वो खाली घर नहीं था – रश्मि झा मिश्रा

कार का हॉर्न तीन बार बजाने के बावजूद जब अंदर से गेट खोलने कोई नहीं आया, तो समीर के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उसने ड्राइविंग सीट पर बैठे-बैठे ही अपनी पत्नी, रिया की तरफ देखा।

“देखा रिया? मैं तुमसे कहता था न कि माँ और बाबूजी वहां अकेले मुश्किल में हैं। अब देखो, गेट खोलने वाला भी कोई नहीं है। पता नहीं किस हाल में होंगे? फोन भी नहीं उठा रहे सुबह से।” समीर की आवाज़ में झुंझलाहट और डर दोनों थे।

रिया ने उसे शांत करने की कोशिश की, “समीर, आप इतना मत सोचिए। हो सकता है पीछे वाले आंगन में धूप सेक रहे हों या टीवी देख रहे हों। 70 साल की उम्र है, सुस्ती तो आ ही जाती है। वैसे भी, आज सरप्राइज देने आए हैं, तो थोड़ा इंतज़ार तो बनता है।”

समीर ने गाड़ी से उतरते हुए एक गहरी सांस ली। आज उसके पिता, रिटायर कर्नल रघुनंदन और माँ सुमित्रा जी की 45वीं सालगिरह थी। समीर ने मुंबई से पुणे तक की यह ड्राइव सिर्फ इसलिए की थी ताकि वह अपने माता-पिता को यह सरप्राइज दे सके और अंततः उन्हें अपने साथ मुंबई चलने के लिए मना सके।

पिछले तीन सालों से, जब से बाबूजी रिटायर हुए थे, समीर को यही लगता था कि वे इस बड़े से पुराने घर में अकेलेपन और उदासी के शिकार हो रहे हैं। वह उन्हें अपनी ‘सोसायटी लाइफ’ और ‘मेट्रो सिटी’ की सुविधाओं में ले जाना चाहता था।

समीर ने डुप्लीकेट चाबी से मेन गेट खोला। अंदर घुसते ही उसे एक अजीब सी चीज महसूस हुई। वह सन्नाटा, जिसकी उसे उम्मीद थी, वहां नहीं था। इसके विपरीत, घर के अंदर से हंसने-खिलखिलाने और बर्तनों के खटकने की आवाज़ें आ रही थीं।

“ये शोर कैसा है?” रिया ने धीरे से पूछा।

समीर तेज कदमों से बरामदे की ओर बढ़ा। मुख्य दरवाजा खुला हुआ था। जैसे ही वह दहलीज पर पहुंचा, उसके कदम ठिठक गए। सामने का नज़ारा उसकी कल्पना से बिल्कुल परे था।

उसने सोचा था कि बाबूजी अपनी आराम कुर्सी पर ऊंघ रहे होंगे और माँ घुटनों के दर्द के कारण सोफे पर बैठी होंगी। लेकिन यहाँ तो महफ़िल सजी थी।

ड्राइंग रूम का फर्नीचर दीवारों से सटा दिया गया था और बीच में दरी बिछी थी। वहां करीब पंद्रह-बीस बच्चे बैठे थे, जो शायद पास की बस्ती के लग रहे थे। उनके सामने ब्लैकबोर्ड पर कुछ लिखा था और… और बाबूजी! बाबूजी हाथ में छड़ी लिए नहीं, बल्कि चॉक लिए उन्हें गणित का कोई सवाल समझा रहे थे। उनके चेहरे पर वह कड़क फौजी अनुशासन नहीं, बल्कि एक नरम, दुलार भरी मुस्कान थी।

और माँ? सुमित्रा जी, जिन्हें समीर हमेशा “बेटा, मेरे घुटने अब साथ नहीं देते” कहते सुनता था, वह रसोई से ड्राइंग रूम के बीच फुर्ती से चल रही थीं। उनके हाथों में बड़ी सी ट्रे थी जिसमें हलवा और पूड़ियाँ थीं। उनके साथ दो-तीन अन्य महिलाएं भी थीं जो समीर के लिए अनजान थीं—शायद पड़ोसी या मददगार।

“अरे कल्लू, तूने फिर से पहाड़ा गलत सुनाया! अब तुझे हलवा बाद में मिलेगा,” बाबूजी की दमदार आवाज़ गूंजी और पूरे कमरे में बच्चों की हंसी का फव्वारा छूट पड़ा।

समीर और रिया अवाक खड़े थे। उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। यह वही घर था जिसे समीर ‘वृद्धाश्रम’ जैसा नीरस समझता था?

तभी एक छोटी सी बच्ची, जिसकी दो चोटियां हवा में झूल रही थीं, की नज़र दरवाजे पर खड़े समीर पर पड़ी। उसने ज़ोर से कहा, “दादी माँ! कोई आया है!”

सुमित्रा जी ने पलटकर देखा। उनके हाथ से ट्रे लगभग छूटते-छूटते बची।

“समीर? रिया? तुम लोग कब आए?” सुमित्रा जी के चेहरे पर पसीना था, पर चमक किसी 16 साल की किशोरी जैसी थी।

बाबूजी ने भी चश्मा नाक पर ठीक करते हुए देखा। “अरे! यह तो असली सरप्राइज हो गया। आओ भाई, अंदर आओ। क्लास डिस्टर्ब मत करो।” उन्होंने हंसते हुए कहा।

समीर अब भी सदमे में था। वह अंदर आया और माँ के पैर छुए। “माँ, यह… यह सब क्या है? ये बच्चे कौन हैं? और आप इतना काम कर रही हैं? डॉक्टर ने आपको आराम करने को कहा था।”

सुमित्रा जी ने पल्लू से माथा पोंछा और मुस्कुराईं, “अरे बेटा, डॉक्टर ने शरीर को आराम देने को कहा था, मन को मारने को नहीं। बैठो, मैं तुम्हारे लिए पानी लाती हूँ।”

थोड़ी देर में क्लास खत्म हुई। बच्चों ने शोर मचाते हुए हलवा-पूरी खाई और ‘नमस्ते अंकल-आंटी’ कहकर भाग गए। घर में फिर से थोड़ी शांति हुई, लेकिन यह शांति उदास नहीं, बल्कि संतोषजनक थी।

रात के खाने के समय, समीर ने वह बात छेड़ ही दी जो उसके मन में चल रही थी।

“बाबूजी, मुझे लगा था आप लोग यहाँ अकेले परेशान होते होंगे। मैं तो आज आप लोगों को मुंबई ले जाने की तैयारी के साथ आया था। वहां हमारा फ्लैट बड़ा है, नौकर-चाकर हैं, आपको कोई काम नहीं करना पड़ेगा। बस आराम करना।”

बाबूजी ने खाने का निवाला तोड़ा और एक पल के लिए रुके। उन्होंने सुमित्रा जी की ओर देखा और फिर समीर की ओर।

“बेटा समीर,” बाबूजी ने गंभीर स्वर में कहा। “तुझे याद है जब मैं फौज से रिटायर होकर आया था, तो पहले छह महीने मैं डिप्रेशन में चला गया था? मुझे लगता था कि मैं ‘बेकार’ हो गया हूँ। तेरी माँ भी घर के सन्नाटे से बीमार रहने लगी थी। हम दोनों सिर्फ मौत का इंतज़ार कर रहे थे।”

समीर चुपचाप सुनता रहा।

“फिर एक दिन,” सुमित्रा जी ने बात आगे बढ़ाई, “पड़ोस की कामवाली बाई अपनी बेटी को साथ लाई थी। वह बच्ची होशियार थी, पर स्कूल नहीं जा सकती थी। तेरे बाबूजी ने उसे पढ़ाना शुरू किया। उस एक बच्ची से शुरू हुआ यह सिलसिला आज बीस बच्चों तक पहुँच गया है। और मैं… मुझे तो लगा था मैं बूढ़ी हो गई हूँ, लेकिन जब इन बच्चों के लिए नाश्ता बनाती हूँ, तो पता ही नहीं चलता दर्द कहाँ गया।”

बाबूजी ने मुस्कुराते हुए कहा, “समीर, तू हमें मुंबई ले जाकर क्या देगा? एक एसी कमरा? बड़ा टीवी? और दिन भर खिड़की से बाहर ताकते रहने की सज़ा? वहां हम ‘ज़िंदा’ रहेंगे, पर यहाँ हम ‘जी’ रहे हैं। यहाँ हम किसी के काम आ रहे हैं। ये बच्चे, ये मोहल्ले के लोग जो शाम को सत्संग के लिए आते हैं, ये हमारा नया परिवार हैं।”

समीर ने रिया की तरफ देखा। रिया की आंखों में आंसू थे।

“भैया,” तभी रसोई से एक महिला चाय लेकर आई। यह सरला थी, जो समीर के लिए अजनबी थी। “आप खुशकिस्मत हैं कि आपको ऐसे माता-पिता मिले। पिछले साल जब मेरे पति का एक्सीडेंट हुआ था, तो कर्नल साहब ने ही अस्पताल का पूरा खर्चा उठाया था। और माताजी ने मेरे बच्चों को संभाला। यह घर सिर्फ ईंट-पत्थर का मकान नहीं है भैया, यह इस पूरे इलाके की उम्मीद है।”

समीर का गला भर आया। वह जिस ‘खालीपन’ को भरने आया था, वह तो कभी था ही नहीं। असल में, खालीपन तो उसकी अपनी जिंदगी में था—भागदौड़, डेडलाइन और वीकेंड पार्टीज़ के बीच, जहां सुकून का नामोनिशान नहीं था। उसने अपने माता-पिता को ‘बेचारा’ समझा था, जबकि वे ‘दाता’ की भूमिका में थे।

उसने अपने बैग से वह केक निकाला जो वह लाया था।

“सॉरी बाबूजी, सॉरी माँ,” समीर ने धीरे से कहा। “मैं अपनी दुनिया के चश्मे से आपकी दुनिया देख रहा था। मुझे लगा बुढ़ापा मतलब लाचारी होती है, पर आपने तो बुढ़ापे को एक नई शुरुआत बना दिया।”

बाबूजी ने समीर के कंधे पर हाथ रखा। “बेटा, जीवन का अर्थ सांस लेना नहीं, बल्कि किसी की सांसों की वजह बनना है। जिस दिन इंसान को लगता है कि उसकी अब किसी को ज़रूरत नहीं, वो उसी दिन बूढ़ा होता है। हमें अभी बूढ़ा मत बना।”

केक कटा। तालियां बजीं। सरला और उसके बच्चे भी शामिल हुए। उस रात समीर ने अपने माता-पिता के घर में जो नींद ली, वैसी नींद उसे मुंबई के आलीशान फ्लैट में बरसों से नहीं आई थी।

अगली सुबह जब समीर और रिया वापस जाने के लिए तैयार हुए, तो समीर ने बाबूजी के पैर छुए।

“बाबूजी, अब मैं आपको मुंबई चलने की ज़िद नहीं करूँगा। पर एक वादा करिए।”

“क्या?” बाबूजी ने पूछा।

“अगली बार जब आऊं, तो मुझे भी अपनी इस क्लास में एक कोना दे दीजिएगा। थोड़ा बहुत गणित तो मैं भी पढ़ा ही सकता हूँ,” समीर ने हंसते हुए कहा।

सुमित्रा जी ने उसे गले लगा लिया। “जरूर बेटा, यह घर तुम्हारा है, और यह काम भी।”

गाड़ी स्टार्ट करते समय समीर ने रियर व्यू मिरर में देखा। उसके माता-पिता गेट पर खड़े हाथ हिला रहे थे। वे कमजोर या लाचार नहीं दिख रहे थे। वे दो बरगद के पेड़ों की तरह लग रहे थे, जिनकी छांव में कई नन्हीं पौधें पनप रही थीं।

समीर ने रिया से कहा, “रिया, लोग कहते हैं बच्चे मां-बाप का सहारा बनते हैं। पर सच तो यह है कि मां-बाप अपनी आखिरी सांस तक हमें यही सिखाते रहते हैं कि असली सहारा ‘स्वयं’ और ‘सेवा’ में है।”

गाड़ी हाइवे पर दौड़ पड़ी, लेकिन समीर का दिल वहीं उस आंगन में छूट गया था, जहां अकेलेपन का शोर नहीं, बल्कि अपनों के प्यार का संगीत गूंज रहा था।


मित्रों, हम अक्सर सोचते हैं कि बुज़ुर्गों को सिर्फ आराम की ज़रूरत होती है, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है ‘महत्वपूर्ण’ महसूस करने की। उन्हें दया नहीं, उद्देश्य चाहिए होता है।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ, तो लाइक करें और कमेंट में ‘माता-पिता’ लिखकर अपना प्यार जताएं। इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें।

अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो रिश्तों की अहमियत और जज्बातों को समझने वाली ऐसी ही मार्मिक कहानियां पढ़ने के लिए पेज को फॉलो करें।

धन्यवाद!

मूल लेखिका : रश्मि झा मिश्रा 

error: Content is protected !!