शालिनी अपने पिता की चार संतानों में सबसे बड़ी थी। पिता मजदूरी करते और माँ सब्ज़ी का ठेला लगाती थी। गरीबों के बच्चे जल्दी ही बड़े और समझदार हो जाते हैं जिंदगी की पाठशाला उन्हें लोगों की नज़रें और उनकी तासीर पढ़ना अच्छे से सिखा देती है।
शालिनी 10 साल की उम्र में ही चौका चूल्हा संभालने लगी थी क्योंकि अगर माँ घर के काम में ही लगी रहती तो उनके पेट की आग बुझाने के लिए घर का चूल्हा कैसे जलता यह बात उसके बालमन ने बहुत अच्छी तरह से समझ ली थी। इसके साथ साथ वह छोटी बहनों का ध्यान भी रखती और अपने पिता को खाना देने भी जाती थी।
कुदरत ने रूप रंग जी खोलकर लुटाया था उस पर। गोरा रंग, सुतवां नाक, गुलाबी होंठ, लंबे बाल और उम्र के साथ आता हुआ निखार बरबस ही लोगों का ध्यान आकृष्ट करने लगा था।
उसके माता पिता इससे अनजान नहीं थे । उसके अनुरूप वर खोज पाना उनके वश में नहीं था फिर भी वे चाहते थे कि कम से कम ऐसा घर वर मिले कि उनकी बेटी को यहाँ की तरह अभावों में न रहना पड़े। लोगों की बुरी नज़रों से बचाने के लिए 14 साल की उम्र से ही उन्होंने उसके लिए वर की तलाश शुरु कर दी थी।
आखिर एक पारिवारिक मित्र ने उनसे रामलाल के बारे में बात की… सरजू मेरी मानो तो शालिनी बिटिया की शादी रामलाल से कर दो। अभी दो वर्ष पहले ही उसकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया है वो कहते हैं न कि क्वाँरी के भाग्य से ब्याही मरती है शायद हमारी शालिनी के भाग्य में उसी से विवाह करना लिखा हो।
यह क्या कह रहे हो तुम.. उम्र देखी है उसकी शालिनी से दुगनी उम्र का है वह। मैं अपनी बेटी के साथ यह अन्याय कैसे कर सकता हूँ।
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बस उम्र ही तो अधिक है बाकी तो घर द्वार, जमीन जायदाद सब तरह के सुख तो हैं उसके पास। बताओ यह सब ढूँढने के लिए रकम है तुम्हारे पास? वह विवाह का पूरा खर्च उठाने के लिए भी तैयार है। सोच लो भई, मैं तो तुम्हारे भले के लिए ही कह रहा था अब तुम जानो और तुम्हारा काम।
सरजू जहाँ भी रिश्ते की बात करने जाता उसे सब अपने जैसे ही मिलते झोंपड़ी में रहने और मजदूरी करने वाले। जो जरा भी खाते पीते घर के होते वे रिश्ते से ही इंकार कर देते। थक हार कर उसने रामलाल के साथ ही रिश्ता करने का मन बना लिया।
इस तरह शालिनी अपने से दुगनी उम्र के रामलाल के घर की लक्ष्मी बनकर उसके घर आ गई। वह तो फूला नहीं समा रहा था नवयौवना पत्नी को पा कर। कभी कभी शालिनी को भी लगता कि उसके साथ अन्याय हुआ है पर जब कभी वह अभावों भरी अपनी पुरानी जिंदगी से आज की तुलना करती तो अपने को बेहतर स्थिति में पाती। वह अपने जीवन से संतुष्ट हो चली थी।
कुछ दिनों तक तो सब ठीक ठाक चलता रहा पर बाद में रामलाल को अहसास होने लगा कहीं ऐसा तो नहीं शालिनी उसके स्थान पर किसी हमउम्र को अपने पति के रूप में चाहती हो और यहीं से उसके दिमाग में शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा। अब वह किसी से बात भी कर ले तो वह आसमान सर पर उठा लेता। धीरे धीरे वह शराब में डूबने लगा।
यह कोई कमी या बीमारी तो थी नहीं जिसका इलाज़ हो पाता यह एक ऐसा मनगढंत विश्वास था जिसे तोड़ना शालिनी के लिए बहुत कठिन होता जा रहा था। वह खुद भी घुट घुट कर जी रही थी सबसे मिलना बात करना बंद कर दिया था उसने। फिर एक दिन पता चला कि वह माँ बनने वाली है अब उसने अपने होने वाले बच्चे का वास्ता देकर रामलाल से शराब न पीने का संकल्प लिया। रामलाल के मन में भी अपना वारिस होने की तीव्र लालसा थी इस खुश खबरी ने उसके जीवन में नई खुशी का संचार किया।
अब वह शालिनी का बहुत ध्यान रखता और कोई भी ऐसी बात नहीं करता जिससे उसका दिल दुखे और उसका असर उसके होने वाले बच्चे पर पड़े ।
बच्चे की खुशी क्या होती है यह उसने तब जाना जब उसके जीवन में यह बहार आई। जिंदगी ने उसे जीने का नया सबक सिखाया था।
अगर वह अपने माता पिता की मजबूरी को अन्याय मानकर उन्हें दोष देते हुए अपने जीवन को विषाक्त कर लेती तो सुखों की आहट को कभी महसूस कर ही नहीं पाती।
हो सकता है मेरी कहानी बहुत लोगों को पसंद न आये पर अभावों को रात दिन सहने वाले इंसान के मन में सिर्फ उससे मुक्ति का ही ख्याल आता है जो कई बार ऐसी घटनाओं का कारण बन जाता है।
#अन्याय
कमलेश राणा
ग्वालियर