रविवार की दोपहर थी, लेकिन मिसेज कुसुम के घर का तापमान किसी ज्वालामुखी की तरह उबल रहा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी, जो खिड़कियों के कांच पर एक सुकून भरी थपकी दे रही थी, मगर घर के अंदर का माहौल इसके ठीक विपरीत था। ड्राइंग रूम में टीवी बंद पड़ा था, लेकिन कुसुम जी की आवाज़ किसी न्यूज एंकर की ब्रेकिंग न्यूज़ से ज्यादा तेज गूंज रही थी।
“बहुत हो गया समीर! अब और बर्दाश्त नहीं होता मुझसे। लगा फोन अपनी सास को। मैं भी तो पूछूँ समधन जी से… ये कैसे संस्कार दिए हैं बेटी को? भला कौन सी औरत है जो माँ नहीं बनना चाहती? शादी को तीन साल हो गए हैं, और मैडम को अभी भी अपना ‘करियर’ प्यारा है। अरे, करियर क्या साथ लेकर जाओगी ऊपर?”
कुसुम जी का चेहरा गुस्से से लाल था। वे सोफे पर बैठीं, अपनी साड़ी के पल्लू को बार-बार झटक रही थीं। उनके सामने सेंटर टेबल पर चाय के कप ठंडे हो चुके थे।
कमरे के दूसरे कोने में, डाइनिंग टेबल पर रिया अपना लैपटॉप खोले बैठी थी। उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर चल रही थीं, लेकिन उनकी रफ़्तार अब धीमी पड़ चुकी थी। कानों में हेडफोन लगे होने के बावजूद, सास का एक-एक शब्द किसी तीखे तीर की तरह उसके कानों को भेद रहा था। रिया एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर थी और कल उसकी एक बहुत महत्वपूर्ण प्रेजेंटेशन थी। लेकिन घर के इस ‘महाभारत’ ने उसका ध्यान भटका दिया था।
समीर, जो अब तक अपने फ़ोन में कुछ पढ़ने का नाटक कर रहा था, माँ के बढ़ते गुस्से को देखकर हड़बड़ा गया। वह उठकर कुसुम जी के पास आया और उनके कंधे पर हाथ रखकर उन्हें शांत करने की कोशिश की।
“माँ, प्लीज शांत हो जाओ। बीपी बढ़ जाएगा आपका। रिया काम कर रही है, उसे डिस्टर्ब हो रहा है। हम बाद में बात कर लेंगे न इस बारे में।”
“बाद में कब?” कुसुम जी ने समीर का हाथ झटक दिया। “तीन साल से ‘बाद में’ ही सुन रही हूँ। मेरी सहेली विमला को देख, दो पोते-पोतियों के साथ खेलती है। और एक मैं हूँ, जिसे अपने ही घर में बच्चे की किलकारी सुनने के लिए तरसना पड़ रहा है। और यह महारानी… इसे तो फुर्सत ही नहीं है अपनी मीटिंग्स से। समीर, मुझे नहीं पता, तू अभी फोन लगा सुशीला जी को। मैं आज फैसला करके रहूँगी।”
समीर ने बेबसी से रिया की तरफ देखा। रिया ने लैपटॉप की स्क्रीन से नज़रें नहीं हटाईं, लेकिन उसकी भींची हुई जबड़े की नसें बता रही थीं कि वह अपने गुस्से को काबू करने की कितनी कोशिश कर रही है।
कुसुम जी ने समीर के हाथ से फ़ोन छीना और खुद ही कॉन्टैक्ट लिस्ट में ‘सासू माँ’ (समीर के फोन में सेव नाम) ढूंढने लगीं। समीर ने रोकने की कोशिश की, “माँ, रहने दो न, अच्छा नहीं लगता।”
“तुझे तो कुछ अच्छा नहीं लगता। जोरू का गुलाम बनकर रह गया है,” कुसुम जी ने नंबर डायल कर दिया और फ़ोन स्पीकर पर डाल दिया।
घंटी बजी। एक बार… दो बार…
उधर से एक शांत और सधी हुई आवाज़ आई, “हेलो? समीर बेटा? सब ठीक है न?”
यह सुशीला जी की आवाज़ थी—रिया की माँ।
कुसुम जी ने समीर को बोलने का मौका ही नहीं दिया। वे सीधे शुरू हो गईं।
“हेलो सुशीला जी! मैं कुसुम बोल रही हूँ। और सब ठीक नहीं है, इसीलिए फ़ोन किया है।”
उधर से थोड़ी खामोशी छाई, फिर सुशीला जी ने संयत स्वर में कहा, “नमस्ते कुसुम जी। कहिए, क्या बात हो गई? कोई परेशानी?”
“परेशानी तो आपने खड़ी कर दी है हमारे लिए,” कुसुम जी ने व्यंग्य से कहा। “मैं पूछना चाहती हूँ कि आपने अपनी बेटी को क्या सिखाकर भेजा है? क्या संस्कार दिए हैं? एक औरत का सबसे बड़ा धर्म होता है अपने वंश को आगे बढ़ाना, अपने परिवार को पूर्ण करना। लेकिन आपकी लाडली रिया को तो माँ बनने के नाम से ही नफरत है।”
कमरे में सन्नाटा पसर गया। रिया की उंगलियाँ कीबोर्ड पर थम गईं।
कुसुम जी आगे बोलती रहीं, “तीन साल हो गए शादी को। मैं रोज़ कहती हूँ कि अब खुशखबरी सुना दो, मेरा बुढ़ापा सुधर जाएगा। लेकिन यह सुनती ही नहीं। कहती है अभी ‘सेटल’ होना है। और कितना सेटल होगी? लाखों का पैकेज है, फिर भी पेट नहीं भरता। सुशीला जी, आप ही समझाइए अपनी बेटी को। वरना मुझे तो लगता है कि कहीं इसमें कोई शारीरिक कमी तो नहीं है जो यह बात को टाल रही है? अगर ऐसा है तो बता दीजिये, हम इलाज करवाएं। या फिर यह मॉडर्न ख्यालों की हवा लग गई है इसे?”
कुसुम जी ने अपनी भड़ास निकाल दी थी। उन्हें उम्मीद थी कि सुशीला जी अभी माफी मांगेंगी, रिया को डांटेंगी और कहेंगी कि ‘मैं उसे समझाऊँगी’।
लेकिन फोन के दूसरी तरफ से एक गहरी सांस लेने की आवाज़ आई।
“कुसुम जी,” सुशीला जी की आवाज़ में कोई घबराहट नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी दृढ़ता थी। “आपकी बात खत्म हो गई या कुछ और कहना है?”
“कहना क्या है, मुझे जवाब चाहिए,” कुसुम जी तनकर बैठ गईं।
“तो सुनिए,” सुशीला जी ने कहा। “मैंने अपनी बेटी को वो संस्कार दिए हैं, जो शायद आज के ज़माने में हर माँ को देने चाहिए। मैंने उसे सिखाया है कि वह एक ‘इंसान’ पहले है और ‘औरत’ बाद में। मैंने उसे सिखाया है कि माँ बनना एक ‘चॉइस’ है, कोई ‘मजबूरी’ नहीं। यह कोई ड्यूटी नहीं है जिसे निभाना ही पड़े, यह एक जिम्मेदारी है जिसे तब उठाना चाहिए जब आप मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह तैयार हों।”
कुसुम जी हक्की-बक्की रह गईं। “क्या मतलब? आप अपनी बेटी का पक्ष ले रही हैं? आप उसे गलत राह दिखा रही हैं?”
“मैं उसे सही राह दिखा रही हूँ कुसुम जी,” सुशीला जी की आवाज़ थोड़ी तेज़ हुई। “आप कह रही हैं कि वह माँ नहीं बनना चाहती। क्या आपने कभी उससे पूछा कि वह क्यों नहीं चाहती? या फिर क्या आपने अपने बेटे समीर से पूछा कि वह क्या चाहता है? बच्चा पैदा करने के लिए दो लोगों की रज़ामंदी चाहिए होती है। क्या आपने कभी सोचा कि शायद समीर भी अभी तैयार न हो?”
समीर ने शर्मिंदगी से सिर झुका लिया।
सुशीला जी ने आगे कहा, “और रही बात संस्कारों की… तो कुसुम जी, संस्कार वो होते हैं जो दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना सिखाएं। रिया आज जिस मुकाम पर है, वहां पहुँचने के लिए उसने दिन-रात मेहनत की है। वह अपनी पहचान बना रही है। क्या एक औरत का वजूद सिर्फ़ ‘बच्चे पैदा करने की मशीन’ बनकर रह जाना चाहिए? अगर कल को उसके बच्चे हो गए और उसे अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी, तो क्या आप उसकी उस कुंठा को संभाल पाएंगी जो उसके मन में घर कर जाएगी? एक नाखुश माँ कभी भी एक खुशहाल बच्चे की परवरिश नहीं कर सकती।”
कुसुम जी का मुंह खुला का खुला रह गया। “तो क्या… क्या वंश आगे नहीं बढ़ेगा? मेरा घर सूना रहेगा?”
“घर बच्चों से नहीं, खुशियों से भरता है समधन जी,” सुशीला जी ने जवाब दिया। “और अगर आपको पोते-पोती का इतना ही शौक है, तो अपने बेटे और बहू को वो माहौल दीजिये जहाँ वे सुरक्षित महसूस करें। जहाँ उन्हें यह न लगे कि बच्चा होते ही उनकी ज़िंदगी खत्म हो जाएगी। आप रिया को कोस रही हैं, पर क्या आपने कभी समीर से पूछा कि उसने रिया का कितना साथ दिया है घर के कामों में? रिया ऑफिस भी करती है और घर आकर आपकी रसोई भी संभालती है। ऐसे में वह बच्चा प्लान करने की हिम्मत कैसे जुटाए?”
कुसुम जी के पास कोई जवाब नहीं था। वे बस गुस्से में फोन को घूर रही थीं। तभी एक खटाक की आवाज़ हुई।
रिया ने अपना लैपटॉप बंद कर दिया था। उसने हेडफोन उतारकर मेज़ पर रखे और अपनी कुर्सी से खड़ी हो गई। वह धीरे-धीरे चलकर कुसुम जी के पास आई। उसका चेहरा शांत था, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी जो आंसुओं से नहीं बुझ सकती थी।
“मम्मी जी,” रिया ने बेहद धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ में कहा। “बहुत हो गया। आपने मेरी माँ को फ़ोन किया, मुझे कोई आपत्ति नहीं। लेकिन आपने मेरे ‘संस्कारों’ और मेरे ‘शरीर’ पर जो उंगली उठाई है, उसका जवाब देना अब ज़रूरी हो गया है।”
समीर ने टोकना चाहा, “रिया…”
“नहीं समीर, आज नहीं,” रिया ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। “आज बात होगी। मम्मी जी, आप जानना चाहती हैं न कि मैं माँ क्यों नहीं बन रही?”
कुसुम जी ने रिया को घूरकर देखा।
रिया ने एक गहरी सांस ली। “क्योंकि मैं डरी हुई हूँ, मम्मी जी। और यह डर मुझे मेरे करियर से नहीं, आपसे लगता है।”
“मुझसे?” कुसुम जी चौंक गईं।
“हाँ, आपसे। और इस घर के माहौल से,” रिया की आवाज़ थोड़ी कांपी। “मम्मी जी, मैं रोज़ देखती हूँ कि कैसे आप पड़ोस वाली वर्मा आंटी की बहू की बुराई करती हैं क्योंकि उसने बेटा पैदा करने के बाद अपनी नौकरी दोबारा शुरू कर दी। मैं सुनती हूँ जब आप कहती हैं कि ‘बच्चों को माँ के हाथ का खाना चाहिए, मेड का नहीं’। मैं देखती हूँ कि समीर ऑफिस से आकर सोफे पर लेट जाते हैं और मैं ऑफिस से आकर चाय बनाने किचन में जाती हूँ। आप कहती हैं कि बच्चे के बाद सब ठीक हो जाएगा, लेकिन मुझे पता है कि बच्चे के बाद मेरी ज़िंदगी सिर्फ़ ‘त्याग’ की एक कहानी बनकर रह जाएगी।”
रिया ने समीर की तरफ देखा। “समीर एक अच्छे पति हैं, लेकिन एक पिता बनने के लिए जिस साझेदारी की ज़रूरत होती है, वो अभी इस घर में नहीं है। मम्मी जी, आप पोता चाहती हैं, पर मैं एक ऐसा ‘पार्टनर’ चाहती हूँ जो डायपर बदलने से लेकर रात को जागने तक, हर चीज़ में मेरा साथ दे। सिर्फ़ ‘स्पर्म डोनर’ नहीं चाहिए मुझे।”
कुसुम जी को लगा जैसे किसी ने उनके गाल पर तमाचा मार दिया हो। इतनी बेबाक बातें उन्होंने अपनी बहू से कभी नहीं सुनी थीं।
रिया ने आगे कहा, “और आप कह रही थीं न कि कौन सी औरत माँ नहीं बनना चाहती? मैं बनना चाहती हूँ मम्मी जी। मैं भी चाहती हूँ कि मेरी गोद में मेरा बच्चा खेले। लेकिन मैं तब माँ बनूँगी जब मेरे पास उसके लिए ‘वक़्त’ होगा, जब मेरे पास उसके भविष्य के लिए पर्याप्त ‘सेविंग्स’ होंगी, और सबसे बड़ी बात… जब मुझे यह विश्वास होगा कि मेरा बच्चा इस दुनिया में एक बोझ नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी बनकर आएगा जिसे हम दोनों मिलकर उठाएंगे। मैं अपनी माँ की तरह या आपकी तरह सिर्फ़ ‘कुर्बानी की देवी’ नहीं बनना चाहती। मुझे माफ़ कीजियेगा, लेकिन मेरे लिए ‘संस्कार’ का मतलब अपनी आत्मा को मारना नहीं है।”
रिया की आँखों से अब आंसू बह रहे थे। वह मुड़ी और अपने कमरे की तरफ चली गई।
ड्राइंग रूम में फिर से सन्नाटा छा गया। फ़ोन अभी भी चालू था।
सुशीला जी की आवाज़ आई, “कुसुम जी, मेरी बेटी ने जो कहा, वो एक कड़वा सच है। अगर आप उसे ‘बहू’ की जगह ‘बेटी’ समझतीं, तो आज आपको फ़ोन करके शिकायत नहीं करनी पड़ती, बल्कि आप उसके सिर पर हाथ रखकर कहतीं कि ‘बेटा, तू चिंता मत कर, हम सब तेरे साथ हैं’। जिस दिन आप उसे यह भरोसा दिला देंगी, उस दिन आपको दादी बनने के लिए किसी से लड़ना नहीं पड़ेगा। नमस्ते।”
फ़ोन कट गया।
कुसुम जी मूर्तिवत बैठी थीं। समीर भी सिर झुकाए खड़ा था। आज उसे पहली बार एहसास हुआ कि रिया के मन में कितना बड़ा तूफ़ान चल रहा था, जिसे वह अपनी मुस्कुराहट और चुप्पी के पीछे छिपाए रखती थी।
कुछ देर बाद, कुसुम जी की नज़र समीर पर पड़ी।
“समीर…” कुसुम जी की आवाज़ अब कमज़ोर थी। “क्या… क्या मैं सच में इतनी बुरी सास हूँ? क्या मैं वाकई तुम लोगों पर बोझ डाल रही हूँ?”
समीर माँ के पास बैठ गया। उसने माँ का हाथ अपने हाथ में लिया।
“बुरी नहीं हो माँ, बस आप थोड़ा पुराना सोचती हो। रिया गलत नहीं कह रही। आज ज़माना बदल गया है। महंगाई देख रही हैं आप? बच्चों की स्कूल फीस, उनकी परवरिश… यह सब आसान नहीं है। हम दोनों अभी अपने करियर के पीक पर हैं। अगर अभी हमने ब्रेक लिया, तो हम बच्चे को वो भविष्य नहीं दे पाएंगे जो हम देना चाहते हैं। और माँ… घर के कामों में भी रिया अकेली पड़ जाती है। मैं भी तो मदद नहीं करता। उसे डर लगता है कि बच्चे के बाद वह पूरी तरह अकेली पड़ जाएगी।”
कुसुम जी ने अपनी आँखों से चश्मा हटाया और साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं। उन्हें अपनी जवानी याद आ गई। कैसे उन्हें भी पेंटिंग का शौक था, लेकिन शादी होते ही और फिर बच्चे होते ही उनके ब्रश और रंग कहीं खो गए थे। उन्हें याद आया कि कैसे वे भी कभी-कभी बाथरूम में छुपकर रोती थीं क्योंकि थकान से बदन टूटता था, पर सास के डर से कुछ कह नहीं पाती थीं। उन्होंने अनजाने में वही डर रिया के मन में पैदा कर दिया था।
“मुझे नहीं पता था बेटा…” कुसुम जी बुदबुदाईं। “मुझे लगा कि जैसे हमने किया, वैसे ही सब करते हैं। मुझे लगा कि औरत का जीवन बस इसी में है। पर आज रिया की बातें सुनकर लगा कि शायद मैंने उस पर अपनी ख्वाहिशें थोप दीं।”
समीर ने माँ को गले लगा लिया।
रात के खाने का वक़्त था। रिया अपने कमरे में थी, बाहर आने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। उसे लग रहा था कि अब घर में और क्लेश होगा।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
रिया ने दरवाज़ा खोला। सामने कुसुम जी खड़ी थीं। उनके हाथ में खाने की थाली थी।
“मम्मी जी…” रिया हड़बड़ा गई।
कुसुम जी अंदर आईं और थाली मेज़ पर रख दी।
“मैंने खाना बनाया है। तेरे पसंद की भिंडी है,” कुसुम जी ने बिना रिया की तरफ देखे कहा।
रिया चुप खड़ी रही।
कुसुम जी ने एक गहरी सांस ली और मुड़कर रिया को देखा।
“रिया, आज तूने जो कहा… वो कड़वा था, पर शायद ज़रूरी था। मैं पुरानी पीढ़ी की हूँ, मेरी सोच बदलनी मुश्किल है, पर नामुमकिन नहीं। मुझे पोते का लालच था, है और शायद रहेगा भी। लेकिन… लेकिन मैं यह भी नहीं चाहती कि मेरा पोता या पोती एक ऐसी माँ की गोद में आए जो अंदर से खुश न हो।”
कुसुम जी आगे बढ़ीं और रिया के सिर पर हाथ रखा।
“तुझे जब ठीक लगे, तब सोचना। मैं अब दबाव नहीं डालूँगी। और हाँ… समीर से कह दिया है मैंने, कल से सुबह की चाय वो बनाएगा और शाम को सब्जी काटने में तेरी मदद करेगा। अगर वो बाप बनना चाहता है, तो उसे पहले पति बनना सीखना होगा।”
रिया की आँखों में फिर से आंसू आ गए, लेकिन इस बार ये ख़ुशी के आंसू थे। उसने झुककर कुसुम जी के पैर छुए, लेकिन कुसुम जी ने उसे गले लगा लिया।
“बस-बस, अब रोना बंद कर। और सुन, तेरी माँ… सुशीला जी… बड़ी तेज़ हैं। मुझे डांट दिया फ़ोन पर,” कुसुम जी ने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा।
रिया भी अपनी हंसी नहीं रोक पाई। “वो माँ हैं न, बच्चों के लिए शेरनी बन जाती हैं।”
“हाँ,” कुसुम जी ने कहा, “अब समझी। मैं भी तो माँ हूँ। अब से मैं भी तेरी तरफ से ही बोलूँगी।”
उस रात घर में बारिश रुक चुकी थी। हवा में ठंडक थी, लेकिन रिश्तों में जो गर्माहट लौटी थी, उसने उस घर को एक मकान से फिर से ‘घर’ बना दिया था। लैपटॉप फिर से खुला, लेकिन अब उस पर काम करते हुए रिया के चेहरे पर तनाव नहीं, बल्कि एक सुकून था। क्योंकि उसे पता था कि अब उसे ‘मजबूरी’ में नहीं, बल्कि ‘मर्जी’ से अपनी दुनिया सजानी है। और संस्कार? संस्कार अब बदल रहे थे—थोड़े नए, थोड़े पुराने, लेकिन प्यार से भरे हुए।
लेखिका : रमा शुक्ला