**वो दाग नहीं, ममता के हस्ताक्षर हैं** – मोहिनी मिश्रा

*किटी पार्टी की चकाचौंध में जब एक बुजुर्ग माँ से गलती हुई, तो मेहमानों ने नाक-भौं सिकोड़ ली। लेकिन 15 साल के पोते ने उस ‘गंदगी’ को जिस तरह अपनाया, उसने वहाँ मौजूद हर औरत के मेकअप के पीछे छिपे असली चेहरे को बेनकाब कर दिया।*

आरव रुका नहीं। उसने अपनी दादी का गीला हाथ अपने हाथ में लिया। “और आंटी, आप लोग तो बड़े घरों से हैं न? बहुत पढ़ी-लिखी हैं। तो आपको यह नहीं पता कि माँ-बाप और छोटे बच्चे एक समान होते हैं? जिस दिन आप बूढ़ी होंगी और आपके हाथ कांपेंगे, तब अगर आपका बेटा आपको ‘छी’ बोलकर ओल्ड एज होम भेजने की बात करेगा, तब आपको यह कालीन और यह परफ्यूम याद आएगा?”

“अरे मीरा! यह झूमर तो तुमने कमाल का लगवाया है, बिल्कुल इटालियन लगता है। और यह सोफा, उफ्फ! इसका फैब्रिक तो देखो, मखमल है न?” सोनिया ने अपने हाथ में पकड़े वाइन ग्लास को नज़ाकत से घुमाते हुए कहा।

मीरा के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान थी, लेकिन दिल में गर्व के लड्डू फूट रहे थे। आज उसकी बारी थी किटी पार्टी होस्ट करने की। शहर की पॉश कॉलोनी ‘गुलमोहर ग्रीन्स’ के इस आलीशान फ्लैट में मीरा ने हर चीज़ बहुत सलीके से सजाई थी। उसके पति, अनिरुद्ध, शहर के माने हुए आर्किटेक्ट थे और मीरा खुद एक बुटीक चलाती थी। समाज में उनका अच्छा-खासा रुतबा था।

हॉल में करीब दस-बारह महिलाएं बैठी थीं। फिजा में महंगे परफ्यूम की खुशबू और एयर कंडीशनर की ठंडक घुली हुई थी। बातें वही थीं—किसने कौन सी डायमंड ज्वेलरी खरीदी, किसके बच्चे किस इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ रहे हैं, और किसकी सास कितनी ‘मुसीबत’ है।

मीरा किचन से कबाब की प्लेट लेकर आ रही थी कि तभी उसकी नज़र हॉल के कोने में खुले हुए बेडरूम के दरवाज़े पर पड़ी। उसका दिल धक से रह गया। उसने तो वह दरवाज़ा बंद किया था।

उस कमरे से एक बेहद कमजोर, सफ़ेद साड़ी में लिपटी हुई बुजुर्ग महिला बाहर निकल रही थीं। वह थीं अनिरुद्ध की माँ, सुमित्रा देवी। अस्सी पार कर चुकी सुमित्रा जी को अब अल्जाइमर की शिकायत थी। कभी-कभी वह भूल जाती थीं कि वह कहाँ हैं, कभी उन्हें लगता कि अनिरुद्ध अभी छोटा बच्चा है।

मीरा ने दौड़कर उन्हें रोकना चाहा, “माँ जी! आप बाहर क्यों आ गईं? मैंने कहा था न कि आज मेहमान आए हैं, आप कमरे में ही आराम कीजियेगा।”

लेकिन सुमित्रा जी की धुंधली आँखों में एक अजीब सी घबराहट थी। वह कुछ बोलना चाहती थीं, पर उनके होंठ कांप रहे थे। शायद उन्हें वॉशरूम जाना था, लेकिन भीड़ और शोर देखकर वह रास्ता भूल गई थीं।

इससे पहले कि मीरा उन तक पहुँचती, सुमित्रा जी लड़खड़ाईं और सोफे के पास लगे उस बेशकीमती ईरानी कालीन पर गिरते-गिरते बचीं। और उसी पल, वह हादसा हो गया जिसका मीरा को सबसे ज्यादा डर था। सुमित्रा जी का मूत्राशय जवाब दे गया। एक पीली धार उनकी साड़ी से होती हुई, उस महंगे कालीन पर फैल गई।

पूरे हॉल में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर अचानक, सोनिया (जो मीरा की तथाकथित बेस्ट फ्रेंड थी) अपनी नाक पर रुमाल रखते हुए चिल्लाई, “ओह माय गॉड! मीरा, यह क्या है? छिः! पूरा मूड खराब कर दिया। इतनी बदबू!”

दूसरी महिला, तान्या, ने अपनी साड़ी समेटते हुए कहा, “यार मीरा, तुम अपनी सास को ओल्ड एज होम क्यों नहीं भेज देतीं? देखो, उन्होंने मेरा नया गाउन गंदा कर दिया होता अभी। छी, कैसे रह लेती हो तुम इस गंदगी में?”

सुमित्रा जी वहीँ फर्श पर जड़वत खड़ी थीं। उन्हें शायद अपनी गलती का अहसास हो गया था। उनकी आँखों से टप-टप आंसू गिर रहे थे और वह अपनी गीली साड़ी को छिपाने की नाकाम कोशिश कर रही थीं। शर्मिंदगी से उनका झुर्रियों भरा चेहरा लाल पड़ गया था।

मीरा को लगा जैसे काटो तो खून नहीं। उसे अपनी सास पर गुस्सा भी आ रहा था और शर्म भी। वह मेहमानों के सामने अपनी ‘इमेज’ खराब होने से बौखला गई थी।

“सॉरी… आई एम सो सॉरी लेडीज़,” मीरा हकलाते हुए बोली। “मैं… मैं अभी मेड को बुलाती हूँ। माँ जी को पता नहीं चलता आजकल। आप लोग प्लीज दूसरे कमरे में चलिए।”

सोनिया ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, “रहने दो मीरा। अब तो उल्टियां आ रही हैं। हम चलते हैं। अगली बार पार्टी कहीं बाहर रखेंगे, तुम्हारे घर में तो यह ‘नर्सिंग होम’ वाला माहौल बर्दाश्त नहीं होता।”

सारी औरतें उठने लगीं। वे सुमित्रा जी को ऐसे देख रही थीं जैसे वह कोई इंसान नहीं, बल्कि कूड़े का ढेर हों। सुमित्रा जी कांप रही थीं, शायद ठंड से नहीं, बल्कि उस अपमान से जो उनकी आत्मा को छलनी कर रहा था।

तभी, घर का मुख्य दरवाज़ा खुला। मीरा का पंद्रह वर्षीय बेटा, आरव, स्कूल से लौटा था। उसके कंधे पर भारी बैग था और चेहरे पर पसीना। उसने जैसे ही हॉल में कदम रखा, उसे अजीब से सन्नाटे और दुर्गंध का अहसास हुआ।

उसने देखा कि उसकी दादी बीच हॉल में गीले कपड़ों में खड़ी रो रही हैं, और मम्मी की सहेलियाँ उन्हें घृणा से देख रही हैं। मीरा भी दूर खड़ी थी, पास जाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी।

आरव एक पल के लिए रुका। उसने अपनी माँ की तरफ देखा, फिर उन ‘आंटीज’ की तरफ। उसकी आँखों में एक अंगारा सा दहका। उसने अपना स्कूल बैग ज़मीन पर पटका और सीधे अपनी दादी के पास गया।

“दादी,” आरव ने बहुत ही कोमल स्वर में कहा। उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला और सुमित्रा जी के आंसू पोंछे। “क्यों रो रही हो आप? छोटी सी बात है। चलो, मैं आपको साफ़ कर देता हूँ।”

सोनिया ने टोका, “अरे आरव बेटा, पास मत जाओ। इन्फेक्शन हो जाएगा। देख नहीं रहे कितनी गंदगी है? अपनी मम्मी को बोलो मेड बुलाएंगी।”

आरव ने पलटकर सोनिया की तरफ देखा। उसकी नज़र इतनी तीखी थी कि सोनिया सकपका गई।

“आंटी,” आरव ने शांत लेकिन मज़बूत आवाज़ में कहा, “जब मैं छोटा था, तो इसी दादी की गोद में न जाने कितनी बार मैंने सुसु-पॉटी की थी। तब तो दादी को इन्फेक्शन नहीं हुआ? तब तो उन्होंने मुझे ‘छी’ कहकर ज़मीन पर नहीं पटक दिया? उन्होंने अपनी साड़ी बदली, मुझे नहलाया और फिर सीने से लगाकर सुलाया। आज अगर बुढ़ापे में उनका शरीर कमज़ोर हो गया है, तो यह ‘गंदगी’ कैसे हो गई?”

हॉल में पिन ड्रॉप साइलेंस था। मीरा अपनी जगह जमी रह गई। बेटे के शब्दों ने उसके गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा मारा था।

आरव रुका नहीं। उसने अपनी दादी का गीला हाथ अपने हाथ में लिया। “और आंटी, आप लोग तो बड़े घरों से हैं न? बहुत पढ़ी-लिखी हैं। तो आपको यह नहीं पता कि माँ-बाप और छोटे बच्चे एक समान होते हैं? जिस दिन आप बूढ़ी होंगी और आपके हाथ कांपेंगे, तब अगर आपका बेटा आपको ‘छी’ बोलकर ओल्ड एज होम भेजने की बात करेगा, तब आपको यह कालीन और यह परफ्यूम याद आएगा?”

तान्या ने कुछ कहना चाहा, लेकिन उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकली।

आरव ने फिर अपनी माँ की तरफ देखा। “मम्मी, आपको शर्म आ रही है न? कि आपकी पार्टी खराब हो गई? यह कालीन गंदा हो गया? यह कालीन पापा ने पिछले महीने बीस हज़ार का खरीदा था। लेकिन यह दादी… इन्होंने पापा को बनाने के लिए अपने गहने तक बेच दिए थे। आज आप इस बीस हज़ार के कालीन के लिए उस औरत को ज़लील होने दे रही हो जिसने आपको ‘माँ’ शब्द का मतलब सिखाया?”

मीरा की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उसका अहंकार, उसकी झूठी शान, उसकी किटी पार्टी का नशा—सब कुछ आरव के उन चंद सवालों में बह गया।

वह दौड़कर सुमित्रा जी के पास गई। उसने आरव को हटाया और खुद सुमित्रा जी को गले लगा लिया। गीली साड़ी और दुर्गंध अब उसे महसूस नहीं हो रही थी। उसे महसूस हो रहा था तो बस एक कांपता हुआ शरीर जिसे सहारे और प्यार की ज़रूरत थी।

“मुझे माफ़ कर दीजिये माँ जी… मुझे माफ़ कर दीजिये,” मीरा फूट-फूट कर रोने लगी। “मैं भूल गई थी कि यह घर आपकी तपस्या की नींव पर खड़ा है, मेरे इंटीरियर डेकोरेशन पर नहीं।”

सोनिया और बाकी महिलाएं अब नज़रें नहीं मिला पा रही थीं। वे चुपचाप, बिना कुछ बोले, एक-एक करके वहां से खिसक लीं। जो पार्टी शान-शौकत के प्रदर्शन के लिए शुरू हुई थी, वह एक कड़वे सच पर खत्म हुई।

मीरा और आरव सुमित्रा जी को बाथरूम ले गए। मीरा ने खुद अपने हाथों से उन्हें नहलाया। जब वह उन्हें नए कपड़े पहना रही थी, तो सुमित्रा जी ने अपनी कांपती उंगलियों से मीरा का चेहरा छुआ।

“बहू… मैंने… गंदा कर दिया न? वो… वो सहेलियाँ चली गईं?” सुमित्रा जी ने डरी हुई आवाज़ में पूछा।

मीरा ने उनके हाथों को चूम लिया। “नहीं माँ जी। आपने कुछ गंदा नहीं किया। आपने तो आज मेरे मन की गंदगी साफ़ कर दी। और वो सहेलियाँ नहीं थीं, वो तो बस तमाशबीन थीं। मेरा असली दोस्त तो मेरा बेटा है जिसने आज मुझे आईना दिखा दिया।”

शाम को जब अनिरुद्ध घर आया, तो उसे घर में अजीब सी शांति महसूस हुई। कालीन गायब था, फर्श साफ़ था। डाइनिंग टेबल पर कोई फैंसी खाना नहीं था, बल्कि खिचड़ी बनी थी।

सुमित्रा जी अपने कमरे में सुकून से सो रही थीं। मीरा और आरव उनके पास बैठे थे। अनिरुद्ध ने पूछा, “पार्टी कैसी रही?”

मीरा ने अनिरुद्ध का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “पार्टी तो नहीं चली अनिरुद्ध, लेकिन आज हमारे घर का ‘संस्कार’ पास हो गया। हमारा बेटा बड़ा हो गया है।”

उस रात मीरा ने वह महंगा कालीन हमेशा के लिए स्टोर रूम में रखवा दिया। उसे समझ आ गया था कि रिश्तों की गर्माहट मखमल के सोफों में नहीं, बल्कि उस अहसास में होती है जहाँ हम अपनों की कमियों को भी अपना सकें।

बुढ़ापा, बचपन की वापसी ही तो है। फर्क सिर्फ इतना है कि बचपन में माँ-बाप हमारी गंदगी साफ़ करते हुए भविष्य के सपने देखते हैं, और बुढ़ापे में हमें उनकी सेवा करते हुए उनके अतीत का कर्ज़ चुकाना होता है। और जो औलाद इस कर्ज़ को ‘बोझ’ समझती है, वह दुनिया की सबसे गरीब औलाद है।

**कहानी का शीर्षक:**

**वो दाग नहीं, ममता के हस्ताक्षर हैं**

**लेखक का संदेश:**

बुढ़ापा कोई बीमारी नहीं है, यह जीवन का एक पड़ाव है जहाँ इंसान को दवाई से ज्यादा ‘प्यार’ और ‘सम्मान’ की ज़रूरत होती है। हमारे माता-पिता ने हमें तब संभाला था जब हम बोल भी नहीं सकते थे, तो क्या हम उन्हें तब नहीं संभाल सकते जब वे फिर से बच्चे बन जाते हैं?

**क्या इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया?**

क्या आपके घर में भी कोई बुजुर्ग है? आज ही उनके पास जाइये, उनके झुर्रियों भरे हाथों को थामिये और कहिये कि “आप हमारे लिए बोझ नहीं, हमारी धरोहर हैं।”

**”अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी रूह को झकझोर दिया, तो लाइक, कमेंट और शेयर ज़रूर करें। ताकि समाज की हर मीरा को यह बात समझ आ सके और हर घर में आरव जैसा बेटा तैयार हो सके। ऐसी ही दिल को छू लेने वाली और मार्मिक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**

लेखिका : मोहिनी मिश्रा

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