वो बंद कमरा और बैग में सिमटी दुनिया – स्वाति जैन

“जिस घर की दीवारों का रंग कभी मेरी पसंद से तय होता था, आज उसी घर में मुझे अपनी एक साड़ी टांगने के लिए ‘इजाज़त’ और ‘जगह’ दोनों मांगनी पड़ी। क्या शादी के बाद बेटियों का हक सिर्फ यादों तक ही सिमट कर रह जाता है?”

“सुमित, आपको नहीं लगता मायके का घर चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, लड़कियों के कपड़े शादी के बाद बैग में ही रहते हैं?”

सुमित ने मोबाइल से नज़र हटाई। “क्या मतलब?”

“मतलब यह सुमित,” मेघा की आँखों में नमी आ गई। “नीचे देखो, इतना बड़ा घर है। तीन बेडरूम, ड्राइंग रूम, लॉबी, ऑफिस। लेकिन मेरे लिए कोई एक दराज भी खाली नहीं है। मेरा सामान इसी बैग में आया है और इसी में वापस जाएगा। मैं इस घर की बेटी हूँ, पर अब मेरा कोई ‘ठिकाना’ नहीं है यहाँ। मैं बस एक मेहमान हूँ, जिसका स्वागत तो होता है, पर जिसे अपना सामान फैलाने का हक़ नहीं होता।”

ट्रेन की सीटी बजी और प्लेटफार्म पर रुक गई। मेघा ने खिड़की से बाहर झांका। अपना शहर, अपनी हवा और वो अपनापन जो सिर्फ ‘मायके’ शब्द में होता है। उसके चेहरे पर थकान के बावजूद एक चमक आ गई। तीन साल बाद वह अपने घर आ रही थी। गोद में छह महीने का बेटा कबीर और साथ में पति सुमित थे।

स्टेशन पर पापा लेने आए थे। मेघा को देखते ही उनकी आँखों में नमी और होंठों पर मुस्कान तैर गई। “आ गई मेरी गुड़िया!” उन्होंने कबीर को गोद में लेते हुए कहा।

कार घर की तरफ दौड़ी। मेघा रास्ते भर शहर के बदलते नज़ारों को देखती रही। लेकिन उसका दिल तो बस उस घर तक पहुँचने की जल्दी में था, जहाँ उसने अपना बचपन, अपनी जवानी और अपने सपने जिए थे।

जैसे ही कार ‘शर्मा निवास’ के गेट पर रुकी, मेघा की आँखें फटी की फटी रह गईं। पुराना लोहे का गेट अब बदल चुका था। उसकी जगह एक ऑटोमैटिक स्लाइडिंग गेट लगा था। घर का रंग भी अब उसका पसंदीदा पीला नहीं, बल्कि मॉडर्न ग्रे और वाइट हो गया था।

“पापा, घर तो बिल्कुल बदल दिया आपने!” मेघा ने आश्चर्य से कहा।

“हाँ बेटा,” पापा ने गर्व से कहा। “तेरे भाई रोहन की शादी हुई तो थोड़ा रेनोवेशन करवा लिया। अब घर बड़ा हो गया है, ऊपर एक पूरी मंजिल और बन गई है।”

मेघा मुस्कुराई। उसे खुशी थी कि उसका मायका तरक्की कर रहा है।

अंदर दाखिल होते ही माँ ने आरती की थाली से स्वागत किया। रोहन और उसकी पत्नी, प्रिया, भी मुस्कुराते हुए मिले। सब कुछ बहुत अपना, बहुत प्यारा लग रहा था। नाश्ते और चाय के दौर के बाद, माँ ने कहा, “मेघा, तू थक गई होगी। जा, ऊपर वाले कमरे में आराम कर ले।”

“ऊपर वाला कमरा?” मेघा ने पूछा। “माँ, मैं तो अपने नीचे वाले कमरे में ही रहूँगी। वो खिड़की वाली जगह मेरी फेवरेट है।”

माँ थोड़ा असहज हुईं। “अरे बेटा, वो कमरा तो अब… दरअसल, रोहन ने उसे अपना ऑफिस बना लिया है। वर्क फ्रॉम होम चलता है न उसका। और साथ वाला कमरा अब स्टोर रूम बन गया है। तेरे लिए ऊपर गेस्ट रूम तैयार किया है, एकदम होटल जैसा।”

मेघा के दिल में एक हल्की सी टीस उठी। उसका कमरा… जहाँ उसने रातों को जागकर पढ़ाई की थी, जहाँ छुपकर उसने अपनी डायरी लिखी थी, अब वो ‘ऑफिस’ बन गया था? खैर, उसने खुद को समझाया कि बदलाव तो होते ही हैं।

वह ऊपर गेस्ट रूम में गई। कमरा वाकई सुंदर था। नए गद्दे, एसी, बड़ा सा टीवी। लेकिन उसमें वो ‘खुशबू’ नहीं थी जो उसके पुराने कमरे में थी।

सुमित ने सूटकेस एक कोने में रख दिया। मेघा ने सोचा कि कपड़े निकालकर अलमारी में जमा ले, ताकि बार-बार बैग न खोलना पड़े। उसने कमरे की बड़ी सी अलमारी खोली।

लेकिन अलमारी खाली नहीं थी।

उसमें रजाई, कंबल, रोहन के पुराने कोट और घर के कुछ एक्स्ट्रा तकिए ठूंस-ठूंस कर भरे हुए थे। अलमारी में बमुश्किल एक छोटा सा कोना खाली था जहाँ शायद दो-चार कुर्ते ही टांगे जा सकते थे।

मेघा ने अलमारी का दरवाज़ा बंद कर दिया और वहीं ज़मीन पर बैठकर अपना सूटकेस खोला।

उसने अपने कपड़े नहीं निकाले। उसने बस ज़िप खोली, एक जोड़ी कपड़े निकाले और ज़िप वापस बंद कर दी। सुमित ने देखा तो पूछा, “मेघा, अलमारी में जगह नहीं है क्या? मैं माँजी से बोलूँ खाली करवाने को?”

“नहीं सुमित,” मेघा ने जल्दी से कहा। “रहने दो। चार दिन की तो बात है। क्यों बेकार में माँ को परेशान करना। बैग में ही ठीक है।”

यह कहते हुए मेघा की आवाज़ तो सामान्य थी, लेकिन अंदर कुछ टूट सा गया था। यह वही घर था जहाँ उसके पास एक पूरी अलमारी हुआ करती थी। उसमें उसकी साड़ियों, जीन्स और टॉप्स का एक अलग ही साम्राज्य था। अगर रोहन का एक रुमाल भी उसकी अलमारी में आ जाता, तो वह घर सिर पर उठा लेती थी। और आज? आज इस आलीशान, तीन मंज़िला घर में उसके पास अपने चार जोड़े कपड़े टांगने के लिए भी जगह नहीं थी।

शाम को घर में चहल-पहल थी। रिश्तेदार मिलने आ रहे थे। मेघा को तैयार होना था। उसने अपनी भारी बनारसी साड़ी निकाली। साड़ी बैग में दबे होने के कारण थोड़ी मुड़ गई थी।

वह नीचे माँ के पास गई।

“माँ, प्रेस कहाँ है? साड़ी थोड़ी क्रश हो गई है,” मेघा ने पूछा।

“अरे, प्रेस तो प्रिया के कमरे में है। रुक मैं मंगवा देती हूँ,” माँ ने आवाज़ लगाई। “प्रिया बहू, ज़रा प्रेस देना।”

प्रिया ने प्रेस लाकर दी, लेकिन साथ ही एक हिदायत भी दे दी, “दीदी, थोड़ा ध्यान से यूज़ करना, इसका वायर थोड़ा लूज़ है। और काम हो जाए तो वापस रख देना, मुझे कल सुबह सुमित (प्रिया के पति, रोहन) के कपड़े प्रेस करने हैं।”

मेघा ने प्रेस ली। उसे याद आया, एक वक्त था जब इस घर की हर चीज़ पर उसका हक़ था। उसे किसी से मांगना नहीं पड़ता था। आज उसे हर छोटी चीज़—तौलिया, साबुन, प्रेस—के लिए ‘इजाज़त’ लेनी पड़ रही थी।

रात के खाने पर पापा ने बड़े उत्साह से बताया, “मेघा, तुझे पता है, हमने पीछे वाला आंगन भी पक्का करवा दिया। अब वहाँ बारिश में कीचड़ नहीं होता।”

मेघा को याद आया कि उस कच्चे आंगन में उसने और रोहन ने कितने मिट्टी के घरौंदे बनाए थे। उसने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “अच्छा किया पापा। साफ रहता होगा अब।”

खाने के बाद सब हॉल में बैठे थे। रोहन अपने नए बिजनेस के बारे में बता रहा था। प्रिया अपनी नई ज्वेलरी दिखा रही थी। मेघा चुपचाप बैठी थी। उसे महसूस हो रहा था कि वह इस परिवार का हिस्सा तो है, लेकिन अब एक ‘दर्शक’ की तरह। केंद्र में अब रोहन और प्रिया थे।

तभी कबीर रोने लगा। मेघा उसे चुप कराने के लिए लोरी गाने लगी। माँ बोलीं, “अरे, इसे भूख लगी होगी। मेघा, तू इसे ऊपर ले जा। यहाँ शोर में नहीं सोएगा।”

मेघा कबीर को लेकर ऊपर अपने ‘गेस्ट रूम’ में आ गई।

कमरे में सन्नाटा था। सिर्फ एसी की आवाज़ आ रही थी। मेघा की नज़र फिर उस कोने में रखे सूटकेस पर गई। खुला हुआ सूटकेस, जिसमें से उसके कपड़े झांक रहे थे।

उसने सुमित से कहा, “सुमित, आपको नहीं लगता मायके का घर चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, लड़कियों के कपड़े शादी के बाद बैग में ही रहते हैं?”

सुमित ने मोबाइल से नज़र हटाई। “क्या मतलब?”

“मतलब यह सुमित,” मेघा की आँखों में नमी आ गई। “नीचे देखो, इतना बड़ा घर है। तीन बेडरूम, ड्राइंग रूम, लॉबी, ऑफिस। लेकिन मेरे लिए कोई एक दराज भी खाली नहीं है। मेरा सामान इसी बैग में आया है और इसी में वापस जाएगा। मैं इस घर की बेटी हूँ, पर अब मेरा कोई ‘ठिकाना’ नहीं है यहाँ। मैं बस एक मेहमान हूँ, जिसका स्वागत तो होता है, पर जिसे अपना सामान फैलाने का हक़ नहीं होता।”

सुमित ने उठकर मेघा का हाथ थाम लिया। “तुम ज़्यादा सोच रही हो मेघा। माँ-पापा तो जान छिड़कते हैं तुम पर।”

“जानते हूँ सुमित,” मेघा ने आंसू पोंछे। “प्यार में कमी नहीं है। पर ‘जगह’ में कमी आ गई है। जब मैं कुंवारी थी, तो यह घर मेरा था। अब यह रोहन का घर है। माँ-पापा अब रोहन के घर में रहते हैं। और मैं? मैं बस एक विजिटर हूँ।”

अगले दो दिन मेघा ने वही महसूस किया। जब उसे नहाने जाना होता, तो उसे बैग से कपड़े निकालने पड़ते। जब उसे कबीर का डायपर ढूँढना होता, तो बैग की चेन खोलनी पड़ती। वो ‘ज़िप’ की आवाज़ बार-बार उसे याद दिलाती कि उसका वजूद अब ‘पोर्टेबल’ हो गया है।

तीसरे दिन रोहन की सालगिरह की पार्टी थी। घर को बहुत खूबसूरती से सजाया गया था। मेघा ने अपनी सबसे अच्छी ड्रेस पहनी। सब उसकी तारीफ कर रहे थे। “अरे मेघा, तुम तो बिल्कुल नहीं बदलीं,” चाची ने कहा।

मेघा मुस्कुराई। मन में सोचा, “मैं नहीं बदली चाची, पर मेरा घर बदल गया है।”

पार्टी के बीच में मेघा को प्यास लगी। वह किचन की तरफ गई। वहां प्रिया अपनी सहेलियों से बात कर रही थी।

“अरे, मेघा दीदी बहुत अच्छी हैं। बिल्कुल इंटरफेयर नहीं करतीं,” प्रिया कह रही थी। “और सबसे अच्छी बात, वो गेस्ट रूम में ही रहती हैं, पूरे घर में अपना सामान नहीं फैलातीं। वरना ननदें आती हैं तो पूरा घर कबाड़खाना बना देती हैं।”

मेघा के कदम ठिठक गए। उसे ‘अच्छी ननद’ का खिताब मिल गया था क्योंकि उसने अपनी जगह ‘बैग’ तक सीमित कर ली थी। अगर उसने अपना हक़ जताया होता, तो शायद वो ‘बुरी ननद’ बन जाती। उसने पानी पिए बिना ही वापस कदम मोड़ लिए।

अगले दिन वापसी थी।

मेघा पैकिंग कर रही थी। पैकिंग क्या, बस जो दो-चार कपड़े बाहर थे, उन्हें वापस उसी सूटकेस में डालना था। माँ कमरे में आईं। उनके हाथ में अचार का डिब्बा और कुछ लड्डू थे।

“ले बेटा, ये रख ले। तेरे सुमित को पसंद हैं,” माँ ने कहा। फिर उन्होंने इधर-उधर देखा। “अरे, तूने अलमारी इस्तेमाल नहीं की क्या? कपड़े सब ऐसे ही बाहर रखे थे?”

मेघा ने सूटकेस की चेन बंद की। चर्रर्र… उस आवाज़ ने कमरे की खामोशी को चीर दिया।

“नहीं माँ,” मेघा ने मुस्कुराते हुए कहा। “अलमारी में बहुत सामान था आपका। और वैसे भी, बैग में ही ठीक रहता है। आदत हो गई है अब।”

माँ ने मेघा को गौर से देखा। शायद उन्हें मेघा की आँखों में छिपा वो दर्द दिख गया। वो खालीपन जो भरे हुए घर में भी उसे महसूस हो रहा था।

“मेघा,” माँ ने धीरे से कहा। “अगली बार जब तू आएगी, तो यह अलमारी खाली मिलेगी। मैं वादा करती हूँ।”

मेघा ने माँ को गले लगा लिया। “कोई बात नहीं माँ। घर दिलों से बड़ा होता है, अलमारियों से नहीं। आप लोगों ने इतना प्यार दिया, वही बहुत है।”

विदाई का समय आया। पापा ने फिर से कार निकाली। रोहन ने कबीर को प्यार किया। प्रिया ने मुस्कुराकर ‘बाय’ बोला।

कार जब गेट से बाहर निकली, तो मेघा ने पीछे मुड़कर उस आलीशान घर को देखा। ग्रे और वाइट रंग का वो मॉडर्न घर।

सुमित ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

मेघा ने एक गहरी सांस ली। “यही कि एक लड़की का अजीब नसीब होता है सुमित। ससुराल में उसे ‘जगह’ बनाने में पूरी उम्र लग जाती है कि यह मेरा घर है। और मायके में, जहाँ वो पैदा हुई, वहाँ उसकी जगह धीरे-धीरे ‘स्टोर रूम’ और ‘गेस्ट रूम’ में बदल जाती है। अंत में, उसका अपना घर शायद वही होता है, जो वो अपने दिल में बसाती है, या फिर… उस सूटकेस में, जिसे वो साथ लेकर चलती है।”

मेघा ने अपनी सीट बेल्ट लगाई और सामने देखने लगी। उसे समझ आ गया था कि मायका अब एक ‘डेस्टिनेशन’ है, ‘घर’ नहीं। घर अब वो था जहाँ वो जा रही थी, जहाँ की अलमारी में उसके कपड़े हैं, जहाँ की चाबियाँ उसके पास हैं।

उसने अपने बैग पर हाथ रखा। मायके की यादें, माँ का प्यार, पापा का दुलार और बचपन की खुशबू—सब उस बैग में बंद थे। कपड़े भले ही बैग में रह गए हों, लेकिन वो अहसास अब भी उसके साथ था।

और शायद, हर विवाहित स्त्री की यही कहानी है। घर बड़े हो जाते हैं, कमरे बढ़ जाते हैं, लेकिन बेटी का सामान अंततः बैग में ही सिमट जाता है। वो बैग, जो उसकी यात्रा का साथी भी है और उसकी बदलती हुई तकदीर का गवाह भी।


निष्कर्ष:

दोस्तों, यह सिर्फ मेघा की कहानी नहीं है। यह हर उस बेटी की कहानी है जो शादी के बाद जब अपने ही घर जाती है, तो उसे ‘मेहमान’ का दर्जा मिल जाता है। हम अक्सर घर की रिनोवेशन में दीवारों का रंग तो बदल देते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि उस घर की बेटी के लिए उसका कोना सिर्फ एक जगह नहीं, उसका वजूद होता है। अलमारियाँ कपड़ों से भरी हो सकती हैं, लेकिन बेटी के लिए थोड़ी सी खाली जगह उसे यह अहसास दिलाने के लिए काफी होती है कि “यह अब भी तेरा ही घर है।”

आपको यह कहानी कैसी लगी? क्या आपने भी कभी अपने मायके में ऐसा महसूस किया है? क्या आपके कपड़े भी बैग में ही रह जाते हैं? अपने अनुभव और विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : स्वाति जैन 

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