देवकी जी का बड़े बेटे सूरज पर कुछ ज्यादा ही स्नेह बरसता था। वह जब भी कुछ मीठा बनाती, तो सूरज के पसंद का ही मीठा बनाती थी ।यहां तक की कोई खाने की वस्तु भी होती, तो अपने बड़े बेटे सूरज को थोड़ा ज्यादा देती ।
अक्सर शर्मा जी अपनी पत्नी देवकी से बोल उठते थे । ये अच्छी बात नहीं है देवकी। दोनों बच्चों में जो तुम भेद भाव कर रही हो। भले ही आज हमारे बच्चे छोटे हैं।
मगर कल को जब बड़े हो जाएंगे, तो तुम्हें बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। मुझे आने वाले वक्त से डर लग रहा है । न जाने वक्त क्या रंग दिखा दे, इसीलिए मैं अपनी पुश्तैनी जमीन जो मेरे नाम पर है।
वह तुम्हारे और दोनों बच्चों के नाम जल्द ही करवा दूंगा। मैं देख रहा हूं, तुम्हारे इस लाड प्यार में आजकल सूरज कुछ ज्यादा ही बड़बोला और चालाकियां सीखने लगा है।
जबकि राम अभी से ही कितने अनुशासन के साथ चलता है । शायद तुमने कभी गौर किया या नहीं। मैं नहीं जानता । तुम्हारे ऐसे बर्ताव के बाद भी मैंने अक्सर राम की नजरों में हम दोनों के लिए बहुत ही सम्मान देखा है।
चाहे कुछ भी हो जाए। वह कितना भी थक जाए, मगर अपने छोटे-छोटे हाथों से मेरे पैर दबाना कभी नहीं भूलता, अगर सच कहूं तो हमारे लिए ऐसा सम्मान सूरज की नजर और जुबान पर मैंने कभी नहीं देखा और मैं उससे आने वाले समय में भी कोई उम्मीद नहीं करूंगा।
अब बाकी ऊपर वाला जाने । मुझे तुम्हें आगाह करना था क्यों कि ये मेरा फर्ज था। शर्मा जी की बात सुनते ही देवकी जी तुरंत बोल उठी। अजी ऐसी कोई बात नहीं है।
आप तो कुछ ज्यादा ही सोच रहे हैं। मैं प्यार तो अपने दोनों बच्चों से ही करती हूं। हां यह बात अलग है की सूरज से मेरा कुछ ज्यादा लगाव है क्योंकि सूरज हमारी जिंदगी में सबसे पहले आया बाकि और कोई वजह नहीं है।
मैं मानती हूं सूरज के मुकाबले राम ज्यादा समझदार है मगर समय के साथ देखिएगा ।सूरज भी राम के जैसे ही समझदार हो जाएगा।अभी हमारे दोनों बच्चे ही छोटे हैं।
रही बात हमारी पुश्तैनी जमीन की तो मुझे ऐसा लगता है। सूरज अपने छोटे भाई के साथ कभी बुरा नहीं करेगा। अचानक मां मैं राम के साथ क्या बुरा नहीं करूंगा कहते हुए सूरज हमारे करीब आकर बैठ गया।
मैं सूरज की बात सुनकर उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोल उठी। ऐसी कोई बात नहीं है बेटा। वह तो मैं और तेरे बाबूजी ऐसे ही कुछ बातें कर रहे थे।
शर्मा जी वकील को बुलाकर कोर्ट के कागजात बनवाते इसके पहले ही उनका एक्सीडेंट हो गया। एक्सीडेंट में उनकी दोनों आंखे जाती रही।
शर्मा जी अब पूरे लाचार हो चुके थे क्योंकि उन्हें कुछ दिखता नहीं था। राम हमेशा अपने बाबूजी से कहता। बाबूजी आप फिकर ना करें और मुझे अपनी आंखें मान लीजिए।
देवकी जी तो ठहरी उनकी पत्नी, उनसे भी उम्र के हिसाब से जितना बन पड़ता था। वह कभी पीछे नहीं हटती थी ।
मगर सूरज बाबूजी की सेवा तो दूर दो घड़ी उनके पास बैठता तक नहीं था । यह सब देखकर अब देवकी जी को भी बुरा लगने लगा था मगर,अब सूरज किसी की सुनता नहीं था।
ये सब देख शर्मा जी ने कई बार सूरज को समझाने की कोशिश करते मगर समझाया तो उसे जाता है जो थोड़ी समझने की कोशिश करें।
इसी तरह समय गुजरते गया । अब सूरज और राम दोनों का विवाह हो चुका था। अचानक एक दिन शर्मा जी ने भी हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद ली। देवकी जी के जीवन में हाहाकार सा मच गया। शर्मा जी के जाते ही सूरज ने धोखे से चुपके से सारी जमीन अपने नाम कर ली।
आज अचानक जब सूरज को फोन पर पुश्तैनी जमीन की बात करते हुए सुना तो उनसे रहा न गया । सूरज यह तूने जो भी किया है, बहुत गलत काम किया है। तूने अपनी मां का हिस्सा तो रखा ही मगर अपने भाई का हिस्सा भी रख लिया।
तुम बड़े भाई होकर ऐसा कैसे कर सकते हो । आज तुमने मेरे प्यार और संस्कार को झुठला दिया। तुम्हारे बाबूजी मुझे हमेशा तुम्हारे बारे में सीख दिया करते थे।
मगर मैं ठहरी बावरी जो कभी समझ ही नहीं पाई। देवकी जी यही नहीं रुकी क्योंकि आज उनके सब्र का बांध टूट चुका था वह फिर रोते हुए बोल उठी।
सूरज वक्त से डरो वरना एक दिन ऐसा सैलाब आएगा । जो तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ेगा। मैं तो मां हूं मैं तुम्हें बद्दुआ नहीं दे सकती, मगर अब आशीर्वाद भी नहीं दे सकती ।
मेरी भूल की सजा तुम राम को दे रहे हो। जिसके लिए मैं अब कभी तुम्हें माफ नहीं कर पाऊंगी।आज मैने बहुत बड़ी सीख ली है ।
सूरज कभी भी जमीन जायदाद के लिए अपने बच्चों का भरोसा नहीं करना चाहिए और कुछ ऐसा जतन करना चाहिए की कभी भी बच्चे अपनी माता-पिता या भाई बहन के साथ ऐसी धोखा घड़ी ना कर सके कहते कहते देवकी जी अपने बड़े बेटे की मोह की दीवार को तोड़कर जो कुछ अपने पास बचा खुचा था। वह लेकर मन में प्रायश्चित लिए भारी कदमों से राम के कमरे ओर चल पड़ी।
स्वरचित
सीमा सिंघी
गोलाघाट असम