वह किताब जो उसने छीन ली – रमा साहू 

*दुनिया ने उसे एक क्रूर सौतेली माँ कहा जिसने अपने बेटे के हाथ से किताबें छीनकर उसे अनपढ़ बना दिया, लेकिन सालों बाद जब उस बेटे ने माइक थामकर सच बोला, तो हर आँख शर्म से झुक गई।*

कमरे में दीवार घड़ी की टिक-टिक रात के सन्नाटे को चीर रही थी। रात के दो बज रहे थे, लेकिन सत्रह साल के आरव की आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। उसकी टेबल पर फिजिक्स और केमिस्ट्री की मोटी-मोटी किताबें किसी पहाड़ की तरह खड़ी थीं, जो उसे हर पल कुचलने को तैयार थीं। आरव की आँखें सूजी हुई थीं, सिर में लगातार दर्द हो रहा था, और हाथ कांप रहे थे। वह बार-बार पन्ने पलटता, फॉर्मूले रटने की कोशिश करता, लेकिन शब्द उसकी आँखों के सामने धुंधले हो जाते थे।

तभी दरवाजे की कुंडी हल्की सी हिली। आरव डर के मारे सीधा हो गया। उसे लगा पापा आ गए हैं। अगर उन्होंने उसे सोता हुआ देख लिया, तो फिर वही ताने शुरू हो जाएंगे—”तेरी माँ होती तो तुझे ऐसे निकम्मा नहीं बनने देती,” या “तुझे डॉक्टर बनाना मेरा सपना है, और तू है कि सो रहा है।”

लेकिन दरवाजा पापा ने नहीं, सुमेधा ने खोला था। सुमेधा, आरव की सौतेली माँ। हाथ में गर्म दूध का गिलास लिए वह कमरे में दाखिल हुईं। आरव ने उन्हें देखते ही जल्दी से किताब आँखों के सामने कर ली और पढ़ने का नाटक करने लगा।

सुमेधा ने धीरे से गिलास टेबल पर रखा और आरव के सिर पर हाथ फेरा। उसका माथा तप रहा था।

“आरव, बेटा सो जा। बुखार है तुझे,” सुमेधा ने चिंता से कहा।

“नहीं माँ… कल प्री-बोर्ड्स हैं। अगर नंबर कम आए तो पापा…” आरव की आवाज़ में एक ऐसा डर था जिसने सुमेधा के दिल को झकझोर दिया।

सुमेधा को इस घर में आए हुए तीन साल हो चुके थे। आरव के पिता, मिस्टर खन्ना, एक बेहद अनुशासित और महत्वाकांक्षी इंसान थे। अपनी पहली पत्नी के गुजरने के बाद उन्होंने आरव की परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ी थी, लेकिन उनका प्यार शर्तों पर टिका था—और वो शर्त थी ‘अव्वल आना’। खन्ना साहब चाहते थे कि आरव शहर का सबसे बड़ा डॉक्टर बने। इसके लिए उन्होंने आरव का बचपन, उसकी हंसी, और अब उसकी जवानी… सब कुछ किताबों के बोझ तले दफना दिया था।

सुमेधा ने महसूस किया कि आरव एक ज़िंदा लाश बनता जा रहा है। वह लड़का जो कभी कैनवास पर रंगों से खेलता था, अब काले अक्षरों से डरने लगा था।

अगली सुबह वही हुआ जिसका डर था। आरव एग्जाम हॉल में बेहोश हो गया। उसे घर लाया गया। डॉक्टर ने बताया कि यह सब अत्यधिक तनाव (Stress) और पैनिक अटैक की वजह से है। खन्ना साहब डॉक्टर की बातों से ज़्यादा इस बात से परेशान थे कि आरव का एग्जाम छूट गया।

“कमज़ोर है ये! ज़रा सा प्रेशर नहीं झेल पाता। अब क्या मुंह दिखाऊंगा समाज में?” खन्ना साहब ड्राइंग रूम में टहलते हुए चिल्ला रहे थे।

सुमेधा रसोई में खड़ी सब सुन रही थी। आज उसके सब्र का बांध टूट रहा था।

शाम को खन्ना साहब ने एक नया फरमान सुनाया। “मैंने फैसला किया है। आरव को यहाँ के माहौल में पढ़ाई नहीं हो रही। मैं उसे कोटा भेज रहा हूँ। वहां हॉस्टल में रहेगा, तो दिन-रात पढ़ेगा। अगले हफ्ते ही जाएगा।”

आरव अपने कमरे में बिस्तर पर लेटा यह सुन रहा था। ‘कोटा’ का नाम सुनते ही उसकी सांसें फूलने लगीं। वह रोना चाहता था, चीखना चाहता था कि “मैं नहीं कर सकता पापा!” लेकिन उसके गले से आवाज़ नहीं निकली। वह बस छत को घूरता रहा, जहाँ पंखा घूम रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब सा सूनापन आ गया, जैसे उसने जीने की उम्मीद छोड़ दी हो।

सुमेधा आरव के कमरे में आई। उसने आरव की वो सूनी, पथराई हुई आँखें देखीं। एक माँ का दिल—चाहे वो सगी हो या सौतेली—खतरे को भांप लेता है। सुमेधा समझ गई कि अगर आरव कोटा गया, तो शायद वह कभी लौटकर नहीं आएगा, या आएगा भी तो कफ़न में लिपटकर।

उस रात सुमेधा ने एक फैसला लिया। एक ऐसा फैसला जिसके लिए उसे ‘डायन’, ‘कुलक्षिणी’ और न जाने क्या-क्या सुनने को मिलने वाला था।

अगली सुबह, जब खन्ना साहब ऑफिस चले गए, सुमेधा आरव के कमरे में गई। उसने एक बड़ा सा कार्टन (डिब्बा) लिया और आरव की अलमारी से सारी किताबें—फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी, गाइड्स, नोट्स—सब निकालकर उस डिब्बे में भरने लगी।

आरव हड़बड़ा कर उठा। “माँ? ये आप क्या कर रही हैं? मेरे नोट्स… पापा मार डालेंगे!”

सुमेधा ने एक शब्द नहीं कहा। उसने कमरे की दीवारों पर टंगे टाइम-टेबल को फाड़ दिया। उसने आरव का स्कूल बैग खाली कर दिया। उसने वो सारे चार्ट पेपर्स उतार दिए जिन पर फॉर्मूले लिखे थे।

“माँ, प्लीज! पापा आ जाएंगे!” आरव रोने लगा। उसे लगा कि सौतेली माँ उसका भविष्य बर्बाद कर रही हैं।

सुमेधा ने आरव के दोनों कंधे पकड़े और उसकी आँखों में झांका।

“आरव, तुझे ज़िंदा रहना है या डॉक्टर बनना है?” सुमेधा की आवाज़ में एक कंपन था।

आरव चुप हो गया।

“बोल बेटा! अगर तू आज नहीं बोला, तो कल मैं तुझे नहीं बचा पाऊँगी। तुझे क्या चाहिए?”

आरव फूट-फूट कर रो पड़ा। वह सुमेधा के गले लग गया। “माँ, मुझे नहीं पढ़ना। मुझे घुटन होती है। मुझे रंगों से प्यार है, मुझे पेंटिंग करनी है। लेकिन पापा कहते हैं कि पेंटिंग से पेट नहीं भरता। मुझे मरने का मन करता है माँ।”

सुमेधा ने उसे कसकर भींच लिया। “बस! अब और नहीं।”

सुमेधा ने आरव का हाथ पकड़ा और उसे लेकर स्कूल पहुँची। वहां जाकर उसने प्रिंसिपल के सामने आरव का नाम कटवाने (Withdrawal) की अर्ज़ी दे दी।

प्रिंसिपल हैरान थे। “मिसेज खन्ना, आप क्या कर रही हैं? आरव होनहार है, बस थोड़ा भटका हुआ है। बोर्ड्स के साल में नाम कटवाना? उसका साल बर्बाद हो जाएगा।”

“साल बर्बाद होगा सर, मेरा बेटा नहीं,” सुमेधा ने सपाट आवाज़ में कहा और आरव को लेकर बाहर आ गई।

शाम को जब खन्ना साहब घर आए और उन्हें पता चला, तो घर में भूचाल आ गया।

“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई सुमेधा?” खन्ना साहब ने डाइनिंग टेबल पलट दी। “तुमने मेरे बेटे का स्कूल छुड़वा दिया? उसकी किताबें रद्दी में दे दीं? तुम चाहती ही नहीं कि वो सफल हो! मैं जानता था… सौतेली माँ कभी सगी नहीं हो सकती। तुम उसकी बर्बादी चाहती हो ताकि सारी जायदाद तुम्हारे नाम हो जाए!”

खन्ना साहब की बातें किसी चाबुक की तरह सुमेधा पर बरस रही थीं। पड़ोसी भी आवाज़ें सुनकर खिड़कियों से झांक रहे थे। बातें बनने लगीं—”देखा, बेचारी पहली पत्नी के बच्चे का भविष्य खा गई ये औरत।”

आरव कोने में दुबका खड़ा था। वह पिता के गुस्से से डर रहा था, लेकिन आज पहली बार उसे सुमेधा में एक ढाल दिखाई दे रही थी।

सुमेधा खन्ना साहब के सामने चट्टान की तरह खड़ी रही। उसने नज़रे नहीं झुकाईं।

“हाँ, मैंने छुड़वा दी उसकी पढ़ाई। क्योंकि मैं नहीं चाहती कि कल को मुझे उसकी डिग्री की जगह उसकी तस्वीर पर हार चढ़ाना पड़े। आपने कभी उसकी कलाई देखी है खन्ना साहब? देखी है?”

सुमेधा ने आरव का हाथ खींचकर खन्ना साहब के सामने कर दिया। आरव की कलाई पर कम्पास से खरोचने के ताज़े निशान थे।

खन्ना साहब सन्न रह गए।

“वो खुद को ख़त्म करने की सोच रहा था। और आप? आप उसे कोटा भेजने की तैयारी कर रहे थे? आप एक ‘डॉक्टर’ बनाना चाहते थे, मैं एक ‘इंसान’ बचाना चाहती थी।”

खन्ना साहब चुप तो हो गए, लेकिन उनका अहंकार नहीं टूटा। उन्होंने साफ़ कह दिया, “ठीक है। अगर इसे नहीं पढ़ना, तो न पढ़े। लेकिन आज के बाद मैं इसकी जिम्मेदारी नहीं लूँगा। अगर इसने अपनी ज़िंदगी में कुछ नहीं किया, तो इसका ज़िम्मेदार तू होगी सुमेधा। और याद रखना, मेरे पैसे से इसे पेंटिंग-वेंटिंग का शौक पूरा करने नहीं दूँगा।”

उस दिन से घर दो हिस्सों में बंट गया। एक तरफ खन्ना साहब और उनकी खामोशी, दूसरी तरफ सुमेधा और आरव का संघर्ष।

सुमेधा ने अपने गहने बेचे। उसने अपनी छोटी सी बचत निकाली। उसने आरव को किसी महंगे आर्ट स्कूल में नहीं, बल्कि शहर के एक पुराने चित्रकार ‘उस्ताद रहीस’ के पास भेजा।

पड़ोसी ताने मारते, “अरे देखो, डॉक्टर बनने वाला था, अब पेंटर बनेगा। सौतेली माँ ने कहीं का नहीं छोड़ा।”

रिश्तेदार कहते, “खन्ना साहब, तलाक दे दो ऐसी औरत को। बच्चे का भविष्य खा गई।”

लेकिन सुमेधा ने अपने कानों में रूई डाल ली थी। वह रोज़ सुबह आरव को उठाती, लेकिन अब किताबों के लिए नहीं। वह उसे नाश्ता देती और कहती, “जा बेटा, जी ले अपनी ज़िंदगी। कैनवास पर वो सब उतार दे जो तेरे दिल में है।”

आरव बदल गया था। जिस लड़के के चेहरे पर हमेशा बारह बजे रहते थे, अब वह मुस्कुराने लगा था। वह घंटों रंगों में खोया रहता। उसके कपड़े पेंट से सने होते, लेकिन उसकी रूह साफ़ हो रही थी। सुमेधा घर के खर्च चलाने के लिए ट्यूशन पढ़ाने लगी, सिलाई करने लगी, ताकि आरव को रंगों की कमी न हो। खन्ना साहब ने आरव से बात करना बंद कर दिया था, वे उसे एक ‘नाकाम’ औलाद मानते थे।

तीन साल बीत गए। संघर्ष के तीन साल। ताने सुनने के तीन साल।

एक दिन, दिल्ली की सबसे बड़ी आर्ट गैलरी ‘द सोल कैनवास’ में एक प्रदर्शनी लगी। देश-विदेश के कलाकारों की पेंटिंग्स वहां सजी थीं। इस प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण एक युवा चित्रकार की सीरीज़ थी जिसका शीर्षक था—*”द अनस्पोकन स्क्रीम”* (अनकही चीख)।

इस सीरीज़ को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी थी। आलोचक हैरान थे कि इतनी कम उम्र में किसी ने दर्द को इतनी खूबसूरती से कैसे उकेरा है। उस युवा चित्रकार का नाम था—आरव खन्ना।

खन्ना साहब को भी इस प्रदर्शनी का न्योता मिला था, लेकिन आरव की तरफ से नहीं, बल्कि उनके एक दोस्त की तरफ से जो आर्ट का शौकीन था। खन्ना साहब बेमन से वहां गए थे। उन्हें लगा था कि आरव ने कोई छोटी-मोटी पेंटिंग बनाई होगी।

लेकिन जब वे गैलरी में दाखिल हुए, तो सन्न रह गए। आरव की पेंटिंग्स के आगे ‘सोल्ड आउट’ (बिक गया) के टैग लगे थे। लोग आरव के साथ सेल्फी ले रहे थे। विदेशी खरीदार आरव के काम की बोली लगा रहे थे।

एक पेंटिंग के सामने जाकर खन्ना साहब के कदम रुक गए। उस पेंटिंग में एक लड़का किताबों के ढेर के नीचे दबा हुआ था, उसका दम घुट रहा था, और एक औरत का हाथ उसे उस मलबे से बाहर खींच रहा था। उस औरत का चेहरा… हुबहू सुमेधा जैसा था।

नीचे कैप्शन लिखा था—*”मेरी दूसरी माँ, जिसने मुझे पहली सांस दी।”*

खन्ना साहब की आँखों से झर-झर आंसू बह निकले। उन्हें वो रात याद आ गई जब सुमेधा ने किताबें छीनी थीं। उन्हें अपनी जिद और सुमेधा का वो साहसिक फैसला याद आ गया।

तभी स्टेज पर आरव का नाम पुकारा गया। उसे ‘यंग आर्टिस्ट ऑफ द ईयर’ का अवार्ड दिया जा रहा था।

आरव माइक पर आया। पूरा हॉल तालियों से गूंज रहा था। आरव ने हाथ के इशारे से सबको शांत किया। उसकी नज़रें भीड़ में अपने पिता और सुमेधा को ढूंढ रही थीं।

“आज सब मेरी कला की तारीफ कर रहे हैं,” आरव ने भारी आवाज़ में कहा। “लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मैं यहाँ खड़ा क्यों हूँ। तीन साल पहले, मैं एक कमरे में बंद होकर अपनी जान देने वाला था। दुनिया को लग रहा था कि मैं डॉक्टर बनूँगा, पर मैं अंदर ही अंदर मर रहा था।”

हॉल में सन्नाटा छा गया।

आरव ने सुमेधा की तरफ इशारा किया, जो एक कोने में साड़ी का पल्लू संभाले खड़ी थीं।

“वो जो कोने में खड़ी हैं, वो मेरी सगी माँ नहीं हैं। दुनिया उन्हें मेरी सौतेली माँ कहती है। एक दिन उन्होंने मेरी पढ़ाई छुड़वा दी। मेरे स्कूल बैग को रद्दी में फेंक दिया। मेरे रिश्तेदारों ने उन्हें ‘डायन’ कहा। मेरे पड़ोसियों ने कहा कि सौतेली माँ ने बच्चे का भविष्य बर्बाद कर दिया।”

आरव का गला भर आया।

“लेकिन सच यह है कि उन्होंने मेरी पढ़ाई नहीं, मेरी फांसी का फंदा छुड़वाया था। अगर उस दिन उन्होंने मेरे हाथ से वो किताबें न छीनी होतीं और मुझे ब्रश न थमाया होता, तो आज आप मेरी पेंटिंग नहीं, मेरी हार-माला देख रहे होते। उन्होंने समाज की गालियां खाईं, मेरे पिता की नफरत झेली, अपने गहने बेचे… सिर्फ इसलिए ताकि मैं सांस ले सकूँ।”

आरव स्टेज से नीचे उतरा और दौड़कर सुमेधा के पैरों में गिर पड़ा। “थैंक यू माँ… मुझे बचाने के लिए।”

सुमेधा ने रोते हुए उसे उठाया और गले लगा लिया। आज उसे लगा कि उसके तीन साल की तपस्या सफल हो गई। ‘सौतेली’ शब्द आज आंसुओं में धुल गया था।

खन्ना साहब धीरे-धीरे उनके पास आए। वह नज़रे नहीं मिला पा रहे थे। उन्होंने सुमेधा के सामने हाथ जोड़ दिए।

“सुमेधा, मैं हार गया और तुम जीत गईं। मैं एक पिता होकर भी अपने बेटे की चीख नहीं सुन पाया, और तुमने… तुमने माँ बनकर उसे नई ज़िंदगी दी। मुझे माफ़ कर दो।”

सुमेधा ने उनके हाथ थाम लिए। “आप हारे नहीं हैं, आज आपका बेटा जीता है। और जब बेटा जीतता है, तो बाप अपने आप जीत जाता है।”

उस दिन गैलरी से निकलते वक्त खन्ना साहब का सिर गर्व से ऊँचा था, डॉक्टर आरव खन्ना के पिता के रूप में नहीं, बल्कि महान चित्रकार आरव खन्ना के पिता के रूप में। और सुमेधा? सुमेधा के चेहरे पर वो सुकून था जो दुनिया के किसी भी तगमे से बड़ा था।

समाज ने जिसे ‘किताबें छीनने वाली औरत’ कहा था, उसने असल में अपने बेटे को ज़िंदगी की सबसे बड़ी किताब पढ़ा दी थी—खुद पर विश्वास करने की किताब।

**कहानी का संदेश:**

हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बनने के लिए पैदा नहीं होता। कभी-कभी माता-पिता (और विशेषकर सौतेली माताओं) को समाज का विलेन बनना पड़ता है ताकि वे अपने बच्चे के असली हीरो बन सकें। पढ़ाई ज़रूरी है, पर ज़िंदा रहना और खुश रहना उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी है।

**अंत में आपसे एक सवाल:**

क्या सुमेधा ने आरव की पढ़ाई छुड़वाकर सही किया? क्या आज के दौर में माता-पिता को अपने सपनों का बोझ बच्चों पर डालना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।

**”अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही दिल को छू लेने वाली और मार्मिक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**

लेखिका : रमा साहू 

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