यह लड़की मेरे बुढ़ापे का सहारा नहीं, जंजाल बन गई है – आरती झा

शाम के साढ़े सात बज रहे थे। अपार्टमेंट की लिफ्ट से बाहर निकलते ही आर्यन को अपने फ्लैट के दरवाजे से आती हुई ऊँची आवाजें सुनाई देने लगीं। उसके कदमों की रफ्तार, जो दिन भर की थकान के कारण धीमी थी, अचानक तेज हो गई। यह कोई नई बात नहीं थी, लेकिन आज आवाज़ में एक अलग ही तल्खी और कड़वाहट थी।

जैसे ही आर्यन ने चाबी घुमाकर दरवाजा खोला, सामने का दृश्य देखकर वह ठिठक गया। ड्राइंग रूम का फर्श बिखरे हुए कागजों और फाइलों से अटा पड़ा था। सोफे के पास उसकी पत्नी, काव्या, सिर झुकाए खड़ी थी और उसके सामने उसकी माँ, सुमित्रा देवी, छाती पीट-पीटकर रो रही थीं।

“बस! बहुत हो गया!” सुमित्रा देवी की चीख ने घर की दीवारों को हिला दिया। “मैंने पहले ही कहा था कि नौकरीपेशा लड़की से शादी मत कर, पर तुझे तो मॉडर्न बीवी चाहिए थी। देख ले इसका कारनामा! इसने आज मेरी नाक कटवा दी पूरे समाज में। अब मैं किस मुंह से अपनी सहेलियों के बीच बैठूँगी?”

आर्यन ने अपना लैपटॉप बैग सोफे पर पटका और माथे का पसीना पोंछा। “अब क्या हुआ माँ? अभी तो मैं घर में घुसा हूँ। कम से कम पानी तो पीने दो। यह क्या महाभारत छेड़ रखी है?”

“पानी?” सुमित्रा देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछे, जो शायद नकली थे, यह आर्यन को शक था। “यहाँ घर में आग लगी है और तुझे पानी की पड़ी है। पूछ अपनी इस लाड़ली बीवी से कि इसने आज क्या किया। मैंने इसे सुबह ही, पचास बार याद दिलाया था कि आज शाम को ‘कीर्तन मंडली’ की औरतें घर आने वाली हैं। मैंने कहा था कि प्रसाद के लिए हलवा बना देना और घर थोड़ा व्यवस्थित रखना। पर नहीं! महारानी को तो अपनी ज़ूम मीटिंग और प्रेजेंटेशन से फुर्सत मिले तब न!”

काव्या ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं, शायद वह काफी देर से रो रही थी, लेकिन अब उसकी आँखों में एक अजीब सी शून्यता थी।

“आर्यन,” सुमित्रा देवी ने फिर से विलाप शुरू किया, “मिसेस खन्ना और मिसेस वर्मा आई थीं। और पता है इस लड़की ने क्या किया? इसने ड्राइंग रूम में अपने ऑफिस के कागज फैला रखे थे। और जब उन्होंने प्रसाद मांगा, तो इसने क्या दिया पता है? बाज़ार से मंगवाए हुए बिस्कुट! शगुन के बिस्कुट! कहती है हलवा बनाने का टाइम नहीं मिला। हाय राम! मेरी नाक कट गई। वो औरतें बाहर जाकर थू-थू करेंगी कि सुमित्रा की बहू को एक हलवा बनाना नहीं आता और घर को ऑफिस बना रखा है।”

आर्यन ने काव्या की तरफ देखा। काव्या ने अपनी सफाई में कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप जमीन पर बिखरे हुए अपने प्रोजेक्ट के कागजों को समेटने लगी। उन कागजों पर जूतों के निशान थे—शायद सुमित्रा देवी ने गुस्से में उन पर पैर रख दिया था।

“माँ, शांत हो जाओ,” आर्यन ने गहरी सांस लेते हुए कहा। “सिर्फ हलवा न बनाने पर इतना हंगामा? आप खुद भी तो बना सकती थीं अगर इतना ही जरुरी था। काव्या का आज अप्रेजल मीटिंग था, मुझे पता है। उसने मुझे सुबह बताया था कि आज का दिन उसके करियर के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।”

“ओह! तो अब तू मुझे सिखाएगा?” सुमित्रा देवी का गुस्सा और भड़क गया। “मैं बूढ़ी औरत, घुटनों के दर्द से कराहती हूँ, मैं हलवा बनाऊँ? और यह महारानी एसी कमरे में बैठकर कंप्यूटर खटखटाए? मैंने तो इसे पहले ही कहा था कि अगर घर नहीं संभलता तो छोड़ दे यह नौकरी। कौन सा हमारे घर में फाके पड़ रहे हैं जो इसकी कमाई की ज़रूरत है?”

काव्या ने एक फाइल उठाई और बहुत धीमी आवाज़ में बोली, “माँजी, मैंने सुबह ही आपसे माफ़ी मांग ली थी। मैंने स्विगी से मिठाई आर्डर की थी, लेकिन डिलीवरी लेट हो गई। और बिस्कुट मैंने नहीं, आपने ही तो डब्बे से निकालकर प्लेट में रखे थे जब मेहमान आए थे।”

“झूठी कहीं की!” सुमित्रा देवी लगभग दौड़कर काव्या के पास गईं और उसके हाथ से फाइल झटक दी। कागज फिर से बिखर गए। “अब तू मेरी जुबान पकड़ेगी? अपनी गलती मानने के बजाय उल्टा चोर कोतवाल को डांटे? आर्यन, देख रहा है तू? यह लड़की मेरे बुढ़ापे का सहारा नहीं, जंजाल बन गई है। इसे आज ही घर से निकाल, या कह दे कि कल से नौकरी पर नहीं जाएगी। मुझे यह रोज़-रोज़ का क्लेश नहीं चाहिए।”

आर्यन ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसके दिमाग में दिन भर की ऑफिस की राजनीति और थकान चल रही थी, लेकिन घर का यह दृश्य उससे कहीं ज्यादा थका देने वाला था। वह जानता था कि यह लड़ाई हलवे की नहीं है। यह लड़ाई वर्चस्व की है। सुमित्रा देवी को यह हजम नहीं हो रहा था कि काव्या एक वाइस-प्रेसिडेंट बनने की राह पर है। उन्हें डर था कि कहीं बहू का कद उनसे बड़ा न हो जाए।

आर्यन, काव्या के पास गया और घुटनों के बल बैठकर उसके साथ कागज समेटने लगा।

“तू क्या कर रहा है?” सुमित्रा देवी चिल्लाईं। “जोरू का गुलाम बन गया है क्या? मैं कह रही हूँ इसे डांट, और तू इसकी मदद कर रहा है?”

आर्यन खड़ा हुआ। उसने कागजों का पुलिंदा मेज पर रखा और अपनी माँ की आँखों में सीधे देखा। उसकी आवाज़ में ऊँचापन नहीं था, बल्कि एक ऐसी गंभीरता थी जिसने सुमित्रा देवी को एक पल के लिए चुप करा दिया।

“माँ, होश में आओ,” आर्यन ने बेहद संयमित स्वर में कहा। “आप जिसे ‘क्लेश’ कह रही हैं, वह काव्या की छह महीने की मेहनत है। और जिसे आप ‘सिर्फ बिस्कुट’ कह रही हैं, वह उसकी मजबूरी थी। काव्या कोई मशीन नहीं है जो बटन दबाते ही हलवा भी बनाए, लाखों की डील भी क्रैक करे और आपके ताने भी सुने।”

“तो? तो क्या घर की इज़्ज़त मिटा दे?” सुमित्रा देवी ने तुनक कर कहा। “औरत का पहला धर्म उसका घर होता है।”

“धर्म?” आर्यन हंसा, पर उस हंसी में कोई खुशी नहीं थी। “माँ, पिछले महीने जब पापा को हार्ट अटैक आया था, तब अस्पताल का तीन लाख का बिल इसी काव्या ने अपने क्रेडिट कार्ड से भरा था, बिना एक पल की देरी किए। तब आपको इसका ‘धर्म’ याद नहीं आया? तब आपने नहीं कहा कि यह ‘गंवार’ है या ‘नौकरी छोड़ दे’? उस दिन तो आप पूरे अस्पताल में गाती फिर रही थीं कि मेरी बहू लाखों में एक है, बड़े ओहदे पर है।”

सुमित्रा देवी का चेहरा पीला पड़ गया। “वह… वह तो ठीक है, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि बड़ों का आदर भूल जाए।”

“आदर?” आर्यन ने कमरे के चारों ओर इशारा किया। “कागजों पर आपके पैरों के निशान हैं माँ। यह आदर है? काव्या आज सुबह पांच बजे उठी थी ताकि आपके लिए खिचड़ी बना सके क्योंकि आपका पेट खराब था। फिर उसने नौ घंटे लगातार काम किया। और बदले में उसे क्या मिला? यह बेइज्जती?”

काव्या अब सिसक रही थी। आर्यन ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“माँ,” आर्यन ने अपनी बात जारी रखी, “आप कहती हैं कि कोई दूसरी होती तो भाग गई होती। आप सही कहती हैं। कोई दूसरी होती तो शायद अब तक यह घर छोड़कर चली गई होती या मुझे मजबूर करती कि हम अलग घर ले लें। लेकिन यह काव्या है, जो आपकी हर कड़वी बात को घूंट की तरह पी जाती है, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह मुझसे प्यार करती है और इस परिवार को टूटने नहीं देना चाहती।”

“तू… तू अपनी माँ को गलत ठहरा रहा है इस कल की आई लड़की के लिए?” सुमित्रा देवी ने भावनात्मक कार्ड खेलने की कोशिश की। उनकी आँखों में फिर से आँसू भरने लगे। “मैंने तुझे पाल-पोसकर बड़ा किया और आज तू…”

“माँ, प्लीज,” आर्यन ने उन्हें बीच में ही रोक दिया। “यह ‘पाल-पोसकर बड़ा करने’ वाला एहसान जताना बंद कीजिये। आपने मुझे पाला क्योंकि मैं आपका बेटा था, यह आपका फर्ज था। जैसे मैं आज अपना फर्ज निभा रहा हूँ। एक पति होने का फर्ज। अगर मेरी पत्नी गलत होती, तो मैं उसे समझाता। पर आज वह गलत नहीं है। आप गलत हैं।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। घड़ी की टिक-टिक अब साफ सुनाई दे रही थी।

आर्यन ने काव्या का हाथ थाम लिया। “काव्या, चलो तैयार हो जाओ। हम बाहर डिनर के लिए जा रहे हैं। आज तुम्हारी मेहनत का जश्न मनाया जाएगा। हलवा तो नहीं बना, लेकिन आज हम फाइव स्टार में मिठाई जरूर खाएंगे।”

काव्या ने डरी हुई नजरों से सास की ओर देखा।

“जाओ काव्या,” आर्यन ने जोर देकर कहा। “और हाँ, कल से सुबह का नाश्ता और शाम की चाय का जिम्मा मेरा है। माँ, अगर आपको कीर्तन रखना है, तो या तो आप खुद प्रसाद बनाएंगी या हम रसोइया रख लेंगे। काव्या से उम्मीद मत कीजियेगा कि वह ऑफिस के बीच में कड़छी चलाएगी।”

सुमित्रा देवी सोफे पर धम्म से बैठ गईं। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि उनका हमेशा ‘हाँ में हाँ’ मिलाने वाला बेटा आज इतना बदल गया है।

आर्यन बेडरूम की तरफ बढ़ा, फिर दरवाजे पर रुका और मुड़ा।

“और एक आखिरी बात माँ,” आर्यन ने कहा, “अगली बार अगर आपने काव्या की फाइलों को हाथ भी लगाया या उसकी नौकरी पर सवाल उठाया, तो याद रखियेगा, यह घर हम दोनों की कमाई से चलता है। अगर वह नौकरी छोड़ देगी, तो शायद हम इस फ्लैट की ईएमआई भी नहीं भर पाएंगे और हमें गांव वाले पुश्तैनी मकान में जाकर रहना पड़ेगा। जहाँ न एसी है, न लिफ्ट, और न ही आपकी यह किटी पार्टी वाली सहेलियाँ।”

यह एक कड़वा सच था जिसे सुमित्रा देवी अपनी झूठी शान में भूल चुकी थीं। गांव जाने के नाम से ही उनके पसीने छूट गए।

आर्यन और काव्या कमरे में चले गए।

सुमित्रा देवी अकेली ड्राइंग रूम में बैठी रह गईं। फर्श पर अब भी एक-दो कागज पड़े थे। उन्होंने झुककर एक कागज उठाया। उस पर लिखा था—“बेस्ट एम्प्लोयी ऑफ़ द ईयर – काव्या शर्मा”

सुमित्रा देवी ने उस कागज को देखा। उन्हें अपनी सहेली मिसेस खन्ना की बात याद आई जो उन्होंने जाते वक्त कही थी—“सुमित्रा, तू किस्मत वाली है जो तुझे ऐसी पढ़ी-लिखी और कमाने वाली बहू मिली है। हमारी वाली तो दिन भर रील्स बनाती रहती है।”

सुमित्रा देवी को अपनी गलती का अहसास हो रहा था, लेकिन उनका अहंकार उसे स्वीकार करने से रोक रहा था। पर आज आर्यन ने जो आईना दिखाया था, उसमें उन्हें अपना अक्स बदसूरत नज़र आ रहा था।

अंदर कमरे में, काव्या ने आर्यन को गले लगा लिया।

“थैंक यू,” उसने सुबकते हुए कहा। “मुझे लगा था आज तुम भी…”

“मैं तुम्हारा पति हूँ काव्या, मालिक नहीं,” आर्यन ने उसके माथे को चूमा। “और जो इंसान अपनी पत्नी के सम्मान की रक्षा अपने ही घर में नहीं कर सकता, उसे समाज में सिर उठाने का कोई हक़ नहीं है। माँ अभी पुराने ख्यालातों में हैं, उन्हें बदलने में वक्त लगेगा। पर मैं तुम्हें टूटने नहीं दूँगा।”

दस मिनट बाद, जब वे दोनों तैयार होकर बाहर निकले, तो सुमित्रा देवी डाइनिंग टेबल पर बैठी थीं। टेबल पर पानी के तीन गिलास रखे थे।

“रुको,” सुमित्रा देवी ने रूखी आवाज़ में कहा।

आर्यन और काव्या रुक गए।

“बाहर का खाना रोज-रोज सेहत के लिए अच्छा नहीं होता,” सुमित्रा देवी ने बिना उनकी तरफ देखे कहा। “फ्रिज में पनीर रखा है। मैं… मैं मटर-पनीर बना देती हूँ। तुम दोनों फ्रेश हो जाओ।”

आर्यन के होठों पर एक हल्की मुस्कान तैर गई। काव्या ने भी राहत की सांस ली। यह कोई माफीनामा नहीं था, न ही सुमित्रा देवी एकदम से बदल गई थीं। लेकिन यह एक शुरुआत थी—एक युद्धविराम की।

“माँ, मैं आपकी मदद कर देता हूँ सब्ज़ी काटने में,” आर्यन ने कहा।

“रहने दे,” सुमित्रा देवी ने उठते हुए कहा, पर उनकी आवाज़ में अब वह पहले वाली कड़वाहट नहीं थी। “तू अपनी बीवी के साथ उस कागज… क्या कहते हैं उसे… प्रेजेंटेशन? हाँ, उसे ठीक कर। मेरी बहू ‘वाइस-प्रेसिडेंट’ बनने वाली है, तो कम से कम मटर-पनीर तो मैं खिला ही सकती हूँ।”

आर्यन ने काव्या का हाथ दबाया। यह एक छोटी सी जीत थी, लेकिन इस जीत ने उनके रिश्ते की नींव को और गहरा कर दिया था। घर की चारदीवारी के अंदर चीखने की आवाज़ें अब शांत हो चुकी थीं, और उनकी जगह समझदारी ने ले ली थी।

मूल लेखिका : आरती झा

error: Content is protected !!