यह घर है या कोई धर्मशाला – करुणा मलिक

देहरादून की वादियों में बरसात का मौसम था और ‘गुलमोहर विला’ की बड़ी सी बालकनी में पुराने ज़माने का ग्रामोफोन बज रहा था। लता मंगेशकर की मखमली आवाज़ हवा में तैर रही थी— “लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो…”

रिटायर्ड कर्नल विक्रमजीत सिंह और उनकी धर्मपत्नी मोहिनी देवी, दोनों ही साठ की उम्र पार कर चुके थे, मगर उनका दिल आज भी किसी इक्कीस साल के प्रेमी जोड़े जैसा धड़कता था।

विक्रमजीत ने बड़े सलीके से मोहिनी का हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें धीरे-धीरे नचाने लगे। मोहिनी ने एक गहरा जामुनी रंग का शॉल ओढ़ रखा था और बालों में मोगरे का गजरा। विक्रमजीत, अपनी विंटेज हैट लगाए, बिल्कुल देव आनंद वाले अंदाज में मुस्कुरा रहे थे।

“अजी सुनिए, कमर में मोच आ जाएगी, रहने दीजिये,” मोहिनी ने शर्माते हुए कहा, लेकिन उनका हाथ विक्रमजीत की पकड़ से छूटने का नाम नहीं ले रहा था।

“मोच तो तब आएगी जब हम नाचना छोड़ देंगे, मोहिनी। अभी तो हम जवान हैं,” विक्रमजीत ने हंसते हुए उन्हें एक और चक्कर दिया।

लिविंग रूम की खिड़की के पीछे से यह नजारा देख रही उनकी बड़ी बहू, कृतिका, ने माथे पर बल डालते हुए पर्दा गिरा दिया। उसने पीछे मुड़कर अपने पति, रोहन से कहा, “रोहन,

देखो अपने मम्मी-पापा को। बाहर सड़क से लोग जा रहे हैं, सब देख रहे हैं। इस उम्र में यह ‘हनीमून पीरियड’ खत्म ही नहीं होता इनका। मुझे तो किटी पार्टी में फ्रेंड्स के सामने शर्म आती है जब वे कहती हैं कि तुम्हारे सास-ससुर तो तुमसे ज्यादा रोमांटिक हैं।”

रोहन ने लैपटॉप से नज़र हटाई और चश्मा ठीक करते हुए बोला, “छोड़ो न कृतिका, उनका घर है, उनकी मर्जी। खुश हैं तो रहने दो।”

“खुश रहने में दिक्कत नहीं है रोहन,” कृतिका तुनक कर बोली, “दिक्कत है उनके इस बेफिक्र रवैये से। कल को बीमार पड़ गए तो सेवा हमें ही करनी पड़ेगी, तब यह डांस काम नहीं आएगा। और वैसे भी, सोसाइटी का एक स्टैंडर्ड होता है।”

विक्रमजीत और मोहिनी का यह प्रेम, उनके बेटों और बहुओं के लिए सरदर्द बन चुका था। दोनों बेटे, रोहन और विवेक, अपनी कॉर्पोरेट दुनिया में इतने मशगूल थे कि उन्हें माता-पिता का यह हंसना-मुस्कुराना ‘बचकाना’ और ‘समय की बर्बादी’ लगता था। ‘गुलमोहर विला’ एक बहुत बड़ी संपत्ति थी, और दोनों बेटों की नज़र अक्सर इस बात पर रहती थी कि पिताजी कब इसे बेचकर फ्लैट्स में शिफ्ट होंगे ताकि हिस्सा बंटे।

अगले दिन सुबह नाश्ते की मेज पर माहौल कुछ गंभीर था। विक्रमजीत के चेहरे पर आज वह शरारती मुस्कान नहीं थी। उनके हाथ में एक पुराना, मटमैला सा अंतर्देशीय पत्र था।

“क्या हुआ पापा? सब ठीक है?” छोटे बेटे विवेक ने टोस्ट पर बटर लगाते हुए पूछा।

विक्रमजीत ने एक गहरी सांस ली। “कुछ ठीक नहीं है। मेरे बचपन के दोस्त और मेरे अर्दली रहे सुबेदार किशन सिंह का खत आया है। वह अब गांव में रहता है।”

“तो? कोई पैसे मांग लिए क्या?” कृतिका ने तंज कसते हुए बीच में ही बोल दिया। मोहिनी ने कृतिका को एक सख्त नज़र से देखा, जिससे वह चुप हो गई।

विक्रमजीत ने बात आगे बढ़ाई, “किशन का बेटा शहर में मजदूरी करता था, पर पिछले हफ्ते एक हादसे में वह नहीं रहा। अब किशन और उसकी पत्नी बिल्कुल अकेले हैं। उनकी पुश्तैनी ज़मीन, जिस पर उनका छोटा सा घर है, वह भी गांव का साहूकार हड़पने की धमकी दे रहा है क्योंकि बेटे के इलाज के लिए उन्होंने कर्ज़ लिया था। अगर पंद्रह दिन में कर्ज़ नहीं चुकाया, तो वे इस बुढ़ापे में बेघर हो जाएंगे।”

रोहन ने लापरवाही से कहा, “सैड न्यूज है पापा। पर हम क्या कर सकते हैं? दुनिया में बहुत दुख है।”

विक्रमजीत ने अपनी कुर्सी सीधी की और दृढ़ता से बोले, “मैंने फैसला किया है। मैं किशन का पूरा कर्ज़ उतारूंगा। उसे कुल आठ लाख रुपये की ज़रूरत है। और सिर्फ इतना ही नहीं, मैं चाहता हूं कि किशन और उसकी पत्नी यहाँ, हमारे आधुनिक सर्वेंट क्वार्टर में आकर रहें। वहाँ वे सुकून से रह सकेंगे।”

पूरे डाइनिंग रूम में सन्नाटा छा गया। चम्मच प्लेट से टकराने की आवाज़ भी जैसे गूंज गई।

कृतिका और छोटी बहू सिमरन की आंखें फटी की फटी रह गईं। आठ लाख रुपये? और ऊपर से दो बूढ़े लोगों को घर में रखना?

“पापा, आप होश में तो हैं?” विवेक ने थोड़ा ऊँची आवाज़ में कहा। “आठ लाख कोई छोटी रकम नहीं होती। और आप उस आदमी को यहाँ ला रहे हैं? यह घर है या कोई धर्मशाला? हम अपनी प्राइवेसी चाहते हैं। घर में बाहरी लोगों का परमानेंट डेरा हमें बर्दाश्त नहीं होगा।”

कृतिका ने आग में घी डाला, “और पापा, अगले महीने हमें नई कार लेनी है, हमने सोचा था आप कुछ हेल्प करेंगे। आप वह पैसा एक ऐसे आदमी पर लुटा रहे हैं जो आपका रिश्तेदार भी नहीं है?”

मोहिनी, जो अब तक चुप थीं, बोलीं, “रिश्ते खून से नहीं, अहसासों से बनते हैं बहू। जब तुम्हारे ससुर 1971 की जंग में घायल होकर बर्फीली पहाड़ियों में गिर गए थे, तब यही किशन उन्हें अपनी पीठ पर लादकर दस किलोमीटर तक चला था। अगर किशन न होता, तो आज न विक्रम होते, न तुम लोग होते, और न यह जायदाद होती।”

“वह सब पुरानी बातें हैं मम्मी,” रोहन झुंझलाया। “उसने अपनी ड्यूटी की थी। उसके लिए उसे सरकार से तनख्वाह मिलती थी। इसका मतलब यह नहीं कि हम जीवन भर उसका ठेका ले लें। यह प्रैक्टिकल दुनिया है। इमोशन्स से पेट नहीं भरता।”

विक्रमजीत ने मेज पर हाथ मारा। उनकी आंखों में एक कर्नल का रूतबा जाग उठा था।

“बस!” उनकी आवाज़ में इतनी कड़क थी कि दोनों बेटे सहम गए। “मैं तुमसे राय नहीं मांग रहा हूं, अपना फैसला सुना रहा हूं। यह घर, यह पैसा, सब मेरी कमाई का है। मैंने तुम लोगों को पढ़ाया, लिखाया, काबिल बनाया, यह मेरा फर्ज था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम मेरे फैसलों के मालिक बन जाओ।”

“लेकिन पापा, लोग क्या कहेंगे कि आपने नौकर को घर में रखा है?” सिमरन ने दबी ज़बान में विरोध किया।

विक्रमजीत ने एक फीकी हंसी हंसी। “लोग? वही लोग न, जो कल हमें नाचते हुए देखकर हंस रहे थे? मुझे उन लोगों की परवाह नहीं है। मुझे परवाह उस इंसान की है जिसने मेरी जान बचाई। और सुन लो, कल मैं बैंक जा रहा हूं पैसे ट्रांसफर करने। और परसों किशन और उसकी पत्नी यहाँ आ रहे हैं। अगर तुम लोगों को उनके साथ रहने में शर्म आती है, तो तुम लोग अपने लिए अलग इंतजाम करने को आज़ाद हो।”

इतना कहकर विक्रमजीत उठ खड़े हुए। मोहिनी भी उनके साथ खड़ी हो गईं। दोनों वहां से चले गए, और पीछे छोड़ गए एक भारी सन्नाटा।

शाम को घर का माहौल तनावपूर्ण था। बेटे और बहुएं अपने कमरों में बंद थे, शायद आपस में ही बड़बड़ा रहे थे कि ‘बुड्ढे-बुढ़िया सठिया गए हैं’।

विक्रमजीत अपने बगीचे में बैठे थे, थोड़े उदास। मोहिनी दो कप चाय लेकर आईं।

“क्या सोच रहे हैं कर्नल साहब? कि बच्चों को बुरा लगा?” मोहिनी ने उनके बगल में बैठते हुए पूछा।

विक्रमजीत ने मुस्कुराने की कोशिश की। “नहीं मोहिनी। मुझे इस बात का दुख नहीं कि उन्हें बुरा लगा। मुझे दुख इस बात का है कि हमने उन्हें ‘सफल’ तो बना दिया, पर ‘इंसान’ नहीं बना पाए। वे पैसों का हिसाब तो जानते हैं, पर रिश्तों की कीमत नहीं जानते।”

तभी गेट पर एक ऑटो रुका। उसमें से एक बहुत ही वृद्ध व्यक्ति, जिसने धोती-कुर्ता पहन रखा था, और एक वृद्ध महिला उतरे। उनके हाथ में एक टिन का बक्सा और एक पोटली थी।

यह किशन था।

विक्रमजीत ने जैसे ही उसे देखा, वे अपनी छड़ी छोड़कर गेट की तरफ लपके। किशन ने झुककर उनके पैर छूने चाहे, लेकिन विक्रमजीत ने उसे उठाकर गले लगा लिया। दोनों बूढ़े दोस्तों की आंखों से आंसू बह रहे थे। कोई शब्द नहीं बोले गए, बस सिसकियाँ थीं जो सालों की दूरी को पाट रही थीं।

ऊपर बालकनी से रोहन और विवेक यह सब देख रहे थे। उन्होंने देखा कि उनके पिता, जो हमेशा सख्त और अनुशासित रहते थे, आज एक गरीब, फटेहाल आदमी के गले लगकर बच्चों की तरह रो रहे हैं।

किशन ने रोते हुए अपनी पोटली खोली। उसमें से उसने एक पुराना, जंग लगा हुआ पीतल का लोटा और घर के बने हुए घी का डिब्बा निकाला।

“साहब,” किशन की आवाज़ कांप रही थी, “मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है। बस यह गांव का घी लाया हूं, आपको बहुत पसंद था न बॉर्डर पर? और यह… यह वही लोटा है जिसमें आपने मुझे पानी पिलाया था जब मुझे गोली छूकर निकली थी। मैंने इसे आज तक संभाल कर रखा है।”

विक्रमजीत ने वह घी का डिब्बा ऐसे थामा जैसे कोई बेशकीमती खजाना हो।

यह दृश्य देखकर बालकनी में खड़े रोहन के गले में कुछ अटक सा गया। उसने देखा कि उसके पिता के चेहरे पर जो सुकून और खुशी अब थी, वह उस वक्त भी नहीं थी जब रोहन ने अपनी पहली ऑडी कार खरीदी थी। कृतिका भी चुप थी। उसने हमेशा चीजों की कीमत देखी थी, पर आज वह भावनाओं का मोल देख रही थी।

मोहिनी ने आगे बढ़कर किशन की पत्नी को गले लगाया और उन्हें अंदर ले जाने लगीं।

रात के खाने के समय, डाइनिंग टेबल पर एक अजीब सा बदलाव था। विक्रमजीत ने किशन और उसकी पत्नी को मेज पर अपने साथ बैठाया था। कृतिका और सिमरन रसोई में थीं। विक्रमजीत को लगा कि शायद बहुएं विरोध स्वरूप खाना नहीं परोसेंगी।

लेकिन तभी कृतिका बाहर आई। उसके हाथ में चांदी की थाली थी। उसने बड़े आदर के साथ पहली रोटी किशन की थाली में परोसी।

“काका, घी कम तो नहीं है?” कृतिका ने धीरे से पूछा।

विक्रमजीत चौंक गए। उन्होंने देखा कि रोहन भी पीछे खड़ा था, नज़रे झुकाए हुए।

“पापा,” रोहन ने गला साफ करते हुए कहा, “मैंने… मैंने किशन काका के रहने के लिए आउटहाउस की सफाई करवा दी है। और… और अगर उन्हें कोई मेडिकल चेकअप चाहिए तो मेरा दोस्त डॉक्टर है, मैं कल ही अपॉइंटमेंट ले लूंगा।”

विक्रमजीत की आंखों में एक नई चमक आ गई। उन्होंने मोहिनी की तरफ देखा। मोहिनी की आंखों में भी विजय की मुस्कान थी।

“अरे, रहने दे आउटहाउस,” विक्रमजीत ने हंसते हुए कहा, “आज रात तो यार-दोस्त महफिल जमाएंगे। क्यों किशन? वो पुराना गाना याद है जो हम बंकर में गाते थे?”

किशन ने अपने पोपले मुंह से हंसते हुए कहा, “जी साहब! ‘ज़िंदगी एक सफर है सुहाना…'”

और उस रात ‘गुलमोहर विला’ में फिर से संगीत गूंज उठा। लेकिन इस बार सिर्फ ग्रामोफोन नहीं बज रहा था, बल्कि दो पीढ़ियों के बीच की दीवार ढहने का संगीत भी बज रहा था। बच्चे समझ चुके थे कि उनके माता-पिता ने अपनी कमाई लुटाई नहीं थी, बल्कि एक ऐसा निवेश किया था जिसका रिटर्न ‘सुकून’ और ‘दुआओं’ के रूप में मिलता है, जिसे कोई बैंक नहीं दे सकता।

रात के बारह बजे, जब सब सोने चले गए, तो मोहिनी ने विक्रमजीत से कहा, “कर्नल साहब, आपने फिर जीत लिया।”

विक्रमजीत ने अपनी विंटेज हैट को टेबल पर रखते हुए कहा, “जंग और प्यार में, जो दिल से लड़ता है, वही जीतता है मोहिनी। और आज हमारे बच्चों ने भी दिल से सोचना शुरू कर दिया है। इससे बड़ी जीत और क्या होगी?”

बाहर बारिश फिर शुरू हो गई थी, लेकिन अंदर का मौसम अब बहुत खुशनुमा था।

मूल लेखिका : करुणा मलिक

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