“ये क्या बात हुई मम्मी जी? मैं आपके पूरे घर के लोगों के लिए सोचूं … – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

” ये क्या बात हुई मम्मी जी? मैं आपके पूरे घर के लोगों के लिए सोचूं। और आप लोग मेरे बारे में बिल्कुल भी ना सोचो।

अब घर में मेहमान हों और घर की बहू कमरे में कुंडी लगाकर बैठी रहे, यह अच्छा लगता है क्या? लोग क्या कहेंगे? कि भाई-भाभी ने स्वागत नहीं किया?”

“पर मम्मी जी, यह सिर्फ तीन घंटे की बात है,” वंदना ने समझाने की कोशिश की। “मैंने शाही पनीर की तैयारी कर दी है। गाजर घिस दी है। बस छौंकना और पकाना बाकी है। वह मैं मीटिंग के बाद कर लूँगी। या मयंक कर लेंगे।”

मयंक, जो अभी-अभी अपनी नीली शर्ट पहनकर बाहर आया था, यह सुनकर चौंक गया। “मैं? वंदना, तुम्हें पता है न मुझे ऑफिस से आने में देर हो जाएगी। और वैसे भी, कुकिंग मेरा डिपार्टमेंट नहीं है।”

वंदना ने मयंक की ओर देखा। “मयंक, यह प्रोजेक्ट मुझे फ्रीलांस से फुल-टाइम जॉब दिला सकता है। सैलरी तुम्हारी सैलरी के बराबर होगी। क्या तुम एक शाम के लिए सिर्फ़ मेहमानों को अटेंड नहीं कर सकते?”

मयंक ने घड़ी देखी। “वंदना, प्लीज़ ड्रामा मत करो। दीदी आ रही हैं। तुम अपनी मीटिंग रिशेड्यूल कर लो। या फिर कल कर लेना।”

“यह क्लाइंट मीटिंग है मयंक, सब्जी मंडी का भाव नहीं जो कल कर लूँ,” वंदना की आवाज़ में तल्खी आ गई।

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सुबह के नौ बज रहे थे और ‘गुप्ता निवास’ में युद्ध स्तर की हलचल थी। कुकर की सीटी, मिक्सर की घरघराहट और बाथरूम से आती पानी की आवाज़—सब एक साथ गूंज रहे थे। इस पूरे ऑर्केस्ट्रा की कंडक्टर थी वंदना।

वंदना एक हाथ से टिफिन पैक कर रही थी और दूसरे हाथ से ससुर जी की शुगर की दवाई की शीशी ढूंढ रही थी।

“वंदना! मेरी नीली वाली शर्ट नहीं मिल रही!” बेडरूम से उसके पति, मयंक की आवाज़ आई।

“अलमारी के दूसरे रैक में, दाईं तरफ प्रेस करके रखी है,” वंदना ने बिना पलटे जवाब दिया और साथ ही सास, कुसुम जी के हाथ में अदरक वाली चाय का कप थमाया।

“बहू, चाय में चीनी थोड़ी कम है आज,” कुसुम जी ने एक घूंट लेते ही मुंह बनाया। “और सुन, आज खाने में लौकी मत बनाना। तेरी ननद, नेहा आ रही है दोपहर तक। उसे शाही पनीर पसंद है। और हाँ, शाम को उसके बच्चों के लिए गाजर का हलवा भी बना देना।”

वंदना का हाथ एक पल के लिए रुका। उसके माथे पर पसीने की एक बूंद आ गई थी। आज की तारीख… 15 अक्टूबर।

“मम्मी जी, नेहा दीदी आ रही हैं, यह तो अच्छी बात है,” वंदना ने संयत स्वर में कहा। “लेकिन मैंने आपको पिछले हफ्ते ही बताया था न कि आज शाम को मेरा ‘वेब डिज़ाइनिंग’ का फाइनल प्रेजेंटेशन है। मुझे तीन घंटे के लिए अपने कमरे में लॉक रहना होगा। क्लाइंट अमेरिका से हैं, यह मेरे करियर का अब तक का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है।”

कुसुम जी ने चाय का कप मेज पर रखा और चश्मा ठीक करते हुए बहू को ऐसे देखा जैसे उसने कोई पाप कर दिया हो।

“अरे हाँ, वो तेरा कंप्यूटर वाला काम,” कुसुम जी ने लापरवाही से कहा। “पर बेटा, नेहा छह महीने बाद मायके आ रही है। दामाद जी भी साथ हैं। अब घर में मेहमान हों और घर की बहू कमरे में कुंडी लगाकर बैठी रहे, यह अच्छा लगता है क्या? लोग क्या कहेंगे? कि भाई-भाभी ने स्वागत नहीं किया?”

“पर मम्मी जी, यह सिर्फ तीन घंटे की बात है,” वंदना ने समझाने की कोशिश की। “मैंने शाही पनीर की तैयारी कर दी है। गाजर घिस दी है। बस छौंकना और पकाना बाकी है। वह मैं मीटिंग के बाद कर लूँगी। या मयंक कर लेंगे।”

मयंक, जो अभी-अभी अपनी नीली शर्ट पहनकर बाहर आया था, यह सुनकर चौंक गया। “मैं? वंदना, तुम्हें पता है न मुझे ऑफिस से आने में देर हो जाएगी। और वैसे भी, कुकिंग मेरा डिपार्टमेंट नहीं है।”

वंदना ने मयंक की ओर देखा। “मयंक, यह प्रोजेक्ट मुझे फ्रीलांस से फुल-टाइम जॉब दिला सकता है। सैलरी तुम्हारी सैलरी के बराबर होगी। क्या तुम एक शाम के लिए सिर्फ़ मेहमानों को अटेंड नहीं कर सकते?”

मयंक ने घड़ी देखी। “वंदना, प्लीज़ ड्रामा मत करो। दीदी आ रही हैं। तुम अपनी मीटिंग रिशेड्यूल कर लो। या फिर कल कर लेना।”

“यह क्लाइंट मीटिंग है मयंक, सब्जी मंडी का भाव नहीं जो कल कर लूँ,” वंदना की आवाज़ में तल्खी आ गई।

कुसुम जी ने हस्तक्षेप किया। “देखो बहू, पैसा-वैसा तो मयंक कमा ही रहा है। हमने तुझे काम करने से कभी रोका नहीं। लेकिन घर-परिवार पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। नेहा को बुरा लगेगा अगर तुम उसे टाइम नहीं दोगी। कैंसिल कर दो अपनी वो मीटिंग।”

वंदना को लगा जैसे किसी ने उसकी मेहनत, उसके सपनों और उसकी पहचान को एक ही झटके में डस्टबिन में डाल दिया हो। पिछले एक महीने से वह रातों को जागकर कोडिंग कर रही थी। उसने घर का एक काम भी नहीं छोड़ा था। सास के घुटनों की मालिश से लेकर ससुर के बैंक के काम तक, सब कुछ समय पर किया था, ताकि आज के दिन उसे वो तीन घंटे मिल सकें।

दोपहर के दो बज गए। नेहा और उसके पति समीर आ गए। घर में उत्सव जैसा माहौल था। वंदना ने चेहरे पर मुस्कान चिपकाकर सबका स्वागत किया। नाश्ता परोसा, शरबत पिलाया।

घड़ी की सुई चार पर पहुँच रही थी। उसकी मीटिंग साढ़े चार बजे थी।

वंदना रसोई में थी, बर्तनों के ढेर के बीच। नेहा किचन के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई। “भाभी, वो समोसे के साथ वाली हरी चटनी नहीं बनाई आपने? और मम्मा कह रही थीं आप गाजर का हलवा बनाने वाली हैं? बच्चे भूख से रो रहे हैं।”

वंदना ने गीले हाथ पोंछे। “दीदी, हलवे का सामान तैयार है। बस चढ़ाना है। मुझे अभी एक ज़रूरी कॉल के लिए जाना है। मैं आकर बना दूँगी।”

तभी कुसुम जी वहां आ गईं। “अरे, अभी तक हलवा नहीं चढ़ा? और तुम कमरे में जाने की बात कर रही हो? वंदना, शर्म नहीं आती? घर में ननद खड़ी है और तुम्हें अपने लैपटॉप की पड़ी है?”

“मम्मी जी, प्लीज़ समझिए…”

“मैं कुछ नहीं समझना चाहती!” कुसुम जी चिल्लाईं। “खबरदार जो तुम कमरे में गईं। पहले हलवा बनेगा, फिर पकौड़े बनेंगे शाम की चाय के लिए। तुम्हारा यह कंप्यूटर का खेल आज नहीं चलेगा। मैंने समीर दामाद जी से वादा किया है कि बहू के हाथ का खाना खिलाऊंगी। मेरी नाक मत कटवाओ।”

मयंक भी वहां आ गया, अपनी माँ के सुर में सुर मिलाते हुए। “वंदना, माँ सही कह रही हैं। तुम इतना सेल्फिश कैसे हो सकती हो?”

वंदना सुन्न रह गई। सेल्फिश? वह?

जो औरत पिछले पांच सालों से सुबह छह बजे उठकर रात के ग्यारह बजे तक मशीन की तरह खटती है, जिसने अपनी एमबीए की डिग्री को अलमारी में बंद कर दिया ताकि इस घर का “सिस्टम” चलता रहे, आज उसे ‘सेल्फिश’ कहा जा रहा था?

उसने एप्रन खोला और किचन स्लैब पर रख दिया। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक अंगार था जो आज वर्षों की बर्फ को पिघला रहा था।

वह पलटी और सीधे कुसुम जी की आंखों में देखा।

“ये क्या बात हुई मम्मी जी? मैं आपके पूरे घर के लोगों के लिए सोचूं। और आप लोग मेरे बारे में बिल्कुल भी ना सोचो?”

रसोई में सन्नाटा छा गया। नेहा और मयंक हैरान रह गए। वंदना कभी पलटकर जवाब नहीं देती थी।

“मैं पिछले एक हफ्ते से इस दिन की तैयारी कर रही थी,” वंदना ने अपनी आवाज़ ऊंची किए बिना, लेकिन बेहद सख्त लहजे में कहा। “मैंने आप सबके लिए मेनू प्लान किया, घर साफ़ किया, दवाइयां स्टॉक कीं। मैंने सिर्फ तीन घंटे मांगे थे। तीन घंटे! 24 घंटों में से। लेकिन आपके लिए मेरी करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि ‘कंप्यूटर का खेल’ है? और मेरे सपनों की कीमत ‘गाजर के हलवे’ से भी कम है?”

“जुबान लड़ाती है?” कुसुम जी ने कांपते हुए कहा।

“हाँ, लड़ा रही हूँ,” वंदना ने कहा। “क्योंकि अगर आज नहीं बोली तो शायद गूंगी हो जाऊंगी। आप सबको आदत हो गई है कि वंदना तो ‘सुपरवुमन’ है, उसे थकान नहीं होती, उसके कोई सपने नहीं हैं। लेकिन मैं भी इंसान हूँ मयंक। और आज मुझे यह प्रोजेक्ट चाहिए। किसी भी कीमत पर।”

वंदना ने किचन का दरवाजा पार किया।

“अगर तुम कमरे में गईं,” मयंक ने पीछे से चेतावनी दी, “तो सोचना मत कि इस घर में सब सामान्य रहेगा।”

वंदना रुकी। उसने मुड़कर देखा। “सामान्य तो वैसे भी कुछ नहीं है मयंक। जिस घर में एक औरत की पहचान सिर्फ रोटियों की गिनती से होती हो, वो घर ‘सामान्य’ नहीं, ‘जेल’ होता है। और आज मैं अपनी बेल खुद करा रही हूँ।”

वंदना अपने कमरे में गई और दरवाज़ा अंदर से लॉक कर लिया। उसने अपना हेडसेट लगाया और दुनिया के शोर को बाहर छोड़ दिया।

बाहर भूचाल आ गया।

कुसुम जी का बीपी बढ़ने लगा (या शायद बढ़ने का नाटक शुरू हुआ)। नेहा बच्चों को संभालते-संभालते झुंझला गई। “मम्मी, भाभी ने तो हद कर दी। अब हलवा कौन बनाएगा?”

“मैं नहीं जानता,” मयंक ने गुस्से में कहा। “स्विगी से मंगा लो।”

अगले तीन घंटे उस घर के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं थे।

समीर (दामाद जी) को चाय चाहिए थी। मयंक किचन में गया तो उसे चायपत्ती का डिब्बा नहीं मिला। चीनी की जगह उसने नमक डाल दिया। चाय पीकर समीर ने थूक दी।

नेहा बच्चों के लिए मैगी बनाने गई, तो उसने दूध उफान दिया। पूरा स्लैब गंदा हो गया।

कुसुम जी को अपनी शाम की दवाई नहीं मिल रही थी। “अरे, कोई तो देखो मेरी दवाई कहाँ है! वंदना कहाँ रखती थी?”

शाम के सात बजते-बजते घर का नज़ारा बदल चुका था। सिंक झूठे बर्तनों से भरा था। किचन में जला हुआ दूध और बिखरा हुआ आटा था। ड्राइंग रूम में बच्चे रो रहे थे। और मयंक, नेहा और कुसुम जी सोफे पर हताश बैठे थे। बाहर से मंगाया हुआ पिज़्ज़ा ठंडा पड़ा था क्योंकि किसी को खाने का मन नहीं था।

वे सब गुस्से में थे, लेकिन उस गुस्से के नीचे एक डर भी था—यह एहसास कि वंदना के बिना यह घर ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता है।

ठीक साढ़े सात बजे वंदना के कमरे का दरवाज़ा खुला।

वह बाहर आई। उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। थकान थी, लेकिन वह विजय की थकान थी। उसका प्रेजेंटेशन बहुत अच्छा गया था। क्लाइंट ने उसे तुरंत हायर कर लिया था।

वह ड्राइंग रूम में आई। सबने उसे ऐसे देखा जैसे किसी अपराधी को देख रहे हों।

“मीटिंग ख़त्म हो गई महारानी की?” कुसुम जी ने ताना मारा। “देख लिया घर का हाल? खुश हो अब?”

वंदना ने चारों तरफ देखा। बिखरा हुआ घर, सड़े हुए मुंह।

“मैं बहुत खुश हूँ मम्मी जी,” वंदना ने मुस्कुराते हुए कहा। “इसलिए नहीं कि घर गंदा है। बल्कि इसलिए क्योंकि आज मुझे मेरी मेहनत का फल मिल गया। मुझे कॉन्ट्रैक्ट मिल गया है।”

“तो हम क्या करें? आरती उतारें?” मयंक ने चिढ़कर कहा। “मेहमान भूखे बैठे हैं।”

वंदना सोफे के पास गई और अपनी हैंडबैग उठाई।

“नहीं, आरती उतारने की ज़रूरत नहीं है। और न ही अब मुझे किसी को सफाई देने की ज़रूरत है। नेहा दीदी, माफ़ कीजियेगा आपका स्वागत ठीक से नहीं हो पाया। लेकिन यह घर आपका भी है, और मम्मी जी का भी। उम्मीद है आप लोग संभाल लेंगे।”

“तुम कहाँ जा रही हो?” मयंक खड़ा हो गया।

“मैं अपनी जीत को सेलिब्रेट करने जा रही हूँ,” वंदना ने कहा। “अकेले। कॉफ़ी पीने। क्योंकि इस घर में तो मुझे सिर्फ ताने मिलेंगे। और हाँ, रात का खाना आप लोग बाहर से आर्डर कर लीजियेगा, मेरी सैलरी अब शुरू हो गई है, तो बिल मैं भर दूँगी।”

वंदना मुख्य द्वार की ओर बढ़ी।

“वंदना, अगर तुम दरवाज़े से बाहर गईं तो…” कुसुम जी ने अपनी पुरानी धमकी दोहराने की कोशिश की।

वंदना ने दरवाज़े का हैंडल पकड़ा और पलटकर कहा, “तो क्या मम्मी जी? घर गंदा रह जाएगा? दवाई नहीं मिलेगी? खाना नहीं बनेगा? देखिये, आज तीन घंटे में आपको पता चल गया कि ‘सिर्फ घर में रहने वाली’ बहू क्या-क्या करती है। यह घर मैंने अपनी रूह से सींचा था, लेकिन बदले में आपने मुझे कभी ‘अपना’ नहीं समझा, सिर्फ ‘उपयोगी’ समझा।”

उसने दरवाज़ा खोला।

“मैं दो घंटे बाद लौटूंगी। तब तक, अगर आप लोगों को मेरी ज़रूरत महसूस हुई हो, तो हम बात करेंगे। और अगर आपको लगे कि मैं गलत थी… तो मैं कल सुबह हमेशा के लिए अपने मायके चली जाऊंगी। फैसला आपका है।”

वंदना बाहर निकल गई। ठंडी हवा ने उसके चेहरे को छुआ। वह आज़ाद महसूस कर रही थी।

अंदर, सन्नाटा और भी गहरा हो गया था।

समीर, जो अब तक चुपचाप तमाशा देख रहा था, धीरे से बोला, “सासू माँ, बुरा मत मानियेगा, लेकिन भाभी सही कह रही हैं। हम सब जब आते हैं तो चाहते हैं कि वो मशीन की तरह खटें। लेकिन आज जब उनका इतना बड़ा दिन था, तो हम एक कप चाय खुद नहीं बना सके? यह उनका घर है या कोई होटल?”

नेहा ने सिर झुका लिया। उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था। उसने अपनी माँ की तरफ देखा। कुसुम जी के पास कोई जवाब नहीं था। उनकी दवाई की शीशी ठीक उनके सामने मेज पर रखी थी, लेकिन वंदना के बिना उन्हें वह दिखाई नहीं दी थी।

मयंक खिड़की के पास गया और बाहर जाती हुई वंदना को देखता रहा। उसे याद आया कि शादी से पहले वंदना कितनी चहकती थी, उसके कितने सपने थे। और आज, उसे अपनी एक उपलब्धि के लिए लड़ना पड़ा—अपनों से ही।

दो घंटे बाद जब वंदना वापस लौटी, तो घर का नज़ारा थोड़ा अलग था।

किचन साफ़ था (शायद नेहा और समीर ने मिलकर किया था)। डाइनिंग टेबल पर खाना लगा था (बाहर का नहीं, खिचड़ी बनी थी)।

वंदना चुपचाप अंदर आई।

कुसुम जी सोफे पर बैठी थीं। मयंक खड़ा था।

“आ गई?” मयंक ने पूछा। उसकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था।

“हम्म,” वंदना ने चाबियां रखीं।

मयंक ने एक लिफाफा आगे बढ़ाया। “यह लो।”

“क्या है?”

“समीर जीजाजी लाये थे, मिठाई का डिब्बा। तुम्हारी नई नौकरी के लिए,” मयंक ने नज़रें झुकाकर कहा। “और… और सॉरी। हमने वाकई तुम्हारे बारे में नहीं सोचा।”

कुसुम जी ने धीरे से कहा, “बहू, मेरी दवाई दे देना। और सुन… कल से सुबह का नाश्ता मयंक बनाएगा। तुझे अपनी वो कंप्यूटर वाली नौकरी भी तो करनी होगी।”

वंदना की आँखों में आँसू आ गए। इस बार खुशी के। उसने समझा कि कभी-कभी अपनों को जगाने के लिए थोड़ा कठोर होना पड़ता है। उसने वह एक सवाल पूछकर पूरे घर का नक्शा बदल दिया था।

उसने मिठाई का टुकड़ा उठाया और सास के मुंह में खिलाया। “थैंक यू मम्मी जी। बस, यही तो चाहिए था। थोड़ा सा मेरा ख्याल, बाकी सबका ख्याल तो मैं रख ही लूँगी।”

उस रात ‘गुप्ता निवास’ में फिर से शांति थी, लेकिन यह शांति मजबूरी की नहीं, सम्मान की थी। वंदना ने सिर्फ़ एक नौकरी नहीं पाई थी, उसने अपने घर में अपना खोया हुआ वजूद पा लिया था।

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वंदना ने सही किया या गलत?

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2️⃣ गलत किया— मेहमान पहले
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मूल लेखिका : डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

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