में आएँगी।

सुधा-ठीक है, थोड़ा इंतज़ार कर लेते है।

पंडित जी- पूजा का शुभ मुहूर्त आरंभ हो चुका है, इसमें विलंब ठीक नही।

सुधा-ठीक है पंडित जी आप पूजा शुरू कीजिए।

सुधा का पूजा में मन नहीं लग रहा है वो यही सोच रही है कि सब क्या सोच रहे होंगे कि रिश्तेदारों में कोई नही आया है।

सुधा यही सोचते अतीत में पहुँच जाती है जब वो आलोक के साथ विवाह के पवित्र बंधन में बंधी थी, घर की बड़ी बहू थी सासू माँ और सभी ननदों की चहेती। घर में इतनी ख़ुशहाली और संपन्नता थी कि सब हमारे परिवार की एकता की मिसाल देते थे। भाइयों और बहनों का प्यार देखते ही बनता था सब रक्षाबंधन से पहले ही अपने मनपसंद उपहारों की लिस्ट दे देती थी, और ये भी तो अपनी बहनों की हर ख्वाहिश पूरी करने में कहा पीछे थे। साथ ही अपने छोटे भाई की शादी के बाद उनके बच्चों के भी फेवरेट बड़े पापा थे। कुछ भी चाहिए होता था तो बड़े पापा को फ़ोन मिलाया जाता था।

      आलोक ने सभी बहनों को कभी पिता जी की कमी नहीं खलने दी, तीनों बहनों की बेटियों की शादी में भात की रस्म ज़ोरो शोरों से निभायी। पूरा समाज कहते नहीं थकता था कि भई हो तो ऐसा, पर #वक़्त बदलते देर नहीं लगती।

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 जब आलोक को पैरालिसिस अटैक पड़ा था सब बहुत घबरा गये थे। रोज़ मिलने आते थे पर जब डॉक्टर ने कहा कि इन्हें घर ले जाइए घर पर इनकी सेवा कीजिए क्योंकि कुछ कह नहीं सकते कि ये ठीक हो पायेंगे या नहीं। मैंने भी मन में हिम्मत बँधायी कि घरवाले सब साथ है तो जल्दी ही मिलकर इनको ठीक कर देंगे। शुरुआत में तो सबने मदद की फिर सब मौसम की तरह पल भर में बादल गए।

   सबको लगा अब भाईसाहब का सारा पैसा तो इनके इलाज में ही खर्च हो जाएगा, अब तो इनसे कुछ मिलने की उम्मीद नहीं। धीरे धीरे सबने किनारा करना शुरू कर दिया, और कुछ कसर जो रह गई थी वो इनके देहांत ने पूरी कर दी।

पंडित जी-कन्या को बुलाइए।

पंडित जी की आवाज़ सुनकर सुधा चौंक कर वर्तमान में वापस आयी, और प्रीति को लेने उसके कमरे में गई।

प्रीति (अपने पिता की तस्वीर देखते हुए)-पापा अगर शादी में चाचा-चाची नहीं आए तो कन्या दान कौन करेगा। यह कह कहकर वो रोने लगी।

सुधा- बेटा कन्यादान मैं और पापा ही करेंगे, वो हमेशा हमारे आस-पास विद्यमान है। ये कह सुधा ने प्रीति को गले लगा लिया।




पूजा की रस्म समापन की ओर थी, पर रिश्तेदारों में कोई नहीं आया। अगले दिन विवाह था, सुधा अपनी ननद और देवर के यहाँ विनती करने गई कि बिना बाप की बिटिया है तो आप लोग आ जाइएगा। समाज और ससुराल पक्ष वाले भी होंगे वहाँ तो बिटिया की ख़ातिर आ जाइएगा।।

अगले दिन सुधा सुबह से इसी कश्मकश में थी कि ददिहाल पक्ष ही मायने रखता है कोई आएगा या नहीं। विवाह में सिर्फ़ प्रीति के ननिहाल के लोग ही नज़र आ रहे थे। थोड़ी देर में बुआ और चाची भी आयी पर मेहमान की तरह। बारात द्वार पर आती है अब सब द्वारचार के लिये फूफा को बुलाते है, जो सबसे पीछे मेहमानों की क़तार में है प्रीति के मामा ने उन्हें आगे आने को कहा तब मुँह नाक बनाकर द्वारचार किया। प्रीति के ससुराल पक्ष के लोग बातें बना रहे हैं कि ऐसी क्या बात है कि प्रीति के ददिहाल पक्ष के लोग आगे नहीं आ रहे।

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किसी तरह विवाह संपन्न हुआ पर प्रीति ने ये सब देखकर क़सम खायी कि बहुत निभा लिया मम्मी ने ये बेमानी रिश्ता फूफा चाचा से, अब नही। विदाई में सिर्फ़ ननिहाल पक्ष के लोगो से गले लगी और वहाँ उपस्थित सभी के सामने ऐलान किया कि सिर्फ़ यही मेरा परिवार है, क्योंकि परिवार प्यार, सम्मान और विश्वास से बनता है और हर परिस्थिति में डटकर खड़ा रहता है, वक़्त के साथ बदलते रिश्तों को ख़त्म कर देना ही सही है। ये सब सुनकर वहाँ खड़े सभी लोग प्रीति के ससुराल वालों की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करते है।

ये सब सुनकर प्रीति के ससुर जी ने कहा- बिल्कुल सही कहा प्रीति बेटा, कब तक समाज की ख़ातिर  ऐसे बेमानी रिश्तों का बोझ उठाया जाएगा। किसी ना किसी को तो कदम उठाना होगा।

सुधा और प्रदीप आज हल्का महसूस कर रहे थे, उन्हें लग रहा था जैसे किसी झूठे बंधन से मुक्ति मिली हो।

आदरणीय पाठकों,

 हमारे आस-पास भी कई ऐसे उदाहरण होंगे, जो लोक लाज के भय से ऐसे रिश्तों को निभा रहे होंगे। अब और नहीं, ऐसे वक़्त के साथ बदलते रिश्तों को तुरंत पूर्णविराम दिया जाना ही उचित है।

आशा है आप सबको मेरी ये रचना पसंद आयी होगी। आप लोगों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।

स्वरचित।

रश्मि सिंह
#वक़्त

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