रसोई घर में रोटी बेलती सारिका की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। आटे में नमक जितना घुल जाता है, उतना ही उसका दर्द भी अब उसके भीतर घुल चुका था। बाहर ड्राइंग रूम में हँसी-ठिठोली का शोर था, और भीतर रसोई में उसके सिसकियों का सन्नाटा। उसे लग रहा था जैसे वह अकेली नहीं—उसकी आत्मा भी आज रोटी के साथ पिस रही है।
संयुक्त परिवार में कहने के लिए सब साथ-साथ रहते थे, पर सारिका तो सिर्फ़ इतना जानती थी कि सब बस हर बात पर उसे और उसके माता-पिता को ज़लील करने की फ़िराक में रहते थे। “बहू हमारे घर की है,” यह बात केवल रस्मों में थी। असलियत यह थी कि “बहू हमारे घर की है” का मतलब था—अब उसके मायके का सम्मान भी उनके हाथ में है, जब चाहें तो उसे उछालकर देख लें।
आज भी तो घर में मेहमानों के बीच उसके रंग रूप और रहन-सहन को लेकर मज़ाक उड़ाया था उसकी ननदों ने। कोई बोली—“अरे! बहू जी की साड़ी देखो, लगता है दिल्ली में फैशन का क्या पता!” कोई हँसी—“ये बोकारो वाले क्या समझेंगे हमारे खानदान की रीत?”
और शांति देवी… उसकी सास… वह भी तो अपनी बेटियों के साथ हँस रही थीं उस पर। सिर्फ हँस नहीं रही थीं, उसके माता-पिता का भी मज़ाक उड़ा रही थीं—ऐसे जैसे उनकी गरीबी, उनकी मजबूरी, उनके संघर्ष किसी जोक का हिस्सा हों।
सारिका के हाथ रोटी बेल रहे थे, पर उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। आँखों के पानी ने आटे पर गिरकर उसे और मुलायम कर दिया था, पर उसका दिल… दिन-ब-दिन और सख्त होता जा रहा था—क्योंकि लगातार अपमान इंसान को तोड़ता नहीं, कभी-कभी “मौन क्रांति” बना देता है।
तभी बाहर से आवाज़ आई—
“देखो! दिल्ली से पार्सल आया है।”
सारिका के दिल की धड़कन तेज़ हो गई। दिल्ली… उसकी माँ-पापा… वह एक पल को भूल गई कि अभी-अभी कितनी बातें उसके बारे में कही गई थीं। उसके भीतर एक उम्मीद जागी—“शायद माँ ने कुछ भेजा होगा… शायद पापा ने नाती के लिए कुछ…”
पर अगले ही पल शांति देवी की आवाज़ ने उस उम्मीद पर पानी फेर दिया—
“अपने नाती के जन्म और उसकी छठी पर तो आए नहीं और अब बच्चे के जन्म के तीन महीने बाद यह छठिहारी भेजी है। हमारे तो सारे मनोरथ पर पानी फेर दिया समधी जी ने तो। हम तो बड़ा खानदान समझ कर इनसे रिश्ता जोड़े थे पर हमको क्या पता था इतना कंगाल परिवार है इनका।”
“कंगाल…” यह शब्द सारिका के कानों में किसी हथौड़े की तरह लगा।
उसकी रोटी का गोल आकार बिगड़ गया। उसने आँसू पोंछे, पर आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
तभी सारिका की छोटी ननद बोली—
“इतना छोटा सा पैकेट है। सिर्फ अपनी बेटी और नाती के लिए भेजा होगा। माँ हमें आप बेकार में बुला रही हो, कौन सा हम दोनों बहनों के लिए कुछ होगा इसमें।”
सारिका को बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही थी सासूमाँ और ननदों की ये बातें।
एक तो शादी में इनकी सारी शर्तें मानी थीं उसके पिता ने।
दूसरे राज्य में आकर अपनी बेटी के ब्याह में कितनी परेशानी झेली थी, क्या ये लोग नहीं समझ सकते?
सारिका के दिमाग में शादी के दिन घूम गए। उसके पिता का थका चेहरा, माँ की भागदौड़, रिश्तेदारों की चिंता, दूसरे राज्य का अनजान माहौल—और शांति देवी का “शर्तों” वाला लहजा।
वह सोचने लगी—क्यों? सिर्फ इसलिए कि हमने अपनी बेटी को अच्छे घर में भेजा, तो क्या हमारी इज्जत गिरवी रख दी?
उसके पिता ने दो साल लगातार दिल्ली से बोकारो हर महीने छुट्टी लेकर आने के कारण रिटायरमेंट के आठ साल पहले ही वी.आर.एस. लेना पड़ा था। यह बात वह कितनी बार अपने पति संजीव को बता चुकी थी। पिता को नौकरी से पहले ही हटना पड़ा—इसका दर्द वह रोज महसूस करती थी। घर की आमदनी कम हो गई थी, जिम्मेदारियाँ वही थीं।
और उसकी माँ… कुछ महीने पहले ही मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था। आँखों में अभी भी कमजोरी रहती, ज्यादा काम करने पर दर्द होता। इसलिए छठी वाले दिन उसके मायके से कोई नहीं आ पाया।
सारिका का मन बेचैन था अपनी माँ को देखने के लिए। पर पहले गर्भावस्था का अंतिम माह था, इसलिए उसे ऐसे में किसी ने जाने की इज़ाजत नहीं दी।
“इतनी दूर जाने की जरूरत क्या है? अंतिम महीना है, घर में रहो,” यह आदेश था, सलाह नहीं।
फिर बच्चा हो गया तो—“बच्चा छोटा है तो तू जाने का सोच भी कैसे सकती है?” शांति देवी उससे कहतीं।
सारिका मन मसोसकर रह जाती।
वह माँ को याद करके रातों में चुपचाप रोती।
हफ्ते-महीने में एक फोन पर माँ-पापा से बात होती थी।
और एक दिन उसके पापा ने कहा था—
“बिटिया रानी, अब रिटायरमेंट के बाद तेरा पापा तो बूढ़ा हो गया है, अब इतनी दूर आ तो नहीं सकता। फिर तेरी मम्मी का भी अभी इलाज चल ही रहा है तो ज्यादा पैसा भी नहीं है तेरे बूढ़े पापा के पास… पर नाती को आशीर्वाद के रूप में जो जुड़ सका वो भेज रहे हैं।”
सारिका ने उस दिन फोन रखकर बहुत देर तक रोया था। उसे लगा था—उसका पापा अपनी मजबूरी में भी खुद को दोषी मान रहा है, और यहाँ उसके ससुराल में उसी मजबूरी को “कंगाली” कहा जा रहा है।
ड्राइंग रूम में पार्सल खुलने लगा। सारिका रसोई से बाहर नहीं जाना चाहती थी, पर अब उसकी साँसें वहाँ के माहौल में अटक गई थीं। वह हाथ पोंछकर दरवाजे के पास खड़ी हो गई।
पार्सल खुला तो उसमें सिल्क की सात साड़ियाँ थीं और बच्चे के कपड़े और उसके हाथ-पैर के लिए चाँदी के गहने थे।
सारिका के चेहरे पर एक पल के लिए चमक आ गई—उसकी माँ ने सबका ध्यान रखा था। सास, दोनों ननदें, चारों बहुएँ… और नाती के लिए कपड़े व चाँदी के गहने।
पर शांति देवी की नजर में यह “प्यार” नहीं था, “मोल” था—और मोल उन्हें कम लगा।
“ये क्या रुमाल भेजा है और ये कैसे गहने हैं, कितना हल्का लग रहा है ये कड़ा जैसे बाजार से नकली दस बीस रुपए वाला खरीदकर भेज दिया है।” शांति देवी ने कहा।
सारिका की आँखों में फिर आँसू भर आए।
वह आगे बढ़कर बोली—
“नहीं माँ, साड़ियाँ हैं। मम्मी ने आपके लिए, दोनों बेटियों और चारों बहुओं के लिए भेजी है और यह असली चांदी ही है।”
उसकी आवाज में विनती थी—“कम से कम इतना तो मान लो कि उन्होंने कोशिश की।”
लेकिन अब नए तीर चलने लगे।
सारिका के जेठजी जो वहीं बैठे थे, बोले—
“सिर्फ घर की औरतों और अपने नाती के लिए ही भेजा और हम आदमी लोग के लिए कुछ नहीं।”
सारिका के देवर सूरज ने एक पैकेट निकालते हुए कहा—
“भाई, इसके पापा ने पांच-पांच सौ के चार नोट और ये एक सौ एक भी तो भेजे हैं। हम चारों भाई का एक-एक अंडरवियर बनियान तो आ ही जाएगा।”
इतना कहकर वह ठहाका मारकर हँस पड़ा।
उसकी हँसी में मजाक नहीं था—ज़हर था।
और उस ज़हर में सभी भाई-बहन और शांति देवी हँसने लगे।
सारिका को लगा जैसे उसके माँ-पापा की मेहनत, उनका प्यार, उनका सम्मान—सबको उन्होंने “अंडरवियर-बनियान” में बदल दिया।
यही वो पल था जब संजीव की सहनशक्ति टूट गई।
वह अब तक चुप था, शायद घर का माहौल बिगड़ने से बचाना चाहता था।
लेकिन आज… वह नहीं रुक पाया।
“यह हँसना बंद कीजिए आप लोग। उन लोगों की परेशानी में हम लोग उनकी कोई मदद नहीं कर पा रहे हैं और ऐसे में भी पापा जी ने कितना कुछ भेजा है।” संजीव ने कहा।
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया।
सबने संजीव को ऐसे देखा जैसे उसने कोई अपराध कर दिया हो—अपनी पत्नी का पक्ष लेकर, अपने ससुर का सम्मान करके।
तभी बड़े भाई ने तंज कस दिया—
“पापा जी… वाह भाई तरक्की कर रहा है। अपने ससुर जी का भक्त बन गया है तू तो।”
संजीव के चेहरे पर गुस्सा नहीं—दुख था।
“मुझे इस संबंध में कोई बात नहीं करनी है। आप लोगों को सारिका और उसके परिवार को ज़लील करके पता नहीं क्या खुशी मिलती है। कभी सोचा है अगर हमारी दोनों बहनों के ससुराल वाले भी इसी तरह उन्हें और हमें हर छोटी-छोटी बात पर ज़लील करेंगे तो हम पर क्या बीतेगी।”
उसकी बात में “सवाल” था, और सवाल अक्सर लोगों को चुभता है, क्योंकि सवाल उनके भीतर की सच्चाई से सामना करवाता है।
सारिका का मन काँप उठा।
संजीव का साथ ही उसे उस घर में टिकाए हुए था।
वरना वह कब की टूट गई होती।
वह सोचती—“कम से कम मेरे पति तो मेरे साथ हैं… वही मेरे लिए इस घर में ढाल हैं।”
आज रसोई घर में उसका अंतिम दिन ही है… क्योंकि कल सुबह ही तो उसे संजीव के साथ अपने बेटे को लेकर उसकी कंपनी से मिले फ्लैट में शिफ्ट होना है।
यह फैसला संजीव ने अचानक नहीं लिया था। यह फैसला वर्षों के अपमान के बाद आया था।
हर ताना, हर मजाक, हर बार “तेरे माँ-बाप” कहकर नीचे दिखाना—सब जमा होता गया, और एक दिन संजीव ने साफ कह दिया—बस।
उसने अपने परिवार वालों से साफ शब्दों में कह दिया—
“जहाँ मेरी पत्नी और उसके परिवार… जो कि अब मेरा भी है… उनकी इज्जत नहीं होगी, उनको ज़लील किया जाएगा, उनका अपमान होगा—वहाँ अब मैं अपने परिवार के साथ नहीं रह सकता।”
सारिका को याद है, उस रात संजीव ने बहुत शांत आवाज में कहा था—
“सारिका, मैं तुम्हें रोज टूटते नहीं देख सकता। तुम मेरी पत्नी हो, तुम्हारे माँ-पापा मेरे भी हैं। अगर मेरा परिवार तुम्हारे परिवार को अपमानित करेगा, तो मैं यह नहीं सहूँगा। मैं घर छोड़कर भाग नहीं रहा, मैं अपने रिश्ते बचा रहा हूँ।”
उस दिन सारिका की आँखों में आँसू थे—पर इस बार वे आँसू दुख के नहीं, राहत के थे।
उसे लगा जैसे वर्षों बाद कोई उसके अंदर के घाव पर मरहम रख रहा हो।
आज जब वह रसोई में रोटी बेल रही थी, तब भी उसके आँसू बह रहे थे—लेकिन अब उन आँसुओं में एक नया भाव भी था—आखिरी बार सहने का, और पहली बार खुद के लिए जीने का।
उसे पता था, कल सुबह जब वह इस घर से निकलेगी, तो पीछे से बातें जरूर होंगी—
“बहू ने घर तोड़ दिया,” “बेटा बहू के काबू में है,” “संजिव अपनी औकात भूल गया,” “दिल्ली वालों ने जादू कर दिया,”
लेकिन उसे यह भी पता था—अब वह “ज़लील” नहीं होगी।
अब वह अपने बच्चे के सामने टूटती हुई माँ नहीं बनेगी।
अब वह अपने माता-पिता की इज्जत को हर दिन कटघरे में खड़ा नहीं देखेगी।
और संजीव… वह किसी युद्ध से लौटे सिपाही की तरह नहीं, बल्कि अपने परिवार को बचाने वाले इंसान की तरह उसके साथ खड़ा था।
रात को सारिका ने अपने कमरे में बेटे को गोद में लिया।
उसकी उँगलियाँ उसके नन्हें हाथों में फँस गईं।
उसने धीरे से कहा—
“बेटा… आज माँ बहुत रोई… पर कल माँ हँसेगी। क्योंकि कल से कोई तुम्हारी नानी-नाना का मजाक नहीं उड़ाएगा… कल से माँ को कोई ‘ज़लील’ नहीं करेगा…”
किचन में आटा खत्म हो चुका था।
रोटी का ढेर बन चुका था।
पर सारिका के भीतर एक और ढेर बन रहा था—हिम्मत का।
कल वह अपने बेटे के साथ एक नए घर में जाएगी—जहाँ दीवारें छोटी होंगी, पर सम्मान बड़ा होगा।
पाठकों के लिए सवाल (कमेंट के लिए)
- क्या संजीव का घर छोड़कर अलग रहने का फैसला सही था?
- क्या संयुक्त परिवार “सिर्फ साथ रहने” का नाम है, या “सम्मान” भी उतना ही जरूरी है?
- अगर आप सारिका की जगह होते तो क्या करते—चुप रहते या आवाज उठाते?
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