ये औरतें भी न, छोटी-छोटी बातों को दिल पर लगा लेती हैं। – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव

रात के ग्यारह बज चुके थे। मुंबई की उस गगनचुंबी इमारत के चौदहवें फ्लोर पर बने फ्लैट की बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, सिवाय ड्राइंग रूम के एक कोने में जलते लैम्प के। सोफे पर पसरकर ३२ वर्षीय विहान अपने लैपटॉप में सिर गड़ाए हुए था। किचन से बर्तनों के खटकने की हल्की आवाज़ें आ रही थीं, जो इस बात का संकेत थीं कि उसकी पत्नी, काव्या, अभी भी काम में जुटी है।

“काव्या, यार एक कप ग्रीन टी मिलेगी क्या? सिर फट रहा है आज मीटिंग्स की वजह से,” विहान ने स्क्रीन से नज़र हटाए बिना ही आवाज़ लगाई।

किचन से आवाज़ आई, “बस दो मिनट विहान, सिंक साफ़ कर रही हूँ, अभी लाती हूँ।”

पाँच मिनट बाद काव्या हाथ में कप लेकर आई। उसके चेहरे पर थकान की एक ऐसी परत थी जिसे कोई भी मेकअप नहीं छिपा सकता था। आँखों के नीचे काले घेरे और बालों की लटें जो पसीने से माथे पर चिपकी थीं। उसने चुपचाप कप टेबल पर रखा और जाने लगी।

“अरे सुनो,” विहान ने उसे रोका, “वो कल मेरा ब्लू वाला शर्ट प्रेस नहीं था। प्लीज सुबह ध्यान रखना, कल बहुत ज़रूरी प्रेजेंटेशन है। और हाँ, आज खाने में नमक थोड़ा तेज़ था। माँ होतीं तो टोक देतीं, मैं तो बस एडजस्ट कर लेता हूँ।”

काव्या ने एक पल के लिए विहान को देखा—वही खाली नज़रें जो पिछले पाँच सालों से उसकी पहचान बन गई थीं। उसने कोई बहस नहीं की, बस धीमे से सिर हिलाया, “जी, ध्यान रखूँगी,” और बेडरूम की तरफ बढ़ गई।

विहान ने एक घूँट भरा और मन ही मन सोचा, “ये औरतें भी न, छोटी-छोटी बातों को दिल पर लगा लेती हैं। दिन भर घर पर रहती है, फिर भी इतना थकान का नाटक। मैं बाहर दुनिया से लड़कर आता हूँ, मुझे तो रिलैक्स चाहिए।”

यह विहान की दुनिया थी—एक सफल कॉर्पोरेट एम्पलाई, जो मानता था कि उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ क्रेडिट कार्ड के बिल भरना और घर की EMI चुकाना है। घर के अंदर की दुनिया उसके लिए ‘काव्या का डिपार्टमेंट’ था। उसे लगता था कि काव्या की ज़िंदगी बहुत आसान है। एसी घर में रहना, मशीन में कपड़े धोना और कुक से खाना बनवाना—इसमें मेहनत ही क्या है?

लेकिन वक्त का पहिया घूमा। शादी के पाँच साल बाद उनके घर में एक नन्ही परी का आगमन हुआ। उन्होंने उसका नाम रखा—’आराध्या’।

आराध्या के आने से घर का माहौल बदल गया। विहान, जो पहले ऑफिस से आकर दोस्तों के साथ फोन पर लगा रहता था, अब सीधे बेसिन पर हाथ धोकर आराध्या के पास पहुँच जाता। वह नन्ही सी जान अपनी मुट्ठी में विहान की उंगली पकड़ती, तो विहान को लगता कि उसने दुनिया जीत ली है।

जैसे-जैसे आराध्या बड़ी होने लगी, विहान का अपनी बेटी के प्रति प्रेम एक जुनून में बदलने लगा। वह उसके लिए दुनिया का सबसे अच्छा पिता बनना चाहता था। आराध्या की एक छींक भी आ जाए, तो विहान पूरा घर सिर पर उठा लेता। काव्या अक्सर मुस्कुराती, “अरे, बस सर्दी है, ठीक हो जाएगी।” लेकिन विहान डॉक्टर के पास भागता।

एक रविवार की दोपहर, आराध्या अब चार साल की हो चुकी थी। विहान सोफे पर बैठकर क्रिकेट मैच देख रहा था। आराध्या अपनी गुड़ियों के साथ खेल रही थी। विहान का ध्यान मैच से हटकर अपनी बेटी पर गया। वह ‘घर-घर’ खेल रही थी।

आराध्या ने अपनी एक गुड़िया को सोफे पर लिटाया और दूसरी गुड़िया (जो शायद मम्मी थी) के हाथ में एक छोटा सा खिलौना कप पकड़ाया।

आराध्या अपनी तोतली आवाज़ में गुड़िया पर चिल्लाई, “चाय ठंडी क्यों है? तुम्हें कुछ काम ठीक से नहीं आता। जाओ, मेरे मोज़े ढूँढो।”

विहान सन्न रह गया। उसने टीवी का रिमोट म्यूट कर दिया। उसने आराध्या को आवाज़ दी, “बेटा, ये गुड़िया ऐसे क्यों बात कर रही है?”

आराध्या ने मासूमियत से अपनी बड़ी-बड़ी आँखें झपकाईं, “पापा, ये गुड्डा ऑफिस से आया है ना, तो ये थक गया है। इसलिए ये मम्मी डॉली को डांट रहा है। ऐसे ही तो होता है ना?”

विहान के गले में कुछ अटक गया। “ऐसे ही तो होता है ना?” यह प्रश्न किसी हथौड़े की तरह उसके दिमाग पर लगा। आराध्या वही दोहरा रही थी जो उसने अपने घर में देखा था। विहान को लगा कि कोई उसे आईना दिखा रहा है। लेकिन उसने इसे ‘बच्चों का खेल’ कहकर टालने की कोशिश की।

समय बीतता गया। आराध्या अब दस साल की हो गई थी। वह पढ़ाई में होशियार थी, पेंटिंग करती थी और क्लासिकल डांस सीख रही थी। विहान उसे ‘प्रिंसेस’ की तरह रखता था। उसे रत्ती भर भी काम नहीं करने देता था।

एक दिन काव्या बहुत बीमार पड़ गई। उसे वायरल फीवर था और वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। घर की रफ़्तार थम गई। विहान ने ऑफिस से छुट्टी ले ली। वह किचन में गया, तो उसे समझ नहीं आया कि चाय की पत्ती कहाँ है और चीनी कहाँ। कुकर की सीटी कितनी बार बजानी है, यह एक गणित का सवाल बन गया।

दोपहर को आराध्या स्कूल से आई। उसने देखा कि माँ बीमार हैं और पिता किचन में जूझ रहे हैं। उसने अपना बैग रखा, यूनिफॉर्म बदली और चुपचाप किचन में आ गई।

“पापा, आप हटो, मैं करती हूँ,” दस साल की बच्ची ने स्टूल लगाकर गैस जलाई और खिचड़ी बनाने की कोशिश करने लगी।

विहान ने उसे रोका, “नहीं बेटा, हाथ जल जाएगा। तुम जाओ, पढ़ाई करो।”

“अरे पापा, मुझे आता है। माँ ने सिखाया है। वो कहती हैं कि लड़कियों को सब आना चाहिए, वरना ससुराल में दिक्कत होगी,” आराध्या ने बड़े सहज भाव से कहा और चावल धोने लगी।

विहान के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “ससुराल? बेटा, तुम अभी बहुत छोटी हो। तुम्हें ये सब करने की ज़रूरत नहीं है। तुम राजरानी हो मेरी।”

आराध्या ने पीछे मुड़कर पिता को देखा, “पापा, राजरानी तो कहानियों में होती हैं। रियलिटी में तो लड़कियाँ काम ही करती हैं ना? जैसे माँ करती हैं। माँ भी तो नानी की राजरानी थीं, पर यहाँ तो वो थक जाती हैं ना? मुझे भी तो एक दिन किसी के घर जाना है, अगर काम नहीं सीखूँगी तो वो लोग मुझे डांटेंगे।”

विहान उस दिन किचन के दरवाज़े पर बुत बनकर खड़ा रह गया। उसकी दस साल की बेटी उसे दुनिया की सबसे कड़वी सच्चाई बता रही थी। वह अपनी बेटी को डॉक्टर, इंजीनियर, या पायलट बनाने के सपने देखता था, लेकिन समाज और उसका अपना घर उसे अनजाने में एक ‘आज्ञाकारी बहू’ बनने की ट्रेनिंग दे रहा था।

उस रात विहान को नींद नहीं आई। वह काव्या के पास बैठा उसके माथे पर पट्टियां रख रहा था। काव्या गहरी नींद में थी। विहान की आँखों के सामने बार-बार आराध्या का चेहरा आ रहा था।

उसने कल्पना की—बीस साल बाद की।

आराध्या एक बड़ी कंपनी में काम करती है। वह थकी-हारी घर आती है। उसका पति, जो शायद विहान जैसा ही कोई ‘सफल’ आदमी है, सोफे पर पैर फैलाकर बैठा है। आराध्या पानी मांगती है, तो वह अनसुना कर देता है। आराध्या किचन में जाती है, खाना बनाती है, और फिर उसका पति खाने में नुक्स निकालता है—”नमक तेज़ है।” आराध्या चुपचाप सुन लेती है, अपनी आँखों के आंसू पी लेती है, ठीक वैसे ही जैसे काव्या पीती है।

विहान के अंदर एक ज्वाला भड़क उठी। उसे अपने ही ख्यालों से घिन आने लगी।

“नहीं!” वह मन ही मन चीखा। “मैं अपनी आराध्या के साथ ऐसा नहीं होने दूँगा। मैं उसकी शादी किसी ऐसे लड़के से करूँगा जो उसे पलकों पर बिठाए, जो उसका सम्मान करे, जो उसके थके होने पर उसके पैर दबाए, न कि हुक्म चलाए।”

तभी, उसके अंतर्मन से एक आवाज़ आई—“लेकिन विहान, तुम खुद क्या हो? क्या तुम वही पति नहीं हो जिससे तुम अपनी बेटी को बचाना चाहते हो? काव्या भी तो किसी की ‘आराध्या’ थी। उसके पिता ने भी तो उसे नाज़ों से पाला होगा। जब उन्होंने उसका हाथ तुम्हारे हाथ में दिया होगा, तो क्या उन्होंने सोचा होगा कि तुम उसे एक ‘अनपेड सर्वेंट’ बना दोगे?”

यह अहसास किसी बिजली के झटके जैसा था। विहान ने काव्या के चेहरे को देखा। उन झुर्रियों को, जो समय से पहले आ गई थीं। उन खुरदरे हाथों को, जो कभी मखमल से कोमल थे, लेकिन अब डिटर्जेंट और बर्तनों की रगड़ से सख्त हो गए थे।

विहान को याद आया कि शादी के शुरुआती दिनों में काव्या को कविताएँ लिखने का कितना शौक था। वह कितनी चहकती थी। लेकिन पिछले कुछ सालों में उसने काव्या की आवाज़ सिर्फ “जी, अभी लाई” या “खाना मेज़ पर है” के रूप में ही सुनी थी। उसने एक जीती-जागती, सपना देखने वाली लड़की को एक ‘मशीन’ में बदल दिया था।

वह रो पड़ा। एक पति के रूप में वह कभी काव्या के दर्द को नहीं समझ पाया था। उसे लगता था कि मर्द होना मतलब सिर्फ पैसा कमाना है। लेकिन आज, एक ‘पिता’ की नज़र ने उसे ‘पति’ की असलियत दिखा दी थी। उसे समझ आ गया कि अगर वह चाहता है कि उसकी बेटी का भविष्य सुरक्षित और सम्मानजनक हो, तो उसे पहले अपने घर का वर्तमान बदलना होगा। क्योंकि आराध्या वही सीखेगी जो वह देखेगी। अगर आराध्या देखेगी कि उसका पिता उसकी माँ का सम्मान करता है, घर के कामों में हाथ बंटाता है, तो वह कभी किसी ऐसे पुरुष को स्वीकार नहीं करेगी जो उसे कमतर समझे।

अगली सुबह, सूरज निकलने से पहले विहान उठ गया।

काव्या की नींद खुली तो घड़ी में सात बज रहे थे। वह हड़बड़ा कर उठी। “हे भगवान, सात बज गए! विहान की चाय, आराध्या का टिफिन… आज तो बहुत देर हो गई,” वह बड़बड़ाते हुए बिस्तर से उतरी। शरीर अभी भी टूट रहा था, लेकिन ज़िम्मेदारी का बोझ बुखार से भारी था।

वह गिरते-पड़ते किचन की तरफ भागी। लेकिन वहाँ का नज़ारा देखकर उसके कदम ठिठक गए।

विहान किचन में था। वह एप्रन पहने हुए था (जो उसे थोड़ा छोटा पड़ रहा था)। स्लैब पर आराध्या का टिफिन पैक रखा था। गैस पर चाय उबल रही थी और टोस्टर से ब्रेड की खुशबू आ रही थी।

“विहान? आप… आप यहाँ क्या कर रहे हैं?” काव्या की आवाज़ में अविश्वास था।

विहान ने पीछे मुड़कर देखा। उसके हाथ में चाय का कप था। “उठ गई तुम? डॉक्टर ने कहा है तुम्हें दो दिन पूरा बेड रेस्ट चाहिए। और खबरदार जो किचन में कदम रखा तो।”

“लेकिन… ऑफिस? नाश्ता?” काव्या को लगा वह कोई सपना देख रही है।

“मैंने दो दिन की छुट्टी ली है,” विहान ने चाय का कप काव्या के हाथों में थमाया। “और नाश्ता बन गया है। आराध्या को मैंने तैयार कर दिया है, बस उसके बाल बनाने हैं, वो मुझे नहीं आता। वो तुम देख लो।”

काव्या की आँखों में आँसू आ गए। “पर विहान, ये सब आप क्यों…”

विहान ने काव्या के होंठों पर उंगली रखकर उसे चुप करा दिया। उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी और पश्चाताप था।

“काव्या, मुझे माफ़ कर दो,” विहान का गला भर आया। “पिछले दस सालों में, मैंने कभी यह महसूस ही नहीं किया कि यह घर हम दोनों का है, सिर्फ तुम्हारा नहीं। मैंने हमेशा सोचा कि मैं बाहर मेहनत करता हूँ, इसलिए मैं खास हूँ। पर तुम… तुम बिना छुट्टी, बिना सैलरी, और बिना तारीफ के जो करती हो, वह मेरी मेहनत से कहीं ज्यादा बड़ा है।”

उसने गहरी सांस ली और खिड़की के बाहर देखा जहाँ आराध्या स्कूल बस का इंतज़ार कर रही थी।

“मैं नहीं चाहता कि कल को आराध्या यह सोचकर बड़ी हो कि औरत का जन्म सिर्फ त्याग करने के लिए हुआ है। मैं चाहता हूँ कि वह देखे कि एक मर्द, एक पिता, और एक पति भी घर संभाल सकता है। मैं चाहता हूँ कि वह अपने भविष्य के लिए ‘विहान’ जैसा पति न ढूंढे जो मैंने कल तक था, बल्कि एक ऐसा साथी ढूंढे जो उसे बराबरी का दर्जा दे। और वह यह तभी सीखेगी जब मैं बदलूँगा।”

काव्या रो रही थी, लेकिन यह आँसू दुख के नहीं थे। यह उस सुकून के थे जिसका इंतज़ार उसे बरसों से था। विहान ने उसे गले लगा लिया।

उस दिन के बाद, उस घर की तस्वीर बदल गई।

अब शाम को ऑफिस से आकर विहान सोफे पर नहीं पसरता था। वह और काव्या मिलकर खाना बनाते। विहान ने सब्ज़ी काटना सीख लिया था (हालाँकि वह अभी भी प्याज़ काटते वक्त रोता था)। रविवार का दिन अब ‘काव्या का रेस्ट डे’ घोषित हो गया था।

सबसे बड़ा बदलाव आराध्या में आया। एक दिन वह अपनी गुड़ियों के साथ खेल रही थी। विहान ने छुपकर देखा।

आराध्या ने गुड्डा गुड़िया के पास बिठाया और कहा, “सुनो, तुम ऑफिस से थक कर आए होगे। तुम बैठो, मैं पानी लाती हूँ। फिर हम दोनों मिलकर खाना बनाएँगे, ठीक है?”

विहान मुस्कुरा दिया। उसने अपनी बेटी के भविष्य की नींव सुधार दी थी।

कुछ साल बाद, जब आराध्या कॉलेज जाने वाली थी, विहान ने उसे अपने पास बिठाया।

“आराध्या,” विहान ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, जीवन में हमेशा याद रखना। तुम किसी की परछाई नहीं हो। तुम्हारा अपना वजूद है। कभी किसी ऐसे इंसान के लिए मत झुकना जो तुम्हारी बराबरी न कर सके। और शादी… शादी का मतलब सिर्फ खाना बनाना और घर संभालना नहीं होता। शादी दो पहियों की गाड़ी है। अगर कोई तुमसे कहे कि तुम सिर्फ घर के लिए बनी हो, तो उसे मेरे पास भेज देना।”

आराध्या हँस पड़ी, “पापा, आप बेस्ट हो। लेकिन आपको यह सब सिखाया किसने? दादी ने तो नहीं सिखाया होगा?”

विहान ने काव्या की तरफ देखा जो बालकनी में खड़ी पौधों को पानी दे रही थी। धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी और वह बहुत सुंदर लग रही थी—बिना किसी थकान के।

“नहीं बेटा,” विहान ने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे यह सब एक नन्ही सी परी ने सिखाया, जिसने दस साल की उम्र में खिचड़ी बनाने की कोशिश की थी। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि मैं एक ‘पति’ बनकर तो फेल हो गया था, लेकिन एक ‘पिता’ बनकर मैं पास होना चाहता था। और मजे की बात यह है कि एक अच्छा पिता बनने की कोशिश में, मैं शायद एक बेहतर पति भी बन गया।”

उस रात, विहान ने अपनी डायरी में लिखा:

“औरत को समझना मुश्किल नहीं है, बस नज़रिये की बात है। हम मर्द अक्सर उसे ‘पत्नी’ की नज़र से देखते हैं—एक ऐसी चीज़ जो हमारी सुविधा के लिए है। लेकिन जिस दिन हम उसे ‘बेटी’ की नज़र से देखते हैं, उस दिन हमें उसके त्याग, उसके दर्द और उसके अस्तित्व का सही मोल समझ आता है। जो हम अपनी बेटी के लिए चाहते हैं—सम्मान, प्यार, आज़ादी—वही हमें अपनी पत्नी को देना चाहिए। क्योंकि वो भी तो किसी की बेटी है, किसी की ‘आराध्या’ है।”

यह कहानी सिर्फ विहान की नहीं, हर उस घर की है जहाँ दीवारें मूक दर्शक बनकर एक औरत के धीरे-धीरे खत्म होने का तमाशा देखती हैं। बदलाव की शुरुआत भाषणों से नहीं, बल्कि अपने ही घर की रसोई और अपनी ही सोच से होती है।

लेखिका : डॉ अनुपमा श्रीवास्तव

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