“सुनो जी,शिप्रा पांच बजे तक पहुंच जाएगी तो उसकी पसंद की प्याज़ की कचौड़ियां आ और गुड़ वाला हलवा याद से ले आए थे ना आप”,रीमा जी ने घड़ी में देखते हुए अपने पति रमाकांत जी से कहा।
“तुमने मुझसे कब कहा यह सब लाने को..अब तो चार बज रहे हैं और तुम्हें पता है राम भरोसे हलवाई की कचौड़ियां तो इस वक्त खत्म होने वाली होती हैं”,रमाकांत जी घबराते हुए बोले।
“हे भगवान, अब बेटी की पसंद भी आपको बताकर मंगवानी पड़ेगी..बचपन से जानते हो तो हो अपनी बेटी की पसंद को और हर बार तुम ही तो लाते हो..अब की बार क्या हुआ”,रीमा जी नाराज़गी से बोली।
“आप दोनों चिंता मत कीजिए मांजी, मैंने शिप्रा दीदी की पसंद की कचौड़ियां और हलवा पहले से ही किशन (बहुत सालों से घर का नौकर) कहकर मंगवा लिए हैं।वो पापा जी नींद में थे और मैंने उन्हें परेशान करना ज़रूरी नहीं समझा और कितनी बार तो मांजी से सुना ही था दीदी की पसंद के बारे में और बस फिर क्या था किशन को भेजकर मंगवा लिया मैंने सब और एक दो चीज़ें घर पर भी बना ली है”, मुस्कुराते हुए उनकी बहू दिया बोली।
दिया की शादी को अभी 3 महीने ही हुए थे और आज उसकी ननद शिप्रा दिल्ली से उसकी शादी के बाद पहली बार कुछ दिनों के लिए रहने आ रही थी।दिया के लिए भी ननद के साथ कुछ समय बिताने का पहला मौका था।
रमाकांत जी सरकारी नौकरी से रिटायर्ड थे और उनके दो बच्चे थे…बड़ी बेटी शिप्रा जो कि दिल्ली ब्याही थी और छोटा बेटा सुरेश जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था।रमाकांत जी के पिताजी का स्वर्गवास तो लगभग बारह वर्ष पहले हो गया था पर मांजी अभी दो साल पहले ही उन्हें छोड़ कर गई थी। जब शिप्रा की नई-नई शादी हुई थी…अरमान तो उन्हें बहुत था अपने पोते सुरेश की शादी देखने का पर भगवान के आगे किसकी चल सकती है।
सुरेश की शादी को अभी तीन महीने ही हुए थे और दिया उनके घर में अच्छी तरह से रच बस गई थी।वह थी भी बड़ी प्यारी सबको इज्ज़त और सम्मान देना उसके संस्कारों में ही था।उसके पिताजी कॉलेज में प्राध्यापक थे और माताजी एक कुशल गृहिणी थी। उसका एक छोटा भाई था जो अभी पढ़ाई कर रहा था।
दिया ने खुद भी एमबीए किया था और नौकरी भी करना चाहती थी पर इससे पहले ही उसकी शादी तय हो गई थी। अब उसने सास-ससुर की सहमति से दो-तीन जगह इंटरव्यू दिया हुआ था और परिणाम की प्रतीक्षा कर रही थी।
पांच बजते बजते सुरेश की कार घर के बाहर खड़ी हो गई जो शिप्रा को लेने स्टेशन चला गया था और इसके लिए आज उसने हाफ डे ले रखा था। सबने जल्दी से बाहर पहुंचकर शिप्रा का स्वागत किया। शिप्रा कार से बाहर निकल मां से लिपट गई और उसे देख दीया की आंखें भी अपनी मां को याद कर नम हो गई और फिर उसने मुस्कुराकर शिप्रा को गले लगा कर उसका स्वागत किया।
सुरेश और किशन कार से उसका सामान उतारकर अंदर ले आए। रमाकांत जी के चेहरे पर बेटी के आने से रौनक आ गई थी वरना पिछले दो दिनों से वह दांत के दर्द से बड़े परेशान थे।शिप्रा के आने से सच में चहल-पहल बढ़ गई थी।
प्याज़ की कचौड़ियां और हलवा देखकर शिप्रा बोली,” पापा,आप मेरी पसंद कभी नहीं भूलते है ना”।
“इस बार तेरी पसंद तेरे पापा ने नहीं तेरी भाभी दिया ने याद रखी है वरना…यह तो दवाई खाकर सोए पड़े थे”, रीमा जी हंस कर बोली।
“वाह मां! यह चाट तो बहुत स्वाद है…क्या कोई नई दुकान खुली है”, शिप्रा ने पूछा।
“हां, खुली है ना दिया की दुकान…यह बाज़ार कि नहीं घर की बनाई हुई चाट है और दिया ने खास तेरे लिए बनाई है”, रीमा जी ने प्रशंसा भरी नज़रों से दिया को देखते हुए कहा।
“दीदी, मांजी तो बस ऐसे ही कह रही हैं..आप और लो ना” कहते हुए दिया ने थोड़ी सी चाट शिप्रा की प्लेट में और डाल दी।
रात को भी खाने में सब कुछ शिप्रा की पसंद का ही था और उसके बाद उसकी पसंद की केसर पिस्ता वाली कुल्फी भी। शिप्रा यह सब देख कर बहुत खुशी थी…वैसे ऐसा पहली बार नहीं था कि उसके मायके आने पर उसकी पसंद की चीज़ें बनी हो पर इस बार मां के साथ दिया ने भी उसकी पसंद का ध्यान रखा था और वह इसी बात से ज़्यादा खुश थी।
रात को सब गप्पें मारने बैठे तो दिया ने पूछा,” दीदी, जीजाजी आपके साथ क्यों नहीं आए”।
“मुझे तो तुम लोगों के साथ कुछ दिन गुज़ारने थे और दीपक की कॉन्फ्रेंस एक हफ्ते बाद की है..बस मैंने उनसे पहले आने का मौका ढूंढ लिया और अब हफ्ते के बाद दिन के लिए वह आएंगे ही”।
“हां ठीक है, वैसे भी इन दो सालों में मुश्किल से दो-तीन बार तो रहने आई है तू”, रीमा जी बोली।
“छोड़ो ना मां, अब तो आई हूं ना तो अब इस बार का मज़ा लेने दो”, शिप्रा बोली।
अगले दिन शिप्रा जब सो कर उठी तो सुरेश काम पर जा चुका था और रमाकांत जी पौधों को पानी दे रहे थे और रीमा जी नहा धोकर पूजा कर रही थी।आज बहुत दिनों बाद मायके में शिप्रा आराम से उठी थी।दिया को रसोई में देख शिप्रा सोच रही थी कि ससुराल में लड़कियों को कैसे अपने ज़िम्मेदारी निभानी पड़ती है।
शिप्रा फटाफट नहा धोकर आई तो दिया ने सबके लिए नाश्ता लगा दिया। रमाकांत जी अपने लिए दलिया और बाकियों के लिए पूरी भाजी देखकर बोले,” दिया बेटी, यह तो सरासर नाइंसाफी है मैं नहीं खाऊंगा यह दलिया”।
“पिताजी, आपको तो यही दलिया खाने को मिलेगा। डॉक्टर ने आपको नरम चीज़ खाने का बोला है और सिर्फ आज के दिन की तो और बात है”, दिया बोली।
“हां बिल्कुल, बहू सही कह रही है एक-दो दिन परहेज़ कर कर लोगे तो कुछ नहीं होगा”, रीमा जी बोली।
“मां खा लेने दो ना एक पूरी”, शिप्रा बोली।
“नहीं बिल्कुल नहीं दीदी, आपको नहीं पता पिताजी दांत के दर्द से से कितने परेशान थे”, दिया का यूं बीच में बोलना शिप्रा को अच्छा तो नहीं लगा पर वह चुप कर गई।
अगले तीन-चार दिन ऐसे ही बीत गए थे। वीकेंड आया तो सुरेश की छुट्टी थी…सब घूमने निकल पड़े और बाहर के खाने का भी लुत्फ उठाया। अब तो रमाकांत जी भी सब कुछ खा पी रहे थे और उनकी शिकायतें भी दूर हो गई थी। रीमा जी ने शिप्रा और दामाद जी के लिए तोहफे खरीदे और दिया से भी पसंद करवाए और उसे भी एक दो चीज़े दिलवा दी जिससे उसकी खुशी देखते ही बनती थी।
अगली रात को शिप्रा अपनी मां के साथ अकेले बैठी थी। वह बोली,” मां,तुम्हें नहीं लगता कि तुम लोगों ने दिया को घर में ज़्यादा ही छूट दे रखी है।वह बता रही थी कि उसने नौकरी के लिए इंटरव्यू दे रखे हैं। आपने उसे नौकरी की इजाज़त कैसे दे दी..फिर तो आप पर ही काम का सारा बोझ पड़ जाएगा।आप भूल गई दादी कैसे आपसे बर्ताव करती थी और आपकी तो लगी लगाई नौकरी भी छुड़वा दी थी दादी ने… और मेरी सास भी तो यही करती है मेरी घर में कहां चलने देती है और बेटियों के आने पर उल्टा मुझ पर और हावी हो जाती हैं और खुद से मुझे कोई चीज़ दिलवाई हो ऐसा तो कभी नहीं हुआ जैसे आपने दिया को दिलवाई और नौकरी करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। यह तो घर-घर की कहानी है मां फिर आप क्यों इतना बलिदान दे रही हो”।
“ज़रूरी तो नहीं हर घर की कहानी एक जैसी हो और इसमें बलिदान कैसा? घर में लोग ही कितने हैं और क्या काम है… दिया के आने से पहले भी तो घर के काम क्या नहीं होते थे? किशन भी मेरी पूरी मदद करता तो है और मैं क्या इतनी बूढ़ी हो गई हूं जो अभी से बैठ जाऊं और बैठ बैठ कर अपने घुटनों पर ज़ंग लगा लूं या बाकी औरतों की तरह अपनी प्यारी सी बहू को फालतू में कष्ट दूं और रही चीज़ें दिलाने की बात तो तुमने देखा नहीं उसके मासूम से चेहरे पर कैसे बच्चों जैसी खुशी आ गई थी जैसे तुम्हारे चेहरे पर वह भी तो तुम्हारी तरह इस घर की बेटी ही है ना और साथ में तुम्हारी दादी की बात तो तुम रहने ही दो तुम्हारी दादी ने जो कुछ मेरे साथ किया तो मेरा दिल भी तो कितना आहत होता था उनकी बातों से तो क्या मैं उस सबका बदला अपनी बहू से लूंगी.. बिल्कुल नहीं…मैं क्यों अपनी बेटी जैसी बहू का दिल को कष्ट पहुंचाऊ” ं रीमा जी बोली।
कुछ देर बाद रात के खाने के बाद दिया एकदम से भागती हुई आई और सास के गले में बाहें डालते हुए बोली,” मम्मी जी मुझे एक कंपनी से ऑफर लेटर आ गया है और यह सब आपकी वजह से ही संभव हो सका है। मैं कितनी किस्मत वाली हूं जो मुझे आप जैसे सास मिली है वरना मेरी कितनी ही सहेलियों की सास तो उनको नौकरी करने के खिलाफ है। शिप्रा दी है ना मम्मी जी अच्छी… बहुत अच्छी”।
शिप्रा दिया के मासूम चेहरे को देख और उसकी भोली बातों को सुन मुस्कुरा उठी और बोली,”हां अच्छी है तुम्हारी सास और मेरी भाभी दोनों ही बहुत अच्छी हैं” और कहते हुए उसने दिया को गले लगा लिया और मुबारकबाद दी और सोचने लगी मां सही ही कहती है कि ज़रूरी नहीं हर घर की कहानी एक जैसी हो।
प्रिय पाठकों, अगर बहू को भी पूरा मान सम्मान दिया जाए तो वह भी घर के बड़ों की इज्ज़त और सम्मान का पूरा ध्यान रखेगी।
#स्वरचितएवंमौलिक
गीतू महाजन,
नई दिल्ली।