यह दुनिया आपकी ‘रूल बुक’ से नहीं चलती – अर्चना खंडेलवाल 

सफेद रंग की ऑडी कार गैराज में आकर रुकी। अमित ने गाड़ी से उतरते ही जोर से दरवाजा बंद किया। उसके चेहरे पर तनाव साफ़ दिख रहा था। वह तेज कदमों से घर के अंदर दाखिल हुआ।

ड्राइंग रूम में उसके पिता, रघुवीर जी, अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे एक डायरी में कुछ हिसाब लिख रहे थे। उनके पास ही चाय का कप रखा था, जिससे भाप निकलनी बंद हो चुकी थी। रघुवीर जी रिटायर्ड बैंक मैनेजर थे। नब्बे के दशक में उनका शहर में एक रूतबा हुआ करता था, लेकिन रिटायरमेंट के दस साल बाद अब उनकी दुनिया इस घर की चारदीवारी और पुरानी फाइलों तक सिमट कर रह गई थी।

अमित को गुस्से में अंदर आते देख रघुवीर जी ने चश्मा नाक पर नीचे खिसकाया।

“आ गए बेटा? आज थोड़ी देर हो गई?” रघुवीर जी ने सहज भाव से पूछा।

अमित ने अपना लैपटॉप बैग सोफे पर पटका और पानी का जग उठाकर सीधे मुंह से लगा लिया। पानी पीने के बाद उसने एक गहरी सांस ली और पिता की ओर मुड़ा।

“पापा, मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि आप मिस्टर शर्मा (पड़ोसी) से बहस मत किया कीजिये? आज फिर उन्होंने मुझे ऑफिस में कॉल किया था। कह रहे थे कि आपने उनकी पार्किंग वाली जगह पर गमले रखवा दिए हैं। मुझे क्लाइंट मीटिंग छोड़कर उनकी बकवास सुननी पड़ी। आपको समझ नहीं आता कि मेरी इमेज का सवाल है?”

रघुवीर जी ने अपनी डायरी बंद कर दी। उनके चेहरे पर एक हल्की सी शिकन आई।

“बेटा, मैंने गमले उनकी जगह पर नहीं रखे थे। वो हमारी ही बाउंड्री वॉल के अंदर थे। शर्मा जी की गाड़ी का बंपर हमारे गेट से टकरा रहा था, इसलिए मैंने एहतियातन वहां गमले रखवाए ताकि वो गाड़ी पीछे न लें। और रही बात बहस की, तो मैंने सिर्फ उन्हें नियम समझाया था।”

“नियम! नियम! नियम!” अमित झल्ला उठा। “पापा, आप बैंक से रिटायर हो चुके हैं। यह दुनिया आपकी ‘रूल बुक’ से नहीं चलती। शर्मा जी आरडब्ल्यूए (RWA) के प्रेसिडेंट हैं। उनसे पंगा लेना मतलब सोसाइटी में रहना मुश्किल करना। आप बस घर में शांति से क्यों नहीं बैठते? क्यों हर छोटी-बड़ी चीज़ में अपनी टांग अड़ाते हैं?”

रसोई से अमित की पत्नी, शिखा, बाहर आई। हाथ में तौलिया लिए।

“अरे अमित, आते ही शुरू हो गए? पापाजी ने तो बस घर की भलाई के लिए किया था,” शिखा ने ससुर का पक्ष लेने की कोशिश की।

“तुम चुप रहो शिखा,” अमित ने उंगली दिखाई। “तुम्हें नहीं पता बाहर दुनिया कैसे चलती है। और पापा, प्लीज… कल घर पर पेंटर आने वाले हैं। मैंने उनसे बात कर ली है कि कौन सा कलर होगा। आप उन्हें अपने ‘सस्ते और टिकाऊ’ वाले लेक्चर मत दीजियेगा। मुझे मेरे घर का इंटीरियर क्लासिक चाहिए, सरकारी दफ्तर जैसा नहीं।”

रघुवीर जी का हाथ कांप गया। ‘मेरा घर’। अमित ने कितनी आसानी से कह दिया था ‘मेरा घर’। जबकि इस घर की ज़मीन रघुवीर जी ने अपनी पीएफ की रकम से खरीदी थी, ईंट-ईंट उन्होंने अपनी निगरानी में जुड़वाई थी। बस दो साल पहले, टैक्स बचाने के लिए उन्होंने घर के कागज़ात अमित के नाम ट्रांसफर कर दिए थे।

रघुवीर जी ने धीरे से कहा, “अमित, मैं सिर्फ यह कह रहा था कि एशियन पेंट्स का वो रॉयल वाला शेड ज्यादा चलता है, और वो पेंटर नया है, उसे…”

“पापा!” अमित चिल्लाया। उसकी आवाज़ में एक ऐसी हिकारत थी जिसने रघुवीर जी को अंदर तक छलनी कर दिया। “मुझे पता है क्या बेस्ट है। मैं लाखों कमाता हूँ, मेरे पास बेस्ट आर्किटेक्ट हैं। आपका ज़माना गया। अब आप बस आराम कीजिये। हर बात में अपनी राय थोपना बंद कीजिये। आपकी वजह से मुझे शर्मिंदा होना पड़ता है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा जो शोर से ज्यादा चुभता है।

रघुवीर जी धीरे से अपनी कुर्सी से खड़े हुए। उन्होंने अपनी डायरी उठाई। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरा, अथाह शून्य था।

उन्होंने कांपती हुई आवाज़ में, लेकिन बेहद स्पष्ट शब्दों में पूछा,

“मेरी कोई इज्जत नहीं है क्या??”

अमित हक्का-बक्का रह गया। उसने पिता को कभी इस टोन में बात करते नहीं सुना था।

“क्या?” अमित बुदबुदाया।

रघुवीर जी ने डायरी मेज पर रख दी।

“मैंने पूछा, इस घर में, तुम्हारे जीवन में, मेरी कोई इज्जत नहीं है क्या? या मैं सिर्फ एक पुराना फर्नीचर हूँ जिसे तुम जब चाहो कोने में खिसका देते हो और जब चाहो उस पर धूल जमने की शिकायत करते हो?”

“पापा, आप ड्रामा कर रहे हैं,” अमित ने नज़रें चुराते हुए कहा। “मेरा वो मतलब नहीं था।”

“तुम्हारा वही मतलब था अमित,” रघुवीर जी की आवाज़ अब थोड़ी ऊंची हो गई थी। “पिछले छः महीनों से देख रहा हूँ। मैंने बिजली का बिल चेक किया तो तुमने कहा ‘पापा आपको समझ नहीं आएगा’। मैंने माली को खाद डालने को कहा तो तुमने उसे मना कर दिया क्योंकि ‘गूगल’ कुछ और कह रहा था। आज मैंने घर की सुरक्षा के लिए पड़ोसी से बात की, तो तुम्हें शर्मिंदगी महसूस हुई? मैंने तुम्हें चलना सिखाया, और आज तुम्हें मेरे साथ चलने में शर्म आती है?”

“पापा, जनरेशन गैप है…”

“जनरेशन गैप विचारों में होता है अमित, सम्मान में नहीं,” रघुवीर जी ने उसे बीच में ही काट दिया। “मैं रिटायर हुआ हूँ, मेरा दिमाग नहीं। मैं आज भी वही रघुवीर प्रसाद हूँ जिसके दस्तखत के बिना शहर के बड़े-बड़े लोन पास नहीं होते थे। और तुम… तुम आज जो भी हो, जिस स्कूल में पढ़े, जिस कॉलेज में गए, वो इसी ‘पुराने ज़माने’ के आदमी की मेहनत थी। आज तुम मुझे मेरे ही घर में पराया महसूस करा रहे हो?”

रघुवीर जी की सांस फूलने लगी। शिखा दौड़कर पानी लाई। “पापाजी, शांत हो जाइये। अमित का वो मतलब नहीं था।”

रघुवीर जी ने हाथ के इशारे से पानी मना कर दिया।

“नहीं शिखा। आज बात हो जाने दो। इज्जत पैसे से नहीं कमाई जाती अमित। इज्जत कमाई जाती है तजुर्बे से, संस्कारों से। तुमने दीवारों पर महंगा पेंट तो लगवा लोगे, लेकिन उस घर की नींव मैं हूँ। अगर नींव हिल गई, तो तुम्हारा यह ‘क्लासिक इंटीरियर’ भी नहीं टिकेगा।”

रघुवीर जी मुड़े और अपने कमरे में चले गए। दरवाजा बंद होने की आवाज़ ने अमित के अहंकार पर एक चोट की, पर उसने उसे नजरअंदाज कर दिया।

“बुढ़ापे में सब ऐसे ही हो जाते हैं,” अमित बड़बड़ाया और अपने कमरे में चला गया।

अगले तीन दिन तक घर में एक अजीब सी खामोशी रही। रघुवीर जी अपने कमरे से बहुत कम निकलते। वे खाना खाते और वापस चले जाते। उन्होंने न तो पेंटर को टोका, न माली को, और न ही शर्मा जी से कोई बात की। अमित को लगा कि चलो, शांति हो गई। पापा समझ गए।

चौथे दिन अमित के ऑफिस में एक बड़ा संकट आ गया।

अमित एक रियल एस्टेट कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था। उसका एक बड़ा प्रोजेक्ट, जो शहर के बाहरी इलाके में बन रहा था, कानूनी पचड़े में फंस गया था। जमीन के पुराने कागज़ात में कुछ गड़बड़ी थी और स्थानीय तहसीलदार ने काम रुकवा दिया था। करोड़ों का प्रोजेक्ट दांव पर था। अमित पिछले दो दिनों से वकीलों और दलालों के चक्कर काट रहा था, लेकिन कोई हल नहीं निकल रहा था। तहसीलदार बहुत सख्त था और रिश्वत लेने को तैयार नहीं था।

शाम को अमित घर लौटा तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। वह सोफे पर सिर पकड़कर बैठ गया।

शिखा चाय लेकर आई। “क्या हुआ अमित? बहुत परेशान लग रहे हो?”

“बर्बाद हो गया शिखा,” अमित ने हताशा में कहा। “तहसीलदार काम नहीं करने दे रहा। अगर कल तक एनओसी (NOC) नहीं मिली, तो इन्वेस्टर हाथ खींच लेंगे। मेरी नौकरी भी जा सकती है। मैंने हर कोशिश कर ली। कोई जुगाड़ नहीं चल रहा।”

रघुवीर जी अपने कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर आए। वे पानी पीने किचन जा रहे थे। उन्होंने अमित की बात सुन ली थी। वे चुपचाप पानी पीकर वापस जाने लगे।

“पापा…” अमित के मुंह से अनायास निकल गया।

रघुवीर जी रुके। उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

अमित की हिम्मत नहीं हो रही थी, लेकिन डूबते को तिनके का सहारा। “पापा, वो… खन्ना जी। तहसीलदार खन्ना जी। वो आपके बैंक में थे न पहले?”

रघुवीर जी धीरे से मुड़े। “हां। हरीश खन्ना। मेरा जूनियर था। क्यों?”

अमित खड़ा हो गया। “पापा, वो अब तहसीलदार है। उसी ने मेरा प्रोजेक्ट रोका है। क्या आप… क्या आप उससे बात कर सकते हैं? प्लीज पापा। मेरी नौकरी का सवाल है।”

रघुवीर जी ने अमित को देखा। वही अमित जो तीन दिन पहले कह रहा था कि ‘आपका ज़माना गया’।

“तुम्हारे पास बेस्ट वकील हैं न अमित? बेस्ट आर्किटेक्ट हैं? पैसा है? तो फिर इस ‘रिटायर्ड’ आदमी की क्या ज़रूरत?” रघुवीर जी ने शांत स्वर में पूछा।

अमित की नज़रें झुक गईं। “पापा, पैसा काम नहीं आ रहा। वो… वो ईमानदार आदमी है। वो किसी की नहीं सुन रहा।”

रघुवीर जी एक पल के लिए चुप रहे। फिर वे अपनी अलमारी की तरफ गए। उन्होंने अपना पुराना कोट निकाला और पहना।

“चलो,” उन्होंने कहा।

“अभी?” अमित हैरान था। “रात के आठ बज रहे हैं।”

“वो उसका घर है। मुझे पता है वो कहाँ रहता है। चलो,” रघुवीर जी ने आदेश दिया।

अमित ने चुपचाप गाड़ी निकाली। रास्ते भर कोई बात नहीं हुई। अमित बार-बार साइड मिरर में पिता को देख रहा था। रघुवीर जी का चेहरा भावशून्य था।

वे एक सरकारी कॉलोनी में पहुंचे। हरीश खन्ना के घर की घंटी बजाई।

दरवाजा खुला। सामने हरीश खन्ना खड़े थे। सफेद कुर्ते-पायजामे में। जैसे ही उनकी नज़र रघुवीर जी पर पड़ी, उनके चेहरे पर जो भाव आया, उसे देखकर अमित हैरान रह गया।

“रघुवीर सर!” हरीश खन्ना ने झुककर रघुवीर जी के पैर छुए। “अरे सर, आप यहाँ? आपने फोन कर दिया होता, मैं खुद आ जाता।”

“बस हरीश, इस तरफ से गुजर रहा था तो सोचा मिलता चलूँ,” रघुवीर जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

हरीश उन्हें आदर के साथ अंदर ले गए। ड्राइंग रूम में बिठाया, खुद उनके लिए पानी लाए। अमित कोने में खड़ा यह सब देख रहा था। जिस तहसीलदार से मिलने के लिए अमित दो दिन से अपॉइंटमेंट की भीख मांग रहा था, वह उसके पिता के सामने एक आज्ञाकारी छात्र की तरह खड़ा था।

“और सुनाओ हरीश, कैसा चल रहा है सब?” रघुवीर जी ने पूछा।

“सब आपकी दुआ है सर। आपने बैंक में जो सिखाया, वही ईमानदारी आज भी काम आ रही है,” हरीश ने कहा। “बताइये सर, कैसे आना हुआ?”

रघुवीर जी ने अमित की तरफ इशारा किया। “यह मेरा बेटा है, अमित। इसका कोई प्रोजेक्ट है तुम्हारे इलाके में। कुछ कागज़ी दिक्कत आ रही है।”

हरीश ने अमित को देखा। उसका रवैया तुरंत बदल गया, थोड़ा सख्त हो गया। “अच्छा, तो आप हैं ‘स्काईलाइन डेवलपर्स’ वाले? मिस्टर अमित, आपके कागज़ात में पुरानी रजिस्ट्री की चेन मिसिंग है।”

अमित कुछ बोलने ही वाला था कि रघुवीर जी बोले, “हरीश, कागज़ मैं देखूँगा। अगर कुछ गलत होगा तो मैं खुद इसे मना कर दूंगा। लेकिन अगर सिर्फ कोई तकनीकी पेंच है जिसे सुलझाया जा सकता है, तो देख लो। मैं गवाह हूँ कि ज़मीन सही है।”

हरीश खन्ना ने एक पल के लिए रघुवीर जी को देखा। फिर मुस्कुराया।

“सर, अगर आप कह रहे हैं, तो बात ही खत्म हो गई। आपके शब्द से बड़ा कोई स्टांप पेपर नहीं है मेरे लिए। आपने ही मुझे सिखाया था कि नियम इंसान की मदद के लिए होते हैं, उसे फंसाने के लिए नहीं।”

हरीश ने अपनी फाइल उठाई और एक नोट लिखा। “कल सुबह अपने वकील को भेज दीजियेगा अमित जी। काम हो जाएगा।”

अमित को विश्वास नहीं हो रहा था। जो काम करोड़ों रुपये नहीं कर पाए, वो उसके पिता की ‘साख’ ने पांच मिनट में कर दिया।

वापसी में गाड़ी में सन्नाटा था, लेकिन यह सन्नाटा अलग था। यह भारी नहीं, बल्कि सुकून देने वाला था।

घर पहुँचकर अमित ने गाड़ी पार्क की। रघुवीर जी उतरकर अंदर जाने लगे।

“पापा,” अमित ने पीछे से पुकारा।

रघुवीर जी रुके।

अमित उनके पास आया। उसकी आँखों में आंसू थे। वह घुटनों के बल बैठ गया और पिता के पैर पकड़ लिए।

“मुझे माफ़ कर दीजिये पापा। मैं… मैं बहुत बड़ा गधा हूँ। मुझे लगा कि दुनिया सिर्फ स्मार्टनेस और पैसे से चलती है। मैं भूल गया था कि साख बनाने में पूरी ज़िंदगी लग जाती है, और वो साख बाज़ार में नहीं मिलती।”

रघुवीर जी ने अमित के कंधे पर हाथ रखा और उसे उठाया।

“बेटा, पैसा कमाना आसान है, नाम कमाना मुश्किल। और घर में बड़ों की इज्जत इसलिए नहीं की जाती कि वो पैसे कमाते हैं, बल्कि इसलिए की जाती है क्योंकि जब दुनिया तुम्हें ठुकरा देती है, तो उनका तजुर्बा ही तुम्हें बचाता है।”

अमित ने सिर झुका लिया। “आज मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया पापा। आपकी इज्जत… आपकी इज्जत इतनी है कि उसके आगे मेरी पूरी हैसियत कुछ भी नहीं।”

रघुवीर जी ने उसे गले लगा लिया। “बस बेटा, घर को घर ही रहने दो। इसे ऑफिस मत बनाओ। और शर्मा जी से कल माफ़ी मांग लेना, वो गमले मैंने इसलिए रखवाए थे क्योंकि उनकी गाड़ी का पिछला हिस्सा हमारे गेट से रगड़ खाता था, नुकसान उनका ही होता।”

अमित हंसा। एक हल्की, शर्मिंदा हंसी। “आप सही थे पापा। आप हमेशा सही होते हैं।”

अगले दिन सुबह, जब पेंटर आया, तो अमित ने उससे कहा, “भैया, कलर और शेड के लिए पापा से पूछ लो। जो वो कहेंगे, वही फाइनल होगा।”

रघुवीर जी अपनी आराम कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। उन्होंने चश्मा नीचे किया और अमित की तरफ देखा। अमित ने मुस्कुराकर ‘थम्स अप’ किया।

घर वही था, दीवारें वही थीं, लेकिन आज उस घर की नींव पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई थी। रघुवीर जी को अपनी इज्जत वापस मिल गई थी, और अमित को… अमित को उसका पिता वापस मिल गया था।

मूल लेखिका : अर्चना खंडेलवाल 

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