वो अधूरी चिट्ठी और 30 साल का बोझ – सावित्री मल्होत्रा

शादी के मंडप से भागा हुआ दूल्हा जब 30 साल बाद अचानक सामने आया, तो उस बुजुर्ग महिला का खून खौल उठा। लेकिन जब उस भगोड़े ने अपनी जेब से वो पीला पड़ा हुआ कागज़ निकाला, तो नफरत आंसुओं में बह गई। पढ़िए एक ऐसे त्याग की कहानी जो दुनिया की नज़रों में ‘धोखा’ थी।


शाम के पांच बजते ही सोसायटी के पार्क में हलचल शुरू हो गई थी। बच्चों की किलकारियां और बुजुर्गों की धीमी हंसी हवा में तैर रही थी। लेकिन उस भीड़ में भी एक कोना ऐसा था जहाँ खामोशी पसरी थी। सीमेंट की उस बेंच पर बैठी ‘सुधा जी’ अपनी ही दुनिया में गुम थीं।

सुधा जी पिछले महीने ही लखनऊ से पुणे अपने बेटे राहुल के पास आई थीं। पति रमेश के देहांत के बाद वो लखनऊ की बड़ी सी हवेली में खुद को बहुत अकेला महसूस करती थीं। राहुल ने जिद्द करके उन्हें अपने पास बुला लिया था। यहाँ सब कुछ था—सुविधाएं, ए.सी., नौकर-चाकर—पर वो अपनापन नहीं था जो लखनऊ की गलियों में था। बेटा और बहू अपनी कॉर्पोरेट दुनिया में व्यस्त रहते, और पोता अपने वीडियो गेम्स में।

सुधा जी का वक्त काटने का एक ही सहारा था—शाम की सैर।

आज भी वो अपनी छड़ी के सहारे बेंच पर बैठीं, अपनी हथेलियों की लकीरों को देख रही थीं। तभी एक साया उन पर पड़ा। उन्होंने नज़र उठाई। एक बुजुर्ग सज्जन, जिनके बाल पूरी तरह सफ़ेद हो चुके थे और आँखों पर मोटा चश्मा था, उनके पास आकर खड़े हो गए थे।

“क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?” उस आवाज़ में एक अजीब सी कंपकंपी थी।

सुधा जी ने संकोच से पल्लू ठीक किया और थोड़ा खिसक गईं। “जी, बैठ जाइए। यह तो सार्वजनिक जगह है।”

वह सज्जन बैठ गए। दोनों के बीच एक फुट की दूरी थी, लेकिन खामोशी मीलों लम्बी थी। सुधा जी को लगा कि वो उन्हें घूर रहे हैं। असहज होकर उन्होंने अपनी नज़रें घुमा लीं। लेकिन तभी उन्हें लगा कि यह चेहरा कुछ जाना-पहचाना है। वो माथे पर बायीं तरफ का वो छोटा सा जले का निशान… वो गहरी धसी हुई आँखें…

सुधा जी के दिमाग में यादों का एक तूफ़ान उमड़ पड़ा। 30 साल पहले का वो मंज़र उनकी आँखों के सामने नाचने लगा। शहनाई की आवाज़, मेहमानों की भीड़, लाल जोड़े में सजी वो खुद… और फिर वो खबर जिसने उनके पिता को जीते जी मार दिया था।

सुधा जी का शरीर गुस्से से कांपने लगा। उन्होंने मुड़कर उस आदमी को देखा। इस बार उनकी आँखों में संकोच नहीं, अंगारे थे।

“विनोद?” सुधा जी के हलक से यह नाम किसी गाली की तरह निकला।

बुजुर्ग आदमी ने सिर झुका लिया। “पहचान लिया तुमने, सुधा।”

सुधा जी ने कसकर अपनी मुट्ठी भींच ली। “पहचानूंगी नहीं? उस चेहरे को कैसे भूल सकती हूँ जिसने मेरी ज़िंदगी, मेरे पिता की इज़्ज़त, सब कुछ मिट्टी में मिला दिया था? तुम यहाँ? ज़िंदा हो तुम? मुझे लगा था तुम मर गए होगे।”

विनोद ने कोई जवाब नहीं दिया। बस अपनी लाठी को कसकर पकड़े रहे।

सुधा जी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। “आज 30 साल बाद तुम मेरे सामने आकर बैठे हो? किस हक़ से? तुम्हें पता है तुम्हारे मंडप से भाग जाने के बाद मेरे परिवार पर क्या गुज़री थी? मेरे बाबूजी… वो शर्म से घर से नहीं निकले और छह महीने में ही दिल के दौरे से गुज़र गए। समाज ने मुझे ‘मनहूस’ कहा। वो तो भला हो रमेश जी का, जिन्होंने मेरा हाथ थाम लिया, वरना मैं तो कुएं में कूदने वाली थी।”

सुधा जी की आँखों से आंसू बहने लगे। वो वहां से उठकर जाने लगीं। उन्हें इस आदमी के साये से भी घिन आ रही थी।

“रुक जाओ सुधा!” विनोद की आवाज़ में एक ऐसी दर्दनाक अपील थी कि सुधा जी के कदम ठिठक गए। “मुझे पता है तुम मुझसे नफरत करती हो। करनी भी चाहिए। पूरी दुनिया मुझे भगोड़ा, डरपोक और धोखेबाज़ कहती है। पर जाने से पहले बस मेरे 5 मिनट सुन लो। 30 साल से यह बोझ सीने पर लेकर घूम रहा हूँ। आज हल्का कर लेने दो, फिर चाहे तो पुलिस को बुला लेना।”

सुधा जी रुकीं नहीं, पर मुड़ीं। “क्या सुनाओगे? कोई झूठी कहानी? कि तुम्हें किडनैप कर लिया गया था?”

“नहीं,” विनोद ने कांपते हाथों से अपनी कुरते की जेब से एक पुराना, पीला पड़ चुका लिफाफा निकाला। “बस यह पढ़ लो। यह वो खत है जो मैंने उस रात, शादी से ठीक पहले तुम्हें लिखा था, पर तुम्हें देने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।”

सुधा जी ने वो खत नहीं लिया। “मुझे तुम्हारे किसी खत में दिलचस्पी नहीं है।”

विनोद की आँखों में आंसू आ गए। “सुधा, मैंने शादी इसलिए नहीं तोड़ी थी कि मैं किसी और से प्यार करता था या मुझे दहेज़ चाहिए था। मैं भागा था… तुम्हारी जान बचाने के लिए।”

सुधा जी सन्न रह गईं। “क्या बकवास कर रहे हो?”

विनोद ने गहरी सांस ली और बोलना शुरू किया। “तुम्हें याद है, मेरे पिताजी सरकारी खज़ाने में काम करते थे? शादी से दो दिन पहले, एक बड़ा घोटाला सामने आया था। पिताजी ने जुए की लत में दफ्तर के लाखों रुपये गबन कर लिए थे। पुलिस वारंट लेकर निकली थी। उसी रात, कुछ गुंडे… जिनसे पिताजी ने उधार लिया था, हमारे घर आए थे। उन्होंने धमकी दी थी कि अगर बारात निकली, तो वो मंडप में ही गोलीबारी करेंगे और दुल्हन को उठा ले जाएंगे।”

सुधा जी के हाथ से छड़ी छूटने ही वाली थी। वो अवाक होकर सुन रही थीं।

विनोद की आवाज़ भर्रा गई। “मेरे पास दो रास्ते थे सुधा। या तो मैं बारात लेकर आता और पुलिस व गुंडों के तमाशे के बीच तुम्हारे पिता की इज़्ज़त नीलाम करवाता, तुम्हारी जान खतरे में डालता… या फिर मैं खुद ‘भगोड़ा’ बन जाता। मैंने सोचा, अगर मैं भाग गया, तो बदनामी सिर्फ ‘मेरे’ हिस्से आएगी। लोग कहेंगे लड़का ख़राब था। तुम्हारे पिता को हमदर्दी मिलेगी। गुंडे मेरा पीछा करेंगे, तुम्हारे घर नहीं आएंगे।”

विनोद ने अपनी पतलून ऊपर की। उसके बाएं पैर पर एक गहरा और पुराना जख्म था। “यह देखो। उस रात जब मैं घर से भागा, तो उन गुंडों ने मुझे पकड़ लिया था। तीन दिन तक मुझे एक गोदाम में रखा गया। उन्होंने मेरा पैर तोड़ दिया। जब पुलिस ने पिताजी को पकड़ा, तब जाकर गुंडे भागे। मैं अस्पताल में पड़ा था जब मुझे खबर मिली कि तुम्हारी शादी रमेश बाबू से हो गई है।”

सुधा जी बेंच पर धम्म से बैठ गईं। उनके कानों में सन्नाटा छा गया। जिस इंसान को वो 30 साल से अपनी बर्बादी का ज़िम्मेदार मानती थीं, वो असल में उनका रक्षक था?

“तुमने… तुमने कभी बताया क्यों नहीं?” सुधा जी ने सिसकते हुए पूछा। “एक खत तो भेज सकते थे?”

विनोद ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “बताता तो क्या होता? तुम्हारी शादी हो चुकी थी। अगर मैं सच बताता, तो शायद तुम रमेश जी के साथ खुश नहीं रह पातीं। तुम्हें लगता कि तुमने एक बेकसूर इंसान को छोड़ दिया। मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारा वर्तमान तुम्हारे अतीत के साये में खराब हो। रमेश जी अच्छे इंसान थे, मुझे पता था वो तुम्हें रानी बनाकर रखेंगे। मेरे पिताजी जेल में थे, हमारा घर नीलाम हो गया था। मैं तुम्हें उस नर्क में नहीं घसीटना चाहता था।”

सुधा जी ने वो पीला लिफाफा विनोद के हाथ से ले लिया। उसे खोला। उसमें लिखा था-

“सुधा, मैं जा रहा हूँ ताकि तुम जी सको। दुनिया मुझे गाली देगी, तुम भी दोगी। पर मेरा प्यार इतना कमज़ोर नहीं कि अपनी खुशी के लिए तुम्हारी ज़िंदगी दांव पर लगा दूं। बस दुआ करना कि मैं मर जाऊं, क्योंकि तुम्हारे बिना जीना मरने से भी बदतर होगा। तुम्हारा, दोषी विनोद।”

पार्क में अंधेरा घिरने लगा था। लेकिन सुधा जी के मन का 30 साल पुराना अंधेरा छंट गया था। वो नफरत, जो उन्होंने इतने सालों से पाल रखी थी, वो पिघलकर बह गई थी।

उन्होंने विनोद की तरफ देखा। अब उन्हें उनमें वो ‘धोखेबाज़’ नहीं, बल्कि एक ‘त्यागी’ दिख रहा था। एक ऐसा प्रेमी जिसने बदनामी का ज़हर पीकर अपनी प्रेमिका को इज़्ज़त की ज़िंदगी दी थी।

“तुमने शादी की?” सुधा जी ने धीरे से पूछा।

विनोद ने सिर हिलाया। “नहीं। जिसने एक बार राधा को मन में बसा लिया हो, वो किसी और को कैसे जगह देता? मैं अकेला रहा। नौकरी की, कर्ज़ चुकाया, और दूर से तुम्हारी खबर रखता रहा। जब सुना कि रमेश जी नहीं रहे और तुम यहाँ पुणे आई हो, तो खुद को रोक नहीं पाया। बस एक बार तुम्हें देखना चाहता था। यह बताना चाहता था कि मैंने तुम्हें धोखा नहीं दिया था।”

सुधा जी की आँखों से आंसू नहीं रुक रहे थे। “तुम बहुत बड़े पागल हो विनोद। बहुत बड़े पागल। पूरी ज़िंदगी अकेले काट दी? एक बार भी नहीं सोचा कि मेरा क्या होगा?”

“सोचा था न,” विनोद मुस्कुराए, “इसीलिए तो तुम्हें रमेश जी जैसे नेक इंसान के हवाले किया था। देखो, आज तुम खुश हो, भरा-पूरा परिवार है। मेरा बलिदान व्यर्थ नहीं गया।”

तभी सुधा जी का फोन बजा। उनके बेटे राहुल का फोन था।

“माँ, कहाँ हो? बहुत देर हो गई, अंधेरा हो गया है। घर आ जाओ।”

सुधा जी ने आंसू पोंछे। “हां बेटा, आ रही हूँ।”

वो खड़ी हुईं। विनोद भी सहारे से खड़े हुए।

“अब मैं चलता हूँ सुधा। आज रात मुझे नींद बहुत अच्छी आएगी। 30 साल पुराना मुजरिम आज बरी हो गया,” विनोद ने हाथ जोड़ लिए।

सुधा जी ने आगे बढ़कर विनोद का हाथ थाम लिया। वो हाथ जो झुर्रियों से भरा था, पर जिसका स्पर्श आज भी पवित्र था।

“तुम मुजरिम नहीं हो विनोद। तुम तो देवता हो। अगर उस दिन तुम न भागते, तो शायद आज मैं ज़िंदा न होती। तुमने मुझे नफरत दी ताकि मैं जी सकूं। ऐसा प्यार तो नसीब वालों को मिलता है।”

विनोद की बूढ़ी आँखों में एक सुकून तैर गया।

“अब कहाँ जाओगे?” सुधा जी ने पूछा।

“वृद्धाश्रम में रहता हूँ। पास ही है। वहीं मेरा परिवार है,” विनोद ने कहा।

सुधा जी ने अपने पर्स से एक कार्ड निकाला। “यह मेरे बेटे का नंबर है। और यह घर का पता। रविवार को आना। मेरे पोते को कहानियां बहुत पसंद हैं। उसे एक ऐसे हीरो की कहानी सुनाना जिसने बिना तलवार उठाए जंग जीत ली थी।”

विनोद हंसे। इस बार उनकी हंसी में कंपकंपी नहीं, खनक थी। “जरूर आऊंगा।”

विनोद मुड़कर धीरे-धीरे गेट की तरफ बढ़ गए। उनकी चाल में अब वो लंगड़ाहट कम और एक अजीब सा गर्व ज्यादा था।

सुधा जी वहीं खड़ी उन्हें देखती रहीं। हवा का एक झोंका आया और उनके बालों को सहला गया। उन्हें ऐसा लगा जैसे 30 साल पहले का वो अधूरा मंडप आज पूरा हो गया हो। सात फेरे नहीं हुए थे, पर आत्मा का गठबंधन तो उसी दिन हो गया था।

घर लौटते वक्त सुधा जी ने वो पीला खत अपने पर्स में सबसे सुरक्षित जगह रखा। वो जानती थीं कि रमेश जी उनके पति थे और रहेंगे, लेकिन विनोद… विनोद वो ‘कृष्ण’ थे जिन्होंने अपनी ‘मीरा’ की इज़्ज़त के लिए खुद को ‘रणछोड़’ कहलवाना मंज़ूर किया था।

उस रात सुधा जी ने अपने कमरे की खिड़की खोली। आसमान में चाँद चमक रहा था। उन्होंने मन ही मन कहा, “माफ़ कर दीजियेगा बाबूजी, जिसे हम पत्थर समझकर कोसते रहे, वो तो हीरा निकला।”

रिश्ते सिंदूर और मंगलसूत्र से नहीं, त्याग और समर्पण से बनते हैं। कुछ प्रेम कहानियां पूरी होकर भी अधूरी रह जाती हैं, और कुछ अधूरी होकर भी अमर हो जाती हैं।



कहानी के अंत में एक विचार:

दोस्तो, हम अक्सर आँखों देखी घटना को ही सच मान लेते हैं। लेकिन कभी-कभी सच की एक परत ऐसी भी होती है जो दिखाई नहीं देती। विनोद ने अपनी बदनामी सहकर सुधा का जीवन संवारा। क्या आज के दौर में ऐसा निस्वार्थ प्रेम मुमकिन है?

क्या इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया?

अगर हाँ, तो अपने माता-पिता और बुजुर्गों के साथ थोड़ा समय बिताएं, हो सकता है उनके दिल में भी कोई ऐसी अनकही कहानी दबी हो।

“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही मार्मिक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”

लेखिका : सावित्री मल्होत्रा

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