“वो भी बिना हमारी मर्जी जाने…!”
ड्रॉइंग रूम में खड़े हर व्यक्ति के चेहरे पर अलग रंग था—कहीं झुंझलाहट, कहीं घबराहट, कहीं बनावटी मासूमियत। लेकिन सबसे स्थिर चेहरा था माधवी का, जो चुपचाप अपने ससुर विनोद के पास खड़ी थी।
उसकी हथेलियाँ पसीने से भीग रही थीं, फिर भी उसने आंखें नीचे नहीं कीं। आज पहली बार घर के बड़े-बुजुर्गों ने “घर” को लेकर ऐसी बात छेड़ी थी, जो सालों से दबाई जा रही थी।
“तो ये है बात,” विनोद जी ने धीमी लेकिन ठोस आवाज़ में कहा। “तुम लोगों ने बैंक में लोन अप्लाई किया, पेपर्स साइन करा लिए… और हमें पता तक नहीं चला। घर के कागज़ ऐसे इस्तेमाल हुए जैसे ये सिर्फ तुम्हारा हो।”
आगे सोफ़े पर बैठे उनके बेटे अजय ने कुर्सी के किनारे उंगलियाँ मरोड़ी। उसकी पत्नी काव्या ने तुरंत बीच में घुसते हुए कहा, “पापा जी, इसमें क्या गलत है? हम घर के लिए ही तो कर रहे थे। रिनोवेशन, बच्चों की पढ़ाई… और वैसे भी घर तो आखिर परिवार का ही है।”
“परिवार का है,” विनोद जी ने उसकी तरफ देखा, “तो परिवार की मर्जी भी तो होनी चाहिए। हमें बूढ़ा समझकर अलग कर दोगे? हमारी सहमति की कीमत शून्य है?”
अजय के छोटे भाई विवेक ने बात संभालने की कोशिश की। “पापा, आप गलत समझ रहे हैं। हम तो बस… समय के हिसाब से आगे का सोच रहे थे।”
विनोद जी के पास बैठी उनकी पत्नी शैलजा ने पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी। “समय के हिसाब से? समय के हिसाब से तो हम भी जी रहे हैं। पर तुमने हमें समय से पहले ही बेकार समझ लिया।”
उनकी आंखों में पीड़ा थी, लेकिन शब्दों में सख्ती।
काव्या ने तुरंत नाटक-सा चेहरा बनाया। “मम्मी जी, आप ऐसा क्यों सोच रही हैं? हम तो आपकी सेवा…”
“सेवा?” शैलजा ने कटाक्ष नहीं किया, बस तथ्य रखा। “पिछले साल मेरी सर्जरी हुई थी तो हॉस्पिटल में कौन रहा था रातभर? मेरी बेटी नैना। तुम नहीं। तुम दोनों बहुएँ भी नहीं। और अभी दो महीने पहले दीवाली पर नैना आई थी, अपने पैसों से मेरे लिए शॉल लाई, पापा जी के लिए स्वेटर लाई। तुम लोगों ने क्या दिया? एक मिठाई का डिब्बा—वो भी सामने वाले सुपरमार्केट से।”
शैलजा की आवाज़ भर्रा गई, पर वह रुकी नहीं। “और फिर भी जब विरासत की बात आती है, तो तुम्हें लगता है बेटी का हिस्सा ‘एक्स्ट्रा’ है।”
कमरे में सन्नाटा उतर आया। नैना—जो घर की बेटी थी, शादी के बाद दूसरे शहर में रहती थी—आज वहीं बैठी थी। उसका चेहरा शांत था, लेकिन आंखें भीग चुकी थीं। वह कुछ कहना चाहती थी, पर पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखकर इशारे से रोक दिया।
विनोद जी ने एक गहरी सांस ली। फिर बोले, “अजय, विवेक… मैंने वसीयत बनवा दी है।”
अजय चौंका। “पापा, ये क्या कह रहे हैं?”
“हां,” विनोद जी की आवाज़ में बिल्कुल भी गुस्सा नहीं था, सिर्फ निर्णय था। “मेरे बाद ये घर शैलजा का होगा। और उसके बाद इसके तीन हिस्से होंगे—अजय, विवेक और नैना—तीनों के।”
काव्या की आंखें फैल गईं। “पर पापा जी… नैना तो शादीशुदा है। उसका तो…”
विनोद जी ने उसी पल उसकी बात काट दी। “उसका तो क्या? वो हमारी औलाद नहीं है? सिर्फ इसलिए कि वो लड़की है, उसका हक खत्म हो गया? और तुम… बहू बनकर आई हो तो पूरे घर की मालकिन हो गई? अजीब गणित है तुम्हारा।”
विवेक ने धीमे से कहा, “पापा, हम नैना के खिलाफ नहीं हैं… बस… घर का बंटवारा…”
“बंटवारा तुम्हें चुभता है,” शैलजा ने कहा, “पर नैना के सालों के त्याग का कोई हिसाब नहीं? शादी के बाद भी वो हर महीने हमारा मेडिकल, हमारी दवाइयाँ, हमारे चेकअप—सब देखती रही। और तुम लोगों ने? तुम्हारी जेब से तो राखी पर भी पैसा निकालने में जान निकलती है। हम ही देते हैं ताकि रिश्ते बने रहें।”
अजय तड़पकर उठा। “मम्मी, आप हमें स्वार्थी बोल रही हैं?”
“मैं सच बोल रही हूँ,” शैलजा ने कहा। “स्वार्थी शब्द तुम्हें चुभता है, पर व्यवहार नहीं चुभता।”
इधर माधवी चुप बैठी थी—विवेक की पत्नी। वह बाकी दोनों बहुओं से अलग थी, पर आज उसके चेहरे पर भी एक अजीब-सा अपराधबोध था। क्योंकि वह जानती थी, काव्या ने घर के कागज़ों की बात “बहुत चालाकी” से रखी थी, और दोनों भाइयों ने उसे सामान्य समझकर स्वीकार भी कर लिया था।
विनोद जी ने बात को और स्पष्ट किया। “और वसीयत में ये भी लिखा है कि शैलजा इस घर को बेच नहीं सकती।”
विवेक चौंका। “क्यों?”
विनोद जी ने सीधे बेटे की आँखों में देखा। “क्योंकि मैं तुम्हें जानता हूँ… और मैं तुम्हारी माँ को भी जानता हूँ। कहीं पैसों के लिए तुम अपनी माँ को भावनाओं में बहाकर कुछ भी साइन न करवा लो। ‘इमोशनली फुल’ बना दो—इसका भी डर है मुझे।”
काव्या के चेहरे का रंग उड़ गया। अजय ने होंठ भींच लिए। नैना की आंखें छलक पड़ीं।
और शैलजा… जैसे भीतर से थोड़ी हल्की हो गईं। शायद पहली बार उसे लगा कि उसका पति उसकी पीड़ा समझता है।
विनोद जी ने कुर्सी से उठते हुए कहा, “और एक बात… आज जब बात निकली है तो सुन लो। तीन महीने बाद तुम्हारी जो फाइनल पेमेंट है न, वो हो जाए तो तुम दोनों अपने-अपने घर में शिफ्ट हो जाओ।”
अजय का चेहरा लाल हो गया। “पापा! हम कहाँ जाएंगे?”
“किराए पर,” विनोद जी ने ठंडे स्वर में कहा। “जैसे हमने शुरू में किया था। इस घर का ऊपर वाला हिस्सा मैं किराए पर चढ़ा दूँगा। मेरी और शैलजा की पेंशन और किराया—दोनों मिलाकर हम आराम से जी लेंगे। अपनी मर्जी से। बिना किसी से पूछे। जब तक हम साथ हैं, जी लें। एक के जाने के बाद… फिर पता नहीं कैसे जीना पड़े।”
यह कहते हुए विनोद जी ने शैलजा की तरफ हाथ बढ़ाया। शैलजा ने हाथ थाम लिया। वह हाथ थामना सिर्फ पार्क जाने की तैयारी नहीं थी—वह अपने फैसले पर टिकने का ऐलान था।
वे गेट की तरफ बढ़े। कुछ कदम चलकर विनोद जी रुके, पलटे और कहा, “मैं बददुआ नहीं दे रहा। पर इतना जरूर कहूँगा—जब तुम हमारी उम्र में पहुँचोगे, तब समझोगे कि औलाद की बदलती नजर और बदलता रवैया कितना दुख देता है।”
वे दोनों बाहर निकल गए। भीतर चार लोग ऐसे रह गए जैसे किसी ने आईना दिखाकर कमरे में रख दिया हो।
कुछ देर तक कोई नहीं बोला। सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती रही।
पहली बार नैना ने बोलना चुना। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। “पापा ने जो किया, वो बदला नहीं है। वो सुरक्षा है। अपनी और मम्मी की।”
अजय तमतमाया। “तुम्हें तो फायदा हो गया ना?”
नैना ने उसी पल उसकी तरफ देखा—उस नजर में दुख था, गुस्सा नहीं। “फायदा? मुझे किसी चीज़ का लालच नहीं। लेकिन ये सोच कि मैं बेटी हूँ इसलिए मेरा हक नहीं… यही तो बीमारी है। मैं अगर चाहूँ तो अपने हिस्से को भी मम्मी-पापा के नाम कर दूँ… पर पहले ये मान लो कि मेरा हक ‘हक’ है—दान नहीं।”
माधवी ने धीरे से कहा, “भैया… नैना दीदी सही कह रही हैं।”
विवेक ने उसे घूरा, पर माधवी रुकी नहीं। “हमने घर को अपना समझ लिया, लेकिन घर वाले… हमसे बड़े हैं। उनका डर गलत नहीं है।”
काव्या ने अचानक रोने का नाटक किया। “मैं तो बस परिवार को जोड़कर रखना चाहती थी…”
माधवी ने पहली बार सख्ती से कहा, “परिवार जोड़ना घर के कागज़ छुपाकर नहीं होता, भाभी।”
विवेक का चेहरा झुक गया। उसे समझ आ गया कि गलती सिर्फ “काव्या” की नहीं, उसकी भी थी—क्योंकि उसने सवाल नहीं किया, बस सुविधा देखी।
तीन महीने बीत गए। किराए का घर ढूँढना आसान नहीं था। अजय को पहली बार एहसास हुआ कि जिन सुविधाओं को वह अपना अधिकार समझता रहा, वो पिता की मेहनत का फल थीं। विवेक और माधवी ने भी छोटा सा फ्लैट ले लिया।
शिफ्टिंग वाले दिन शैलजा ने बहुओं के हाथ में मिठाई रखी। आश्चर्य यह था कि उनके चेहरे पर कोई बदले की खुशी नहीं थी—बस एक शांत राहत थी।
उस शाम ऊपर का हिस्सा किराए पर चढ़ा दिया गया। विनोद जी ने घर की दीवारों पर नए पर्दे लगवाए, शैलजा ने अपने लिए एक छोटा सा पूजा-कोना बनाया। नैना ने आकर फ्रिज भर दिया, दवाइयों की सूची बना दी, और जाते-जाते कहा, “अब आप लोग खुद के लिए भी जीना सीखिए।”
कुछ दिन बाद पार्क में टहलते हुए शैलजा ने कहा, “आज पहली बार लगता है मैं अपने घर में मेहमान नहीं हूँ।”
विनोद जी मुस्कुराए। “और मैं पहली बार डर के बिना सोऊँगा।”
उधर अजय और विवेक… दोनों धीरे-धीरे बदलने लगे। दूरी ने उन्हें सिखाया कि सम्मान मुफ्त नहीं मिलता। जब वे रविवार को मिलने आते, तो पहले की तरह हक से नहीं, विनम्रता से आते।
एक दिन अजय ने पिता से कहा, “पापा… उस दिन जो कहा था… मैं समझ गया हूँ। मैं गलत था।”
विनोद जी ने कुछ नहीं कहा, बस उसके कंधे पर हाथ रखा।
कभी-कभी बड़े लोग माफी शब्दों से नहीं, व्यवहार से स्वीकार करते हैं।
और काव्या… उसके लिए यह सबसे बड़ा सबक था। उसे समझ आया कि बहू बनना अधिकार नहीं, रिश्ता है। रिश्ता तब ही टिकता है जब बेटी को भी बेटी समझा जाए।
उस घर में अब तीन हिस्सों की बात सिर्फ कागज़ पर नहीं थी—वह सोच में भी उतर चुकी थी।
क्योंकि घर की असली विरासत दीवारें नहीं… न्याय होता है। और न्याय वही है, जिसमें बेटी का हिस्सा “एहसान” नहीं, “हक” हो।
मूल लेखिका : शिप्पी नारंग