ज़िंदगी की कड़वी चाय – प्रियंका नाथ

सुमित्रा जी से अपनी बेटी की यह हालत देखी नहीं जा रही थी। तभी घर की बड़ी बहू, काव्या, रसोई से बाहर आई। काव्या न सिर्फ इस घर की बहू थी, बल्कि श्रुति की एक बहुत अच्छी दोस्त भी थी।

सुमित्रा जी ने काव्या का हाथ पकड़ा और रुंधे हुए गले से बोलीं, “बहू, तुम ही जाकर श्रुति से कुछ बात करो, उसे समझाओ। मैं कुछ बोलूंगी तो वह फिर से भड़क जाएगी और रोने लगेगी। मुझसे मेरी बच्ची की यह हालत अब और नहीं देखी जाती। 

बाहर काले घने बादल छाए हुए थे और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी, लेकिन घर के अंदर का माहौल बाहर के मौसम से भी ज्यादा उदास और बोझिल था। सुमित्रा जी पिछले कई दिनों से ठीक से सो नहीं पाई थीं।

उनकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे इस बात की गवाही दे रहे थे कि एक माँ का दिल अपनी बेटी को इस तरह टूटता हुआ देखकर किस कदर तड़प रहा था। वे दालान में बेचैनी से टहल रही थीं, बार-बार उनकी नज़रें उस बंद कमरे के दरवाज़े की तरफ उठ जाती थीं, जिसके अंदर उनकी लाडली बेटी श्रुति पिछले पंद्रह दिनों से खुद को कैद किए हुए थी।

श्रुति, जो कभी पूरे घर की रौनक हुआ करती थी, जिसकी खिलखिलाहट से घर का हर कोना गूंजता था, आज एकदम खामोश हो गई थी। वह एक जानी-मानी एडवरटाइजिंग कंपनी में सीनियर क्रिएटिव डायरेक्टर थी। उसकी ज़िंदगी में सब कुछ बेहतरीन चल रहा था। उसका करियर उड़ान भर रहा था

और वह अपने ही ऑफिस में काम करने वाले कबीर से प्यार करती थी। दोनों की सगाई होने वाली थी। लेकिन एक दिन अचानक सब कुछ बिखर गया। कबीर ने न सिर्फ श्रुति के महीनों की मेहनत से बनाए गए एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट को अपने नाम से बॉस के सामने पेश कर दिया,

बल्कि जब श्रुति ने इस धोखे का विरोध किया, तो कबीर ने बड़ी ही चालाकी से ऑफिस के लोगों के सामने श्रुति को ही ‘ईर्ष्यालु’ और ‘मानसिक रूप से अस्थिर’ साबित करने की कोशिश की। हद तो तब हो गई जब उसी दिन कबीर ने श्रुति से सारे रिश्ते तोड़ लिए।

इस दोहरे झटके—प्यार में धोखा और अपने ही टैलेंट की चोरी—ने श्रुति को अंदर तक तोड़ कर रख दिया था। उसे लगने लगा था कि अब वह उस ऑफिस में कभी वापस नहीं जा पाएगी। उसने कंपनी में अपना इस्तीफा मेल कर दिया था, जिसे बॉस ने अभी तक मंजूर नहीं किया था। श्रुति दिन-रात बस उसी धोखे के बारे में सोचती और रोती रहती।

सुमित्रा जी से अपनी बेटी की यह हालत देखी नहीं जा रही थी। तभी घर की बड़ी बहू, काव्या, रसोई से बाहर आई। काव्या न सिर्फ इस घर की बहू थी, बल्कि श्रुति की एक बहुत अच्छी दोस्त भी थी।

सुमित्रा जी ने काव्या का हाथ पकड़ा और रुंधे हुए गले से बोलीं, “बहू, तुम ही जाकर श्रुति से कुछ बात करो, उसे समझाओ। मैं कुछ बोलूंगी तो वह फिर से भड़क जाएगी और रोने लगेगी। मुझसे मेरी बच्ची की यह हालत अब और नहीं देखी जाती। क्या वह उस धोखेबाज़ इंसान के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी, अपना इतना शानदार करियर सब कुछ खत्म कर देगी?” सुमित्रा जी के चेहरे पर बेटी के लिए चिंता और एक गहरी पीड़ा साफ झलक रही थी।

काव्या ने अपनी सास के हाथों को प्यार से सहलाया और उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा, “माँ जी, आप चिंता मत कीजिए। मैं जाती हूँ श्रुति के पास। कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकलेगा। आप जाकर थोड़ा आराम कर लीजिए।”

काव्या वापस रसोई में गई। उसका मन श्रुति की परेशानी का हल खोजने में लगा था। वह जानती थी कि कोरी नसीहतों से श्रुति कुछ नहीं समझेगी। उसे समझाने के लिए शब्दों से ज्यादा किसी ऐसे उदाहरण की ज़रूरत थी जो सीधा उसके दिल और दिमाग पर असर करे।

काव्या ने गैस पर चाय का बर्तन चढ़ाया। पानी उबलने पर उसने उसमें जानबूझकर चायपत्ती की तीन बड़ी चम्मच डाल दीं। उसने चाय को तब तक उबाला जब तक कि उसका रंग एकदम गहरा काला और स्वाद भयंकर कड़वा नहीं हो गया। बिना दूध और नाममात्र की चीनी के उस ‘कड़वी चाय’ को कप में डालकर काव्या श्रुति के कमरे की तरफ बढ़ गई।

कमरे का दरवाज़ा हल्का सा खुला था। अंदर घुप अंधेरा था, पर्दे गिरे हुए थे और श्रुति बिस्तर के एक कोने में घुटनों में सिर दिए बैठी थी। उसके बाल बिखरे हुए थे और आँखें रो-रोकर सूज चुकी थीं। काव्या ने कमरे की लाइट जलाई और श्रुति के पास जाकर बैठ गई।

“श्रुति… लो चाय पी लो। बहुत देर से तुमने कुछ खाया-पीया नहीं है,” काव्या ने वह कप श्रुति की तरफ बढ़ाते हुए बहुत ही कोमल स्वर में कहा।

श्रुति ने बिना कोई सवाल किए एक यंत्र की तरह कप पकड़ा और जैसे ही चाय का एक घूंट अपने गले के नीचे उतारा, उसका चेहरा अजीब सा हो गया। उसने तुरंत मुँह बनाते हुए कप को टेबल पर रख दिया।

“क्या हुआ श्रुति? चाय अच्छी नहीं बनी क्या?” काव्या ने अनजान बनते हुए पूछा।

श्रुति ने खांसते हुए कहा, “भाभी, यह क्या बना दिया आपने? इसमें चायपत्ती इतनी ज्यादा उबल गई है कि यह ज़हर की तरह कड़वी हो गई है। यह तो पी ही नहीं जा रही।”

काव्या ने तुरंत कप उठाते हुए कहा, “ओह! मुझे माफ करना। लाओ, यह कप मुझे दे दो, मैं इसे सिंक में फेंक देती हूँ और तुम्हारे लिए दूसरी चाय बनाकर लाती हूँ।”

जैसे ही काव्या कप लेकर उठने लगी, श्रुति ने उसका हाथ पकड़ लिया। “अरे नहीं भाभी, फेंकने की क्या ज़रूरत है? इतनी सी बात के लिए पूरी चाय क्यों बर्बाद करनी। बस यह थोड़ी कड़वी ही तो है, आप इसमें थोड़ा सा दूध और एक चम्मच चीनी और मिला दीजिए, तो यह बिल्कुल ठीक हो जाएगी और इसका कड़वापन भी दब जाएगा।”

काव्या के चेहरे पर एक हल्की सी, लेकिन गहरी मुस्कान तैर गई। वह वापस बिस्तर पर बैठ गई और श्रुति की आँखों में आँखें डालते हुए बोली, “बिल्कुल सही कहा तुमने श्रुति। पूरी चाय फेंकने की ज़रूरत नहीं है। और यही बात मैं तुम्हें समझाना चाहती थी।”

श्रुति कुछ समझ नहीं पाई, “मतलब? मैं कुछ समझी नहीं भाभी।”

काव्या ने उस चाय के कप को हाथ में लेकर कहा, “ध्यान से सुनो श्रुति। यह जो प्याले में पानी है न, यह तुम्हारा पूरा जीवन है, तुम्हारा करियर, तुम्हारी शख्सियत है। और इसमें जो मैंने ज़रूरत से ज्यादा चायपत्ती उबाल दी, वह तुम्हारे अतीत का बुरा अनुभव है, कबीर का वो धोखा है। अब एक बार जब चायपत्ती पानी में उबल कर अपना रंग और कड़वाहट छोड़ चुकी है, तो क्या तुम उस कड़वाहट को पानी से बाहर खींच कर निकाल सकती हो?”

श्रुति ने धीरे से सिर ‘ना’ में हिलाया।

काव्या ने आगे कहा, “बिल्कुल वैसे ही, जो बुरा अनुभव तुम्हारी ज़िंदगी में घट चुका है, कबीर ने जो भी तुम्हारे साथ किया, उस कड़वे सच को अब तुम अपनी ज़िंदगी से मिटा नहीं सकती। वह जो होना था, हो चुका। वो बुरा अनुभव भी अब तुम्हारे जीवन का एक हिस्सा बन चुका है। लेकिन जिस तरह हम इस कड़वी चाय को फेंकने के बजाय इसमें थोड़ी और चीनी और दूध घोलकर इसका स्वाद बदल सकते हैं, इसे पीने लायक, बल्कि और भी स्वादिष्ट बना सकते हैं… ठीक वैसे ही जीवन में मिले बुरे अनुभवों की कड़वाहट को कम करने के लिए हमें उसमें नए अनुभवों, नई सफलताओं और नई मीठी यादों की चीनी घोलनी पड़ती है।”

श्रुति खामोशी से अपनी भाभी की बातें सुन रही थी। काव्या ने श्रुति का हाथ अपने हाथ में लिया और प्यार से सहलाते हुए कहा, “श्रुति, जीवन में अक्सर हम अतीत की बुरी बातों, किसी के दिए हुए धोखे या बुरी यादों को सोच-सोच कर इतने दुखी हो जाते हैं कि हम उस ‘कड़वाहट’ के चक्कर में अपनी ज़िंदगी का पूरा कप ही फेंक देना चाहते हैं। इस तरह हम अपने वर्तमान पर ध्यान नहीं दे पाते और कहीं न कहीं अपना वह सुनहरा भविष्य बिगाड़ लेते हैं जिसे हमने अपनी सालों की मेहनत से संवारा था। जो हो चुका, उसे बदला या मिटाया नहीं जा सकता। लेकिन उसे पीछे छोड़कर नई और मीठी यादें तो बनाई जा सकती हैं न? जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, वैसे ही ज़िंदगी को देखने के भी दो नज़रिये होते हैं—सकारात्मक और नकारात्मक। कबीर ने तुम्हारे साथ बुरा किया, यह नकारात्मक पहलू था, लेकिन इस धोखे ने तुम्हें शादी से पहले ही उस इंसान की असलियत दिखा दी, यह तुम्हारी ज़िंदगी का सकारात्मक पहलू है। अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम किस नज़रिये को चुनकर अपना आगे का जीवन जीती हो।”

श्रुति की आँखों में एक बार फिर आँसू आ गए, लेकिन इस बार ये आँसू हार के नहीं थे। उसने काव्या के कंधे पर सिर रख दिया और सिसकते हुए बोली, “लेकिन भाभी, मैं उस ऑफिस में वापस कैसे जाऊँ? मैं कबीर का सामना कैसे करूँगी? मुझे तो उसे देखकर ही घबराहट होती है। लोग मेरे बारे में क्या बातें कर रहे होंगे? मैं उसके साथ एक ही ऑफिस की छत के नीचे काम नहीं कर सकती।”

काव्या ने श्रुति का चेहरा ऊपर उठाया और बड़ी ही दृढ़ता के साथ कहा, “क्यों नहीं कर सकती तुम? श्रुति, चोरी तुमने नहीं की है, टैलेंट तुम्हारा चोरी हुआ है। धोखा तुमने नहीं दिया है, धोखा तुम्हें मिला है। जब तुम्हारी कोई गलती ही नहीं है, तो तुम नज़रें क्यों चुराओगी? छिपना तो उसे चाहिए जिसने गुनाह किया है। अगर तुम इस्तीफा देकर घर बैठ जाओगी, तो यह उसकी जीत और तुम्हारी हार होगी। उसे लगेगा कि उसने तुम्हें तोड़ दिया। देखने दो उसे भी और पूरी दुनिया को भी कि तुम इतनी कमज़ोर नहीं हो कि एक धोखेबाज़ इंसान की वजह से अपना शानदार करियर और अपना वजूद खत्म कर दो। तुम अपने टैलेंट के दम पर आज उस कुर्सी पर बैठी हो, किसी की मेहरबानी से नहीं।”

काव्या ने थोड़ा रुककर कमरे के दरवाज़े की तरफ इशारा किया जहाँ सुमित्रा जी छुपकर सब सुन रही थीं, “और अगर तुम्हें अपने लिए हिम्मत नहीं मिल रही है, तो कम से कम बाहर जाकर अपनी माँ को देखो। तुम्हें इस तरह टूटता और परेशान देखकर मम्मी जी भी अंदर ही अंदर घुट रही हैं। उन्होंने तुम्हें इतनी मेहनत से पढ़ा-लिखा कर एक आज़ाद और मज़बूत लड़की बनाया था, ताकि तुम दुनिया का सामना कर सको, इसलिए नहीं कि कोई भी ऐरा-गैरा इंसान आकर तुम्हें तोड़ दे और तुम हार मान कर बैठ जाओ। अपने लिए न सही, तो कम से कम उनके उस प्यार और त्याग के लिए अपने आप को इस दर्द और डिप्रेशन से बाहर निकालो श्रुति।”

काव्या के उन शब्दों ने जैसे श्रुति के अंदर सोई हुई उस शेरनी को फिर से जगा दिया था जो पिछले पंद्रह दिनों से मायूसी की चादर ओढ़े पड़ी थी। उसे अपनी भाभी की एक-एक बात शीशे की तरह साफ नज़र आ रही थी। उसने अपनी माँ के दर्द को महसूस किया और कबीर के उस क्रूर चेहरे को याद किया जिसने उसे नीचा दिखाने की कोशिश की थी। श्रुति ने अपने आँसू पोंछे, एक गहरी साँस ली और अपनी भाभी के गले लग गई।

“आप सही कह रही हैं भाभी। मैं उस इंसान को इतनी आसानी से जीतने नहीं दूँगी। यह मेरी ज़िंदगी है और इसकी मिठास मैं खुद तय करूँगी।”

उस रात घर का माहौल बदला हुआ था। श्रुति ने पंद्रह दिनों बाद परिवार के साथ बैठकर खाना खाया। सुमित्रा जी की आँखों में आज सुकून के आँसू थे। उन्होंने अपनी बहू काव्या को मन ही मन ढेरों दुआएं दीं जिसने एक साधारण से चाय के कप से उनकी बेटी की ज़िंदगी का नज़रिया ही बदल कर रख दिया था।

अगले दिन की सुबह घर में एक अलग ही ऊर्जा लेकर आई। श्रुति ने अपनी अलमारी से अपना सबसे बेहतरीन और कॉन्फिडेंट दिखने वाला नेवी-ब्लू पैंट-सूट निकाला। उसने अपने बालों को सलीके से बांधा, हल्का सा मेकअप किया और आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा। आज उस आईने में उसे एक टूटी हुई लड़की नहीं, बल्कि एक मज़बूत और निडर महिला नज़र आ रही थी।

वह अपना लैपटॉप बैग लेकर डाइनिंग टेबल के पास आई। काव्या वहाँ नाश्ता लगा रही थी। श्रुति ने एक बड़ी सी मुस्कान के साथ कहा, “भाभी, मेरा लंच पैक कर दिया आपने? आज ऑफिस में एक बहुत इंपॉर्टेंट मीटिंग है और मुझे अपनी नई प्रेजेंटेशन दिखानी है।”

काव्या ने प्यार से श्रुति का माथा चूमा और उसका टिफिन उसके हाथ में थमाते हुए बोली, “ऑल द बेस्ट! आज उन्हें दिखा देना कि तुम क्या हो।”

सुमित्रा जी ने अपनी बेटी को दही-चीनी खिलाई। श्रुति आज पूरे आत्मविश्वास और एक नई चमक के साथ ऑफिस जाने के लिए दरवाज़े से बाहर निकल पड़ी। उसे पता था कि आगे का रास्ता आसान नहीं होगा, कबीर का सामना करना मुश्किल होगा, लेकिन अब वह जान चुकी थी कि अपनी ज़िंदगी की कड़वाहट को अपनी सफलता की मिठास से कैसे दूर करना है।


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 लेखिका : प्रियंका नाथ

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